उत्तराखंड: पानी में डूबा लोहारी गाँव, विस्थापित ग्रामीण कर रहे हैं पुनर्वास के लिए जमीन की मांग

उत्तराखंड के लोहारी गाँव के लगभग 500 ग्रामीणों की शिकायत है कि व्यासी बांध के पानी में उनके गाँव को डूबने से पहले उनके सामान को सुरक्षित स्थान पर ले जाने के लिए प्रशासन का दो दिन का नोटिस पर्याप्त नहीं था। विस्थापित ग्रामीण बेहतर मुआवजा पैकेज की मांग कर रहे हैं।

satyam kumarsatyam kumar   16 May 2022 10:29 AM GMT

उत्तराखंड: पानी में डूबा लोहारी गाँव, विस्थापित ग्रामीण कर रहे हैं पुनर्वास के लिए जमीन की मांग

धीरे- धीरे डूबते अपने घरों को देखती लोहारी गाँव की महिलाएं। फोटो। सत्यम कुमार

लोहारी (देहरादून), उत्तराखंड। लोहारी गाँव की सबसे बुजुर्ग गुमानी देवी ने अपने डूबे पुश्तैनी घर को एकटक निगाहों से देखा।

"पता नहीं कितने सालों पहले हमारे पूर्वजो ने ये गाँव बसाया होगा, मैंने अपनी जिंदगी का अधिकांश समय इस गाँव में गुज़ार दिया और मैं कितनी बदकिस्मत हू कि अपने अंतिम दिनों में अपने इस गांव को ख़त्म होते हुए भी देख लिया, "अपने डूबते गाँव को देखती रोती और अपने आंसू पोछते हुए कहती हैं।

गुमानी देवी लोहारी गाँव के उन अनुमानित पांच सौ लोगों में से एक हैं जिनके घर पिछले महीने 9 अप्रैल को बांध के पानी में डूब गए। बांध को देहरादून जिले के कालसी ब्लॉक में व्यासी जल विद्युत परियोजना के हिस्से के रूप में बनाया गया है।

9 अप्रैल को बांध के पानी में गाँव के सारे घर डूब गए। फोटो: सत्यम कुमार

120 मेगावाट (मेगावाट) की परियोजना यमुना नदी पर स्थापित की गई है। यह 86 मीटर ऊंचा कंक्रीट का बांध है और इसके जलाशय का पानी लोहारी में डूबा हुआ है।

ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें अपने पूरे परिवार को शिफ्ट करने के लिए दिया गया दो दिन का समय काफी नहीं था।

"हम अपने लकड़ी के दरवाजों और खिड़कियों को निकाल नहीं पाए। पहाड़ियों पर बने घरों में काफी लकड़ी होती है। जो पानी में बर्बाद हो गई है। हमें कम से कम एक सप्ताह का नोटिस दिया जाना चाहिए था, "गुमानी देवी ने कहा।

बाढ़ में डूबे इस गाँव में अनुमानित 70 परिवार रहते थे, जिनमें से कई अब एक महीने से अधिक समय से अस्थायी आश्रयों में रहने को मजबूर हैं। विस्थापित परिवारों की मांग है कि अधिकारी उन्हें आस-पास के क्षेत्रों में पुनर्वासित करें क्योंकि उनकी पिछली पीढ़ी को दिया गया मुआवजा, जब परियोजना के लिए भूमि का अधिग्रहण किया गया था, उनके लिए फिर से अपना जीवन शुरू करने के लिए 'बहुत कम' है।

'अपनी ही जमीन पर शरणार्थी'

जब गाँव कनेक्शन ने बांध के जलाशय का दौरा किया, जहां एक बार लोहारी गाँव खड़ा था, तो पाया कि 20 परिवार अस्थायी रूप से स्थानीय सरकारी स्कूल में स्थानांतरित हो गए थे, जबकि गाँव की बाकी आबादी पास के गाँवों में अपने रिश्तेदारों के घर रह रही थी।

विस्थापित परिवारों ने शौचालय की सुविधा और पानी तक पहुंच नहीं होने की शिकायत की। "हमें अपनी दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए समय-समय पर पानी के टैंकरों का ऑर्डर देना पड़ता है। सरकार ने तो बस हमें हमारे घरों से उजाड़ दिया है। हम एक ऐसे स्थान पर शरणार्थियों की तरह रह रहे हैं जो पीढ़ियों से हमारे पूर्वजों का घर रहा है, "विस्थापित ग्रामीणों में से एक ने अपना नाम बताए बिना कहा।

गाँव के स्कूल में जमा घरों से निकला लकड़ी का सामान। फोटो: सत्यम कुमार

"अधिकारी इस क्षेत्र को जलमग्न करने की इतनी जल्दी में थे कि उन्होंने हमारी उन फसलों पर भी विचार नहीं किया जो दो दिनों में काटी जा सकती थीं। हमारी गेहूं की फसल बांध के पानी में सड़ रही है "लोहारी गाँव के संदीप तोमर ने शिकायत की।

"हमें पता था कि किसी दिन हमें ज़मीन खाली करनी होगी, लेकिन इस बात का कोई अंदाज़ा नहीं था कि हमें इस तरह से भागना होगा। हम मांग करते हैं कि हमें जल्द से जल्द फिर से बसाया जाए, "तोमर ने कहा।

ग्रामीणों का कहना है कि मुआवजा पैकेज पर्याप्त नहीं है

ग्रामीणों का आरोप है कि उनकी जलमग्न भूमि का मुआवजा पर्याप्त नहीं है।

विस्थापित ग्रामीणों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था लोहारी पुनर्वास संघर्ष समिति के सचिव दिनेश तोमर ने गाँव कनेक्शन को बताया कि प्रशासन ने 1970 के दशक में जब परियोजना शुरू हुई थी, उससे अधिक जमीन का अधिग्रहण किया था।

दिनेश तोमर आगे बताते हैं कि हमारे द्वारा कई बार आंदोलन भी किये गए लेकिन फिर भी पिछले 1-2 वर्ष में कोई जनसुनवाई नहीं हुई। एसडीएम स्तर के अधिकारियों से बातचीत में सिर्फ यही पता चला कि ज़मीन के बदले ज़मीन नहीं मिलेगी और जो मुआवजा तय किया गया है, उसे ही स्वीकार करना होगा।

बाढ़ में डूबे इस गाँव में अनुमानित 70 परिवार रहते थे, जिनमें से कई अब एक महीने से अधिक समय से अस्थायी आश्रयों में रहने को मजबूर हैं।

साथ ही, कार्यकर्ता ने दावा किया कि परियोजना के लिए लोहारी गाँव से छह चरणों में भूमि का अधिग्रहण किया गया था, जबकि इसे क्षेत्र के अन्य गाँवों से एकल अधिग्रहण में हासिल किया गया था।

"वास्तव में अजीब बात यह है कि यहां तीन अलग-अलग ब्लॉक हैं जहां जमीन का अधिग्रहण किया गया है – कलसी, विकासनगर और धनोल्टी। इन तीन ब्लॉकों में जमीन अलग-अलग दरों पर अधिग्रहित की गई है, "तोमर ने कहा।

उन्होंने कहा, "कलसी प्रखंड में आने वाली हमारी जमीन 36 हजार रुपये प्रति एकड़ की दर से अधिग्रहित की गई है, जबकि अन्य जगहों पर 280,000 रुपये प्रति एकड़ की दर से एक एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया गया है( हम सभी ने अपने घर खो दिए हैं, अलग-अलग दरें क्यों लागू की जा रही हैं, "कार्यकर्ता ने तर्क दिया।

ग्रामीण चाहते हैं कि उनकी भूमि के नुकसान की भरपाई अन्यत्र समान भूमि का आवंटन करके की जाए। हालांकि, जिला प्रशासन ने उनकी मांग को ठुकरा दिया है।

अपने देवता को निकालते लोहारी के लोग। फोटो सत्यम कुमार

"इस जगह से लगभग 40 किलोमीटर दूर, प्रशासन हमें 25 वर्ग मीटर का प्लॉट और एक कमरा उपलब्ध करा रहा है। एक कमरे में एक परिवार कैसे रह सकता है? आसपास के वन क्षेत्र हमारी आजीविका के लिए उपलब्ध नहीं होंगे। साथ ही, हमारे कुछ कृषि क्षेत्र अभी भी यहाँ बचे हुए हैं, हम इतनी दूर रहकर अपने खेतों की देखभाल कैसे करेंगे, "ग्रामीण ब्रह्म देवी ने गाँव कनेक्शन को बताया।

विनोद कुमार, अनुमंडल मजिस्ट्रेट, विकास नगर ने विभिन्न मुआवजे के बारे में बताया।

"पहली पेशकश उन लोगों के लिए है जिन्होंने अपना घर खो दिया है। कुल 16 परिवारों को मुआवजे के रूप में आवास की पेशकश की गई है, जबकि जिनके पास पहले से ही एक घर है, उन्हें एक साल के लिए उनके घर का किराया मुहैया कराया जाएगा। उन्होंने कहा, "जिन परिवारों के पास जानवर या मवेशी हैं, उन्हें 8,000 रुपये दिए जाएंगे, जबकि जिनके पास नहीं है उन्हें 7,000 रुपये प्रति माह प्रदान किए जाएंगे।"

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