ग्राउंड रिपोर्ट: मुद्दों से इतर जाट राजनीति तक सीमित रह गया मुजफ्फरनगर चुनाव

मुजफ्फरनगर का यह चुनाव जाट राजनीति की दिशा तय करने वाला होगा, ऐसे में इस सीट का चुनाव मुद्दों से इतर सिर्फ जाट राजनीति पर केंद्रित होकर रह गया है।

Ranvijay SinghRanvijay Singh   8 April 2019 11:40 AM GMT

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ग्राउंड रिपोर्ट: मुद्दों से इतर जाट राजनीति तक सीमित रह गया मुजफ्फरनगर चुनाव

मुजफ्फनगर (उत्‍तर प्रदेश)। लोकसभा चुनाव 2019 के पहले चरण में पश्‍चिमी यूपी की आठ सीटों पर मतदान होने हैं। इन आठ सीटों में से सबसे ज्‍यादा चर्चा अगर किसी सीट की हो रही है तो वो मुजफ्फरनगर लोकसभा की सीट है। चर्चा इसलिए कि ऐसा माना जा रहा है मुजफ्फरनगर का यह चुनाव जाट राजनीति की दिशा तय करने वाला होगा, ऐसे में इस सीट का चुनाव मुद्दों से इतर सिर्फ जाट राजनीति पर केंद्रित होकर रह गया है।

इस सीट की आगे की कहानी जानने से पहले यहां के मुद्दों के बारे में जान लिया जाए तो बेहतर होगा। पश्‍चिमी यूपी को अपनी गन्‍ने की फसल की वजह से चीनी का कटोरा कहा जाता रहा है। इस कटोरे को चीनी से भरने में मुजफ्फरनगर का सबसे ज्‍यादा योगदान है। यहां गन्‍ने की खेती खूब होती है और इसी हिसाब से गन्‍ने के पेमेंट का मुद्दा भी यहां के लिए अहम है। दूसरा मुद्दा यहां का क्राइम ग्राफ है। क्राइम को लेकर लोग यहां बहुत परेशान दिखते हैं। आलम यह है कि एनकाउंटर और पुलिस की सख्‍ती के बावजूद भी बदमाश लगातार अपराध पर अपराध कर रहे हैं। तीसरा मुद्दा रोजगार का है। यहां के युवा रोजगार के लिए दिल्‍ली और दूसरे प्रदेशों में पलायन करने को मजबूर हैं।

इन तीन अहम मुद्दों के होते हुए भी मुजफ्फरनगर का यह चुनाव आखिर जाट राजनीति की ओर केंद्रित क्‍यों रह गया? इस सवाल का जवाब देते हुए मुजफ्फरनगर बुलेटिन के न्‍यूज एडिटर अंकुर दुआ कहते हैं, ''मुजफ्फरनगर की सीट पर जाट बिरादरी का हमेशा से दबदबा रहा है। पहले भी पार्टियां यहां जाट बिरादरी को ध्‍यान में रखकर टिकट देती आई हैं। इस बार चुनाव जाट राजनीति पर ज्‍यादा केंद्र‍ित इसलिए भी लग रहा है कि दो जाट नेता आमने-सामने हैं। मौजूदा सांसद संजीव बालियान और आरएलडी के अध्‍यक्ष अजित सिंह के आमने-सामने होने से इसकी चर्चा ज्‍यादा हो रही है।''

किसानों की राजधानी कहे जाने वाले मुजफ्फरनगर के स‍िसौली में हुक्‍का मीटिंग में बैठे कुछ किसान।

अंकुर दुआ कहते हैं, ''चाहे मोदी जी एयर स्‍ट्राइक करें या फिर विकास की बात करें, लेकिन मुजफ्फरनगर में जाति इतनी हावी है कि इसके इतर बात होगी ही नहीं।'' अंकुर दुआ बताते हैं, ''जाट के पीछे किसान जुड़ा होता है यानी जाट का मतलब है कि उसका परिवार किसानी से जुड़ा ही होगा। यही वजह है कि किसानों की राजधानी कही वाली सिसौली (भाकियू के हेडक्‍वाटर) में दोनों नेता जाते हैं। क्‍योंकि सिसौली में टिकैत परिवार रहता है, जो कि बालियान खाप के चौधरी हैं। अब वहां जाने से जाट बिरादरी का उन्‍हें समर्थन तो मिल ही सकता है, वहीं भाकियू के साथ किसानों का जो वोट बैंक जुड़ा है उसके भी उन्‍हें मिलने के आसार बनते हैं।''

लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत बालियान खाप में चौरासी गांव आते हैं। ऐसे में क्षेत्र में इसका अलग ही दबदबा है। हालांकि भाकियू अध्यक्ष और बालियान खाप के चौधरी नरेश टिकैत कहते हैं कि, ''उनका संगठन अराजनीतिक है। वो किसी भी पार्टि को सपोर्ट नहीं कर रहे। चुनाव से संगठन का कोई लेना-देना नहीं है।'' जब अपने पिता अजित चौधरी के लिए प्रचार करने के क्रम में जयंत चौधरी सिसौली पहुंचे तो ऐसी बात चलने लगी कि टिकैत परिवार ने जयंत को समर्थन दे दिया है। इसके बाद भाकियू के युवा विंग के अध्‍यक्ष गौरव टिकैत ने फेसबुक पोस्‍ट लिखकर इन बातों का खंडन किया।


पहले भी चुनाव के वक्‍त जाट बिरादरी के नेता अपने लोगों को एकजुट होकर वोट करने की अपील करते आए हैं। जब चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत थे उस वक्‍त चुनाव से पहले हुक्‍का पंचायतें हुआ करती थींं, जिसमें वोट किस कैंडिडेट को देना है यह तय होता था।

चुनाव को लेकर होने वाली हुक्‍का पंचायतों पर सिसौली में भाकियू हेडक्‍वाटर पर मिले सतवीर बताते हैं, ''हुक्‍का पंचायतों में यह चर्चा तो हमेशा से होती आई है कि अपने किस नेता को वोट देना है। जब बाबा महेंद्र थे तो वो इशारों में बता देते थे कि किसे वोट करना है, अब ऐसा नहीं होता। वैसे भी इस बाद दोनों अपने लोग ही आमने-सामने हैं। अब देखेंगे, जहां मन होगा, जो ज्‍यादा अपना लगेगा उसे वोट दे देंगे।''

मुजफ्फरनगर के बागोवाली गांव के रहने वाले आस मोहम्‍मद कहते हैं, ''चुनाव में इतने मुद्दे हैं लेकिन नेताओं को जाति से ऊपर उठना सही ही नहीं लगता। वजह यह भी है कि लोग भी इससे ऊपर उठ कर सोचना नहीं चाहते। ऐसे में उन्‍हें भी समीकरण बिठा कर जीत हासिल करनी है। यहां मुद्दे चुनाव से पहले और बाद में होते हैं। चुनाव में तो जाति समीकरण ही हावी रहता है।''

मुजफ्फरनगर में कुल मतदाता करीब 16 लाख हैं। इनमें से पुरुष वोटर 875186 और महिला वोटर की संख्‍या 713297 है। इस सीट पर मुसलमान वोटर्स की संख्‍या 5 लाख है वहीं जाट वोटर्स की संख्‍या डेढ लाख है। आरएलडी अध्‍यक्ष अजित सिंह इसी जाट+मुसलमान समीकरण को लेकर जीत की दहलीज पार करना चाहते हैं, लेकिन संजीव बालियान को यहां स्‍थानीय नेता होने का फायदा मिलते दिख रहा है। मुजफ्फरनगर के पिन्‍ना गांव के रहने वाले अजित बताते हैं, ''संजीव क्षेत्र में दिख जाते हैं। जब वो मंत्री थे तब भी यहां आते रहते थे। हमारे बीच उनका उठना बैठना है। ऐसे में हमारे लिए तो वो ही सही हैं।'' अजित की बात से मिलती जुलती बात यहां कई लोग दोहराते हैं। फिलहाल यहां वोटिंग 11 अप्रैल को होनी है। ऐसे में दोनों ही नेता वोटर्स को साधने में जुटे हैं, लेकिन इन चुनाव प्रचारों में अहम मुद्दे कहीं गुम ही नजर आते हैं।

मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट में आने वाली विधानसभाएं

1. खतौली

2. मुजफ्फरनगर

3. चरथावल

4. बुढ़ाना

5. सरघना


  

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