एक साथ नृत्य करते हुए बीत गए 50 साल, कुछ ऐसी थी पद्म जीतने वाले इस जोड़े की कहानी

एक साथ नृत्य करते हुए बीत गए 50 साल, कुछ ऐसी थी  पद्म जीतने वाले इस जोड़े की  कहानीशांता व वीपी धनंजयन

ऐसा कहते हैं कि अगर आपके करियर को बनाने में जीवनसाथी का सहयोग मिले तो राह काफी आसान हो जाती है लेकिन अगर आपका जीवनसाथी आपका हाथ थामकर, कदम से कदम मिलाकर आपके पूरे करियर में आपका साथ दे तो ज़िंदगी बेहद ख़ूबसूरत हो जाती है और ये सफर अगर 5 दशकों से भी ज्यादा एक साथ पूरा किया हो तब तो बात ही कुछ और है।

ऐसा ही एक जोड़ा हैं धनंजयन। वीपी धनंजयन और शांता धनंजयन। ये दोनों भारत के सबसे प्रसिद्ध भरतनाट्यम करने वाले जोड़ों में से एक हैं और ख़ास बात ये है कि इन दोनों को एक साथ नाट्य कला प्रदर्शित करते हुए 50 साल से ज़्यादा का समय बीत चुका है लेकिन उनकी प्रेम कहानी भी आसान नहीं थी।

वीपी धनंजयन का जन्म केरल के कन्नूर ज़िले के पयन्नुर में एक ग़रीब मलयाली पोडुवल परिवार में हुआ था और वो अपने आठ भाई - बहनों में से एक थे। शांता बहुत अच्छे मलयाली परिवार से थीं जो मलेशिया में रहता था। उन दोनों की दुनिया अलग - अलग थी, लेकिन भरतनाट्यम ने दोनों को साथ लाकर इस तरह जोड़ दिया कि वे फिर कभी अलग नहीं हुए। उन्हें 2009 में अपने नृत्यअकादमी भरत कालंजलि के माध्यम से 'भरतनाट्यम की कलाक्षेत्र परंपरा के विकास, संरक्षण और प्रचार' के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।

वीपी धनंजयन के पिता एक स्कूल टीचर थे जो स्टेज पर नाटक किया करते थे और धनंजयन अपने पिता को एक गाँव से दूसरे गाँव का सफर करते देखते हुए बड़े हुए थे। एक बार उनकी मुलाकात गुरु चांडू पैनिकर से हुई, जिन्हें कलाक्षेत्र की सह संस्थापक रुकमिणी देवी अरुंदले ने एक पुरुष नृतक को खोजने का काम दिया था। धनंजय को 5 अक्टूबर 1953 को 14 साल की उम्र में स्कॉलरशिप पर स्कूल में एडमिशन मिल गया।

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यही वो जगह थी जहां वो शांता से मिले। शांता मलेशिया में पली -बढ़ी थीं। उन्हें बहुत छोटी उम्र से नाचने गाने का शौक था जिसे उनके परिवार वालों ने समझ लिया था। इसलिए उनके माता - पिता ने उन्हें 1952 में आठ साल की उम्र में कलाक्षेत्र में एडमिशन दिला दिया था, जहां वे भारत नाट्यम सीख रही थीं। वीपी धनंजयन 1955 से 1967 तक कलाक्षेत्र में रहे और उन्होंने वहां से भारतनाट्यम व कथकली में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा लिया। शांता 1955 से 1968 तक कलाक्षेत्र में रहीं और उन्होंने ने भी वहां से भरतनाट्यम, कथकली व कैरनेटिक संगीत में परास्नातक डिप्लोमा लिया।

कलाक्षेत्र में शांता से धनंजयन का प्यार पहली नज़र का प्यार था। शांता पहली लड़की थीं जिनसे वो उस स्कूल में मिले थे। हालांकि शांता बहुत ही शांत और अपने नृत्य व संगीत के लिए निष्ठावान थीं लेकिन उन्होंने 12 साल की उम्र में ही ये तय कर लिया था कि वो अपनी ज़िंदगी धनंजयन के साथ बिताएंगी। धनंजयन 18 साल के थे जब उन्होंने शांता से अपनी भावनाओं का इज़हार किया था लेकिन ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद शांता मलेशिया चली गईं और उन्होंने 4 साल बाद यानि जब तक वो भारत लौट कर नहीं आईं धनंजयन को कुछ नहीं बताया।

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उन्हें कलाक्षेत्र प्रोडक्शन में गुरु चांडू पैनिकर व रुकमिणी देवी ने कई कार्यक्रमों में साथ में रखा। चाहें वो राम और सीता हो या अनिरुद्ध व चित्रलेखा, स्टेज पर दोनों ने अपने किरदारों को हमेशा बहुत अच्छे से निभाया। वेबसाइट बेटर इंडिया के मुताबिक, धनंजयन बताते हैं कि शांता से पहली बार मैं थेयोसोफिकल गार्डन में मिला था और उन्हें मेरी देखभाल की ज़िम्मेदारी दी गई थी क्योंकि मुझे तमिल नहीं आती थी। मुझे उनकी आदतों और कठिन परिश्रम करने वाला व्यवहार बहुत पसंद था। वह बताते हैं कि जब मैंने शांता को अपने दिल की बात बताई उसके बाद वो मलेशिया चली गईं लेकिन जब उनके लिए रिश्ते आने लगे तब वो उनके लिए मना करने लगीं। उनके माता -पिता को समझ आ गया कि मेरे लिए उनका प्यार सच्चा है। उनके परिवार ने भी हमें आर्शीवाद दिया और हमने 1966 में केरल के गुरुवायूर मंदिर में शादी कर ली। 60 के दशक के आखिर में उन दोनों ने कलाक्षेत्र को छोड़ दिया और इसके बाद उन्होंने अपने संस्थान भारत कलांजली की स्थापना की, जिसे अब भारतनाट्यम के अच्छे संस्थानों में से एक माना जाता है।

धनंजयन कहते हैं कि इस सबके बीच मेरे लिए सबसे ज़रूरी था शांता को खुश रखना क्योंकि मेरे पास ज़्यादा पैसे नहीं थे। मैं बहुत आम से परिवार से था और शांता का परिवार धनाढ्य था। वो सारे आराम छोड़कर मेरे साथ आई थीं। हमारे संस्थान को भी बिना किसी की आर्थिक मदद के खड़ा करना मेरे लिए चुनौती की तरह था लेकिन हमने मेहनत की और इस चुनौती को पूरा किया।

वे अपनी कला को सिर्फ 'नाट्य' कहते हैं क्योंकि उनका कहना है कि नृत्य कुछ भी हो सकता है लेकिन 'नाट्य' का भारतीय कला संस्कृति में विशेष अर्थ है। इन दोनों ने एक साथ कई स्टेज परफॉरमेंस दी हैं। इन दोनों ने 1980 में खजुराहो डांस फेस्टिवल में, 1981 में जर्मन राष्ट्रपति के लिए भी इन दोनों ने विशेष परफॉरमेंस दी। 1988 में राष्ट्रपति भवन में भी अपनी कला का प्रदर्शन किया। धनंजयन ने कई अंतरराष्ट्रीय कलाकारों के साथ भी मिलकर काम किया। सितारवादक पंडित रविशंकर, न्यूयॉर्क के डांसर जैक्स डी अंबोइज़, द ओहिओ वैलेट कंपनी के साथ काम किया।

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साल 2017 में आए एक विज्ञापन में भी ये जोड़ा नज़र आया था। इस बारे में बात करते हुए धनंजयन ने द न्यूज़ मिनट को बताया था कि उनका बेटा सत्यजीत एक फोटोग्राफर है, उससे किसी ने संपर्क किया था कि क्या उसके माता - पिता इस कैंपेन का हिस्सा बनेंगे। पिछले साल मार्च में उन्हें ये ऑफर मिल था। धनंजयन ने इसके लिए हां कह दिया और गोवा में इस विज्ञापन की शूटिंग की। वह कहते हैं कि इस दौरान हमने काफी कुछ पहली बार किया जैसे शांता ने पैरासेलिंग की और मैंने स्कूटर चलाया। ये भी हम दोनों के लिए अच्छा अनुभव था।

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