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अगर गाय और गोरक्षक के मुद्दे पर भड़कते या अफसोस जताते हैं तो ये ख़बर पढ़िए...

लखनऊ। केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद जो शब्द सबसे ज्यादा चर्चा में रहे उनमें से एक गोरक्षक भी था। देश के हर कोने से गोरक्षकों की ख़बरें आईं। संसद और विधानसभाओं में चर्चा हुई तो सड़कों पर हंगामा शुुरू हुआ। सड़क से लेकर सोशल मीडिया में भक्तों का ऐसा सैलाब उमड़ा कि एक बारगी लगा कि गाय अब न भूखे मरेंगी और न ही सड़कों पर नजर आएंगी।

लेकिन हालात इसके बिल्कुल उलट हैं। उत्तर प्रदेश का कोई शहर, गांव कस्बा हो या देश का कोई दूसरा शहर सड़क पर गायों के झुंड के झुंड नजर आएँगे। जबकि ऐसी गायों को पालने ने बनाई गई गोशालाओं में अवस्थाओं के बीच मायूसी पनप रही है।

“आजकल गोरक्षा ठगी का एक साधन है। सड़कों पर गोरक्षा करने वाले केवल अपने घर भरते हैं। हमारी गोशाला में आज तक कोई व्यक्ति नहीं आया जो ये बोले की हमें गायों की सेवा करनी है, जो कर्मचारी हैं सबको सैलरी देते हैं।” ताराचंद गुप्ता, राजस्थान के झुंझुनूं शेखावटी क्षेत्र में श्रीगोपाल गोशाला के अध्यक्ष गुस्से में कहते हैं।

आजकल गोरक्षा ठगी का एक साधन है। सड़कों पर गोरक्षा करने वाले केवल अपने घर भरते हैं। हमारी गोशाला में आज तक कोई व्यक्ति नहीं आया जो ये बोले की हमें गायों की सेवा करनी है,
ताराचंद गुप्ता, श्रीगोपाल गोशाला, झुंझुनूं, राजस्थान

ताराचंद गुप्ता का गुस्सा जायज भी लगता है। ये गोशाला 130 वर्ष पुरानी है और यहां 1400 गाय, बछड़े, बछिया और सांड हैं। गोशाला में इन पशुओं की सेवा करने के लिए 60 कर्मचारी हैं, जो सैलरी पर हैं। गोशाला दान के पैसों और कुछ सरकारी मदद से बामुश्किल चल रही है।

राजस्थान के झुंझूनुं से करीब 600 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश के पीलीभीत चलते हैं। यहां पूरनपुर ब्लॉक नवादिया मकसूदपुर गाँव में 12 एकड़ में माता भगवती देवी गोशाला बनी हुई है। 12 साल पुरानी गोशाला को हमेशा दानवीरों के इंतजार में रहती है। यहां व्यवस्थापक अनंतराम पालिया बताते हैं, “लोगों को लगता होगा कि गोशाला को या तो सरकार या कोई पार्टी मोटा पैसा दोती होगी लेकिन असलियत है कि हमें एक भी पैसे की सरकारी मदद नहीं मिलती। कुछ लोग दान देते हैं बाकी गोबर और गोमूत्र के उत्पाद बनाकर किसी तरह काम चला रहे हैं।”

पीलीभीत की गोशाला।

सिर्फ इन दो गोशालाओं की स्थिति ऐसी नहीं है, गांव कनेक्शन ने उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान में दर्जनों गोशालाओं में बात की है, उनके हालात और अनुभव बताते हैं कि गोरक्षक, गाय से प्रेम का मुद्दा जमीन पर कहीं नजर नहीं आता। हर छह साल में देश में होने वाली (जो 2012 में हुई ) पशुगणना (इसे 19वीं पशुगणना कहते हैं) के मुताबिक देश के 51 करोड़ मवेशियों में से गोवंश (गाय-सांड, बैंड बछिया, बछड़ा) की संख्या 19 करोड़ है। उत्तर प्रदेश में दो करोड़ 95 लाख गोवंश हैं। जबकि पूरे देश में रजिस्टर्ड गोशालाओं की संख्या 3500 है। उत्तर प्रदेश में 1967 में जहां 65 गोशालाएं पंजीकृत थीं, वहीं 2015 में इनकी संख्या बढ़कर 390 हो गई। वर्तमान समय में इनकी संख्या 450 है।

पिछले दिनों राजस्थान में जालौर की पचमेढ़ा गौशाला में सैकड़ों गायों की मौत हो गई। गायों की मौत बाढ़ के पानी से हुई, सबसे ज्यादा मौते उन गायों की हुई जो चलने फिरने में असमर्थ थीं और उन्हें उठाने के लिए कर्मचारियों की संख्या काफी कम थी। पिछले साल राजस्थान की हिंगोनिया गोशाला में भी कई गायों की मौत हो गई थी। इसकी वजह पर गौर करना इसलिए जरुरी है क्योंकि लचर प्रबंधन और मूलभूत सुविधाओं के अभाव के चलते कर्मचारी हड़ताल पर चले गए थे और नतीजन ये हादसा हुआ।

अगर आप गाय के मुद्दे पर पक्ष या विपक्ष में ख़ड़े होते हैं तो थोड़ा और विस्तार से समझिए। डंडे और तलवार लेकर सड़क पर हंगामा करने वाले, खून खराबा करने वाले कथित गोरक्षकों से गाय के शुभचिंतकों और पशु पालकों को खासी नाराजगी देखी जा सकती है। उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड इलाका, जहां के लिए सूखे के साथ छुट्टा पशु भी कलंक जैसे हैं, जिन्हें अऩ्ना पशु कहा जाता है।

बांदा के डेयरी संचालक रमाकांत तिवारी गांव कनेक्शन को बताते हैं, “मैंने आज हंगामा करने वाले गोरक्षक के यहां आजतक एक गाय नहीं देखी, उन्हें तो ये भी नहीं पता होगा कि गाय पालते कैसे हैं। मेरी समझ से ये सब अपने क्षेत्र में दबदबा बनाने और राजनीति चमकाने के लिए करते हैं।”

गोरक्षा के नाम पर कुछ लोग अपनी दुकानें खोलकर बैठ गए है। गोभक्त अलग हैं गोसेवक अलग है। गाय कत्ल से कम प्लास्टिक खाने से ज्यादा मरती हैं। अगर सच्चे गोरक्षक हैं तो सड़क पर प्लास्टिक फेंकना बंद करा दें।
नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री, पिछले दिनों एक कार्यक्रम में।

गोरक्षकों का मुद्दा इस कदर उठा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक को दखल देना पड़ा। उनका बयान भी गौर करने वाला है। दिल्ली की एक कॉन्फ्रेस में प्रधानमंत्री ने कहा, " गोरक्षा के नाम पर कुछ लोग अपनी दुकानें खोलकर बैठ गए है। मुझे इतना गुस्सा आता है। गोभक्त अलग हैं गोसेवक अलग है। गाय कत्ल से कम प्लास्टिक खाने से ज्यादा मरती हैं। अगर सच्चे गोरक्षक हैं तो सड़क पर प्लास्टिक फेंकना बंद करा दें।’

अऩंतराम पालिया, व्यस्थापक. पीलीभीत गोशाला

गाय इसलिए मुद्दा बन गई और संकट में इसलिए संकट में आ गई क्योंकि उसे एक धर्म विशेष से जोड़ दिया गया। लेकिन सच्चाई यह है कि गाय का दूध इतना उपयोगी है कि उसे इतना महत्व दिया गया है। गायका दूध उपयोगी होता है, उसके गाय और उसके बछड़े खेती में काम आते हैं। गोमूत्र से आयुर्वेदिक दवाएं बनती हैं। अमेरिका में हाल में एक शोध हुआ है तो हमारी सोच से कहीं ज्यादा उपयोगी साबित करता है। अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ के मुताबिक गाय की मदद से एचआईवी का टीका बनाने में मदद मिल सकती है। उनका मत है कि कॉप्लेक्स और बैक्टीरिया युक्त पाचन तंत्र की वजह से गायों में प्रतिरक्षा की क्षमता ज्यादा अच्छी और प्रभावशाली होती है।

अमेरिका में हाल में एक शोध हुआ है तो हमारी सोच से कहीं ज्यादा उपयोगी साबित करता है। अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ के मुताबिक गाय की मदद से एचआईवी का टीका बनाने में मदद मिल सकती है।

जर्मनी के नेतृत्व में यूरोपियन यूनियन ने पर्यावरण सुरक्षा के लिए सभी देशों की उर्जा आवश्यकताओं के पच्चीस प्रतिशत हिस्से को जैविक उर्जा से पूरा करने का लक्ष्य तय किया है। जो मूलतः के लिए गाय और गोबर की तकनीकों पर अमल करके हासिल की जाएगी।

भारतीय नस्ल की गाय ब्राजील में 100 लीटर दूध देकर रिकार्ड बनाती है और हमारे यहां लाखों गाएं किसानों के खेतों को बर्बाद करती हैं। सड़कों पर कचरा खाती हैं। और इन गायों की जो सच में सेवा करना चाहते हैं वो आर्थिक संकट से गुजरते हैं।

बरेली के आईवीआरआई केवीके के प्रधान वैज्ञानिक डॉ बीपी सिंह बताते हैं,"देसी गायों में फैट कम होता है जो मनुष्य के शरीर के लिए अच्छा होता है। गाय के दूध में ही विटामिन ए पाया जाता है। गाय का दूध भैंस और विदेशी नस्ल की गायों की अपेक्षा ज्यादा सेहतमंद होता है। जो हमारे देश की गाय है वो अपनी जलवायु के अनुकूल है इसलिए उनका दूध भी हमारे लोगों के लिए सही है विदेशी गायों का दूध यहां लोगों को अनूकूल नहीं है इनके दूध के लंबे सेवन से नुकसान भी है।"

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लखनऊ शहर से करीब में सरोजनी ब्लॉक के नादरगंज में स्थित जीवाश्रय गौशाला के सचिव यतींद्र त्रिवेदी बताते हैं, “गौशालाओं में सरकार द्वारा प्रति पशु 50 रुपए दिए जाते हैं, जबकि एक पशु पर 75-80 रुपए का खर्चा आता है। और उन पर जो व्यक्ति काम कर रहा है उसको अलग से पैसा देना पड़ता है। सरकार जितनी गोशाला की क्षमता है उतने ही पशु का खर्चा देती है। अगर गौशाला में पशु बढ़ गए तो उनको खुद से खिलाना पड़ता है क्योंकि गोशालाओं की क्षमता बहुत ही सीमित होती है।”

गोशालाओं को मदद की जरुरत- गोसेवा आयोग

इसी महीने में उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जो कि खुद गोभक्त हैं, प्रदेश में गोसेवा आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति की। पूर्व आईएएस डॉ राजीव गुप्ता मुख्य सचिव स्तर का कैडर दिया गया है। वो बताते हैं, "गोशालाओं को सपोर्ट की आवश्यकता होती है। उनको सरकारी सहायता बहुत कम मिल पाती है और यह समस्या हर गोशाला में है कि लोग काम करने के लिए नहीं मिलते है। इसके लिए जरुरी है कि सभी गोशालाओं को स्वावलंबी बनाए जाए ताकि वो उत्पाद बेचकर गोशालाओं को अच्छे से संचालित किया जा सकता है।”

गोशालाओं को सपोर्ट की आवश्यकता होती है। उनको सरकारी सहायता बहुत कम मिल पाती है और यह समस्या हर गोशाला में है कि लोग काम करने के लिए नहीं मिलते है।
डॉ. राजीव गुप्ता, अध्यक्ष, यूपी गोसेवा आयोग

गोशाला में काम करना है तो कोई तैयार नहीं होता

मध्यप्रदेश के भोपाल जिले के आनंद नगर में स्थित 'श्री महामृत्युंजय गौ सेवा सदन' में करीब 2000 गोवंश है, जिनकी सेवा के लिए केवल 9 कर्मचारी है। पिछले 33 वर्षों से गोशाला के सचिव गोविंद व्यास बताते हैं, "किसी को बोलो गोशाला में काम करना है तो कोई तैयार नहीं होता है। अभी बरसात चल रही इसमें और ज्यादा सफाई की जरुरत हो जाती है।”

गोशालाओं के सामने रहता है आर्थिक संकट।