पोल्ट्री फार्मों में इस्तेमाल की जा रही एंटीबायोटिक दवाएं आपको बना रही हैं रोगी

Diti BajpaiDiti Bajpai   26 Oct 2017 12:55 PM GMT

पोल्ट्री फार्मों में इस्तेमाल की जा रही एंटीबायोटिक दवाएं आपको बना रही हैं रोगीमुर्गी-मुर्गों को रोग ग्रस्त और तेजी से वजन बढ़ाने के लिए दिया जाता है एंटीबॉयोटिक

पोल्ट्री उत्पाद यानि चिकन लोग स्वाद और सेहत बढ़ाने के लिए करते हैं लेकिन कुछ पोल्ट्री फार्म में ऐसे एंटीबोयिटिक इस्तेमाल किए जा रहे हैं जो आपके मुंह का स्वाद भले बढ़ाते हों लेकिन सेहत बर्बाद कर देंगे, आपकी शरीर में पहले से इतना एंटीबायोटिक पहुंच चुका है कि बीमार होने पर ये दवाएं असर ही नहीं करेगी, पढ़िए दिति बाजपेई की रिपोर्ट

नई दिल्ली। मुर्गे-मुर्गियों में मांस बढ़ाने के लिए उनको पोल्ट्री फार्म में दी जाने वाली एंटीबायोटिक दवाएं चिकन के जरिए मनुष्यों के शरीर में पहुंच कर विपरीत असर डाल रही ही हैं।

जब चिकन में मौजूद एंटीबायोटिक दवाएं मनुष्य के शरीर में पहुंचती हैं तो मानव शरीर में मौजूद कीटाणु उसके आदी हो जाते हैं, इसके बाद इंफेक्शन या कोई अन्य बीमारी होने पर एंटीबयोटिक दवाएं जब दी जाती हैं तो वह मनुष्यों शरीर पर असर ही नहीं करतीं।

अगर मांसाहारी व्यक्ति के शरीर में एंटीबायोटिक दवाएं पहले से मौजूद हैं, तो जब उस दवा को खाया जाएगा तो वह असर नहीं करेगी। ऐसे ही एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल मानव जीवन के लिए खतरनाक है।
प्रो. आरके दीक्षित, मेडिसिन विभाग, केजीएमयू, लखनऊ

इस खतरे को लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में औषधि विभाग के प्रो. आरके दीक्षित बताते हैं, "अगर मांसाहारी व्यक्ति के शरीर में एंटीबायोटिक दवाएं पहले से मौजूद हैं, तो जब उस दवा को खाया जाएगा तो वह असर नहीं करेगी। ऐसे ही एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल मानव जीवन के लिए खतरनाक है।"

‘सेंटर फॉर डिजीज डायनैमिक्स, इकनॉमिक्स एंड पॉलिसी के वाशिंगटन डीसी और नई दिल्ली के डायरेक्टर, रामानन लक्ष्मीनारायण की अगुवाई में किए गए एक अध्ययन में बताया गया है कि भारतीय पोल्ट्री फार्म में एंटीबायोटिक्स को चूजों को बढ़ाने और बीमारी से दूर रखने के लिए नियमित तौर पर दिया जा रहा है।

पोल्ट्री फार्मों में प्रयोग होने वाली एंटीबायोटिक दवाओं के इस्तेमाल में भारत मौजूदा समय में चौथे स्थान पर है। अगर पोल्ट्री उद्योग में ऐसे ही अंधाधुंध एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल होता रहा तो वर्ष 2030 तक भारत एंटीबायोटिक्स के इस्तेमाल में पहले पायदान पर होगा।

पोल्ट्री फार्म में एंटीबॉयोटिक इस्तेमाल करने के मामले में भारत दुनिया में चौथे नंबर पर है।

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‘सेंटर फॉर डिजीज डायनैमिक्स, इकनॉमिक्स एंड पॉलिसी के अध्यन में बताया गया है कि एंटीबायोटिक्स के अंधाधुंध इस्तेमाल से इसको बेअसर करने वाले बैक्टीरिया के विकसित होने की आशंका बढ़ गई है, जिससे व्यक्तियों में ऐसे संक्रमण पैदा हो सकते हैं, जिनका इलाज करना मुश्किल होगा।

"जो किसान व्यवसायिक स्तर पर मुर्गीपालन व्यवसाय कर रहा है वो एंटीबायोटिक्स का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। फार्मों में रोगों को रोकने के लिए मुर्गीपालक कई तरह-तरह के एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल करते हैं क्योंकि व्यवसायिक स्तर पर उनको मुर्गियों के वजन बढ़ाने से मतलब होता है उसका इंसानों पर क्या असर पड़ेगा इससे कोई मतलब नहीं रहता है।" ऐसा बताते हैं, हैदराबाद स्थित कुक्कुट अनुंसधान निदेशालय के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॅा आर वी राव।

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पूरे भारत में पोल्ट्री का बाजार तेजी से बढ़ रहा है। वर्ष 2004 से 2011 के बीच ग्रामीण भारत में चिकन की खपत में दोगुनी हुई है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के मुताबिक खपत प्रति व्यक्ति 0.13 किलोग्राम से बढ़़कर 0.27 किलोग्राम तक पहुंच गई है, शहरी भारत में इसी अवधि में 0.22 किलोग्राम से लेकर 0.39 किलोग्राम तक बढ़ोत्तरी हुई है।

“पशु-पक्षियों में बैक्टीरिया के द्वारा जो भी जीवाणुजनित रोग होते हैं उनको रोकने के लिए उपचार के रूप में एंटीबायोटिक दवाओं का निर्धारित मात्रा में प्रयोग किया जाता है लेकिन अधिक लाभ लेने के लिए किसान इसको ज्यादा प्रयोग कर रहा है। लेयर्स की अपेक्षा ब्रायलर्स में एंटीबायोटिक्स दवाओं का ज्यादा इस्तेमाल होता है क्योंकि मुर्गियों की समय से जल्दी बढ़वार होती है और वजन भी ज़्यादा होता है जो बाजार में महंगे दामों में बिकता है।’’ झांसी स्थित पशुपालन विभाग के मुख्य पशुचिकित्साधिकारी डॅा. वीके. सिंह ने बताया।

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डॉ सिंह आगे बताते हैं, ‘‘चारे में एंटीबायोटिक दवाओं को मिलाने से पक्षियों में प्रतिरोधी क्षमता बढ़ जाती है, जिससे उनमें संक्रमण (इंफेक्शन) नहीं फैलता है और उनकी बढ़वार जल्दी होती है।’’

उत्तर प्रदेश के कुक्कुट निदेशालय के संयुक्त निदेशक डॅा वीके सचान ने बताया, " विदेशो में जो मुर्गी फार्म होते है उन पर इन बातों पर ध्यान दिया जाता है कि कितनी मात्रा तक फार्मों में एंटीबायोटिक्स दवाओं का प्रयोग किया जा सकता है वह उतनी ही मात्रा में प्रयोग करते है पर भारत में अभी यह स्थिति नहीं है। भारत में एंटीबायोटिक्स स्वतंत्र रूप से और सस्ते में उपलब्ध हैं जिस कारण इसका प्रयोग आम बात है।"

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लक्ष्मीनारायण द्वारा किया गया अध्ययन ‘एनवायरमेंटल एंड हेल्थ पर्सपेक्टिव्स’ नाम के जर्नल में प्रकाशित हुआ है। लक्ष्मीनारायण का कहना है कि भारत में एंटीबायोटिक्स को लेकर जागरूकता की कमी बड़ी चिंता की बात है। ऐसा लगता है कि भारत में उपभोक्ता उन परिस्थितियों को नहीं जानते जिनमें उनका बटर चिकन पाला जाता है।

मुर्गियों के आहार के लिए भारतीय मानक ब्यूरो ने निर्देश दिए हैं, जिसके मुताबिक एंटीबायोटिक का उपयोग इनके विकास के लिए नहीं किया जाना चाहिए, हालांकि इसे भी अनिवार्य नहीं बनाया गया है। ऐसे में एंटीबायोटिक के इस्तेमाल पर कोई रोक नहीं है।

पोल्ट्री फार्म पर एंटीबायोटिक इस्तेमाल के लिए नहीं है सख्त गाइडलाइऩ।

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