40 बरस बाद भी अपनी बसाई बस्ती में रहते हैं बंजारों की तरह

जुर्माना भरने के बाद भी नहीं मिला जमीन का पट्टा, बुनियादी जरूरतों को तरस रहे हैं मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के गांव वाले

40 बरस बाद भी अपनी बसाई बस्ती में रहते हैं बंजारों की तरह

निकिता डिक्रूज,

एक आम किसान की तरह सुंदर अहिरवार भी जीतोड़ मेहनत करके अगली फसल की बुवाई के लिए पूंजी जुटाते हैं। लेकिन उनकी समस्याएं आम किसानों से थोड़ी अलग हैं। वह कहते हैं, "पड़ोस के गांव के रहने वाले अपने जानवर मेरे खेत में चरने के लिए छोड़ देते हैं। हर साल मेरी आधी उपज इन्हीं जानवरों की भेंट चढ़ जाती है।" लेकिन सुंदर न तो इन जानवरों को अपने खेत से भगाने का साहस जुटा पाते हैं और न ही इसकी शिकायत किसी से कर सकते हैं। सुंदर कहते हैं, "जिन लोगों के ये जानवर हैं वे ऊंची जाति के दबंग लोग हैं। हम शिकायत नहीं कर सकते नहीं तो वे हमें नुकसान पहुंचा सकते हैं, हमारे साथ मार-पीट भी कर सकते हैं।"

पुषियाना बाई का घर गिर चुका है, वह हालात से निराश हो चुकी हैं।

यह समस्या अकेले सुंदर की नहीं है, मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के छापर माजरा में रहने वाले सभी 25 किसानों की यही परेशानी है। पर यह कोई नई बात नहीं है। "हमें इस जगह रहते हुए 40 बरसों से ज्यादा हो गए हैं लेकिन न तो रहने के लिए और न खेती के लिए हमारी अपनी जमीन है" सुंदर ने बताया। छापर में रहने वाले सभी लोग तथाकथित निचली जातियों के हैं जिनका मुख्य व्यवसाय खेती है। इन लोगों ने लगभग 3 से 4 एकड़ जमीन साफ करके उसे खेती के लायक बनाया है।

छापर की कहानी 80 के दशक में शुरू होती है। करीब 25 परिवार पास ही के गांव ककरेती छोड़कर ऐसी जगह तलाशने निकले जहां घर बनाने और फसल उगाने के लिए थोड़ा स्थान मिल सके। "हमारे परिवार बढ़ रहे थे लेकिन अपने पुश्तैनी गांव में अब जगह नहीं बची थी। इसके अलावा हम लोग निचली जाति से थे इसलिए हमारे पास खेत नहीं थे। इसलिए हम छापर आ गए, यहां जगह तो थी पर झाड़ियों के अलावा और कुछ नहीं था। हमने यह जगह साफ की और रहने लगे।" छापर माजरा के पंच गेंदलाल कहते हैं। "लेकिन यहीं से हमारी समस्याओं की शुरूआत हुई। सरकार ने हमें अवैध कब्जेदार मानते हुए कहा कि अगर हम यहां रहना चाहते हैं तो हम जुर्माना भरें। यहां रहने वाले हर परिवार ने 1988 में 35-40 रुपए तक का जुर्माना भरा है। हममें से अधिकांश के पास उस समय की असली रसीदें हैं।" यह कहते हुए वह 1988 में जारी की गई फटी-पुरानी रसीदें दिखाते हैं। ये रसीदें उस समय की हैं जब यहां वन्य अधिनियम और दूसरे कानून लागू नहीं हुए थे। गेंदलाल आगे कहते हैं, "कुछ परिवारों ने तो दो बार, कुछ ने तीन बार जुर्माना भरा है। जुर्माना भरने हमें तहसीलदार के दफ्तर जाना पड़ता था। ऐसा करने पर हमारी उस दिन की मजदूरी का नुकसान होता था। 2011 में हमने 1500 रुपए तक का जुर्माना भरा है। हमें एक दिन की मजदूरी 250 से 300 रुपए मिलती थी, इस हिसाब से हमारी एक हफ्ते की कमाई जुर्माने में ही चली जाती थी।"

छापर माजरा के लोगों के पास आज भी जुर्माने की लगभग 40 बरस पुरानी रसीदें हैं।

2006 के वन अधिकार अधिनियम की धारा 3 के दिशानिर्देशों के मुताबिक, जंगल में रहने वाले समुदाय 4 हेक्टेयर तक भूमि पर निवास और स्वामित्व के हकदार हैं। इस हिसाब से छापर के निवासियों का इस जमीन पर कानूनी हक है। लेकिन बेहिसाब जुर्माना भरने के बाद भी इन लोगों को अभी वहां रहने का अधिकार नहीं मिला है। पुषियाना बाई (70) सुंदर की पत्नी हैं और शादी के बाद यहीं रह रही हैं। वह कहती हैं, "जब से हम यहां आए हैं तबसे यहां बिजली नहीं है, जबकि पड़ोस की पंचायत जनवार में पिछले 40 वर्षों से बिजली है। कई मायनों में हमारे साथ ऐसा बर्ताव किया जा रहा है जैसे हम अनचाहे हों।" जब लोग एक जगह से दूसरी जगह जाकर बसते हैं तो पारंपरिक तरीका यह है कि बिजली जैसी सुविधाएं भी उनके साथ-साथ दूसरी जगह पहुंच जाती हैं।

केएस परमार स्थानीय कानूनी सलाहकार हैं और पिछले 10 बरस से इन गांव वालों की लड़ाई में उनकी मदद कर रहे हैं। परमार का कहना है, "पट्टा कानूनी रूप से उन सभी को दिया जाता है जो 2005 से पहले किसी विशेष क्षेत्र में रह रहे हों। ये लोग इतने दिनों से इस जगह पर रह रहे हैं, कायदे से इन्हें पूरी सुविधाओं के साथ यहां रहने का अधिकार मिलना चाहिए। ऐसा न करने की कोई वजह नहीं है।"

रमिया बाई कहती हैं बिना कानूनी हक के खेती करना मुश्किल होता जा रहा है।"आप चारदीवारी नहीं बना सकते, कुएं और मोटर के लिए आपको सब्सिडी नहीं मिल सकती। कोई विकल्प ही नहीं बचा इसलिए लोग यहां से जा रहे हैं। इसी वजह से हमारे बहुत से बच्चे ककरेती में रहते हैं। यहां कुछ भी नहीं है।"

बस्ती बसे लगभग 40 साल हो गए लेकिन कोई बुनियादी सुविधा यहां नहीं पहुंची।

मनोहर जी ककरेती में अपने घर से बाहर लड़खड़ाते हुए निकलते हैं। उनके हाथ में यूरीन बैग है। वह उस बुजुर्ग पीढ़ी के उन लोगों में से हैं जो अपने बेटों के साथ रहने के लिए वापस अपने पुश्तैनी गांव आए हैं। वह कहते हैं, "मैं वहां 30 साल रहा, पर अब मैं इतना बीमार हूं कि अकेला नहीं रह सकता। इसलिए आठ साल पहले मैं अपने बेटे के साथ रहने आ गया। इसके तीन साल बाद मेरे घर में आग लग गई। अब जब वे सबूत मांगते हैं तो उन्हें दिखाने के लिए मेरे पास कुछ नहीं है। सरकार ने हमें पहले कुछ क्यों नहीं दिया? अगर हमें कुछ मिल गया होता तो वहां से कभी नहीं आते। 40 साल पहले हमने ककरेती छोड़ा था कि हम अपनी और अपने बच्चों की जिंदगी संवारेंगे। लेकिन अब हम जहां से चले चले थे वहीं खाली हाथ लौट आए हैं।"

लल्लाबाई, पेंशन सूची में अपना नाम जुड़वाने की कोशिश कर रही हैं, हमें बताती हैं, "हमें राशन कार्ड, मतदाता कार्ड और आधार कार्ड मिले हुए हैं, इनके मुताबिक, हम छापर के निवासी हैं, लेकिन गरीबी रेखा के तहत परिवारों के लिए सब्सिडी वाली आवास योजना का लाभ अभी तक हमें नहीं मिला। हमने जनवार ग्राम पंचायत में सरपंच चुने हैं। हर सरपंच वादा करता है कि वह हमें बुनियादी सुविधाएं दिलवाएगा लेकिन किया किसी ने कुछ भी नहीं।" जनवार में सरपंच कौन बनेगा यह तय करने में छापर मजरा अहम भूमिका निभाता है। लल्लाबाई कहती हैं, "हम आपस में चर्चा करके सर्वसम्मति से मतदान करते हैं, छापर के सभी 80 वोट 1 व्यक्ति को मिलते हैं। हमने पिछले 3 सरपंच चुने हैं। लेकिन आखिर में हमें ही भुला दिया जाता है।"

भारी बारिश की वजह से सुंदर का मकान पिछले महीने गिर गया था। उस समय सुंदर और उसकी पत्नी अंदर सो रहे थे। सुंदर की पत्नी पुषियाना बाई कहती हैं, "हम भाग्यशाली थे कि हमें चोट नहीं लगी। इस उम्र में अस्पताल का खर्चा कैसे भरते?" सुंदर और उनकी पत्नी बरसों से अपना घर सुधरवाने के लिए सरकारी सब्सिडी का इंतजार कर रहे हैं। पुशियाना बाई बोलीं, "हर दूसरे गांव में लोगों को सब्सिडी मिल गई है। पर यहां मेरी उम्र के अधिकांश लोग या तो बीमार हैँ या मर गए हैं। हमें भी नहीं पता कि जीतेजी सब्सिडी मिल पाएगी या नहीं। फिलहाल तो हम प्लास्टिक की छत बनाकर उसके नीचे रह रहे हैं।"

पिछले साल दीवाली पर एक आदमी ने छापर के रहने वालों के खिलाफ यह कहते हुए मुकदमा कर दिया था कि इन लोगों ने उसकी जमीन पर कब्जा कर लिया है। तब से, अदालत में कम से कम 15 तारीखें लग चुकी हैं। गांव के पूर्व पंच रामलाल बताते हैँ, "उसके पास वकील है, हम तो अपने वकील खुद ही हैं। वह आदमी कहता है कि हमारी जमीन उसकी है। जब इतने बरसों में हमें पट्टा नहीं मिला तो उसे कैसे मिल गया।" हर सुनवाई पर जाना भी गांव के इन लोगों के लिए किसी मुसीबत से कम नहीं है। रामलाल कहते हैं, "हर महीने दो से तीन बार तारीखों पर जाना पड़ता है। हमारी दिन भर की मजदूरी मारी जाती है ऊपर से आने-जाने-खाने का खर्च 150 रुपए है। अगर विरोधी पार्टी नहीं आई तो दिन भर इंतजार करके हमें बिना सुनवाई घर लौटना पड़ता है। पहले वाली तहसीलदार ने हमारे जुर्माने वाले कागज देखे थे, उन्हें पता था कि हम पहले आए थे। पर अब उनका ट्रांसफर हो गया है, अब पता नहीं आगे क्या होगा।"

(निकिता पन्ना ज़िले में अवर्णा प्रोजेक्ट के टीम का हिस्सा हैं | अवर्णा प्रोजेक्ट बुंदेलखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में उनके समस्याओं के निवारण और बदलाव के उद्देश्य से शुरू हुआ है।)

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