Top

मध्य प्रदेश: 40 फीसदी जंगल निजी कंपनियों को देने की तैयारी, लेकिन वहां रह रहे लाखों आदिवासी कहां जाएंगे?

मध्य प्रदेश सरकार प्रदेश की वन भूमि के एक बड़े हिस्सों को निजी क्षेत्र की कपंनियों को सौंपने की तैयारी कर रही है। केंद्र सरकार जंगलों को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी काफी समय से कर रही है, लेकिन सवाल तो यह है कि जब निजी कंपनियां जंगलों में जायेंगी तब वहां रह रहे लोगों का क्या होगा? क्या उनके लिए भी सरकार के पास नीतियां हैं?

Mithilesh DharMithilesh Dhar   18 Nov 2020 8:45 AM GMT

मध्य प्रदेश: 40 फीसदी जंगल निजी कंपनियों को देने की तैयारी, लेकिन वहां रह रहे लाखों आदिवासी कहां जाएंगे?सरकार ने अधिसूचना तो जारी कर दी लेकिन यह नहीं बताया कि जंगलों में रह रहे आदिवासी कहां जायेंगे? (फाइल फोटो साभार-www.realreport.in)

मध्य प्रदेश सरकार प्रदेश में वनों की स्थिति को सुधारने के लिए लगभग 40 फीसदी वन क्षेत्र को पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के तहत निजी कंपनियों को देने की तैयारी कर रही है। राज्य के कुल 94,689 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र में से यह क्षेत्र लगभग 37,420 वर्ग किलोमीटर है, जिसे सरकार बिगड़ा वन क्षेत्र कह रही है। सरल शब्दों में बिगड़ा वन क्षेत्र यानी वह जंगल जिसमें पेड़ कम हों, झाड़ियां अधिक और ज्यादातर जमीन खाली पड़ी हो।

इस संदर्भ में मध्य प्रदेश के वनमंत्री कुंवर विजय शाह ने विज्ञप्ति जारी करके बताया, "प्रदेश के बिगड़े वनक्षेत्रों को तेजी से पुनर्स्थापित करने और इनमें सुधार करने के उद्देश्य से वन विभाग द्वारा निजी निवेश को जिम्मा सौंपने की पहल की गई है। इसका प्रस्ताव भारत सरकार को भेजकर मंजूरी प्राप्त की जाएगी। मंजूरी के बाद निजी निवेश को आमंत्रित करने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।"

"निजी कंपनियों के साथ अनुबंध की अवधि 30 साल की होगी। निजी निवेशक से अनुबंध के तहत प्राप्त होने वाल 50 प्रतिशत हिस्सा (आय) राज्य शासन द्वारा ग्राम वन समिति/ ग्राम सभा को दिया जाएगा।" शाह कहते हैं।

आय कैसे होगी, इस बारे में विज्ञप्ति में बहुत ज्यादा तो नहीं, लेकिन इतना बताया गया है कि सरकार इन क्षेत्रों में काष्ठ आधारित उद्योगों को बढ़ावा देगी।

मध्य प्रदेश के कुल 52,739 गांवों में से 22,600 गांव ऐसे हैं जो या तो जंगल में बसे हैं या उनके पास हैं। मध्य प्रदेश के जंगल का एक बड़ा हिस्सा आरक्षित तो एक हिस्से में राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य और सेंचुरी आदि हैं। बाकी भाग को बिगड़ा वन या संरक्षित वन कहा जाता है। यह संरक्षित क्षेत्र आदिवासियों के रहने और उनके जीविकोपार्जन का प्रमुख केंद्र हैं। ऐसे में पर्यावरण और आदिवासियों के मुद्दों पर काम कर रहे लोगों का कहना है कि दरअसल सरकार आदिवासियों को जंगल से बेदखल करना चाहती है।

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार देश में सबसे ज्यादा आदिवासी मध्य प्रदेश में रहते हैं। प्रदेश में आदिवासियों की कुल जनसंख्या 15,316,784 है जिसमें से 14,276,874 आबादी गांव और 1,039,910 आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है।

भारतीय वन सर्वेक्षण, देहरादून की रिपोर्ट 2019 के अनुसार मध्य प्रदेश के कुल 94,689 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र में से 51,919 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र ऐसा है जहां आदिवासी रहते हैं। इसमें से 5,719 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र अत्यंत सघन, 19,129 सामान्य सघन और 14,612 वर्ग किलोमीटर खुले वन की श्रेणी में आता है। यह कुल 24 जिलों में फैला हुआ है। सामान्य सघन और खुले वन को बिगड़ा वन क्षेत्र भी कहा जाता है, इसमें झाड़ के क्षेत्रों को भी शामिल किया जाता है।

भारतीय वन सर्वेक्षण, देहरादून की रिपोर्ट 2019

मध्य प्रदेश के भोपाल में रह रहे सुभाष पांडेय, जो पिछले कई वर्षों से पर्यावरण मुद्दों पर काम कर रहे हैं, वे गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "सबसे पहले तो यह समझने की जरूरत है कि सरकार किन क्षेत्रों को सुधारना चाहती है। सरकार ने जिन क्षेत्रों को चुना है वहां बड़ी संख्या में आदिवासी रहते हैं। ये जंगल ही इन आदिवासियों का पेट भरते हैं।"

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए सुभाष पांडेय कहते हैं, "यहां लगे जंगल की सूखी लकड़ियां और पत्ते बेचकर वे अपना पेट पालते हैं। ऐसे में निजी कंपनियों के आने से वे कहां जायेंगे, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। सरकार की यह योजना अगर लागू होती है जंगलों के एक बड़े हिस्से से आदिवासियों को बेदखल कर दिया जायेगा।"

सरकार जिस बिगड़े वन क्षेत्र को निजी कंपनियों को सौंपने की बात कर रही है, उसे सुधारने की जिम्मेदारी गांवों में बनी वन ग्राम वन समितियों को दी जाती रही हैं। फिर निजी कंपनियों को ये जिम्मेदारी सौंपने की जरूरत क्यों पड़ी?

ये सवाल गांव कनेक्शन ने मध्य प्रदेश के अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक, विकास, चितरंजन त्यागी से पूछा। उन्होंने फोन पर बताया, "अब देखिये, इस पर तो हम भी यह सवाल पूछ सकते हैं कि सरकार को रेलवे स्टेशन या एयरपोर्ट या सड़क निर्माण की जिम्मेदारी निजी क्षेत्रों को सौंपने की क्या जरूरत पड़ी। मतलब साफ है, निजी क्षेत्रों की सर्विस अच्छी है, खर्च कम होता है इसलिए सरकार उन्हें यह जिम्मेदारी दी जा रही है।"

मध्य प्रदेश का आरक्षित और संरक्षित वन। फोटो साभार- ENVIS Centre of Madhya Pradesh's State of Environment

इतने वर्षों तक फिर विभाग ने क्या किया, इस सवाल के जवाब में चितरंजन त्यागी कहते हैं, "बदलाव होते रहते हैं। अब हम एक ही ढर्रे पर तो चल नहीं सकते। पीपीपी मॉडल से बेहतर रिजल्ट मिलता है इसलिए सरकार इस ओर कदम बढ़ा रही है। और अभी तो हम इस पर विचार कर रहे हैं। जो विज्ञप्ति जारी की गयी है वह तो अभी क्षेत्रों की जानकारी जुटाने के लिए है।"

पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप या सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) के तहत सरकार निजी कंपनियों के साथ अपनी परियोजनाओं को अंजाम देती है।

मध्य प्रदेश के बिगड़े वन क्षेत्रों में वनखंड सीमा से पांच किलोमीटर दूरी तक स्थिति ग्रामों में आनी वाली समितियों को ग्राम वन समिति कहा जाता है। इन क्षेत्रों को सुधारने की जिम्मेदारी इन्हीं ग्राम वन समितियों को दी जाती रही है। मध्य प्रदेश में ग्राम वन समिति की कुल संख्या 9,650 है जिनके जिम्मे कुल 37,268 वर्ग किमी भूमि की जिम्मेदारी है।

इस मुद्दे पर बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ से जुड़े और वन क्षेत्र के संरक्षण के लिए काम कर रहे राजकुमार सिन्हा कहते हैं कि सरकार का फैसला गलत और नियम विरुद्ध है। वे बताते हैं, "जिस वन क्षेत्रों को सरकार निजी कंपनियों को सौंपने जा रही है वह भूमि ग्राम समाज की होती है। इसे सामुदायिक वन भूमि भी कहते हैं। न किसी से पूछा न तो बताया गया। सरकार ने अपने मन से फैसला ले लिया। ये तो वन अधिकार कानून 2006 का भी उल्लंघन है।"

भारतीय वन सर्वेक्षण, देहरादून की रिपोर्ट 2019 के अनुसार मध्य प्रदेश भौगोलिक क्षेत्रफल 308,252 वर्ग किलोमीटर है जिसमें कुल 94,689 वर्ग किलोमीट में वन क्षेत्र है। इस वन क्षेत्र में से 61,886 वर्ग किलोमीट का वन क्षेत्र आरक्षित वन और 31,098 वर्ग किलोमीट वन क्षेत्र संरक्षित वन है।

स्त्रोत- राज्य वन विभाग

राजकुमार सिन्हा के मुताबिक वन विभाग ने जिन भूमि को बिना काम का पाया उसमें से कुछ भूमि को 1966 में राजस्व विभाग को अधिक अन्न उपजाऊ योजना के तहत दे दिया। इसमें से ज्यादातर भूमि को वन विभाग ने ग्राम वन के नाम पर अपने ही नियंत्रण में रखा। इसी संरक्षित वन में से लोगों को वन अधिकार कानून 2006 के तहत सामुदायिक वन अधिकार या सामुदायिक वन संसाधनों पर अधिकार दिया जाने वाला है और उससे पहले ही सरकार यह फैसला लेकर आज जाती है।

सिन्हा सरकार से सवाल पूछते हैं? "अगर ये 37 लाख हेक्टेयर भूमि निजी कंपनियों को दे दी जायेगी तो उसमें रह रहे लोग कहां जायेंगे? जबकि 5वीं अनुसूचि के क्षेत्रों में ऐसा कानून है जिसके तहत ग्राम सभा को अपने प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण के अधिकार दिये गये हैं लेकिन निजी कंपनियों को जंगल देने के फैसले से पहले ग्राम सभा को यह क्यों नहीं बताया गया? अगर सुधार ही करना तो उसमें वन समिति और स्थानीय लोगों को शामिल क्यों नहीं किया गया? ग्राम सभा को जो अधिकार दिये गये हैं, उसका क्या होगा?"

वर्ष 2001 में 22 अक्टूबर को मध्य प्रदेश सरकार ने वनों के संरक्षण में आम लोगों की भूमिका सुनिश्चत करने के लिए एक विधेयक पारित किया था। विधेयक में भारत सरकार के वन मंत्रालय के आदेश का हवाला देते हुए कहा गया था कि वनों एवं वनों के आसपास रहने आदिवासियों एवं अन्य ग्रामीणों का वन उत्पादों पर पहला अधिकार होगा। इसके अनुसार संयुक्त वन प्रबंध की प्रणाली के अंतर्गत वनों के प्रबंध में स्थानीय जनता का सहयोग लिया जा रहा है।

वन संपदा की वर्तमान स्थिति के संबंध में भारतीय वन सर्वेक्षण, देहरादून की रिपोर्ट 2019 के अनुसार देश में कुल 807,276 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में वन स्थित है जो कि कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 24.56% है। सर्वाधिक वन क्षेत्रफल वाला राज्य मध्य प्रदेश है जहां 94,689 वर्ग किलोमीटर वन (30.71%) है। वर्तमान रिपोर्ट के अनुसार भारत के 144 पहाड़ी जिलों में 544 वर्ग किलोमीटर वनों में वृद्धि हुई है। वनों की स्थिति के संबंध में जारी 'भारत वन स्थिति रिपोर्ट-2019' में वन एवं वन संसाधनों के आंकलन के लिए पूरे देश में 2,200 से अधिक स्थानों से प्राप्‍त आंकड़ों का प्रयोग किया गया है।

जंगल को निजी कंपनियों को देने के संदर्भ में मध्य प्रदेश वन मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना।

प्रधान मुख्य वन संरक्षक, मध्य प्रदेश की ओर से 10 अक्टूबर को जारी एक पत्र में कहा गया कि बिगड़े वनों को निजी निवेश के सहयोग से विकसित किया जाना है। निजी कंपनियां या संस्थाएं जिन्हें वन क्षेत्र की जिम्मेदारी दी जाएगी वह स्थानीय वन समितियों और विभाग के सहयोग से वहां पर पौधरोपण कराएंगी और वहां के वन क्षेत्र की रखवाली करेगी। निजी कंपनियों से 30 वर्षों का अनुबंध होगा और उनसे होने वाली आय का 50 फीसदी हिस्सा राज्य शासन द्वारा ग्राम वन समिति/ग्राम सभा को दिया जायेगा।

दी प्रिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक नीति आयोग ने अगस्त 2020 में सरकार के सामने बिगड़े वन क्षेत्रों को सुधारने के लिए निजी कंपनियों को सहभागी बनाने की बात की थी, हालांकि यह प्रस्ताव नया नहीं है। नेशनल फॉरेस्ट पॉलिसी 2018 में भी इसका जिक्र था। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत के 40 फीसदी वन तुच्छ या बिगड़े वन श्रेणी के हैं।

नीति आयोग का तर्क था कि अभी देश में जारी वन्यीकरण कार्यक्रमों का कोई वांछित प्रभाव नहीं पड़ा है। इसलिए इस क्षेत्र में भी अब पीपीपी मॉडल को लागू किए जाने की जरूरत है, ताकि निवेश को बढ़ाया जा सके और क्षमता और मैनपावर के साथ वन्यीकरण में आधुनिक तकनीक लाई जा सके।

वर्ष 2015 में भी पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने बिगड़े वन क्षेत्रों को निजी कंपनियों को देने की बात की थी। तब अपने बयान में उन्होंने कहा था, "हम एक ऐसी योजना लेकर आए हैं, जिसमें हम अपनी बिगड़ी भूमि को निजी उद्योगों को राजस्व साझेदारी या कुछ अन्य मॉडल के साथ पट्टे पर दे देंगे, जहां उन्हें जंगल उगाने और अपने औद्योगिक उपयोग की अनुमति होगी।"

यह भी पढ़ें- लॉकडाउन के दौरान पत्तों पर टिकी रही हजारों आदिवासी परिवारों की ज़िंदगी

भारत सरकार के आदिवासी मंत्रालय के मामलों द्वारा गठित हैबिटेट राइट्स व सामुदायिक अधिकारों से संबन्धित समितियों में नामित विषय विशेषज्ञ के तौर पर सदस्य और पर्यावरण मुद्दों पर लिखने वाले मध्य प्रदेश, जबलपुर के सत्यम श्रीवास्तव के मुताबिक इस पूरे मसले को मध्य प्रदेश से जोड़कर अलग तरीके से देखा जाना चाहिये। इस योजना से देश के दूसरे प्रदेश के वन क्षेत्रों पर क्या असर पड़ेगा और मध्य प्रदेश में क्या असर पड़ेगा, यह एक जैसा नहीं हो सकता।

श्रीवास्तव कहते हैं, "मध्य प्रदेश के जिस क्षेत्र को सरकार निजी हाथों में सौंपने का फैसला किया है उसे बिगड़ा वन कहा जाता है। मतलब वह जंगल जो अच्छी क्वालिटी का नहीं है। इसमें सघन, कम सघन और झाड़ वाले क्षेत्र में शामिल होते हैं। वनों को समझने के लिए हमारे देश का तरीका ही अलग है क्योंकि इसे समझने की टेक्निक हमारी अपनी नहीं है। सबसे पहले अंग्रेजों ने जंगलों पर कब्जा शुरू किया था क्योंकि उन्हें वहां इंडस्ट्री लगाना था, ट्रेन की पटरियां बिछानी थीं, इसलिए उन्होंने जंगलों को अपने कब्जे में लिया, जबकि भारत में जंगलों का महत्व ही दूसरा है।"

अंग्रेजों के शासन से लेकर पौराणिक काल तक वनों के महत्व का जिक्र करते हुए आदिवासी मंत्रालय में समिति के सदस्य और पर्यावरण लेखक श्रीवास्तव कहते हैं, "हमारे यहां तो वानप्रस्थ जीवन होता है। भगवान राम भी वनवास गये थे। पांडव भी वनवास गये थे। मतलब हमारे यहां जंगल वास की जगह रही है जबकि बाकी जगहों पर इसे बतौर उत्पादक देखा जाता है। हिंदुस्तान के जंगल को जब उत्पादकता की नजर से देखा गया तब इनका वर्गीकरण किया गया जिसके बाद इन्हीं जंगलों को 1851 में शूद्र वन कहा गया। वर्णाश्रम व्यवस्था की आधार पर इन्हें शूद्र कहा गया। फिर इन्हें निम्न वन कहा गया फिर इन्हें बिगड़े वन की संज्ञा दे दी गयी।"

भारत में वनों की स्थिति

मध्य प्रदेश सरकार की योजना और मंशा पर सवाल उठाते हुए वे कहते हैं, "मध्य प्रदेश का एक तिहाई जंगल जिसे सरकार निजी कंपनियों को सौंपना चाहती है, दरअसल में वह भूमि है। उसका जंगलों से कोई लेना-देना नहीं है। लगभग 40 फीसदी जमीन सरकार निजी कंपनियों को देना चाहती है। अब कंपनियां उस जमीन पर घर बनवाकर बेचेंगी या वहां जंगल उगायेंगी, यह तो उनका अपना फैसला होगा। सरकार ने घनत्व के आधार पर जंगलों को बांट दिया है, जबकि कई पेड़ ऐसे होते हैं जिन्हें फैलने के लिए ज्यादा जगह चाहिये होती है, लेकिन उसे उसकी बुराई नहीं कह सकते। सागौन के जंगह घने होते हैं लेकिन महुआ के जंगल बिरले (ज्यादा घनत्व वाले) होते हैं।"

वन मंत्रालय ने मध्य प्रदेश में पेड़ों और वनों के घनत्व को तीन भागों में बांटा है। शून्य से एक तक इसका मानक तय किया गया है। जिसके तहत 0.4 तक घनत्व के एरिया को खुला या बिगड़ा वन कहा जाता है। 0.5 से 0.7 तक के घनत्व को मीडियम वन क्षेत्र और 0.8 या उससे अधिक के घनत्व पर सघन घनत्व का वन माना जाता है। (जैसा कि सत्यम ने बताया)

सत्यम के मुताबिक जिन क्षेत्रों की बात सरकार कर रही है, वह बसाहट वाला क्षेत्र है, वहां तो जंगल घने होंगे ही नहीं, जाहिर सी बात है कि पेड़ काफी दूर-दूर होंगे। घने जंगलों में आबादी इसलिए नहीं जाती क्योंकि वहां खेती नहीं हो सकेगी। ऐसे में आबादी थोड़ी मैदानी जगहों पर होती है। सरकार की विज्ञप्ति में यह भी लिखा है कि कहीं अगर राजस्व विभाग की जमीन आती है तो कलेक्टर से बात करके उसका भी निजीकारण किया जायेगा, यह बहुत विवादित फैसला है क्योंकि मध्य प्रदेश में वन और राजस्व विभाग के बीच जमीनों को लेकर बहुत ज्यादा विवाद है।

अपने जवाब में सरकार की नीतियों और सवाल उठाते हुए सत्यम कहते हैं, "सरकार बिगड़े वनों को ठीक कराने के नाम पर इन्हें धीरे-धीरे बड़ी कंपनियों को सौंप देना चाहती है, लेकिन सवाल तो यह भी है कि अगर ये बिगड़े वन हैं तो सरकारों ने पिछले 70 वर्षों में क्या किया? वनों का अपना चरित्र होता है, वह बिगड़ा या अच्छा होता ही नहीं। बस वन होता है। सरकार ने यह भी नहीं बताया कि जिन क्षेत्रों को निजी कंपनियों को दिया जायेगा, वहां रह रहे लोग कहां जायेंगे, उनके लिए सरकार की क्या निति है? इस पूरी योजना में सरकार ने कहीं भी फॉरेस्ट ऐक्ट को तवज्जो नहीं दिया है। एक लाइन यह भी नहीं लिखा कि पहले वनाधिकार कानून के तहत वहां रह रहे लोगों के अधिकार सुरक्षित होंगे या नहीं।"

यह भी पढ़ें- आठ गाँव के आदिवासियों ने 500 एकड़ बंजर जमीन पर तैयार कर दिया जंगल

देश में विवादों के बीच निजीकरण की प्रक्रिया लगातार जारी है। रेलवे, एयरपोर्ट, पोर्ट से लेकर बड़ी बड़ी कंपनियों को निजी हाथों में सौपा जा रहा है। सरकार का तर्क है कि कंपनियों के निजी हाथों में जाने से बेहतर नतीजे निकलेंगे लेकिन सिविल सोयासटी इन पर सवाल उठा रही है। मध्य प्रदेश सरकार की बिगड़ा वन क्षेत्र योजना को लेकर ज्यादा जागरुकता नहीं है लेकिन वन और आदिवासियों को समझने वाले लोग सवाल उठा रहे हैं और विरोध भी दर्ज करा रहे हैं।

सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए सत्यम आगे कहते हैं, "सरकार की मंशा साफ है। सरकार सब कुछ कॉर्पोरेट को सौंप देना चाहती है। कैंपा फंड के तहत नियम है कि अगर कोई इंडस्ट्री लगाने के लिए जंगल काटता है तो उसके बदले में उसे कहीं दूसरी जगह जंगल लगाना होता है। इसके लिए भारत सरकार पैसा लेती है। इसके लिए जब काफी पैसा इकट्ठा हो गया तब कैंपा फंड बनाया गया। ये पैसे वन विभाग के माध्यम से चिन्हित जगहों पर जंगल लगाने के लिए खर्च किये जाएंगे। अब इस योजना के तहत सरकार इन्हीं कंपनियों को जंगल लगाने के लिए पैसा भी दे सकती है। मतलब जमीन भी देंगे और पैसे भी। सरकार जबरदस्ती जमीन लेना चाह रही है और कुछ नहीं।"

अलग-अलग राज्यों के लिए प्रस्तावित कैंपा फंड। सोर्स- PIB

देश के वन क्षेत्र के नुकसान की भरपाई करने और स्थिरता बनाए रखने के लिए केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने क्षतिपूरक वनीकरण कोष प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (कैंपा) को 47,436 करोड़ रुपए की राशि प्रदान की है। इस राशि का इस्तेमाल वन और वृक्षों का आवरण बढ़ाने के लिए निर्धारित राष्ट्रीय वानिकी कार्यकलापों में किया जा सकेगा। इनमें क्षतिपूरक वनीकरण, जलग्रहण क्षेत्र का उपचार, वन्यजीव प्रबंधन, वनों में लगने वाली आग की रोकथाम, वन में मृदा एवं आद्रता संरक्षण कार्य, वन्‍य जीव पर्यावास में सुधार, जैव विविधता एवं जैव संसाधनों का प्रबंधन, वानिकी में अनुसंधान तथा कैंपा कार्यों की निगरानी आदि शामिल हैं।

इस विषय पर और ज्यादा जानकारी के लिए गांव कनेक्शन ने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की वेबसाइट पर मिली जानकारी के अनुसार संबंधित अधिकारियों से बात करने की कोशिश की गयी लेकिन फोन नहीं उठा। इसके बाद लगभग दो सप्ताह बाद ई-मेल के माध्यम से किशोर कुमार सिंह अतिरिक्त मुख्य सचिव, वन विभाग, मध्य प्रदेश ने अपने जवाब में बताया कि बिगड़े वनों में सुधार हेतु निजी निवेश आकर्षित करने हेतु एक कान्‍सेप्‍ट नोट तैयार किया जा रहा है, जिसे भारत सरकार को अनुमोदन हेतु प्रेषित किया जायेगा।

Next Story

More Stories


© 2019 All rights reserved.