तमाम योजनाओं के बाद भी कुपोषण भारत के लिए एक चुनौती क्यों ?

Shrinkhala PandeyShrinkhala Pandey   6 Nov 2017 4:45 PM GMT

तमाम योजनाओं के बाद भी कुपोषण भारत के लिए एक चुनौती क्यों ?कुपोषण अाज भी समस्या।

कुपोषण को दूर भगाने के लिए सरकार ने समय समय पर कई योजनाएं चलाई लेकिन फिर भी आज ये भारत के लिए एक चुनौती क्यों बना हुआ है। इसके पीछे के कारण क्या हैं और इसे दूर करने के लिए भारत को अभी किन और चुनौतियों से लड़ना होगा।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार, एक साल तक के बच्चों की मौतों के मामले में उत्तर प्रदेश पूरे देश में टॉप पर है। बिहार के बाद सबसे ज़्यादा ठिगने (कुपोषित बच्चे) उत्तर प्रदेश में ही हैं। वहीं अगर देशों की बात करें तो कुपोषण के मामले में भारत देश ब्राज़ील, साउथ आफ्रीका, चीन, इटली, आस्ट्रेलिया और रूस जैसे देशों के सामने फिसड्डी बना हुआ है

बाल मृत्युदर में यूपी सबसे आगे

यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कुपोषण के कारण 5 साल से कम उम्र के करीब 10 लाख बच्चों की हर साल मौत हो जाती है। बाल मृत्यु दर के मामले में उत्तर प्रदेश देश में सबसे आगे है। यहां प्रति हज़ार बच्चों पर बाल मृत्यु दर 64 है और पांच साल के नीचे के बच्चों की बाल मृत्यु दर प्रति हज़ार बच्चों पर 78 है। स्वास्थ्य एवं कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार की ओर कराए जाने वाले इस स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार यूपी में 0 से 5 साल तक की आयु वर्ग के 46.3 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं। बिहार में 48.3 प्रतिशत, जबकि यूपी में 39.5 प्रतिशत बच्चे अपनी आयु के हिसाब से कम वजन के हैं।

कुपोषण को दूर करने के लिए योजनाएं

आंगनबाड़ी योजना

ये महिला बाल विकास मंत्रालय की योजना है। इसमें छह साल तक की आयु के बच्चों के पोषण व स्वास्थ्य में सुधार लाना है व बाल मृत्यु दर व बच्चों में कुपोषण स्तर में कमी लाना भी है। योजना में बच्चों के साथ-साथ गर्भवती महिलाओं के सेहत का भी लक्ष्य रखा गया था।

मिड डे मील

भारत सरकार की योजना मिड डे मील के तहत कक्षा 1 से 8 तक के सभी बच्चों को दोपहर का खाना स्कूल में मिलता है। ये योजना 1995 में शुरू की गई थी और इसका उद्देश्य स्कूलो में बच्चों की संख्या बढ़ाना व कुपोषण को दूर करना था। योजना में समय-समय पर बदलाव किया गया। आहार में दूध, फलों व हरी सब्जियों का शामिल किया गया।

कुपोषण के लिए विटामिन ए की खुराक जरूरी

शहर के मुकाबले ग्रामीण इलाकों में कुपोषण के शिकार बच्चों की संख्या में अधिक गिरावट दर्ज की गई है। कुपोषण को रोकने के लिए विटामिन ‘ए’ की खुराक अति आवश्यक है। आरएसओसी के आंकड़ों के अनुसार पांच साल से कम उम्र के बच्चों में विटामिन ‘ए’ की खुराक बेहतर हुई है। साल 2005-06 में जहां यह आंकड़े 25 फीसदी थे वहीं 2013 में यह आंकड़े 46 फीसदी दर्ज की गई है। कुपोषण मामलों में सुधार होने के मुख्य कारण खुले में शौंच जाने वालों की संख्या में कमी के साथ संस्थागत जन्म एवं विटामिन ‘ए’ की खुराक में वृद्धि होना है।

कुपोषण की जांच करती कार्यकत्री।

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इसके अतिरिक्त मांओं के लिए हौसला पोषण योजना, बच्चों को स्कूलों में आयरन की गोलियां बांटी जाती हैं। ये सब उन्हें कुपोषण से दूर रखने के जलिए सरकार की ओर से प्रयास है लेकिन फिर भी कुपोषण की स्थिति में ज्यादा सुधार नहीं दिख रहा।

मां का सेहतमंद होना भी जरूरी

केंद्र और राज्य सरकार चाहे कुछ भी दावा करें लेकिन प्रदेश में सिर्फ छह प्रतिशत महिलाओं को ही प्रसव पूर्व देखरेख की सुविधा मिल पाती है। इसके अलावा महज़ 13 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं को ही आयरन और फोलिक एसिड सप्लीमेंट मिल पाता है। उत्तर प्रदेश में जन्म के पहले घंटे में चार में से तीन बच्चों को मां का दूध नहीं मिल पाता। राज्य में जन्म लेने वाले छह से 59 महीनों के दो तिहाई बच्चे एनीमिया के शिकार होते हैं। पिछले वर्ष आई स्टेट न्यूट्रीशन मिशन-2014 की रिपोर्ट का कहना था कि ‘उत्तर प्रदेश में हर रोज 650 बच्चों की मौत कुपोषण के कारण हो रही है, 50 फीसदी माताएं खून की कमी से जूझ रही हैं।

लड़का लड़की में भेदभाव भी कारण

भले ही समय बदला हो, तकनीकियां, शिक्षा सभी में इजाफा हुआ है लेकिन आज भी कई घरों में बेटे और बेटी में अंतर किया जाता है। उनकी परवरिश में भी फर्क होता है, बेटे को अच्छा भोजन अच्छी शिक्षा दी जाती है तो वहीं बेटी से भेदभाव किया जाता है।

शहरी बच्चों में मोटापा कुपोषण का नया चेहरा

एक नई रिसर्च के मुताबिक, पिछले चार दशकों में 18 साल से कम उम्र के बच्चों में मोटापे के स्तर में दस गुना बढ़ोतरी हुई है। इसका मतलब ये कि दुनिया भर में मोटे बच्चों की संख्या अब 12 करोड़ से ज्यादा है। लान्सेट का ये शोध अपनी तरह का सबसे बड़ा शोध है जिसमें दुनिया भर के 200 देशों के आंकड़ों के आधार पर नतीजा निकाला गया है। इसका सबसे बड़ा कारण जंक फूड और एक ही जगह पर बैठकर कंप्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल का इस्तेमाल भी है।विश्व मोटापा दिवस पर जारी रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 तक मोटापे की वजह से होने वाली बीमारियों के इलाज़ पर दुनिया 920 अरब पाउंड खर्च करेगी।

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बच्चों में कुपोषण को कैसे पहचानें

  • कमजोर व दुर्बल शरीर
  • सांस लेने में दिक्कत
  • ज्यादा ठंड लगना
  • थकान या उदासीनता
  • बार-बार संक्रमण का होना

कारण

  • गरीबी
  • लड़का लड़की में भेदभाव
  • मां का कुपोषित या एनीमिक होना
  • कम उम्र में शादी होना
  • गंदे वातावरण में रहना
  • पाचन समस्या होना

लखनऊ की बाल रोग विशेषज्ञ डॉ रूपा शर्मा बताती हैं, “कुपोषण से बचने के लिए आपके आहार में सारे पोषक तत्व होने चाहिए। देखा जाता है कि ग्रामीण क्षेत्र में बच्चों को फल, हरी सब्जियां आदि नियमित नहीं मिल पाता। इसके अतिरिक्त अकुंरित चना, दूध, दही, फल, सब्जियां, सूखे मेवे, अंडा आदि आहार में शामिल होने चाहिए।”

मोटे अनाजों में भरपूर होता है पोषक तत्व

गेहूं, चावल के अलावा कई ऐसे मोटे अनाज हैं जिनमें भरपूर मात्रा में पोषक तत्व होते हैं जो कुपोषण को दूर करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। इस बारे में लखनऊ की पोषाहार विशेषज्ञ डॉ सुरभि जैन बताती हैं, मोटे अनाज जैसे रागी में भरपूर कैल्शियम होता है जई में फाइबर व कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है। ज्वार में भी आयरन, कैल्शियम पाया जाता है इसलिए इन अनाजों को आहार में शामिल करके कुपोषण से बचा जा सकता है।

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