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दक्षिण से लेकर उत्तर भारत तक लॉकडाउन और मौसम की मार से बर्बाद हो रहे आम किसान

उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, पश्चिम बंगाल जैसे कई राज्यों के हजारों किसान और कारोबारी आम की खेती से जुड़े हुए हैं। मार्च से जुलाई तक आम किसानों को अच्छी कमाई हो जाती है, लेकिन इस बार खराब मौसम और लॉकडाउन ने किसानों की हालत खराब कर दी है।

Divendra SinghDivendra Singh   13 May 2020 12:30 PM GMT

दक्षिण से लेकर उत्तर भारत तक लॉकडाउन और मौसम की मार से बर्बाद हो रहे आम किसान

लॉकडाउन और मौसम की मार से इस बार आम किसान पूरी तरह से बर्बाद हो गए हैं। बौर लगते ही ओला-बारिश से बर्बादी की शुरूआत हो गई थी, फिर आंधी-तूफान के साथ बारिश ने बचे आम को भी नुकसान पहुंचा दिया है। आम किसानों के सामने मुश्किल है कि लॉकडाउन में वो आम को कहां बेच पाएंगे।

महाराष्ट्र, गुजरात, तेलांगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के बड़े क्षेत्रफल में आम की खेती होती है। मार्च से लेकर अगस्त तक अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग किस्में बाजार में आने लगती हैं। उत्तर प्रदेश 23.47% के साथ आम उत्पादन में पहले स्थान पर है।

महाराष्ट्र के रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग जैसे कई जिलों होने वाली आम की किस्म अल्फांसो (हापुस) मार्च महीने में ही तैयार हो जाती है, जोकि मार्च, अप्रैल, मई से जून तक मार्केट में रहती है। अलफांसो की विदेशों में भी अच्छी खासी मांग रहती है। सिंधुदुर्ग जिले के देवगढ़ तालुका में ओमकार सपरे देवगढ़ अल्फांसों नाम से ग्रुप चलाते हैं, उनके साथ सात सौ से ज्यादा किसान जुड़े हुए हैं।

ओमकार बताते हैं, "महाराष्ट्र में मुंबई की वाशी मार्केट अल्फांसों की सबसे बड़ी मार्केट है, पूरे प्रदेश से किसान अपना आम लेकर यहीं आते हैं, इसके बाद पूणे और कोल्हापुर सबसे बड़ी मार्केट है। इस लॉकडाउन से किसानों की हालत खराब हो गई है। मार्च से हापुस (अल्फांसों) पकने लगता है और मानसून आने तक बाजार में बना रहता है। ये पूरा महीना बंद ही रहा है, पिछले साल अप्रैल महीने में 30 हजार टन आम वाशी मार्केट में पहुंचा था, जबकि इस बार अभी तक 900 टन आम ही पहुंचा है। अगर इससे देखा जाए तो 97 प्रतिशत का नुकसान हुआ है।"

महाराष्ट्र के रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग जैसे कई जिलों होने वाली आम की किस्म अल्फांसो (हापुस) मार्च महीने में ही तैयार हो जाती है।

भारतीय अल्फांसो की मांग अमेरिका, यूरोप के देश और खाड़ी के देशों में बहुत अधिक है। कोरोना की वजह से अल्फांसो के निर्यात न होने पर इसकी मांग घरेलू बाज़ार में भी पर्याप्त होती है लेकिन देशव्यापी लॉकडाउन की वजह से देश के किसी और हिस्से में अल्फांसो को भेज पाना संभव नहीं हो पा रहा है।

दक्षिण भारत में कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलांगाना जैसे प्रमुख उत्पादक राज्य हैं। यहां भी स्थिति कुछ ठीक नहीं है।

तेलंगाना के सिकंदराबाद के किसान मोहम्मद एजाज के बाग में बैंगनपल्ली किस्म की आम लगे हैं, मोहम्मद एजाज आम की खेती पूरी तरह से जैविक तरीके से करते हैं।

मोहम्मद एजाज कहते हैं, "हमारी बाग में आम मई महीने में पकने लगते हैं, इस बार यहां भी खराब मौसम की वजह से आम का पहले से बहुत नुकसान हो गया था। लॉकडाउन की वजह से आम नहीं बिकने वाला है। इस बार हमने सोचा है कि आम दोस्तों-रिश्तेदारों और सड़क पर जा रहे लोगों में फ्री में बांट देंगे।"

तेलंगाना के सिकंदराबाद में बैंगनपल्ली किस्म आम की बाग

वो आगे कहते हैं, "जैविक तरीके से आम की खेती करने से दूसरे किसानों से अच्छा दाम मिलता था, शहर से खुद लोग आकर खरीदकर ले जाते थे, लेकिन इस बार तो नहीं लग रहा है कि कोई आ पाएगा।"

भारत में उगायी जाने वाली आम की किस्मों में दशहरी, लंगड़ा, चौसा, फज़ली, बम्बई ग्रीन, बम्बई, अलफांसो, बैंगन पल्ली, हिम सागर, केशर, किशन भोग, मलगोवा, नीलम, सुर्वन रेखा, वनराज, जरदालू हैं। नई किस्मों में, मल्लिका, आम्रपाली, रत्ना, अर्का अरुण, अर्मा पुनीत, अर्का अनमोल तथा दशहरी-५१ प्रमुख प्रजातियाँ हैं। उत्तर भारत में मुख्यत: गौरजीत, बाम्बेग्रीन, दशहरी, लंगड़ा, चौसा एवं लखनऊ सफेदा प्रजातियां उगायी जाती हैं।

उत्तर प्रदेश के 13 जिलों में हर साल 45 लाख मिट्रिक टन आम का उत्पादन होता है, इसमें से लखनऊ जिले के मलिहाबाद में सात लाख मीट्रिक टन आम का उत्पादन होता है। आम में बौर आते ही ओला-बारिश होने पेड़ों से बौर गिर गए थे, जिससे इस बार कम फल आए थे। मार्च से लेकर मई तक कई बार तेज हवाओं के साथ बारिश हुई, जिससे बचे हुए आम भी गिर गए। अब किसानों के सामने मुश्किल है कि जो आम बच भी गया है लॉकडाउन में कैसे बेंच पाएंगे। उत्तर प्रदेश के प्रमुख आम उत्पादक जिले लखनऊ, अमरोहा, सम्भल, मुजफ्फरनगर और सहारनपुर हैं। लगभग ढाई लाख हेक्टेयर क्षेत्र में विभि‍न्न कि‍स्में उगायी जाती हैं। इनमें दशहरी, चौसा, लंगड़ा, फाजली, मल्लिका, गुलाब खास और आम्रपाली प्रमुख हैं।

मलिहाबाद तहसील के रनीपारा गाँव के गौरव सिंह के पास बीस बीघा आम की बाग है। गौरव बताते हैं, "साल भर हम किसान आम की तैयारी करते हैं, इसी से साल भर की कमाई हो जाती है। लेकिन इस बार मौसम ने साथ नहीं दिया, पिछले दिनों आयी आंधी में तो बहुत आम गिर गए, ओले से बचे हुए आम में भी दाग लग गए हैं। अब हमारे सामने ये परेशानी है कि जो आम बच गया है उसे कैसे बेचेंगे। लॉकडाउन की वजह से अभी तक एक भी व्यापारी नहीं आया है। जबकि अभी तक ज्यादातर बागें बिक जानी चाहिए थी।"

पिछले दिनों मौसम खराब होने से उत्तर भारत में आम आंधी और तेज बारिश से गिर गया।

मैंगो ग्रोवर्स ऑफ इंडिया ने उत्तर प्रदेश सरकार को एक पत्र भी लिखा है। एसोसिएशन ने सरकार से मांग की है कि किसानों को धान, गेहूं और आलू की तरह ही आम की खरीद करनी चाहिए, जिससे आम किसानों को नुकसान से बचाया जा सके। मैंगो ग्रोवर्स ऑफ इंडिया के अध्यक्ष इंसेराम अली बताते हैं, "

आम किसानों का तो लगातार ही नुकसान हो रहा है, इस बार वैसे भी कम आम आए थे और अब लगातार आंधी पानी से 20-25 प्रतिशत तक नुकसान हो गया। हर बार 50 लाख मीट्रिक टन उत्पादन होता है, उसमें से 30-35 लाख टन आम ही इस बार आया था, आंधी-पानी से उसका भी नुकसान हो गया।

यहां 25 मई नहीं तो एक जून से ही शुरू ही हो जाता है, लेकिन इस बार एक व्यापारी नहीं आए हैं, हर बार 80-90 प्रतिशत बाग व्यापारी खरीद लेते थे, पहली बार हुआ है जब बाग नहीं बिके हैं। इस बार किसानों को बाग बचाने में भी मुश्किल आ रही है, क्योंकि लेबर ही नहीं आए हैं इस बार लॉकडाउन की वजह से। हमारी तो यही कोशिश है कि बाजार तक पहुंचे, लेकिन व्यापारी ही नहीं आएंगे तो आम कौन खरीदेगा, हर बार दिल्ली, मुंबई, पंजाब तक से व्यापारी आते थे, इस बार नहीं आए।

सरकार जैसे आलू, गेहूं जैसी फसलें खरीदती है, उसी तरह सरकार को आम भी खरीदना चाहिए, लेकिन सरकार तो हमें किसान ही नहीं समझती है। बारिश से इस बार आम के बौर काफी बर्बाद हो गए थे और जब फल तैयार होने का समय आया तो कोरोना आ गया। हर साल इटली, जापान, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ ही खाड़ी देशों में भी हमारे यहां से आम निर्यात होता था। यूपी से करीब हर साल ढाई सौ टन आम की सप्लाई दूसरे देशों की जाती है। लेकिन इस बार आम किसान बहुत नुकसान उठाने वाला है।"

भारत दुनिया में ताजा आमों का एक प्रमुख निर्यातक देश भी है। साल 2018-19 में भारत ने 406.45 करोड़ रुपए का 46510.27 मीट्रिक टन ताजे आमों को निर्यात किया था।

यूपी का आम मुख्य रूप से ईरान, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), सऊदी अरब, कतर और कुवैत और बांग्लादेश सहित खाड़ी देशों को निर्यात किया जाता है। दक्षिण भारत में उगाई जाने वाली आम की किस्में आमतौर पर दक्षिण पूर्व एशियाई देशों जैसे मलेशिया और सिंगापुर में भेज दी जाती हैं।

हालाँकि भारत वैश्विक उत्पादन में 40 प्रतिशत से ऊपर है, इसके बाद चीन, थाईलैंड और पाकिस्तान के बाद शीर्ष आम उत्पादकों में से एक है, फल का एक बड़ा हिस्सा घरेलू रूप से खपत होता है और केवल एक छोटी मात्रा में निर्यात किया जाता है।

मैंगो एक्सपोर्ट एसोसिएशन उत्तर प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष नदीम सिद्दीकी बताते हैं, "बारिश से इस बार आम के बौर काफी बर्बाद हो गए थे और जब फल तैयार होने का समय आया तो कोरोना आ गया। हर साल इटली, जापान, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ ही खाड़ी देशों में भी हमारे यहां से आम निर्यात होता था। यूपी से करीब हर साल ढाई सौ टन आम की सप्लाई दूसरे देशों की जाती है। लेकिन इस बार आम किसान बहुत नुकसान उठाने वाला है।"

वो आगे कहते हैं, "पिछले दो साल में 2400-2500 करोड़ में आम का व्यापार हुआ था, जो इस बार घट कर 600-800 करोड़ रह जाएगा।"


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