कामायनी: आज के मानव जीवन को उसके समूचे परिवेश में प्रस्तुत करने वाला महाकाव्य

Manisha KulshreshthaManisha Kulshreshtha   15 Nov 2018 5:36 AM GMT

कामायनी: आज के मानव जीवन को उसके समूचे परिवेश में प्रस्तुत करने वाला महाकाव्य

'कामायनी' जयशंकर प्रसाद कृत ऐसा महाकाव्य है जो सदैव मानव जीवन के लिए एक प्रेरणा बन कर रहेगा। कामायनी सदा से मेरी प्रिय पुस्तकों में से एक रही है। इसे मैंने कई बार पढ़ा‚ मुझे हर बार इसमें नए अर्थ मिले हैं। जीवन के हर दशक में‚ हर पड़ाव में नए सिरे से पढ़ने पर जीवन के प्रति जीवन का नया दर्शन पता चला है।

कामायनी से मेरा परिचय अपने अस्तित्व से परिचय के तुरंत बाद का है, मेरी मां ने मुझे बताया कि उन्होंने मेरा नाम कामायनी से चुना, जहां इड़ा यानि बुद्धि का पर्याय मनीषा आता है। मेरी मां का प्रिय ग्रंथ मुझमें तो उत्सुकता जगाता ही। मैंने इसे किशोरावस्था में पढ़ा। फिर हिंदी में एमए करते हुए तो सिलेबस का महत्वपूर्ण हिस्सा रही कामायनी।

'कामायनी' जयशंकर प्रसाद कृत ऐसा महाकाव्य है जो सदैव मानव जीवन के लिए एक प्रेरणा बन कर रहेगा।

कामायनी की कथा मूलत: एक कल्पना‚ एक फैण्टसी है। जिसमें प्रसाद जी ने अपने समय के सामाजिक परिवेश‚ जीवन मूल्यों‚ सामयिकता का विश्लेषित सम्मिश्रण कर इसे एक अमर ग्रन्थ बना दिया। यही कारण है कि इसके पात्र - मनु‚ श्रद्धा और इड़ा - मानव‚ प्रेम व बुद्धि के प्रतीक हैं। इन प्रतीकों के माधयम से कामायनी अमर हो गई। क्योंकि इन प्रतीकों के माध्यम से जीवन का जो विश्लेषण कामायनी में प्रसाद जी ने प्रस्तुत किया, वह आज भी उतना ही सामयिक है, जितना कि प्रसाद जी के समय में रहा होगा। देवों का घमण्ड‚ स्वयं सृष्टिकर्ता के रूप में स्वयं सृष्टि ने ही उनके उच्छृंखल व्यवहार को लेकर तीनों लोकों में प्रलय कर कैसे तोड़ा यह जहां पौराणिक ऐतिहासिक बात है वहीं एक सबक है मनुष्यत्व के प्रति…धरती के प्रति उनके मनमाने व्यवहार के प्रति।

कामायनी का प्रथम प्रकाशन लगभग 58 वर्ष पूर्व हुआ था तब से आज तक लेकर कामायनी हिन्दी साहित्य में सर्वाधिक लोकप्रिय तथा विवादित और चर्चित पुस्तक रही है। हर विश्वविद्यालय के हिन्दी के पाठ्यक्रम में शामिल रही है। स्कूलों की 10वीं‚ 11वीं तथा 12वीं कक्षाओं के हिन्दी के कोर्स में भी में भी कामायनी के अंश शामिल रहे हैं। अपनी लोकप्रियता‚ आलोचना तथा प्रशंसा को समभाव से स्वीकार कर 'कामायनी' आज भी अपने स्थान पर अटल है। इसकी प्रासंगिकता सुधि पाठकों तथा आलोचकों के लिए आज भी उतनी ही है जितनी हमेशा रही है। संक्षेप में‚ कामायनी एक ऐसा महाकाव्य है‚ जो आज के मानव जीवन को उसके समस्त परिवेश व परिस्थिति के साथ प्रस्तुत करता है।

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मुक्तिबोध जी के शब्दों में – " कामायनी में वर्णित सभ्यता – प्रयासों के पीछे प्रसाद जी का अपना जीवनानुभव‚ अपने युग की वास्तविक परिस्थिति‚ अपने समय की सामाजिक दशा बोल रही है।"

कामायनी में चिन्ता‚ आशा‚ श्रद्धा‚ काम‚ वासना‚ लज्जा‚ कर्म‚ इर्ष्या‚ इड़ा‚ स्वप्न‚ संघर्ष‚ निर्वेद‚ दर्शन‚ रहस्य‚ आनन्द नामक पन्द्रह सर्ग हैं। हर सर्ग में मनु की यानि मानव की दशा का हृदयस्पर्शी वर्णन विश्लेषण है… जो जीवन के हर पड़ाव‚ हर पहलू पर प्रकाश डालता चलता है।

कामायनी में से मेरे प्रिय पद्यांश प्रस्तुत करने से पूर्व में स्वयं प्रसाद जी की पुस्तक में लिखी भूमिका के कुछ अंशों से पाठकों का परिचय करवाना चाहूँगी‚ जो कामायनी की कथा के मूल में ले जाएगी -

" जलप्लावन भारतीय इतिहास में एक ऐसी प्राचीन घटना है‚ जिसने मनु को देवों से विलक्षण‚ मानवों की एक भिन्न संस्कृति प्रतिष्ठित करने का अवसर दिया। वह इतिहास ही है। 'मनवे वै प्रात:' इत्यादि से इस घटना का उल्लेख 'शतपथ ब्राह्मण' के आठवें अध्याय में मिलता है। देवगणों के उच्छृंखल स्वभाव‚ निर्बाध आत्मतुष्टि में अंतिम अध्याय लगा और मानवीय भाव अर्थात श्रद्धा और मनन का समन्वय होकर प्राणी को एक नए युग की सूचना मिली। इस मन्वन्तर के प्रर्वतक मनु हुए। मनु भारतीय इतिहास के आदिपुरुष हैं। राम‚ कृष्ण और बुद्ध इन्हीं के वंशज हैं।"

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" श्रद्धा के साथ मनु का मिलन होने के बाद उसी निर्जन प्रदेश में उजड़ी हुई सृष्टि को फिर से आरम्भ करने का प्रयत्न हुआ। किन्तु असुर पुरोहित के मिल जाने से इन्होंने पशुबलि दी। ...इस यज्ञ के बाद मनु में जो पूर्वपरिचित देव प्रवृत्ति जाग उठी‚ उसने इड़ा के सम्पर्क में आने पर उन्हें श्रद्धा के अतिरिक्त एक दूसरी ओर प्रेरित किया। ... इड़ा के प्रति मनु को अत्यधिक आकर्षण हुआ और श्रद्धा से वे कुछ खिंचे। ऋगवेद में इड़ा का कई जगह उल्लेख मिलता है यह पजापति मनु की पथप्रदर्शिका‚ मनुष्यों का शासन करने वाली कही गई है।"

"यह आख्यान इतना प्राचीन है कि इतिहास में रूपक का भी अद्भुत मिश्रण हो गया है। इसीलिए मनु‚ श्रद्धा और इड़ा आदि अपना ऐतिहासिक अस्तित्व रखते हुए सांकेतिक अर्थ की भी अभिव्यक्ति करें तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। मनु अर्थात मन के दोनों पक्ष हृदय और मस्तिष्क का सम्बन्ध क्रमश: श्रद्धा और इड़ा से भी सरलता से लग जाता है। श्रद्धा हृदय्य याकूत्या श्रद्धया विन्दते वसु ( ऋग्वेद 10 – 151 – 4) इन्हीं सबके आधार पर 'कामायनी' की कथासृष्टि हुई है। हां ' कामायनी' की कथा श्रृंखला मिलाने के लिये कहीं-कहीं थोड़ी बहुत कल्पना को भी काम में ले आने का अधिकार मैं नहीं छोड़ सका हूं।" -जयशंकर प्रसाद

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कामायनी का अंश (चिन्ता सर्ग से)

हिमगिरी के उत्तुंग शिखर पर‚ बैठ शिला की शीतल छांह

एक पुरुष‚ भीगे नयनों से‚ देख रहा था प्रलय प्रवाह।

नीचे जल था‚ ऊपर हिम था‚ एक तरल था एक सघन

एक तत्व की ही प्रधानता कहो उसे जड़ या चेतन।

दूर दूर तक विस्तृत था हिम स्तब्ध उसीके हृदय समान

नीरवता – सी शिला‚ चरण से टकराता फिरता पवनमान।

तरुण तपस्वी सा वह बैठा‚ साधन करता सुर- श्मशान

नीचे प्रलय सिन्धु लहरों का‚ होता था सकरुण अवसान।

बंधी महाबट से नौका थी सूखे में अब पड़ी रही

उतर चला वह जलप्लावन और निकलने लगी मही।

निकल रही मर्म वेदना‚ करुणा विकल कहानी सी

वहाँ अकेली प्रकृति सुन रही‚ हंसती सी पहचानी सी।

चिन्ता करता हूं मैं जितनी उस अतीत की‚ उस सुख की

उतनी ही अनंत में बनती जातीं रेखाएं दु:ख की।

स्वयं देव थे हम सब‚ तो फिर क्यों न विश्रृंखल होती सृष्टि

अरे अचानक हुई इसी से कड़ी आपदाओं की वृष्टि।

मौन! नाश! विध्वंस! अंधेरा!शून्य बना जो प्रगट अभाव‚

वही सत्य है‚ अरी अमरते! तुझको यहाँ कहाँ ठांव।

मृत्यु‚ अरी चिरनिद्रे! तेरा अंक हिमानी सा शीतल‚

तू अनन्त में लहर बनाती काल – जलधि की – सी हलचल।

वाष्प बन उजड़ा जाता था वह भीषण जल संघात‚

सौर चक्र में आवर्तन था प्रलय निशा का होता प्रात:।

(मनीषा कुलश्रेष्ठ हिंदी की लोकप्रिय कथाकार हैं। गांव कनेक्शन में उनका यह कॉलम अपनी जड़ों से दोबारा जुड़ने की उनकी कोशिश है। अपने इस कॉलम में वह गांवों की बातें, उत्सवधर्मिता, पर्यावरण, महिलाओं के अधिकार और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा करेंगी।)

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