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हाथों से मैला उठाने की कुप्रथा यहाँ पीढ़ियों से चली आ रही, इस दंष से अभी तक आजाद नहीं हुई ये महिलाएं

शौचालय निर्माण में हर साल करोड़ों रुपए खर्च होने वाले स्वच्छ भारत में आज भी ये महिलाएं हाथ से मैला उठाने को मजबूर हैं। गाँव कनेक्शन की विशेष सीरीज 'स्वच्छ भारत में मैला उठाती महिलाएं' के पहले भाग में पढ़िए आख़िर ये महिलाएं मैला उठाने को क्यों विवश हैं? क्या है इनकी मजबूरी?

Neetu SinghNeetu Singh   12 Dec 2020 5:00 PM GMT

जालौन (उत्तर प्रदेश)। बांस की डलिया बगल में दबाकर नीले रंग की छींटदार साड़ी पहने शोभारानी रोजमर्रा की तरह आज भी सुबह 10 बजे मैला उठाने के लिए गाँव की गलियों में निकल पड़ी थीं। नाक पर साड़ी का पल्लू बांधकर ये मैला उठा रहीं थीं।

शोभारानी अपने गांव में ही उन घरों से मैला (मानव मल) उठाने जा रही थीं, जिनके घरों में या तो शौचालय नहीं हैं या फिर वो आदतन दो ईंट रखकर शौच करते हैं और शौच के बाद उस पर राख आदि डाल देते हैं। शोभा उसे लोहे के एक खुरपे की सहायता से उठाकर अपनी डलिया में रखती हैं और मल वाली जगह पर झाड़ू लगाती हैं। उठाए गए मैले को सर पर उठाकर गांव के बाहर फेंककर आती हैं। ये उनका रोज का काम है। शोभारानी की तरह उनके गांव में वाल्मीकि समुदाय की दूसरी महिलाएं भी ऐसा ही काम रोज करती हैं। सरल शब्दों में इसे आप हाथ से मैला उठाने की कुप्रथा कह सकते हैं।

देशभर में स्वच्छ भारत मिशन योजना काफी समय से चल रही है। शौचालय बनाने और स्वच्छता का पाठ पढ़ाने में करोड़ों रुपए खर्च किए जा चुके हैं और खर्च किये भी जा रहे हैं, लेकिन देश के कई हिस्सों में हाथ से मैला उठाने का काम आज भी जारी है। आम बजट 2020-21 में 'स्वच्छ भारत अभियान' के लिए 12,300 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

जालौन जिले के संदी गाँव में हाथ से मैला उठाती ममता बाल्मीकी. फोटो : नीतू सिंह

सरकार की स्वच्छ भारत मिशन- ग्रामीण वेबसाइट के अनुसार भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में दो अक्टूबर 2014 से अब तक 10, 72, 59, 057 शौचालय बन चुके हैं। शौचालय निर्माण में हर साल औसतन 10,000 करोड़ रुपए खर्च होते हैं।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से करीब 250 किलोमीटर दूर जालौन जिले की शोभारानी को अपनी उम्र ठीक से नहीं पता, देखने पर वो 45-50 वर्ष की लगती हैं। रोज सुबह ये अपने गाँव के 10-12 घरों में हाथ से मैला उठाने का काम 30-35 साल से कर रही हैं। ये काम पहले से कम तो हुआ है पर पूरी तरह से अभी समाप्त नहीं हुआ है। इनके पति ज्यादा काम कर नहीं पाते, एक बेटा दिव्यांग हैं। बच्चों का पेट भरने के लिए इतने वर्षों से मैला उठाना इनकी मजबूरी है। ये समुदाय भूमिहीन होता है, इनके पास जीवकोपार्जन का कोई साधन नहीं है। पीढ़ियों से मैला उठाने का काम ये लोग करते आ रहे हैं।

खबर पढ़ते वक्त आपके मन में कई सवाल उठ रहे हैं होंगे कि आख़िर स्वच्छ भारत में शोभारानी हाथ से मैला क्यों उठा रही हैं? क्या गाँव में अभी पूरी तरह शौचालय नहीं बने या फिर कोई और वजह? ये सवाल भी जेहन में आ सकता है कि शायद मैला उठाने के इन्हें ज्यादा पैसे मिलते होंगे?

लेकिन शोभारानी या उन जैसी उनके समाज की तमाम महिलाओं को इस काम के बदले कोई पैसे नहीं मिलते। मैला उठाने के बदले सिर्फ दिन की कुछ रोटियां, नमक या अचार या फिर कई बार थोड़ी बहुत सब्जी मिल जाती है। हाथ से मैला उठाना इनकी मजबूरी है क्योंकि इन्हें परिवार का पेट पालना है। शोभारानी के गांव में इनकी जाति के कुल पांच घर हैं। इन सबने एक दो साल से खाना लेना बंद कर दिया है जिसके बदले इन्हें साल में 8-10 पसेरी (पसेरी मतलब ढाई किलो) गेंहूं मिलते हैं।

अपने पोते-पोतियों की तरफ इशारा करते हुए शोभारानी कहती हैं, "बच्चों का पेट भरने के लिए बेबस में ये गंदा काम करना पड़ता है। किसे अच्छा लगता है कि वो हाथ से दूसरों का मैला (शौच) उठाकर फेंके? नहीं करेंगे तो ये बच्चे खाएंगे क्या? मुंह में कपड़ा बाँध लेते हैं, कई बार उल्टी हो जाती है, पूरी जिंदगी गुजर गयी पर ये काम करना बंद नहीं हुआ।"

शोभारानी 30-35 सालों से रोज सुबह बांस की डलिया लेकर मैला उठाने जाती हैं. फोटो : नीतू सिंह.

जिन घरों से आप मैला उठाने जाती हैं, वहां आपके साथ कैसा बर्ताव होता है? छुआछूत के बारे में सवाल करने पर वे कहती हैं, "हम हो चाहें हमारे बच्चे, ये छुआछूत तो हमारे मरने के बाद ही खत्म होगा। अभी भी जब मैला लेकर निकलते हैं तो कई लोग पीछे से पानी छिड़कने लगते हैं। रोटी मांगने जाओ तो दरवाजे के बाहर से कुंडी बजाओ, दूर से रोटी देते हैं। उनके बर्तन, उनका शरीर हमसे छूना नहीं चाहिए।"

शोभारानी जालौन जिला मुख्यालय से लगभग 17 किलोमीटर दूर कदौरा ब्लॉक के संदी गाँव की रहने वाली हैं। ये जबसे इस गाँव की बहु बनकर आयीं तबसे यही काम कर रही हैं। इस गाँव में बाल्मीकी समुदाय के ज्यादातर लोगों ने गाँव कनेक्शन को बताया कि ये आज भी यही काम करते हैं। गांव कनेक्शन की रिपोर्टर ने इस गाँव में शोभारानी और ममता को नौ दिसंबर 2020 को कुछ घरों से मैला उठाते देखा भी।

जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर मरगायां गांव की 44 वर्षीय गुड्डी देवी गुस्से में कह रहीं थीं, "हमेशा कोई न कोई आकर वीडियो बनाकर ले जाता है पर हमारी जिंदगी में कोई सुधार नहीं हुआ। आपको तो पैसे मिलते होंगे पर हम लोगों से वीडियो बनाने के अलावा कभी कोई मिलने नहीं आता। इस कोरोना में तो बच्चों का पेट भरना मुश्किल है।"

मरगायां गाँव में गाँव कनेक्शन की टीम शाम को पहुंची, वहां के वाल्मीकि समुदाय के लोगों ने वीडियो बनाने से मना कर दिया।

"हमारे बच्चों को दूध,घी के तो सपने भी नहीं आते। जबसे लॉकडाउन लगा है तबसे लोग सब्जी भी देना कम कर दिए हैं। नमक रोटी इस लॉकडाउन में खानी पड़ रही है। हमारी किसको सुध है? सब कोरोना में सफाई की बात करते हैं और हम गंदा काम करते हैं," गुड्डी अपनी आप बीती बता रहीं थीं।


सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अधीन काम करने वाली संस्था नेशनल सफाई कर्मचारी फाइनेंस एंड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (एनएसकेएफडीसी) द्वारा 18 राज्यों के 170 जिलों में अगस्त 2019 में एक सर्वे कराया गया था. इन जिलों में कुल 87,913 लोगों ने खुद को मैला ढोने वाला बताते हुए रजिस्ट्रेशन कराया था। जिसमें सिर्फ 42,303 लोगों को ही राज्य सरकारों ने मैनुअल स्कैवेंजर्स (मैला ढोने वाले लोग) के रूप में स्वीकार किया गया। इस हिसाब से जितने लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया था, उसमें से 50 फीसदी से भी कम लोगों को मैनुअल स्कैवेंजर्स माना गया है।

इस सर्वे के अनुसार पूरे देश में सबसे अधिक उत्तर प्रदेश के 47 जिलों से 41,068 लोगों ने खुद को मैनुअल स्कैवेंजर्स बताते हुए रजिस्ट्रेशन कराया था जबकि राज्य सरकार ने केवल 19,712 लोगों को ही मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में स्वीकार किया है। नेशनल सफाई कर्मचारी फाइनेंस एंड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन की वेबसाईट के अनुसार जनवरी 2019 से अगस्त 2019 तक हर महीने सर्वे किये गया है जिसमें यूपी में रजिस्ट्रेशन कराने वालों की संख्या हर महीने बढ़ी है। जहाँ जनवरी 2019 में 24,967 मैनुअल स्कैवेंजर्स के लिए रजिस्ट्रेशन हुए थे वहीं अगस्त 2019 में ये संख्या 41,068 तक पहुंच गयी।

मरगायां गाँव के ग्राम प्रधान उदय भानु बताते हैं, "हमारे गाँव में 85 प्रतिशत घरों में शौचालय बने हैं। लेकिन आज भी गाँव की दो महिलाएं 30-35 घरों में हाथ से मैला उठाने का काम करती हैं। जिसके बदले इन्हें रोज रोटी मिलती है।"

जिन घरों में ये महिलाएं साफ़ करने जाती हैं क्या उनके घर शौचालय नहीं बने हैं? इस पर उदय भानु कहते हैं, "सबके घर शौचालय बने हैं लेकिन कुछ लोग आदतन आज भी ईंटे पर बैठकर शौच करते हैं। ये मानसिकता है उनकी, अगर ये साफ़ करने न जाएँ तो कोई जबरजस्ती थोड़े साफ़ करवाएगा।"

नेशनल सफाई कर्मचारी फाइनेंस एंड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार बिहार के 16 जिलों में 4,757 लोगों ने खुद को मैनुअल स्कैवेंजर्स बताते हुए रजिस्ट्रेशन कराया था, लेकिन राज्य सरकार ने इनमें से एक भी व्यक्ति को मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में स्वीकार नहीं किया है। वहीं हरियाणा में 1221, जम्मू कश्मीर में 254 और तेलंगाना ने 288 लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया था पर राज्य सरकारों ने किसी को भी मैनुअल स्कैवेंजर्स स्वीकारा नहीं।

जुलाई 2019 में संसद से दिए गए जवाब में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने कहा था कि सरकार को देश में 18 राज्यों में 170 जिलों से हाथ से मैला सफाई के 54,130 मामलों का पता चला है।

क्या जालौन जिले में मैला उठाने का काम अभी हो रहा है? इस सवाल के जवाब में जालौन के जिलाधिकारी डॉ मन्नान अख्तर ने गाँव कनेक्शन को फोन पर बताया, "हम लोगों ने दो साल पहले एक सर्वे करवाया था जिसमें चार पांच लोग किसी गाँव में मिले थे, इनके पुनर्वास के लिए इन्हें 40,000 रुपए भी दिए गये थे। अब ड्राई ट्वायलेट का कॉन्सेप्ट ही नहीं है तो मैला उठाने वाले लोग कहाँ होंगे? अगर वो ये काम कर रहे हैं और आपके पास प्रूफ है तो मुझे दीजिये।"

संदी और मरगायां गाँव के बाल्मीकी समुदाय के लोगों ने गाँव कनेक्शन को बताया कि इन दोनों गाँव के 25-30 लोग अभी भी ये काम कर रहे हैं इसमें कितनी सच्चाई है? इस सवाल के जवाब में जिलाधिकारी डॉ मन्नान अख्तर ने कहा, "आपसे ज्यादा लंबे समय से मैं यहाँ रहा हूँ, ग्राम प्रधान से हमेशा संपर्क में रहता हूँ, आजतक ऐसी कोई सूचना प्राप्त नहीं हुई है। मेरी जानकारी में जिले में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जो ये काम करता हो। संदी और मरगायां दोनों समृद्ध गाँव हैं यहाँ 25-30 ऐसे लोगों की संख्या हो ही नहीं सकती, आपको भ्रमित किया जा रहा है।"

ममता बाल्मीकी ये काम छोड़ना चाहती हैं पर उनकी मजबूरी है. फोटो : नीतू सिंह

जिला जालौन, सूखे के लिए कुख्यात बुंदेलखंड क्षेत्र में आता है। सूखे बुंदेलखंड में सूखे शौचालय हाथ से साफ हो रहे हैं ये पता नहीं चलता अगर तीन साल पहले "बुंदेलखंड दलित अधिकार मंच" नाम के एक संगठन ने यहां अभियान न चलाया होता, सर्वे न किया होता। पिछले 10 वर्षों से दलितों के हक और अधिकार के लिए काम करने वाले इस संगठन ने साल 2017 में जालौन के दो ब्लॉक कदौरा और महेवा में सर्वे कर 276 परिवार चिन्हित किये थे जो मैला उठाने का काम करते थे।

2017 में ही मानवाधिकार दिवस के दिन ही यूपी की विधानसभा के सामने इन महिलाओं ने डलिया और झाड़ू लेकर एक मार्च निकाला जिसमें इनका नारा था, आख़िर कब मिलेगी हमें मैला ढोने से मुक्ति?"

सरकार ने इस मामले को संज्ञान में लिया। उसी समय भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी वित्त विकास निगम के तहत जिले में अप्रैल 2018 में तीन कैम्प लगाये गए। जिसमें मैनुअल स्कैवेंजर्स के डिक्लेरेशन फॉर्म भरवाए गए और 649 लोगों को चिंहित किया गया।

बुंदेलखंड दलित अधिकार मंच के संयोजक कुलदीप कुमार बौद्ध कहते हैं, "तीन साल की मेहनत के बाद भारत सरकार ने 649 लोगों को खुद स्वीकारा। इन सभी परिवारों के पुनर्वास के लिए डेढ़ दो साल पहले प्रति परिवार 40,000 रुपए भी दिए गए, लेकिन दोबारा किसी ने उनकी तरफ मुड़कर नहीं देखा। अभी हालात ऐसे लग रहे हैं कि अगर जल्द ही इन्हें सरकार की दूसरी योजनाओं का लाभ नहीं मिला तो पुनः ये इस काम को करना इनकी मजबूरी बनेगी।"

कुलदीप आगे कहते हैं, "जब भारत सरकार की तरफ से डिक्लेरेशन कैम्प लगाए थे उस समय बहुत लोग अपना फॉर्म नहीं भर पाए थे। अभी हमारे पास 1138 फॉर्म पूरी डिटेल के साथ रखें हैं। अगर पूरे जिले की बात करें तो कम से कम '2,500' महिलाएं अभी भी ये काम करने को मजबूर हैं। सरकार ये आंकड़े पूरी तरह से छिपा रही है, हमारे सर्वे से पहले सूचना के अधिकार के तहत हमें जिले में जवाब दिया गया था कि जिले में कोई भी मैला ढोने का काम नहीं करता है।"

तीन साल पहले बुन्देलखंड दलित अधिकार मंच ने यूपी विधानसभा के सामने मैला ढोने वाली महिलाओं के हक की सरकार से मांग की थी.

देश में मैला ढोने की कुप्रथा पर पूर्णतया प्रतिबंध है। इसके लिए एक कानून भी बनाया गया है, "हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वासन अधिनियम 2013". इस कानून के तहत मैला ढोने के काम में संलिप्त लोगों को पुनर्वास किया जाए। जिला स्तर पर 'जिलास्तरीय सर्वेक्षण समिति' और राज्य स्तर पर 'राज्यस्तरीय सर्वेक्षण समिति' का गठन किया जाए। जो लोग भी इस काम में चिंतित पाए जाएं उन्हें रोजगार से जोड़ा जाए।

उत्तर प्रदेश राज्यस्तरीय निगरानी समिति के सदस्य, जालौन जिले के भग्गू लाल बाल्मीकी बताते हैं, "जालौन जिले में हाथ से मैला उठाने का काम लगभग 50 महिलाएं अभी भी कर रही हैं। ये उन घरों में साफ़ करने जाती हैं जिन घरों में ईंटें रखकर घर के बुजुर्ग, बीमार या बच्चे शौच करते हैं। लेकिन कानून में इन्हें मैला उठाने की श्रेणी में माना ही नहीं जाता है। कई घरों में शौचालय बनने के बाद भी ऊँची जाति के लोग आदतन ऐसा करवाते हैं।"

जनवरी 2019 में प्रकाशित स्वच्छ भारत के सर्वे में भी ये बात सामने आई कि बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में लोगों की 'आदत में बदलाव' नहीं आ पा रहा है। सर्वे में कहा गया है कि इन राज्यों में एक चौथाई घरों में शौचालय होने के बाद भी लोग खुले में शौच के लिए जाते हैं।


"जब कैम्प लगा था उस समय बाल्मीकी समुदाय के बहुत लोग पलायन कर गये थे, लॉकडाउन में सब वापस आ गये हैं। दोबारा एक बार कैम्प लगने की अतिशीघ्र जरूरत है। ये वंचित तबका है, इनके पास रोजगार का कोई साधन नहीं है। जीवकोपार्जन के लिए 40,000 रूपये पर्याप्त नहीं हैं, इनका पुनर्वास होना सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए," भग्गू लाल ने बताया।

इस कानून के बावजूद शोभारानी की तरह उनकी पड़ोसन ममता वाल्मीकि (40 वर्ष) भी आज मैला उठाने का काम कर रही हैं।

ममता आज माया विश्वकर्मा के घर पर मैला उठाने गयीं थीं। ममता माया की तरफ इशारा करते हुए कहती हैं, "ये दिव्यांग हैं, चल फिर नहीं सकतीं। इनका शौचालय नहीं बना है, ये अपने घर से पीछे बने आड़ की जगह में शौच जाती हैं। रोज सुबह हम फेंकने आते हैं।"

संदी गाँव की महिलाओं की आपबीती सुनिए

आपको अभी तक शौचालय नही मिला इसपर माया कहती हैं, "कई बार फॉर्म भरकर दिए हैं लेकिन अभी तक हमारे नाम से शौचालय आया ही नहीं। मजबूरी में इनसे साफ करवाना पड़ता है।"

गांव कनेक्शन ने संदी गांव के प्रधान पुत्र अश्वनी दुबे से पूछा कि क्या आपके गांव में आज भी महिलाएं मैला उठाती हैं इस पर वो बोले, " नहीं, हमारी जानकारी में नहीं हैं। हमारे यहां 95 फीसदी लोगों के यहां शौचालय बन चुके हैं।"

जब हमने उन्हें बताया कि कुछ घरों में तो हम देखकर आये हैं जहां महिलाएं हाथ से मैला उठा रहीं थीं और उनके शौचालय नहीं बने। अश्वनी दुबे कहते हैं, "लॉकडाउन में कई परिवार गांव लौटे हैं जिस वजह से ये देखने को मिला होगा। माया विश्वकर्मा के पति बाहर मजदूरी करते हैं, गांव में शौचालय उनका कौन बनवाएगा?"

गाँव कनेक्शन ने यूपी के जालौन जिले में 7-9 दिसंबर तक तीन गाँव मरगायां, संदी और चमारी में बाल्मीकी परिवारों के साथ तीन दिन तक पड़ताल की। इस दौरान ये जानने की कोशिश की कि क्या आज भी ये महिलाएं मैला ढोने का काम कर रही हैं? पड़ताल में ये निकलकर आया कि आज भी कई महिलाएं हाथों से मैला उठाने का काम कर रही हैं। चमारी गाँव में इस कुप्रथा से यहाँ की महिलाएं एक डेढ़ साल पहले ही आजाद हुई हैं। ये वो परिवार हैं जिन्हें सरकार की तरफ से पुनर्वास के लिए मुआवजा राशि मिल चुकी है।

मरगायां गाँव की गुड्डी देवी ने बताया, "हमारे यहाँ 25-30 परिवार रहते हैं, सब लोग आज भी मैला उठाने का काम कर रहे हैं। इस काम के बदले हमें पैसे नहीं मिलते। सुबह आठ से 12 बजे तक पहले एक मोहल्ले की टट्टी (मैला) फेकने जाओ फिर 12 बजे नहा धोकर उन्हीं घरों में बर्तन लेकर खाना मांगने जाओ।" गुड्डी की बातों का वहां बैठी कई महिलाओं ने समर्थन किया।

ये हैं माया विश्वकर्मा, जो दिव्यांग हैं. इनके घर शौचालय नहीं बना है. ममता बाल्मीकी इनके यहाँ मैला उठाने आती हैं.


जालौन जिले के जिला पंचायत राज अधिकारी अभय कुमार यादव फोन पर बताते हैं, "हमारे पास जितने शौचालय बनने की मांग आयी उतने शौचालय बन गये हैं। वर्ष 2018-19 में एक सर्वे हुआ था जितने लोग इस सर्वे में मैला उठाने के लिए चिन्हित किये गये थे उन्हें 40,000 की मुआवजा राशि दे दी गयी है। अभी भी सर्वे करा रहे हैं, अगर कोई पात्र व्यक्ति मिलता है तो उसे तुरंत पुनर्वास किया जाएगा। सामुदायिक शौचालय की देखरेख के लिए भी हम यही कोशिश कर रहे हैं कि इन परिवारों को ही ये जिम्मेदारी सौंपी जाए जिसमें इन्हें महीने के 6,000 रुपए मिलेंगे।

संदी गाँव की रिया बाल्मीकि (14 वर्ष) गिनती के दो चार बार ही बचपन में स्कूल गईं हैं। पढ़ाई क्यों नहीं की इस पर वो कहती हैं, "हमें सब बच्चों से दूर बैठाया जाता था। हम अपने घर से बोरी बिछाने के लिए ले जाते थे। मास्टर हाथ पकड़कर लिखवाते ही नहीं थे। सबको हमसे छूत लगता था,ये सब हमें बुरा लगता था इसलिए हमनें पढ़ाई नहीं की।"

रिया अपने समुदाय की पहली लड़की नहीं हैं जिन्होंने पढ़ाई न की हो, इनके समुदाय में गिनती के कुछ एक बच्चे ही प्राइमरी स्कूल में जाते हैं। लॉकडाउन की वजह से लगभग एक साल से वो भी नहीं गए।

रिया की माँ कहती हैं, "हमारे 4 बच्चे हैं। हमनें बहुत कोशिश की कि इन्हें पढ़ाएं पर इनके साथ इतना भेदभाव होता है ये जाते ही नहीं है। ट्यूशन भी पढ़ाने के लिए बहुत लोगों को बोला पर छूत की वजह से हमारे बच्चों को कोई ट्यूशन भी पढ़ाने नहीं आता।"

अपनी दादी और माँ के साथ बैठी रिया बाल्मीकी.

क्या कहता है कानून?

देश में पहली बार 1993 में मैला ढोने की प्रथा पर प्रतिबंध लगाया गया था। इसके बाद 2013 में कानून बनाकर इस कुप्रथा पर पूरी तरह से बैन लगाया गया था। कानून में प्रावधान है कि अगर कोई मैला ढोने का काम कराता है तो उसे सजा दी जाएगी, लेकिन केंद्र सरकार खुद ये स्वीकार करती है कि उन्हें इस संबंध में किसी को भी सजा दिए जाने की जानकारी नहीं है। मैला ढोने वालों का पुनर्वास सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की मैला ढोने वालों के पुनर्वास के लिए स्व-रोजगार योजना के तहत किया जाता है।

इस योजना के तहत मुख्य रूप से तीन तरीके से मैला ढोने वालों का पुनर्वास किया जाता है। पहला 'एक बार नकदी सहायता' के तहत मैला ढोने वाले परिवार के किसी एक व्यक्ति को एक मुश्त 40,000 रुपए दिए जाते हैं। मुआवजा राशि केवल जीवकोपार्जन के लिए दी जाती है इससे पुनर्वास नहीं होता है। मैला ढोने वालों को प्रशिक्षण देकर उन्हें रोजगार से जोड़कर पुनर्वास माना जाता है। इसके तहत प्रति माह 3,000 रुपये के साथ दो साल तक कौशल विकास प्रशिक्षण दिया जाता है। निश्चित राशि तक के लोन पर मैला ढोने वालों के लिए सब्सिडी देने का प्रावधान है।

कैसा होता है सूखा टॉयलेट?

देश में पहले ये बाकायदा पक्के भी हुआ करते थे। कई बार जो अपने घरों में पक्के शौचालय नहीं बनवा सकते हैं या शहर की बात करें तो झुग्गियों आदि में लोग जुगाड़ के शौचालय बना लेते हैं। इसमें टैंक, पिट या सीवर नहीं होता है, वहां लोग गड्ढे की जगह बाल्टी आदि रख देते हैं। कई बार कुछ लोग ईंट रखकर भी शौच से मुक्त होते हैं। शौच जाने के बाद कई बार लोग राख आदि डाल देते हैं। सफाई कर्मचारी दिन में एक बार उसे उठा ले जाते हैं। लेकिन अब ये कानूनी रूप से पूरी तरह प्रतिबंध है।

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