हर साल बचाई जा सकती हैं लाखों ज़िंदगियां

हर साल बचाई जा सकती हैं लाखों ज़िंदगियां

भारत में लाखों लोग हर साल ऐसी बीमारियों से जान गंवा देते हैं जिन्हें बुनियादी सुविधाएं, प्राथमिक उपचार, टीकाकरण, साफ-सफाई और कुपोषण दूर करके बचाया जा सकता है

Chandrakant Mishra

Chandrakant Mishra   23 July 2019 10:28 AM GMT

लखनऊ। "मेरे बेटे को चुमकी बुखार हो गया था। पहले प्राइवेट ले गए फिर मेडिकल कॉलेज लेकिन हमरा बच्चा बच नहीं सका। डॉक्टर लोग जब एक बुखार का इलाज नहीं कर सकता तो कैंसर और बड़ी-बड़ी बीमारियों के बारे में क्या कहें? " बिहार के मुजफ्फरपुर प्रखंड तुर्की के ग्राम अमरख के रहने वाले अशोक (28 वर्ष) का ये दर्द उस समय उभरा जब चमकी बुखार से उनके बेटे ने दम तोड़ दिया।

अशोक के बच्चे की ही तरह न जाने कितने लोग भारत में ऐसी बीमारियों से दम तोड़ देते हैं जिन्हें जल्द इलाज, और मूलभूत सुविधाओं तक उनकी पहुंच से बचाया जा सकता है। ये ऐसी बीमारियां हैं, जो साफ-सफाई, टीकाकरण, पोषणयुक्त भोजन और समय से इलाज मिलने से हजारों ज़िंदगियां बचाई जा सकती हैं।

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हाल ही में बिहार के मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार से करीब 150 बच्चों की जान चली गई। इन बच्चों की मौतों ने एक बार हमारी स्वास्थ्य सुविधाओं को कठघरे में खड़ा कर दिया। एक बुखार से इतने बच्चों की मौतों ने स्वास्थ्य सेवाओं से लेकर मूलभूत सुविधाओं तक जरूरतमंदों की पहुंच की पोल खोल दी है।

सामुदायिक स्वास्थ्य और चमकी बुखार पर रिसर्च करने वाले डॉक्टर अरुण शाह ने गाँव कनेक्शन को बताया, "हमारे देश में स्वास्थ्य पर आवंटित होने वाला बजट बहुत कम है। सबसे पहले इसे बढ़ाना होगा। इसके साथ ही देश में अस्पतालों और डॉक्टरों की भारी कमी है," उन्होंने आगे कहा, "स्वास्थ्य जांच भी एक बहुत बड़ी परेशानी है। वर्ष 2018 में जारी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में 70 प्रतिशत कैंसर के मामलों का पता तब चलता है जब वह अंतिम चरण में पहुंच जाता है।"

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दुनियाभर में बीमारियों से मौत के 10 प्रमुख कारणों में टीबी एक बड़ा कारण है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की वर्ष 2016 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पूरी दुनिया के 24 फीसदी टीबी के मामले सामने आते हैं। टीबी के कारण भारत में हर साल करीब पांच लाख लोगों की मौत हो जाती है। हालांकि, भारत सरकार वर्ष 2025 तक भारत को टीबी मुक्त करने की बात कह रही है।


पटेल चेस्ट इंस्टिट्यूट नई दिल्ली के पूर्व निदेशक प्रो. राजेंद्र प्रसाद ने गाँव कनेक्शन को बताया, "भारत में बदहाल स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर चिंताएं जताई जाती हैं, और उनसे निपटने के उपायों के बारे में चर्चा भी की जाती है, लेकिन धरातल पर उपायों का क्रियान्वयन नहीं होता, जिसका खामियाजा एक बड़ी आबादी को कई तरह की बीमारियों के रूप में भुगतना पड़ता है।"

वह आगे कहते हैं, "भारत में टीबी (क्षय रोग) की बात करें तो यह एक ऐसी बीमारी बन चुकी है, जो इलाज मौजूद होने के बावजूद कई कारणों से खत्म नहीं हो पा रही है। जिन लोगों पर इन समस्याओं के समाधान की जिम्मेदारी है वे इस तरफ गंभरता से ध्यान नहीं दे रहे।"

स्वास्थ्य क्षेत्र की खबरों और जानकारियों को छापने वाले प्रतिष्ठित जर्नल 'द लैंसेट' की वर्ष 2019 की रिपोर्ट के अनुसार भारत स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और गुणवत्ता के मामले में 195 देशों की सूची में 145वें स्थान पर है, वर्ष 1990 में भारत 153वें पायदान पर था। ताजा सूची 2016 के अध्ययन पर आधारित है। ढाई दशकों में भारत के प्रदर्शन में मात्र 16.5 अंकों की बढ़त हुई, जबकि वैश्विक औसत 54.4 अंकों का है।

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विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के महानिदेशक ट्रेडोस एडहानोम गेबेरियस ने एक विज्ञप्ति जारी कर कहा था, "बहुत से लोग अभी भी ऐसी बीमारियों से मर रहे हैं जिसका आसान इलाज मौजूद है और बड़ी आसानी से जिसे रोका जा सकता है। बहुत से लोग केवल इलाज पर अपनी कमाई को खर्च करने के कारण गरीबी में धकेल दिए जाते हैं और बहुत से लोग स्वास्थ्य सेवाओं को ही पाने में असमर्थ हैं। यह अस्वीकार्य है।"

उत्तर प्रदेश में संचारी रोग निदेशक डॉक्टर मिथिलेश कहते, "कोई भी सामान्य दिखने वाला बुखार भी दिमागी हो सकता है। इसलिए बुखार आने पर डॉक्टर को दिखाएं और जांच जरुर कराएं। अपने आस-पास साफ सफाई रखें। बच्चों को स्वच्छ पानी दें। वैक्सीनेशन से चिकन पॉक्स और पोलियो को दूर किया गया तो एईएस और जेई को क्यों नहीं। इसके लिए सभी को जागरूक होना होगा ताकि अधिक से अधिक बच्चों का वैक्सिनेशन किया जा सके।"

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार हर साल भारत में कुपोषण से मरने वाले पांच साल से कम उम्र के बच्चों की संख्या दस लाख से भी ज्यादा है। दक्षिण एशिया में भारत कुपोषण के मामले में सबसे बुरी हालत में है।


मध्य प्रदेश के शहडोल के रहने वाले राकेश के तीन साल के बेटे किशोर की मौत अज्ञात बीमारी से हो गई थी। राकेश बताते हैं, "मेरा बेटा बीमार पड़ गया था। कुछ हरकत भी नहीं करता था। हम लोग उसे एक अस्पताल में ले गए। दो दिन बाद मेरा बेटा मर गया। पूछने के बाद भी डॉक्टरों ने मौत की वजह नहीं बताई। गाँव के कुछ लोग कह रहे थे तुम्हारा बेटा कुपोषित था, इसलिए उसकी मौत हो गई।"

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वहीं, यूपी में कुपोषण पर काम करने वाली संस्था वात्सल्य के कार्यक्रम प्रबंधक अंजनी सिंह ने बताया, "आजादी के इतने साल बाद भी यदि भारत में कुपोषण से बच्चों की मौत हो रही है तो यह शर्म की बात है। भारत में गरीब आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा कुपोषण से जूझ रहा है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार भारत में कुपोषण की वहज से 40 प्रतिशत बच्चों का विकास नहीं हो पाता, वहीं, 60 प्रतिशत बच्चे औसत वजन से भी कम होते हैं। भारत से कुपोषण हटाने के लिए संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों सहित तमाम देशी विदेशी संगठन काम कर रहे हैं। लेकिन अभी तक गरीबी और कुपोषण से निपटने के लिए भारत में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई है।"


दिल्ली हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और राइट टू पब्लिक हेल्थ के लिए काम करने वाले अशोक अग्रवाल ने गाँव कनेक्शन को बताया, "हमारे देश की स्वास्थ्य सेवाएं काफी लचर हैं। प्राइवेट अस्पताल में मिलने वाली सुविधाएं सीमित हैं और बहुत महंगी हैं, ऐसे में आम लोगों को सरकारी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है। अपने भारत में हर वर्ष गैर संचारी रोगों के शिकार लाखों लोगों की मौत हो जाती है। इनमें से कई ऐसे मरीज होते हैं, जिनमें मौत का कारण उपचार का न मिलना होता है। गरीब मरीज इन बीमारियों का इलाज तो दूर जांच तक नहीं करा पाते। मध्यम वर्गीय परिवार के लोग इलाज में इतनी रकम खर्च कर देते हैं कि उनकी कमर टूट जाती है।

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