पुरुषों को नसबंदी के बारे में समझाना आशा बहुओं के लिए चुनौती, आंकड़ा अभी भी बहुत पीछे

पुरुषों को नसबंदी के बारे में समझाना आशा बहुओं के लिए चुनौती, आंकड़ा अभी भी बहुत पीछेपुरूषों को नसबंदी के बारे में समझाना भी जरूरी। 

छोटा परिवार रखने की अंतिम जिम्मेदारी सिर्फ महिला व पुरुष दोनों की है। लेकिन हमारे यहां सरकारी प्रयासों और योजनाओं में भी आबादी नियंत्रण के लिए गर्भ रोकने के दूसरे विकल्पों से ज्यादा महिलाओं की नसबंदी पर जोर दिया जाता है जबकि पुरूष इस मामले में अभी भी काफी पीछे हैं।

21 नवम्बर से 4 दिसम्बर 2017 के बीच मिशन परिवार विकास के अंतर्गत 03 या तीन से अधिक सकल प्रजनन दर वाले चयनित 57 जिलों में पुरुष नसबंदी पखवाड़े का आयोजन किया जा रहा है जिसका थीम हर जिम्मेदार पुरुष की यही है, पहचान, परिवार नियोजन में जो दे योगदान निर्धारित किया गया है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य परिवार सर्वेक्षण 2015-16 (एनएफएचएस -4) के अनुसार, भारत में गर्भनिरोध का सबसे लोकप्रिय तरीका महिला नसबंदी है। आधुनिक परिवार नियोजन विधियों में 75 फीसदी इसका प्रयोग होता है। सुरक्षित, जल्द और आसान होने के बावजूद परिवार नियोजन के तरीकों में पुरुष नसबंदी की हिस्सेदारी 0.62 फीसदी है।

पुरूषों से नसबंदी पर बात करने में आशा बहुओं को होती है झिझक

महिलाओं की अपेक्षा पुरूषों की संख्या इस मामले में कम होने के पीछे सबसे बड़ा कारण जागरूकता की कमी व भ्रांतियां हैं। शाहजहांपुर के ददरौल ब्लॉक की आशा बहू रेखा बताती हैं, “परिवार नियोजन के तरीके व नसबंदी के बारे में समझाने की जिम्मेदारी हम महिलाओं को दी जाती है। हम महिलाओं से तो आसानी से बात कर लेते हैं लेकिन पुरूषों से बात करने में हमें हिचक होती हैं। हम उन्हें इस बारे में क्या समझाएं कैसे बात करें।”

परिवार नियोजन पहलों में पुरुषों को शामिल करने की आवश्यकता क्यों

हमें याद रखना चाहिए कि परिवार नियोजन सिर्फ एक महिला का मुद्दा नहीं है। यह एक दंपति का मुद्दा है। इसलिए, एक पर ध्यान केंद्रित करने से हमें कभी अच्छा परिणाम नहीं मिलेगा। दक्षिण एशिया के कई हिस्सों में पुरुष परिवार नियोजन पर चर्चा में भाग नहीं लेते हैं या निर्णय लेने में शामिल नहीं होते हैं। वे पीढ़ियों से देखते हुए आए हैं कि परिवार नियोजन की जिम्मेदारी महिलाओं पर ही है।

एनएफएचएस -3 के आंकड़ों से पता चलता है कि 22 फीसदी पुरुषों के लिए गर्भनिरोध की जिम्मेदारी महिलाओं पर है। कई अध्ययनों से पता चला है कि अब गर्भनिरोध का निर्णय पुरुषों द्वारा नियंत्रित हो रहा है।

लखनऊ के अमेठी गाँव की आशाबहू आशा देवी बताती हैं, हमें लगता है कि गाँव में ये काम आदमियों का होना चाहिए। वो एक दूसरे को ज्यादा अच्छे से समझा सकते हैं, “महिलाएं थोड़ा झिझकती हैं। वो महिलाओं को तो समझा सकती हैं लेकिन पुरुषों से ऐसे मुद्दे पर बात नहीं कर सकती हैं।

पुरूषों में नसबंदी को लेकर डर

पुरूषों का नसबंदी को लेकर उदासीनता होने का कारण विधियों का अभाव, मिथक और गलत धारणाओं का प्रचलन, सेवाओं तक पहुंच की कमी, सूचना और गर्भनिरोधक के उपलब्ध तरीकों पर परामर्श की कमी, उनके लाभ और दुष्प्रभाव और प्रबंधन तक पहुंच में कमी शामिल हैं। नसबंदी एक सुरक्षित, जल्द और आसान विकल्प है। लेकिन कई अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि भारतीय पुरुष इस प्रक्रिया से गुजरना नहीं चाहते हैं। उन्हें अपने पुरुषत्व को खोने का डर रहता है। देशभर में लैंगिक रूढ़िवाद को तोड़ने, मिथकों को दूर करने, और पुरुष भागीदारों को जिम्मेदार बनाने की रणनीतियों सहित पुरुष नसबंदी को बढ़ावा देने के लिए एक अभियान की आवश्यकता है।

इसके अलावा पुरूषों की इसके पीछे क्या मानसिकता है। इसके बारे में हमें लखनऊ के मनोचिकित्सक विवेक अग्रवाल बताते हैं, “ज्यादातर जानकारी की कमी में पुरूष ये वहम पाल लेते हैं कि अगर वो नसबंदी कराएंगें तो उन्हें नपुसंकता हो सकती है या लोग उनका मजाक बनाएंगें। उनकी मर्दानगीं पर लोग शक करेंगे। इन सबके कारण ही वो महिला को आगे करता है, खुद आगे नहीं आता है।”

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ये भ्रांतियां गलत हैं

पुरूषों में ये भ्रांतियां गलत हैं। इसके बारे में लखनऊ के डॉ एमए खान इस बारे में बताते हैं, “ नसबंदी से पुरुषों के सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता। न ही उनकी सेक्स लाइफ पर को असर पड़ता है। ये गलत सोच है कि इससे उनमें कोई कमी आ जाएगी। इसलिए उन्हें भी इस ओर अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए।”

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