मजदूरों की देहाड़ी 350 रुपए तो रसोइयों को 35 रुपए क्यों दे रही है सरकार?

दस हज़ार रुपए न्यूनतम मानदेय, नौकरी का स्थाईकरण, 12 महीने का वेतन, पांच लाख का मुफ्त जीवन बीमा जैसे मुख्य मुद्दों के साथ रसोइया संघ ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर दो दिन का धरना प्रदर्शन किया।

Pragya BhartiPragya Bharti   9 Feb 2019 2:39 PM GMT

मजदूरों की देहाड़ी 350 रुपए तो रसोइयों को 35 रुपए क्यों दे रही है सरकार?जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन के दौरान मध्यान्ह भोजन योजना के कर्मचारी। फोटो साभार- शुभम सिंह

लखनऊ। 'राष्ट्रीय मध्यान्ह भोजन रसोइया फ्रंट' के नेतृत्व में देश भर के रसोइए 16 दिन की हड़ताल कर रहे हैं। ये एक से 16 फरवरी 2019 तक प्रस्तावित है, इस ही के अंतर्गत आठ और नौ फरवरी को राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर रसोइयों ने धरना दिया। रसोइयों की मुख्य मांग वेतनवृद्धि है। भारत सरकार की मध्यान्ह भोजन योजना के तहत 2016-17 में देश भर में लगभग 25.25 लाख रसोइए काम करते थे, इन्हें हर महीने 1000 रुपए वेतनमान देय है।

रसोइया फ्रंट के राष्ट्रीय महासचिव रामकृपाल बताते हैं कि उन्हें 10 महीने का मानदेय ही मिलता है। 2010 से लेकर अभी तक उनके वेतन में कोई वृद्धि नहीं हुई है। उन्हें हर महीने 1000 रुपए वेतन सरकार की ओर से दिया जाता है पर वो भी समय पर नहीं मिलता। छह महीने और कई बार तो साल-साल भर के वेतन का भुगतान नहीं होता। गाँव कनेक्शन से फोन पर बात करते हुए उन्होंने कहा-

"हम रसोइए गरीब घरों से आते हैं, हमारे पास न घर है, न दुकान, हम इस नौकरी पर ही निर्भर हैं; अगर इसका पैसा भी हमें समय पर नहीं मिलेगा तो हम क्या करेंगे? मोदी, योगी, नितीश सरकार किसी ने हमारी मदद नहीं की। पूरे देश में लगभग 35 लाख रसोइए हैं, बिहार में कुछ 2 लाख 28 हज़ार रसोइए काम करते हैं और उत्तर प्रदेश में ही 4 लाख रसोइए हैं। बिहार में हमें 1250 मिलते हैं तो उत्तर प्रदेश में 1000 रुपए, उस पर केवल 10 महीने का पैसा मिलता है, वो भी हमेशा देर से।"

प्रदर्शन के दौरान दूर-दराज़ इलाकों से आईं मध्यान्ह भोजन योजना के तहत काम करने वालीं कर्मचारी। फोटो साभार- शुभम सिंह

रसोइयों को मिलने वाले मानदेय का खर्च 60% केन्द्र सरकार उठाती है तो 40% राज्य सरकार। तीन पहाड़ी राज्यों हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर और उत्तराखण्ड में ये 90-10 फीसदी है तो वहीं केन्द्र शाषित प्रदेशों में पूरा केन्द्र सरकार वहन करती है। रामकृपाल बताते हैं कि, "इस नौकरी में महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में अधिक है। उत्तर प्रदेश राज्य में उन्हीं महिलाओं को नौकरी मिलती है जिनके बच्चे उस स्कूल में पढ़ते हैं। ये शिक्षकों पर लागू क्यों नहीं है? जिन्हें 1000 रुपए महीने का मिलता है उन पर ये नियम, जो लोग 50-60 हज़ार महीने का कमाते हैं उन पर नियम क्यों नहीं लगाती सरकार?"

राष्ट्रीय महासचिव के अनुसार, रसोइयों के खाते में पैसे नहीं आते जबकि सरकार ने ये घोषणा की थी कि वेतन सीधे कर्मचारियों के खाते में आएगा। प्रधान और हैड मास्टर इसके सचिव होते हैं, उन्हीं के नाम जॉइंट अकाउंट है, इस खाते में पैसे आते हैं। एक और दिक्कत सबसे बड़ी है कि ये अस्थाई नौकरी है, हर साल नियुक्ति के लिए नए तरीके से आवेदन करना होता है। अधिकारी हर बार आय प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र नया बनवाने के लिए कहते हैं। बहुत समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन नियुक्तियों में अध्यापक और गांव के प्रधान घूस लेते हैं, नौकरी लगवाने के लिए गरीब लोगों से 5000 रुपए मांगते हैं। बिहार सरकार ने व्यवस्था की कि सात साल तक एक व्यक्ति को नौकरी दी जाए, वहां फिर भी हालत ठीक है लेकिन साल-साल भर तक उनका पैसा नहीं आता है।

वह कहते हैं कि "मजदूरी का भी दाम 370 रुपए तय है फिर हमें दिन का 35 रुपए क्यों?"

धरना प्रदर्शन में शामिल हुईं बिहार के बक्सर जिले से आईं रानी देवी ने गाँव कनेक्शन को फोन पर बताया कि उन्हें महीने का 1000-1200 रुपए वेतन मिलता है। हर महीने वेतन नहीं मिलता, पांच-छह महीने में एक बार मिलता है वो भी पूरा नहीं, केवल एक या दो महीने का। साल भर काम करने पर 10 महीने का मानदेय मिलता है। हैडमास्टर को चैक से पैसे मिलते हैं, वो उसे अपने खाते में जमाकर बाद में पैसे देता है। वह बताती हैं कि पिछले साल भर से तो खाते में पैसे आ रहे हैं लेकिन समय पर नहीं आते। उन्हें छुट्टियां नहीं मिलती हैं, कभी कुछ आकस्मिक घटना घटने पर भी उन्हें छुट्टी के लिए बहुत परेशान होना पड़ता है। अगर वो छुट्टी मांगते हैं तो कहा जाता है कि दूसरे व्यक्ति को नौकरी दे दी जाएगी, उनसे लिखित में छुट्टी का कारण मांगा जाता है।

'राष्ट्रीय मध्यान्ह भोजन रसोइया फ्रंट' की सरकार से ये मांगें हैं। फोटो साभार- शुभम सिंह

राष्ट्रीय मध्यान्ह भोजन रसोइया फ्रंट में झारखण्ड की अध्यक्ष राघो देवी भी इन्हीं समस्याओं का ज़िक्र करती हैं। उनका कहना है कि 1200 रुपए महीने का मिलता है लेकिन वो भी समय पर नहीं आता। उन्हें नौकरी से निकालने की धमकी मिलती है। वो चाहती हैं कि कम से कम वेतनमान 10,000 रुपए तो होना ही चाहिए। साथ ही उनकी सुरक्षा के लिए जीवन बीमा भी हो। राघो देवी पिछले 15 सालों से मध्यान्ह भोजन योजना के तहत रसोइए का काम कर रही हैं।

इस ही संस्था की उत्तर प्रदेश शाखा में कोषाध्यक्ष गंगा देवी ने बताया कि उन्हें केवल 10 महीने का वेतन मिलता है। मास्टर और प्रधान पूरा वेतन नहीं देते। वो कहती हैं कि मजदूर की देहाड़ी 350 रुपए है और हमें 35 रुपए ही मिलते हैं।

दस हज़ार रुपए न्यूनतम मानदेय, नौकरी का स्थाईकरण, 12 महीने का वेतन, पांच लाख का मुफ्त जीवन बीमा जैसे मुख्य मुद्दों के साथ रसोइया संघ ने बहुत-सी मांगे सरकार के सामने रखी हैं। इन्हीं मांगों के साथ संघ 15 और 16 फरवरी को बिहार की राजधानी पटना में एक और हड़ताल करने जा रहा है।

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