Top

गाड़ी की व्यवस्था करा दो, सुबह से कुछ खाया नहीं है सिर्फ पानी पीकर चल रही हूँ, धूप में छोटा बच्चा रो रहा है

गोद में एक साल का बच्चा लिए पार्वती 40-45 डिग्री के तापमान में 700 किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए पैदल ही चल पड़ी थी। फोटो खींचने पर वो बड़ी उम्मीद से बोली, 'आप पानी दे रही हो, खाने को दे रही हो ...फोटो खींच रही हो, वीडियो बना रही हो ... एक गाड़ी की व्यवस्था करा दो, बच्चा धूप में रो रहा है।"

Neetu SinghNeetu Singh   20 May 2020 3:24 PM GMT

दोपहर के करीब दो बजे लखनऊ से छत्तीसगढ़ पैदल 700 किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए वो एक साल के बच्चे को गोद में लिए 40-45 डिग्री के तापमान में निकल पड़ी थी।

पार्वती (30 वर्ष) और बच्चे का चेहरा इस चिलचिलाती धूप में लाल था, बच्चे का मुंह लू के तेज थपेड़ों से सूख रहा था, वो लगातार रोए जा रहा था। पार्वती अपने साड़ी का पल्लू बच्चे के सर पर डाले तेज कदमों से आगे बढ़े जा रही थी।

लखनऊ के शहीद पर उस दिन पार्वती की तरह दर्जनों महिलाएं पैदल चल रहीं थीं जिनकी गोद में छह महीने से लेकर डेढ़ साल तक के बच्चे थे। कुछ बच्चे अपने पिता और चाचा के कंधों पर थे तो कुछ माँ की उंगली पकड़े पसीना पोछते पैदल चले जा रहे थे।

लखनऊ के शहीदपथ पर पैदल चलते मजदूर और उनके बच्चे.

मई महीने की भीषण गर्मी में ये दृश्य झकझोरने वाला था, सत्ता से कई सवाल कर रहा था ? पीड़ा पहुँचाने वाले इन चेहरों की आपबीती सत्ता के गलियारों तक पहुँचाने के लिए जब गाँव कनेक्शन कुछ तस्वीरें और वीडियो बना रहा था तो उस भीड़ से एक महिला बड़ी उम्मीद से बोली, "आप पानी दे रही हो, खाने को दे रही हो ... फोटो खींच रही हो, वीडियो बना रही हो ... एक गाड़ी की व्यवस्था करा दो, बच्चा धूप में रो रहा है।" ये शब्द पार्वती के थे।

बतौर रिपोर्टर पार्वती के इन शब्दों से मैं नि:शब्द थी। गाँव कनेक्शन ने पार्वती की तरह उस दिन दर्जनों महिलाओं और बच्चों को पानी और रास्ते में कुछ खाने का इंतजाम किया था। इन्हें उस जगह तक पहुंचाया भी जहां से पुलिस वाले पैदल चल रहे लोगों को ट्रक पर बिठा रहे थे। लेकिन ये उनकी पीड़ा को कम करने के लिए काफी नहीं था।

अपने बच्चे के साथ पार्वती लखनऊ से छत्तीसगढ़ पैदल 700 किलोमीटर दूरी नापने के लिए चल दी.

पार्वती अपने तीन बच्चों को छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में अपनी सास के पास छोड़कर पति के साथ लखनऊ मजदूरी करने आयीं थीं। एक साल का बच्चा पार्वती के साथ था। पार्वती गोद में बच्चा लिए और इनके पति सर पर बैग रखे तेलीबाग से अवध शिल्पग्राम बस पकड़ने के लिए आये थे।

इतनी धूप में पैदल क्यों चल दीं आप? सरकार ने बसों का इंतजाम किया है। इस पर पार्वती बोली, "शौक नहीं है इस धूप में बच्चे को लेकर पैदल चलना ... मोबाइल पर एक मैसेज आया था कि आज यहाँ (अवध शिल्पग्राम) से बस मिलेगी। जहां रहते थे वो कमरा खाली कर दिया, यहाँ बस पकड़ने आ गये। अब ये लोग कह रहे हैं कि नगर निगम से लिखवाकर लाओ फिर तुम्हारा नम्बर आएगा, तब जाने को मिलेगा। अब हम कहाँ जाएँ? कब नम्बर आएगा कुछ पता नहीं?"

पार्वती जिस किराये के मकान पर रहती थीं वो कमरा खाली करके बस पकड़ने आयी थी। पार्वती अब वापस उस किराये के घर में भी नहीं जा सकती थी जहां वो रहती थी।

सर पर सामान रखे दर्जों महिलाएं पैदल बिलासपुर को जाती हुईं.

"वापस अब वो लोग (मकान मालिक) घर में नहीं रखेगा। दो महीने से मुश्किल से किराया दे पाया था, पैसा नहीं बचा था तभी तो घर जा रहे थे। यहाँ रहेंगे तो भूख से मरेंगे ... पैदल जाएंगे तो सड़क पर मरेंगे। अब भगवान भरोसे निकल दिए हैं बच गये तो ठीक है," पार्वती के इन शब्दों में गरीबी का दुःख था, मुश्किलें थीं, चुनौतियां थीं पर फिर भी वो बार-बार माथे पर आ रहे पसीने को पोछती, बच्चे को चुप कराती और आगे बढ़ती रहती।

पार्वती के साथ चल रहे 50-60 लोगों के साथ उस दिन यही हुआ। ये सब छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के रहने वाले हैं। कई सालों से लखनऊ में रहकर मजदूरी कर रहे थे। अभी ये सब तेलीबाग की एक बस्ती में किराये के घरों में रहते थे। घर वापसी जाने के लिए इन लोगों ने अपन रजिस्ट्रेशन कराया था जिसके अनुसार इन्हें 17 मई को बस अवध शिल्पग्राम से मिलनी थी। ये अपने किराये के घरों को खाली कर बस पकड़ने के लिए पहुंच गये। वहां जाकर इन्हें पता चला कि ये नगर निगम से लिखवाकर लाएं तब इनका नम्बर आएगा।

सर पर छोटे बच्चों को बिठाए इस धूप में जाते सैकड़ों मजदूर.

"अब हम छोटे बच्चे को लेकर कहां जाएँ लिखवाने? हम लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं। हमें कुछ नहीं पता क्या करना है क्या नहीं? सब नियम कानून हमारे (गरीबों) के लिए ही क्यों बने हैं?, मेरी तीन साल की लड़की है ये, सोचिये आप अगर हमें रास्ते भर कोई साधन नहीं मिला तो पैदल ही जाना पड़ेगा इसे लेकर। अब इस गर्मी में मरें या जियें जो लिखा होगा वही होगा, " तेज धूप में अपनी बेटी की उंगली पकड़े चल रही खिलेस्वरी साहू (28 वर्ष) के चेहरे का दर्द उनकी तकलीफ बताने के लिए काफी था।

सड़कों पर लाखों मजदूर 24 मार्च को आ गये थे जिस दिन प्रधानमंत्री ने लॉकडाउन के पहले चरण की घोषणा बिन किसी कार्ययोजना बनाये कर दी थी। हफ्तों ये भीड़ सड़कों पर पैदल चलते अपने गाँव को पहुंचती रही। कोई पैदल, कोई साइकिल से, कोई ई-रिक्शा से दिल्ली से अलग-अलग राज्यों के लिए चलता रहा। तमाम मीडिया कवरेज के बाद राज्य सरकारों ने इन्हें वापस बुलाने के लिए साधनों का इंतजाम किया जो न के बराबर था। देशव्यापी लॉकडाउन लगातार बढ़ता रहा, मजबूरन बेरोजगार मजदूर सड़कों पर पैदल चलने के लिए विवश हो गये।

पेड़ की छाँव में बैठी पार्वती और तीजन अपने बच्चों के साथ.

देशव्यापी लॉकडाउन में सड़क चलते 500 से ज्यादा मजदूर अपनी जान गंवा चुके हैं। इनमें कुछ सड़क हादसों में, कुछ ट्रेन से कटकर बेमौत मर गये। मरने वालों में पैदल चलने वाले मजदूरों की संख्या सबसे ज्यादा थी। सड़क पर निकलकर जब आप हजारों मजदूरों को भूखे-प्यासे पैदल चलते देखते हैं तो सरकार के तमाम इंतजामों की पोल खुलती है। लॉकडाउन बढ़ने के चौथे चरण तक सरकार लाखों प्रवासी मजदूरों को ये भरोसा दिलाने में कामयाब ही नहीं हो पायी कि वो जहां रहते हैं वहीं रहें, उनके खाने और जाने का पूरा इंतजाम सरकार कर रही है।

खिलेस्वरी साहू एक हाथ छोला लिए दूसरे हाथ से अपनी तीन साल की बच्ची का हाथ पकड़े पैदल जा रही थी। जहां कोई ट्रक रुकता वो तेजी से गाड़ी की तरफ बढ़ती, ट्रक दूसरी जगह का होता तो वो फिर चलने लगती।

आप लोगों के खाने और गाड़ी का तो इंतजाम किया गया था, आप लोग कुछ दिन और इंतजार कर लेते इस पर खिलेस्वरी नाराजगी से बोलीं, "लॉकडाउन में सरकार की तरफ से हमें बस एक बार राशन मिला है, खाना लेने के लिए लम्बी लें लगाना अच्छा नहीं लगता हम लोगों को। हम मेहनत से कमाने और खाने वाले लोग हैं, ऐसे कितने दिनों तक चलता? दो महीने कमरे का किराया और खुद का खर्चा चलाना कठिन हो गया। गाँव में छोटे बच्चे हैं वो भी परेशान हो रहे हैं। पता नहीं कब ये खुलेगा, कब काम मिलेगा?."

अपनी तीन साल की बच्ची के साथ बैठी खिलेस्वरी.

खिलेस्वरी 10 साल से लखनऊ में रहकर मजदूरी कर रही हैं। ये अपने पांच साल के बच्चे को अपने गाँव छोड़कर आयी हैं, अभी पति और तीन साल की बच्ची के साथ गाँव जा रही हैं।

ऐसी क्या मुश्किल आयी जो आपने इतनी गर्मी में पैदल चलने का जोख़िम उठाया? इस पर बिटिया का पसीना पोछ रही खिलेस्वरी बोलीं, "यहाँ कमाते हैं तो खाते हैं। देने वाले लोग कितने दिन राशन देंगे और कितने लोगों को देंगे? इस बीमारी ने गरीब आदमी को ही और गरीब बना दिया। अभी बीमार पड़ जाओ तो अस्पताल में इलाज नहीं, खाने को खाना नहीं ऐसे में यहाँ रहकर मरना ही तो है।"

"कोरोना से जल्दी नहीं मरेंगे हमलोग, मरेंगे तो भूखमरी से ... एक हफ्ते से खाने के लिए केवल चावल बचा था वही खाकर रह रहे थे। मेरा बेटा गाँव से रोज फोन करके बोलता है अम्मा आ जाओ। गाँव बस हम लोग ठीक से पहुंच जाएं, गाँव में कोई दिक्कत नहीं होगी," खिलेस्वरी ने भरी दोपहरी में पैदल चलने की मजबूरी बताई।

इस चिलचिलाती धूप में एक बच्ची पैदल जाते हुए.

सुबह से दोपहर तीन बजे तक बस के लिए परेशान बिलासपुर वाले 10-15 मजदूर बहुत कहने पर एक पेड़ की छाँव में सुस्ताने के लिए बैठे। इन सबके गोद में एक छोटा-छोटा बच्चा था। छाँव में बैठते ही एक चार साल का बच्चा भूख के लिए ज़िद करने लगा तो उसकी माँ तीजन ने एक रोटी निकालकर दे दी।

बच्चा बिना सब्जी अचार के रोटी कैसे खायेगा? इस पर तीजन बोलीं, "हमारे बच्चों को ये सब खाने की लॉकडाउन में आदत पड़ गयी है। जब कमाते थे तब सब्जी दाल सब खिलाते थे, दो महीने से नमक रोटी ही खाना पड़ रहा है। रोटी में नमक और प्याज पड़ा है वो ऐसे ही खा लेगा।"

इन महिलाओं ने पैदल चलने की जो मजबूरी बताई वो ज़ायज थी। पिछले कई दिनों में सड़क हादसों में कई मजदूरों की दर्दनाक मौत हुई बावजूद इसके ये सब अपनी जान को जोख़िम में डाल रहे हैं।

साइकिल पर राधेश्याम अपनी बेटी को बिठाये हुए, पत्नी सर पर बोरी रखे पैदल जा रही हैं.

तीन साल की बच्ची को साइकिल पर बिठाये राधेश्याम बोले, "घर जाने के लिए ऑनलाइन पंजीयन कराया था, मोबाइल पर एक मैसेज भी आया कि आज गाड़ी मिलेगी। अब ये लोग कह रहे हैं नगर निगम से एक कागज लिखवाकर लाओ। पता नहीं कहां अधिकारी बैठता है? इससे अच्छा ऐसे ही चले जाएंगे गाँव।"

जहां रह रहे हैं वहां वापस चले जाईये इस पर राधेश्याम ने कहा, "अब वो नहीं रखेंगे क्योंकि हम भीड़ में आ गये हैं। बिना काम के मकान भाड़ा देना, दो महीने बैठकर खाना मजदूरों के बस की बात नहीं है। तभी तो गाँव जाने के लिए हम लोग परेशान हैं। वहां चार लोग अपने हैं यहाँ के लिए तो हम केवल एक मजदूर हैं।"


Next Story

More Stories


© 2019 All rights reserved.