लॉकडाउन में रिवर्स पलायन के बाद प्रवासियों के दोबारा काम पर लौटने की संभावना

कुछ लोगों का मानना है कि लॉकडाउन के दौरान बेरोज़गारी, विपन्नता, भुखमरी और वंचना के शिकार हुए लोग अब अपने गाँवों-घरों से शायद ही उन जगहों पर वापस लौटें जिनको छोड़ कर वो घर लौटे हैं।

Sushil KumarSushil Kumar   8 Jun 2020 12:27 PM GMT

लॉकडाउन में रिवर्स पलायन के बाद प्रवासियों के दोबारा काम पर लौटने की संभावनाकुछ लोगों का मानना है कि लॉकडाउन के दौरान बेरोज़गारी और भुखमरी के शिकार हुए लोग अब अपने गाँवों-घरों से शायद ही उन जगहों पर वापस लौटें जिनको छोड़ कर वो घर लौटे हैं। फोटो साभार : इंडियाटुडे

क ऐसे समय में जब पूरी दुनिया सभ्यता की अभूतपूर्व विभिषिका कोरोना वायरस संकट से जूझते हुए त्राहि-त्राहि कर रही है, इस संकट से निजात पाने की दिशा में किए जा रहे लाख प्रयासों के बावजूद भविष्य अँधेरे के गर्त में ही दिख रहा है। ऐसे में भारत में नगरीय एवं औद्योगिक केन्द्रों से लॉकडाउन की त्रासदी झेलने के बाद किसी तरह अपने घरों का लौटते और लौट चुके प्रवासी श्रमिकों के भविष्य के बारे में भी लोगों ने अपने-अपने स्तर पर आकलन करने शुरू कर दिए हैं।

कुछ लोगों का मानना है कि लॉकडाउन के दौरान बेरोज़गारी, विपन्नता, भुखमरी और वंचना के शिकार हुए लोग अब अपने गाँवों-घरों से शायद ही उन जगहों पर वापस लौटें जिनको छोड़ कर वो घर लौटे हैं। दूसरी ओर कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि अभी कुछ भी कहना ज़ल्दीबाजी होगी क्योंकि केन्द्र सरकार, राज्य सरकारों और स्वयं श्रमिकों को रोज़गार उत्पन्न कराने वाले बन्द पड़े उद्योगों के सामने भविष्य को लेकर असमंजस की स्थिति है, नीतिगत और व्यवहारगत, दोनों ही स्तरों पर।

यहाँ यह एक ध्यान देने योग्य महत्वपूर्ण तथ्य है कि आजीविका एवं रोज़गार की आशा लिए ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों से नगरीय एवं औद्योगिक क्षेत्रों की ओर प्रवास करने वाले सारे लोग श्रमिकों के रूप में ही प्रवास नहीं करते हैं। इनमें एक बड़ा भाग उन प्रवासियों का भी होता है जो उन नगरीय एवं औद्योगिक क्षेत्रों के व्यापक पारिस्थितीकीय तन्त्र के उपयोगी अंग होते हैं और विनिर्माण, सेवा, लघु-स्तरीय व्यापार जैसे क्षेत्रों में दैनिक आजीविका-आमदनी के कार्यों में संलग्न होते हैं।

दिहाड़ी मज़दूरों, रिक्शा और ई- रिक्शा चालकों, रेहड़ी-पटरी पर खोमचा लगाने वालों, छोटे-मोटे स्तर पर मरम्मत का काम करने वालों, सैलून वालों, लुहारों, बढ़ईयों इत्यादि जैसे अनेक वर्गों को इस संदर्भ में देखा और विश्लेषित किया जा सकता है।

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हम अब उस प्रश्न पर वापस लौटते हैं कि 'क्या लॉकडाउन के दौरान विकट परिस्थितियों को झेल कर घर वापस लौटे प्रवासी परिस्थितियों के सामान्य होने पर पुनः काम पर लौटेंगे?' इसका सरलतम उत्तर है कि 'वो काम पर अवश्य लौटेंगे, परन्तु इस बार कुछ महीनों के लिए उनका कार्य-प्रवास पहले की तुलना में व्यापक तौर पर भिन्न होगा।'

विश्वास से लबरेज यह उत्तर तथ्यों पर आधारित है और इसकी पृष्ठभूमि में पूर्व में धरातल पर किए मान्यता प्राप्त सामाजिक-आर्थिक अध्ययनों की उपलब्धियाँ और निष्कर्ष हैं। कुछ दिनों पूर्व भारतीय रेलवे बोर्ड की प्रेस कांफ्रेंस में यह बताया गया कि बीते मई महीने के अन्त तक भारतीय रेलवे ने 3600 से अधिक श्रमिक-स्पेशल ट्रेनों के माध्यम से 52 लाख से अधिक प्रवासियों को विभिन्न नगरों और औद्योगिक केन्द्रों से उनके गाँवों के निकटतम रेलवे स्टेशनों तक पहुँचा दिया गया है।

यहाँ हम कथित तौर पर मार्ग भटक गई ट्रेनों और घर वापसी की यात्रा के दौरान उन प्रवासियों की चर्चा नही करेंगे। भारतीय रेलवे बोर्ड की उसी प्रेस कांफ्रेंस में इस तथ्य को भी रेखांकित किया गया कि इन 52 लाख से अधिक प्रवासियों में लगभग 90 प्रतिशत लोग हिन्दी भाषी क्षेत्रों के थे और इनमें से भी लगभग 80 प्रतिशत लोग बिहार के थे। इन ट्रेनों ने तमिलनाडु के त्रिपुर सिडको औद्योगिक क्षेत्र से ले कर नेपाल सीमा के पास के मोतिहारी, मधुबनी जैसे स्थानों तक प्रवासियों को पहुँचाया है। पंजाब के औद्योगिक एवं कृषि क्षेत्रों, महाराष्ट्र के मुम्बई, पुणे और अन्य शहरों, हरियाणा के मानेसर, एनसीआर के औद्योगिक केन्द्रों के आस-पास बसे गाँवों में किराए के घरों में रहने वाले प्रवासी श्रमिकों की कहानी तो जगजाहिर है।

क्या कारण रहा है कि बिहार जैसे राज्यों से इतनी बड़ी संख्या में लोग प्रवासी श्रमिकों के रूप में काम करने इन दूरस्थ स्थानों तक की यात्रा करने को बाध्य, प्रेरित नही, होते रहे हैं। यहाँ 'बाध्य' शब्द का प्रयोग अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है क्योंकि स्थानीय स्तर पर आजीविका के निम्नतम साधनों के उपलब्ध नहीं होने के कारण ही एक प्रकार से उन लोगों ने जहाँ भी कहीं कोई सम्भावना दिखी, काम खोजने चले गए।

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अधिकांशतः न्यूनतम मज़दूरी पर काम करने वाले ये लोग जो विभिन्न उपायों के द्वारा श्रम-अधिकारों से भी वंचित कर दिए गए होते हैं, पहले अकेले जाते हैं, फिर थोड़ा स्थायित्व दिखते ही अपने परिवारों को भी साथ ले आते हैं। यह प्रवास आधारित श्रम-नियोजन के तहत एक स्वाभाविक प्रक्रिया भी रही है। जो पीछे रह जाते हैं या छोड़ दिए जाते हैं उनके पास वहीं रहने के अलावा कोई और विकल्प भी नहीं होता है।

ऐसे प्रवासी लोग और श्रमिक किस आधार पर अपने गाँवों-घरों में और कितने समय तक रुक पाएँगे? क्या स्थानीय स्तर पर उनको आजीविका और रोजगार के पर्याप्त साधन उपलब्ध हो पाएँगे? क्या त्वरित ढंग से उनकी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति सम्भव हो पाएगी? क्या बेरोजगारी की अवस्था में वो अपने छोटे-बड़े बच्चों, बुज़ुर्ग माता-पिता, दादा-दादी और अन्य सम्बन्धियों की देख-भाल कर पाएँगे? वर्तमान परिदृश्य में तो ऐसा कत्तई सम्भव नहीं दिखता है। विशेषकर प्रायः पूरे बिहार और पश्चिम बंगाल, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में, जिनकी स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को 'मनीआर्डर इकॉनमी' की संज्ञा दी जाती है, उनके संदर्भ में तो यह निकट भविष्य में सम्भव नहीं दिखता है कि वो अपने कार्य-स्थलों पर कमाई करने वापस नही लौटें।

'लॉकडाउन' की दुश्वारियों और घर-वापसी की यात्राओं की त्रासदियों का भूल कर वो वापस लौटेंगे नगरीय एवं औद्योगिक केन्द्रों की ओर। ऐसी ख़बरें आनी प्रारम्भ भी हो गई हैं कि कल-कारखानों और औद्योगिक उत्पादन केन्द्रों को क्रमश: चालू किया जाने लगा है और सड़क मार्ग से घर वापस लौट चुके प्रवासियों में से कुछ लोग पुनः अपने कार्य-स्थलों पर लौटने लगे हैं।

पंजाब के किसान बसों-ट्रकों के माध्यम से मध्य बिहार के कुछ जिलों खेतिहर मज़दूरों को पहले की अपेक्षा अधिक मज़दूरी एवं अन्य सुविधाओं का वायदा कर के वापस पंजाब ले जाने के भी समाचार आ रहे हैं। आगे भी प्रवासियों का अपने गाँवों-घरों से काम पर वापस लौटने का क्रम जारी रहेगा और प्रत्येक बीतते हुए सप्ताह के साथ बढ़ता रहेगा।

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निश्चित तौर पर स्थायी नौकरियों के साथ-साथ पीएफ, स्वास्थ्य सुविधाओं और ऐसी ही अन्य श्रमिक-सुविधाओं वाली अस्थाई नौकरियों वाले लोग भी स्थिति के थोड़ा भी अनुकूल होते ही लोग काम पर लौटेंगे। हाँ, इतना अवश्य है कि अब आने वाले कुछ महीनों या एक-दो वर्षों तक लोग परिवार को साथ नहीं ले कर अकेले प्रवास करने को प्राथमिकता देंगे।

वैसे अकुशल एवं अर्ध-कुशल दिहाड़ी मज़दूर भी वापस लौटने से बचेंगे यदि स्थानीय स्तर पर उनको नगरीय एवं औद्योगिक केन्द्रों का आधा काम भी मिल जाता है। निश्चित तौर पर कोरोना संकट में लॉकडाउन के दौरान जिन आर्थिक संकटों का सामना इन लोगों को करना पड़ा है उनके अनुभवों से सकारात्मक सीख लेकर अधिकांश लोग बचत की आदतों को भी अपनाएँगे ताकि ऐसे ही अन्य आपातकालिक संकटों में वो बुरा समय आसानी से निकाल सकें।

(डॉ. सुशील कुमार स्वतंत्र पत्रकार और लेखक हैं)

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