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सैकड़ों किमी चलकर गांव आ तो गये, लेकिन चिंता और उदासी यहां भी कम नहीं

लॉकडाउन में इस गाँव का सन्नाटा अपनेआप में कई कहानियां समेटे था, चबूतरे पर बैठे लोगों के चेहरे पर उदासी और चिंता थी। जीतोड़ मेहनत करने वाला किसान खेतों में खराब हो रही सब्जियों को देखकर टूट चुका था। दूध का व्यवसाय करने वाले लोग पानी के भाव 10-15 रुपए लीटर दूध बेचने को मजबूर थे। रोज कमाने खाने वाले लोग कर्ज लेने को विवश थे।

Neetu SinghNeetu Singh   1 May 2020 8:22 AM GMT

सैकड़ों किमी चलकर गांव आ तो गये, लेकिन चिंता और उदासी यहां भी कम नहीं

जिस सुकून की तलाश में लोग भूखे-प्यासे सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर अपने गाँव की तरफ बढ़ रहे थे वे गाँव अब कई कहानियां समेटे चिंतित था।

भारत के इस गाँव में खेतों का अनाज घर आने के बाद भी किसानों के चेहरों पर वो सुकून और तसल्ली नहीं दिख रही थी जो पहले दिखती थी। दूसरे राज्यों में कमाने गये मजदूर अपने घरों में वापस आकर भूखे तो नहीं थे पर रोजगार बंद होने से चिंतित थे। दिहाड़ी मजदूर ये आस लगाये बैठे थे कि कब ये लॉकडाउन खुले और वो अपने काम पर निकलें। कुछ बच्चे स्कूल जाना चाहते तो कुछ नानी के घर। महिलाएं जिनके कंधों पर गृहस्थी संभालने की जिम्मेदारी थी अब उनकी गृहस्थी का सामान खत्म होने लगा था।

लॉकडाउन में बहुत कुछ बदल गया था उत्तर प्रदेश के इस गाँव में। इक्का-दुक्का दुकाने ही खुली थीं यहाँ पर, कुछ एक लोग ही गाँव की गलियों में चहलकदमी करते हुए दिख रहे थे। पेड़ की छाँव में सुस्ता रहे लोगों के चेहरे मुरझाए हुए थे।

यह दृश्य उत्तर प्रदेश के लखनऊ जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर बक्शी का तालाब ब्लॉक के अटेसुवा गाँव का था।

लॉकडाउन में इस गाँव का सन्नाटा अपने आप में कई कहानियां समेटे था। चबूतरे पर बैठे लोगों के चेहरे पर उदासी और चिंता थी। जीतोड़ मेहनत करने वाला किसान खेतों में खराब हो रही सब्जियों को देखकर टूट चुका था। दूध का व्यवसाय करने वाले लोग पानी के भाव 10-15 रुपए लीटर दूध बेचने को मजबूर थे। रोज कमाने खाने वाले लोग कर्ज लेने को विवश थे।

गोद में पोती को लिए बैठी मेवालाल की पत्नी भगवंती देवी.

बांस के टट्टर के नीचे दोपहर में सुस्ता रहे मेवालाल (65 वर्ष) मजदूरी करके परिवार का खर्चा चलाते थे, अभी उनके तीन बेटे जो शहर में मजदूरी करने गये थे वो भी घर आ गये थे। एक व्यक्ति को राशन कोटा से महीने का केवल पांच किलो चावल मिलता है जिससे उनके परिवार की पूर्ती नहीं हो रही थी।

अभी साग सब्जी का खर्चा कैसे चलता है? इस सवाल के जबाव में मेवालाल कुछ देर चुप रहे फिर इधर-उधर देखकर धीरे दे बोले, "अब आपको क्या बतायें? घरैतिन (पत्नी) का जेबर गिरवी रखना पड़ा, इतना कभी कमा नहीं पाए कि बैंक में जमा कर देते जो इस बुरे वक़्त में काम आते। अभी इन्ही पैसों से साग-सब्जी का खर्चा चल रहा है। कमाकर जेबर उठा लेंगे, खुद तो नून रोटी खा सकते हैं पर छोटे-छोटे नाती पोता है उनके लिए तो दाल सब्जी चाहिए ही," यह बताते हुए मेवालाल के चहरे पर संकोच भी था और चिंता की लकीरें भी थीं जो उनकी गरीबी को बयान करने के लिए काफी थीं।

महीनें में राशन के अलावा और भी कई जरूरी खर्चे थे जिसके लिए मेवालाल को मजबूरी में इस लॉकडाउन में अपनी पत्नी के गहने गिरवी रखने पड़ गये।

इनकी पत्नी भगवंती देवी अपनी पोतियों के पैसा मांगने पर उन्हें बार-बार समझा रही थी, "जब बाबा काम पर जाने लगेंगे तब तुम्हारे लिए खाने का खूब सारा सामान लाएंगे।" अपनी पोतियों को झूठी तसल्ली भगवंती कबतक देंगी ये उन्हें भी नहीं पता था।

एक दिन अटेसुवा गाँव में हमने पूरा दिन यह जानने के लिए गुजारा कि इस लॉक डाउन का इस गाँव के लोगों पर क्या असर पड़ा है। अलग-अलग मोहल्लों में दर्जनों परिवारों की आपबीती तकलीफ देने वाली थी, गाँव में कोई एक ऐसा परिवार नहीं मिला जो यह कहते खुश दिखे कि हमें इस लॉकडाउन से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। सब उदास थे, सबकी अपनी अलग-अलग मुश्किलें थी। चाहें वो परचून की दुकान वाला हो या फिर दूध का व्यवसाय करने वाला, परेशानियां किसी की कम नहीं थीं।

पानी के भाव दूध बेचने को मजबूर जमील.

तालाब के किनारे पेड़ की छाँव में बंधी गायों को जमील (45 वर्ष) पानी पिला रहे थे। अभी दूध का क्या कर रहे हैं पूछने पर जमील बोले, "पानी के भाव बिक रहा है, वो भी कोई जल्दी लेने को तैयार नहीं होता। अभी लोगों का पेट भरना मुश्किल हो रहा है कोई दूध क्यों खरीदेगा? कोई 10-15 रूपये लीटर भी लेता है तो हम दे देते हैं, कमसेकम जानवरों के चोकर का पैसा तो निकले। गाय को दाना खली नहीं मिल पा रहा तभी सूखकर इतनी कमजोर हो गयी हैं।"

जमील के पास 12 गाय और दो भैंसे हैं, ये कई साल से दूध का ही धंधा करते हैं, इनके पास अपनी खुद की जमीन नहीं है, आमदनी का दूध ही मुख्य रोजगार है जो अभी बंद पड़ा है। जमील ने अपने बगल में रहने वाले वाजिद अली की तरफ इशारा करते हुए कहा, "ये तो खोया का धंधा करते हैं, मेहनत भी निकल पा रही।

कई सालों से खोया का कारोबार करने वाले वाजिद अली (65 वर्ष) इस बात से परेशान थे कि 350-400 रूपये किलो बिकने वाला खोया अब गाँव में 100-120 रूपये में भी लोग बहुत कहने पर खरीद रहे हैं। इस लॉकडाउन में जानवरों की स्थिति भी बद्दतर हो गयी है। लोग अपना पेट भरने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं ऐसे में जानवरों की पर्याप्त देखरेख नहीं हो पा रही है।

"खोया किसी भाव नहीं बिक रहा। चोकर 1400-1500 रूपये में हो गया है। आमदनी हो नहीं रही, इतना महंगा चोकर जानवरों को नहीं खिला पा रहे हैं। जानवरों ने दूध आधा कर दिया है। अब खर्चों की तबाही है आपको क्या-क्या बताएं? यह सहालग का समय होता है जब खोया का अच्छा भाव मिलता है। खबरें देखकर तो ऐसा लग रहा है कि अब कई महीने ऐसा ही चलेगा, इतने दिनों में जानवर तो कमजोर हो जाएंगे जब उन्हें भरपेट भूसा चोकर नहीं मिलेगा।"

वाजिद अली इस भट्टी पर कई घंटे में खोया बना पाते हैं, 100-120 रूपये में भी मुश्किल से बिक रहा है.

गाँव के एक किसान को जब यह पता चला कि गाँव में कोई पत्रकार आया है तो वो मुझे खोजते हुए पंचायत भवन पहुंच गये जहां हम ग्राम प्रधान से गाँव के हाल खबर ले रहे थे।

मुझे देखते ही वो किसान उम्मीद से बोले, "एक बार आप हमारा खेत देख लीजिए चलकर, आपको खुद पता चल जाएगा कि हमारा कितना नुकसान हुआ है। सब्जी बेचकर रोज का खर्चा चलता था, इस सीजन में सब्जी से इतना पैसा कमा लेते थे, जिससे सालभर नून तेल के लिए सोचना नहीं पड़ता था, अब तो पूरे साल का रोना हो गया।"

पंचायत भवन से कुछ मीटर की दूरी पर लल्ला मौर्या (50 वर्ष) का वो खेत था जिसमें बैंगन पीले पड़ चुके थे।

"बहुत मेहनत की थी, अब सब घूरे (कूड़ा) में ही फेकना पड़ेगा। बैगन कोई दस रूपये में नहीं पूछ रहा, खीरा 10 रूपये के 10-12 बिक रहे हैं, हरी मिर्च 20-30 रूपये किलो बिक रही है। इस भाव से तो लागत भी नहीं निकलेगी," खेत में पीले पड़ चुके बैंगन की तकलीफ लल्ला जैसा एक किसान ही समझ सकता है।

कोरोना संक्रमण से बचने के लिए देशव्यापी लॉकडाउन लगभग 20 मार्च से शुरू हो गया था जो अबतक चल रहा है। इस लॉकडाउन की सबसे ज्यादा मार उस तबके पर पड़ी है जो रोज कमाकर अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। इनके पास बैंक में इतनी बचत नहीं थी जिससे ये एक दो महीने का खर्चा घर बैठे चला सकें।

किसान लल्ला मौर्या मुझे इस उम्मीद से देख रहे थे कि हम उनकी समस्या सरकार तक ले जाएंगे और उसका समाधन हो जाएगा जबकि हकीकत में ऐसा नहीं था।

खेत में पीले पड़ चुके बैंगन को दिखाते किसान लल्ला मौर्या.

लल्ला मौर्या अपनी फसल को बर्बाद होते देख बहुत तकलीफ में थे, "कहने को तो मंडी खुली हैं पर जिस मानपुर मंडी में हम जाते है वहां कई बार व्यापारी ही नहीं आते। उस दिन पूरी सब्जी लौटाकर लाना पड़ता है, पुलिस से चोरी-चुप्पे इधर उधर गलियों में थोड़ी बहुत बिकती है वो भी माटी मोल। बची खुची जानवरों को खिला देता हूँ। एक भैस है उसका भी दूध दूधिया नहीं ले रहा, अब रोज के खर्चे कैसे चलें? जबतक लॉकडाउन खुलेगा तबतक हमारी सब्जियां चौपट हो जाएंगी, फिर हमारे लिए इसके खुलने का कोई मतलब ही नहीं बचेगा।"

ऐसा नहीं था कि लल्ला मौर्या इस वायरस की गम्भीरता को नहीं समझते थे पर उनके सामने मुश्किल यह थी कि उनकी सालभर की आमदनी का जरिया जो सब्जी होती थी वो अब खेतों में बर्बाद हुई जा रही थी।

"हमारे गाँव में केवल 10-20 प्रतिशत लोग ही ऐसे हैं जो दो तीन महीने घर बैठे खा सकते हैं, बाकी 80 फीसदी लोग रोज कमाने खाने वाले हैं। सरकार ने जो राशन दिया है हम उसकी सराहना करते हैं लेकिन अगर जल्दी ही इन लोगों को गाँव में रोजगार नहीं दिया तो ये भूखमरी के कगार पर पहुंच जायेंगे," गाँव के ग्राम प्रधान आजाद अंसारी बोले।

आजाद अंसारी ग्रामीणों की मुश्किलों से काफी चिंतित थे, "अब ऐसे हालात हो गये हैं कि इनके लिए रोज का काम मिलना बहुत जरूरी है, काम के साथ-साथ रोज का मेहनताना मिलना भी बहुत जरूरी है। मनरेगा का पैसा बहुत दिनों बाद मिलता है और बहुत कम मिलता है तभी लोग पलायन कर जाते हैं।"

सफ़ेद शर्ट पहने खड़ा युसूफ हैदराबाद में जड़ी की कढ़ाई करके अपने पूरे परिवार का खर्चा चलाता है.

महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, दिल्ली जैसे बड़े शहरों में कमाने गये अटेसुवा के लोग अब गाँव वापस आ चुके थे। पर गाँव में भी इनके लिए ऐसा कोई रोजगार नहीं था जिससे लॉकडाउन में इन्हें काम मिलता और इनके खर्चे चल सकते। गाँव में कई दिहाड़ी मजदूरी करने वाले ऐसे परिवार मिले जो कर्ज लेकर एक-एक दिन मुश्किल से काट रहे हैं।

हैदराबाद से गाँव वापस पहुंचे युसूफ (24 वर्ष) अपने टूटे घर की तरफ इशारा करते हुए बोले, "घर की स्थिति देखिए, मैं अकेले ही कमाने वाला हूँ, अब्बू कुछ साल पहले गुजर गये। वहां कढ़ाई का काम करता हूँ दिन के 400-500 बन जाते हैं। गाँव में कोई भी काम करूंगा तो इतने पैसे नहीं मिलेंगे। गाँव में पहले से ही बहुत बेरोजगार लोग हैं यहाँ सबको काम नहीं मिल सकता, लॉकडाउन खुलते ही वापस चला जाऊँगा।"

युसूफ अपने पांच भाई-बहनों का खर्चा 16-17 साल की उम्र से खुद चला रहे हैं।

इस गाँव में ज्यादातर लोगों के पास खुद की पर्याप्त जमीने नहीं हैं, इसलिए कुछ लोग अलग-अलग शहरों को पलायन कर जाते हैं तो कुछ अलग-अलग तरह का रोजगार करके खर्चा चलाते हैं, एक बड़ा तबका गाँव में दिहाड़ी मजदूरी करने को मजबूर है। अटेसुवा पंचायत में एक बड़ी आबादी मुस्लिम समुदाय की है अभी हम उसी समुदाय में थे जहाँ पर पूरे मोहल्ले के लोग जरी की कढ़ाई अक्र्के खर्चा चलाते थे। महीने भर से बंद पड़े इस काम से जुड़े कुछ परिवार कर्जा लेकर रोजमर्रा का खर्चा चला रहे हैं।

ये हैं नईफ जो जरी की कढ़ाई के ठेकेदार हैं, इस काम से गाँव में 40-50 परिवार निर्भर हैं.

जरी की कढ़ाई का ठेका लेने वाले नईफ बोले, "गाँव में 40-50 परिवार जरी का काम ही करते हैं। इस समय ये लोग पैसा मांगने आ रहे हैं तो हम दे नहीं पा रहे। मैं जानता हूँ कई लोग कर्जा लेकर अपना पेट भर रहे हैं, पर हम भी मजबूर हैं। मेरे चार बच्चे हैं, अभी हजार रूपये की सब्जी भरकर लाये थे वही बेचकर जैसे-तैसे सबका पेट भर रहे हैं।"

जरी की कढ़ाई का 15-16 साल से काम करने वाले इस्लामुद्दीन (35 वर्ष) घर में रखी जड़ी की कढ़ाई की साड़ी को दिखाते हुए बोले, "जो सामान हमारे पास तैयार रखा है अभी मालिक वही सामान नहीं उठा रहा है, अगर उठा लेता तो कमसेकम कुछ तो बकाया पैसा मिल जाता। अब कर्ज लेकर हम कबतक खर्चा चलाएंगे? बच्चे टाफी-बिस्किट के लिए दो चार रूपये मांगते वो भी नहीं दे पाते। दु:ख होता है पर क्या कर सकते हैं?"

पंचायत भवन में बैठे ग्राम विकास अधिकारी, राजेश कुमार पाण्डेय बोले, "इस गाँव के लोगों की बस एक समस्या है कि उन्हें रोजगार मिले। यहाँ बहुत कम लोगों के पास जमीने हैं, ऐसे में मजदूरी करके पेट भरने के अलावा उनके पास दूसरा कोई रास्ता नहीं है। जबतक ये काम पर नहीं जायेंगे तबतक कर्ज लेकर ही इनकी गुजर बसर होगी। कई लोगों को तो मजबूरी में ब्याज पर भी पैसा लेना पड़ रहा है। ज्यादा दिन तक लॉक डाउन चला तो ये कर्ज के नीचे दब जायेंगे।"

चबूतरे पर उदास बैठीं पप्पी देवी.

सरकार द्वारा श्रम विभाग में रजिस्टर्ड मजदूरों के खाते में 1,000 रूपये डाले गये हैं लेकिन इसका फायदा लेना वाला इस गाँव में मुझे कोई मजदूर नहीं मिला।

दिहाड़ी मजदूरी करने वाले शिवमंगल सिंह (52 वर्ष) के पास जो राशनकार्ड है उसमें उनके दोनों बेटों का नाम दर्ज नहीं है, परिवार में कुल चार लोग हैं पर राशन दो लोगों का ही मिलता है।

"आप ही बताईये क्या 10 किलो चावल चार लोगों के लिए काफी है। हम मनरेगा के मजदूर भी हैं पर हमारे खाते में अभी सरकार का एक भी रुपया नहीं आया है। घर में रहकर हम तो अपाहिज महसूस कर रहे हैं, बस ये जल्दी से लॉकडाउन खुले हम काम पर जाएँ और सरकार से हमें कुछ नहीं चाहिए। अगर काम पर नहीं गये तो कोरोना से तो भले बच जाएँ पर भूखमरी से नहीं बच पायेंगे," शिवमंगल किसी भी तरह बस काम पर लौटना चाहते हैं जिससे उन्हें सरकार के सहारे न रहना पड़े।

शिवमंगल के घर से कुछ दूरी पर चबूतरे पर बैठी पप्पी देवी (35 वर्ष) गुमसुम सी थी, पूछने पर पप्पी बोलीं, "पति पुताई का काम करते हैं उसी से घर में चूल्हा जलता है। महीने भर से वो घर में हैं, दो तीन दिन से उनकी तबियत ठीक नहीं है। हमारे पास इतने पैसे नहीं हैं कि हम उन्हें दवा दिला सकें। क्या करें, किस्से उधार मांगे दिमाग नहीं काम कर रहा," यह बताते हुए पप्पी की आँखे भर आयीं।






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