मानसून : हुज़ूर आते-आते बहुत देर कर दी ...

यूपी के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने फसलों की बुआई और रोपाई की समीक्षा करते हुए 12 जुलाई को कहा कि अगर 15 जुलाई तक अच्छी वर्षा नहीं होती है तो ज्वार, बाजरा, अरहर, मूंग उड़द, काकून, कोदो, सावां आदि फसलों की की बुआई की जाए। मोटे अनाजों के बीच पर्याप्त मात्रा में राजकीय कृषि बीज भंडारों पर उपलब्ध हैं।

मानसून : हुज़ूर आते-आते बहुत देर कर दी ...

लखनऊ। मानसून की बेरुखी से कई राज्यों में देर से शुरु हुई बारिश का असर सीधा असर खरीफ की बुआई पर पड़ा है। खरीफ की फसलों की बुआई 13 जुलाई तक 10 फीसदी से ज्यादा पिछड़ चुकी है। यूपी, बिहार और झारखंड में धान किसानों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ा है।

यूपी में कम बारिश को देखते हुए सरकार ने आकस्मिक योजना तैयार की है। यूपी के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने फसलों की बुआई और रोपाई की समीक्षा करते हुए 12 जुलाई को कहा कि अगर 15 जुलाई तक अच्छी वर्षा नहीं होती है तो ज्वार, बाजरा, अरहर, मूंग उड़द, काकून, कोदो, सावां आदि फसलों की की बुआई की जाए। मोटे अनाजों के बीच पर्याप्त मात्रा में राजकीय कषि बीज भंडारों पर उपलब्ध हैं।

देश में दस्तक देते ही मानसून ने अच्छी रफ्तार दिखाई थी, लेकिन जून के आखिरी हफ्ते तक आते-आते वो कमजोर पड़ गया, जिसके चलते जुलाई के शुरुआती 10 दिनों तक यूपी, बिहार, झारखंड के कई इलाकों में बारिश कम या बिल्कुल नहीं हुई। 11 जुलाई के बाद मानसून ने फिर रफ्तार पकड़ी, जिसके अगले सप्ताह तक जारी रहने का अनुमान मौसम विभाग ने जताया है। अनुमान के मुताबिक कई राज्यों में झमाझम बारिश हो रही है, लेकिन पिछले दिनों की बेरुखी के चलते धान, तिलहन और मोटे अनाजों का रकबा घट सकता है।

कृषि ‍विभाग के 13 जुलाई तक जारी आंकड़ों के मुताबिक देशभर में 501.67 लाख हेक्टेयर में ही खरीब की फसलें बोई गई हैं, जबकि पिछले साल इसी अविधि में बुवाई का आंकड़ा 557.49 को पार कर गया था। इस बुआई में बड़ा आंकड़ा सिंचित क्षेत्र का शामिल है। डीजल से सिंचाई कर धान रोपाई से किसानों को 1000 से 2000 रुपए प्रति एकड़ का अतिरिक्त खर्च लगा है।

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दूसरी तरफ महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और असम समेत कई इलाके पानी-पानी हैं। लेकिन चालू सीजन में 13 जुलाई तक 6 फीसदी कम बारिश रिकॉर्ड की है। इसमें उत्तर भारत के राज्य शामिल हैं। मौसम विभाग में मानसून पूर्वानुमान के प्रमुख डी. सिवानंदा पई कहते हैं, "उम्मीद से बारिश कम जरूर है, लेकिन 10 जुलाई के बाद दिल्ली, हरियाणा, यूपी के कई इलाकों में बारिश का सिलसिला शुरू हो गया है। अगले सप्ताह भी अच्छी बारिश की उम्मीद है। ऐसे में खेती में जो नुकसान होता नजर आ रहा था वो कम हो सकता है।"

उत्तर प्रदेश कृषि विभाग के अनुसार शुरुआत में बारिश अच्छी न होने से 10 जुलाई, 2018 तक खरीफ की बुआई लक्ष्य के सापेक्ष मात्र 28.48 प्रतिशत ही हो पाई है। यही नहीं, धान रोपाई के लक्ष्य 59.89 लाख हेक्टेयर के सापेक्ष 17.30 लाख हेक्टेयर ही हो पाई है, जो निर्धारित लक्ष्य का मात्र 28.9 प्रतिशत ही है।

दिल्ली में मौसम विभाग के दफ्तर के करीब 700 किलोमीटर दूर बुंदेलखंड के ललितपुर में पूरे सीजन के दौरान 13 जुलाई को हल्की बारिश हुई, जबकि इससे पहले इतनी भी बारिश नहीं हुई थी कि खेतों के डीले भीग जाएं। बुंदेलखंड के सबसे प्रभावित जिलों में शामिल ललितपुर में 10 जुलाई तक एक बार भी बारिश नहीं हुई थी। महरौनी के अरविंद परमार बताते हैं, "अच्छे मानसून की बात हो रही थी, तो किसानों ने 10-12 दिन पहले ही उड़द और सोयाबीन बो दिया था, अगर इस हफ्ते (11 जुलाई के बाद) बारिश नहीं हुई तो बीज जमेंगे ही नहीं।"

ललितपुर में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के जिला सलाहकार लवकुश टोंटे बताते हैं, "जब छिटपुट पानी बरसा था तो किसानों ने थोड़ी बहुत नमी देखकर उड़द बो दिए, अब अगर बारिश नहीं हुई तो किसानों को भारी नुकसान हो सकता है।"

खरीफ में 10 फीसदी बुआई पिछड़ी

खरीफ सीजन में पहली जून से 13 जुलाई तक देशभर में मानसून की बारिश 6 फीसदी कम हुई है, जिसका सीधा असर बुआई और रोपाई पर पड़ा है। धान, मोटे अनाज, तिलहन आदि की बुआई 10 फीसदी पीछे हो गई है। खरीफ की मुख्य फसल धान है। इस बार केवल 116.72 लाख हेक्टेयर में रोपाई हो पाई है जबकि पिछले साल ये 126.92 लाख हेक्टेयर क्षेत्र बुआई हुई थी। इसी तरह दालों की बुआई करीब 6 लाख हेक्टेयर कम हुई है। सरकार ने 2018 को मोटे अनाजों का वर्ष घोषित किया लेकिन इस खरीब सीजन में अब तक 92.46 लाख हेक्टेयर बुआई हुई है पिछले साल ये आंकड़ा 110.76 था। हालांकि मक्का ने छलांग लगाई है। पानी की कम जरुरत और बेहतर मुनाफे को देखते हुए किसानों ने मक्का ज्यादा बोया है।

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धान की खेती का इरादा त्यागा

बारिश का इंतजार यूपी के साथ बिहार के किसानों को भी है। ललितपुर से करीब 1300 किलोमीटर दूर बिहार के पूर्णिया जिले में चनका के प्रगतिशील किसान और पत्रकार गिरीन्द्रनाथ झा इस बार धान की खेती का इरादा त्याग चुके हैं। "11 एकड़ धान के लिए तैयार नर्सरी खराब हो रही है, लेकिन बारिश के इंतजार में रोपाई नहीं हो पाई। इतना महंगा डीजल है अगर मौसम ऐसा ही रहा तो मैं इस सीजन में धान नहीं लगाऊंगा।" गिरीद्रनाथ ने फोन पर गाँव कनेक्शन को बताया। वो आगे कहते हैं, "हमारे यहां आखिरी बार अच्छी बारिश करीब एक महीना पहले यानि प्री मानसून से हुई थी, उसके बाद कभी यहां तो कभी वहां यानी क्लस्टर में बारिश हो रही है, जिसका फायदा किसानों को नहीं मिल पा रहा है।" बिहार में धान की खेती बहुतायत होती है।

छोटे-छोटे खेत वाले झारखंड में धान खूब होता है, लेकिन ज्यादातर खेती मानसून पर निर्भर है, जिसे इस बार झटका लगा है। इस पहाड़ी इलाके में पिछले साल के मुकाबले 33 फीसदी कम बारिश हुई है। वर्ष 2017 में 6 जुलाई तक 82.9 मिलीमीटर बारिश हुई थी, जबकि इस बार सिर्फ 49.4 मिली बारिश हुई है।


झारखंड के 20 जिलों में सूखे जैसे हालात

कृषि विभाग ने यहां 18 लाख हेक्टेयर में धान की खेती का लक्ष्य रखा था, जबकि जुलाई के पहले हफ्ते में सिर्फ 1.11 लाख हेक्टेयर में रोपाई हुई है। मोटे तौर पर ज्यादातर इलाकों में रोपाई के लिए बारिश का इंतजार है। इक्रीसेट से जुड़े कृषि वैज्ञानिक सिराज हुसैन कहते हैं, " कमज़ोर मानसून किसानों के लिए सिरदर्द बनता दिख रहा है। इस बार 11 जुलाई तक यूपी के कुछ हिस्सों में बारिश औसत से काफी कम हुई है। इसका असर सीधे बुवाई पर पड़ा है।"

उत्तर भारत में कृषि उत्पादन का बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश, पंजाब हरियाणा और बिहार से आता है। बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक छह जुलाई तक हरियाणा, हिमाचल, यूपी में धान की बुआई में पिछले साल के मुकाबले 50 फीसदी कमी है।

बिहार-झारखंड और पूर्वी यूपी में अच्छी बारिश का अनुमान

महाराष्ट्र, गुजरात, दक्षिण भारत और कई पहाड़ी इलाकों में रेनफॉल को बेहतर बताते हुए वो अलनीनो जैसे किसी प्रभाव से इनकार करते हैं। डी.एस पई कहते हैं, "राजस्थान,मध्य प्रदेश और गुजरात के कुछ हिस्सों में अच्छी बारिश हुई है। आने वाले दिनों में यूपी, बिहार, झारखंड में भी बारिश का सिलसिला शुरू होगा। ये पानी नदियों से होकर देश केदूसरे इलाकों में पहुंचेगा तो वहां के किसानों को फायदा होगा।"

एक पखवाड़े पहले ही पहुंच गया था मानसून

देश में इस बार मानसून अपने अनुमानित समय से करीब एक पखवाड़े पहले ही पहुंच गया था, जिससे किसान और सरकार दोनों को खरीफ के अच्छे सीजन की उम्मीद जगी थी। लेकिन एक जुलाई से लेकर 10 जुलाई तक के मौसम में हालात बदल गए हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक देश के जिन 653 जिलों में बारिश के आंकड़े उपलब्ध थे, उनमें 4 जुलाई तक करीब 40 फीसदी कम बारिश हुई है।

देश में खेती के मुद्दों पर नजर रखने वाले कृषि विशेषज्ञ विजय सरदाना फोन पर गाँव कनेक्शन को बताते हैं, "इसमें कोई संदेह नहीं कि कई राज्यों में मानसून पिछड़ गया है, जिसका असर खेती पर पड़ेगा। खरीफ सीजन कई राज्यों के लिए महत्वपूर्ण है।"

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किसानी की लागत बढ़ी, महंगे डीजल से परेशान

भारत के कुल खेती योग्य भूमि का 46 फीसदी भाग्य सिंचित है। बाकी 54 फीसदी खेती मानसून पर निर्भर है। सिंचित क्षेत्र (जहां सिंचाई के साधन, नहर, नलकूप, कुएं आदि उपलब्ध हैं) में भी मानूसन का अहम रोल रहता है। जब भी मानसून बेरुखी दिखाता है पंजाब, हरियाणा, यूपी जैसे इलाकों में भी किसानों का खर्च बढ़ जाता है।

यूपी के बाराबंकी में टांडपुर गाँव में रहने वाले नरेंद्र कुमार को एक एकड़ से ज्यादा धान लगाना था, धान की नर्सरी भी 21 दिन से ज्यादा की हो गई है, लेकिन रोपाई नहीं हो पाई है। नरेंद्र बताते हैं, "अब इंजन (डीजल सेट) चलाकर रोपाई कराएंगे, क्योंकि बारिश ऐसी नहीं हुई कि रोपाई हो सके। हमारे यहां तो सब लोग इंजन चलाकर (पंपिंग सेट) से खेत भर रहे। इससे करीब 2000 रुपए का डीजल लगेगा, क्योंकि रोपाई के दौरान पानी पूरे खेत में होना चाहिए।"

मानसून की बेरुखी और कम बारिश से न सिर्फ सिंचाई का खर्च बढ़ा है बल्कि मजदूरी भी महंगी हुई। जुलाई के दूसरे सप्ताह में किसानों जमीन के पानी से रोपाई शुरु कराई लेकिन एक साथ मजदूरों की ज्यादा मांग होने से 200 रुपए वाली दैनिक मजदूरी कई क्षेत्रों में 300 से 400 तक पहुंच गई।



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