आइरूर गाँव : कटहल के पत्तों से टेबल स्पून और सिल पर मसाला बनाना, सब गाँव से सीखा

आइरूर गाँव : कटहल के पत्तों से टेबल स्पून और सिल पर मसाला बनाना, सब गाँव से सीखामेरा गाँव कनेक्शन सीरीज़ का पांचवा भाग। 

वो खेल का मैदान जहां हम सब ने खूब गुल्ली-डंडा और कंचे खेले हैं। अम्मा की रसोई में रखी अचारदानी से अचार चुरा कर भागना। रात होते ही आंगन में खटिया पर लेट कर दादी से कहानी सुनना। गाँव की ऐसी ही कई यादें हैं,जो आज तक हम नहीं भूल पाए हैं। अपने काम में व्यस्त रहने के बावजूद हमारा गाँव कनेक्शन हमसे दूर नहीं होता है। ' मेरा गाँव कनेक्शन ' सीरीज़ के पांचवें हिस्से में चलते हैं भारत के दक्षिणी भाग में और जानते हैं आइरूर गाँव के बारे में

गाँव बायोडाटा -

गाँव- आइरूर

ज़िला - पट्टनमथिट्टा

राज्य - केरल

नज़दीकी शहर - कोची , आइरूर सिटी

गूगल अर्थ पर आइरूर गाँव का नक्शा -

आइरूर गाँव -

केरल के पट्टनमथिट्टा ज़िले का छोटा सा गाँव है आइरूर। नारियल के ऊंचे-ऊंचे पेड़ और सुबह के सूरज की रोशनी इस गाँव को और भी ज़्यादा सुंदर बना देती है। जनगणना 2011 के अनुसार इस गाँव की अबादी 3,609 है। गाँव में मुख्यरूप से कटहल, सुपारी और नारियल की खेती होती है। गाँव के पास ही पंपा नदी बहती है, जिससे यहां के स्थानीय मछवारों की रोज़ी-रोटी भी चलती है। केरल के ज़्यादातर गाँवों की तरह आइरूर गाँव की साक्षरता दर अच्छी है। गाँव में 86.82 प्रतिशत साक्षरता दर है।

गाँव की यादें -

' आइरूर ' गांव से जुड़ी यादें हमें बता रही हैं ' अनुलता राज नायर ', जो इस गाँव से ताल्लुक़ रखती हैं।

गर्मियों की छुट्टियों का पहला महीना यानी हम सबका केरल ट्रिप

केरल के एक छोटे से गाँव आइरूर में मेरा ददिहाल था। ज़िला पट्टनमथिट्टा और सड़क कांजीटूकेरो ....... हो गई ना जीभ गोल ? बस यही वजह थी कि बचपन में मेरा मन भी केरल जाने के नाम से घबराने लगता था। मध्यप्रदेश जैसे हिंदी भाषी राज्य में पैदा होने और पलने बढ़ने के कारण मलयालम भाषा मेरे लिए अनजानी ही रही और एक महीने लगातार वहां रहना यानी कि लोगों से बात करते हुए हिचकिचाना.. एक महीने में जो थोड़ा बहुत सीखा वो अगली ट्रिप तक दिमाग से सफाचट हो जाता था।

पर थोड़ा सा समझदार हुई यानी कि भाषा की समझ तो नहीं पर भावनाओं की समझ बढ़ी तब वहां जाना मन को ऐसा सुख देने लगा, जो किसी भी बच्चे को उसके दादा-दादी के घर में मिलता है,फिर ये तो केरल था, भगवान् का अपना देश ...गॉड्स ओन कंट्री।

केरल के आइरूर गाँव में दादी का घर।

केरल में मेरे दादा का घर एक ऊंची पहाड़ी पर बना था, नारियल के ऊंचे और कटहल के घने घने पेड़ों के बीच आड़े टेड़े काले पत्थरों की सीढ़ियों से दौड़ते हुए हम एक सांस में ऊपर पहुंच जाते थे। इस मेहनत का इनाम मिलता था नारियल का मीठा-ठंडा पानी और कई तरह के केले, कोई एक हाथ बराबर तो कोई हथेली के जितना छोटा। ये फल इस प्रदेश की ख़ासियत है। यहां एक भी व्यंजन ऐसा नहीं,जो नारियल के बिना बनता हो...।

मंदिरों में प्रसाद के तौर पर मिलता है नारियल का पानी।

अपने दादाजी को मैंने बोलते बहुत कम देखा था पर उनकी आंखें हमेशा पनीली रहती थीें। मुझे याद है मैंने अपने पापा से पूछा था कि अप्पुपन याने दादाजी की आंखें ऐसी क्यों हैं ? पापा चुप रह गए थे लेकिन मैं बाद में समझ पाई कि जिस बाप का बेटा कई हज़ार किलोमीटर दूर जाकर बस गया हो, उसकी आंखें और मन हमेशा भीगे ही रहते हैं। मैंने ददिहाल को हमेशा अपने पिता की नज़र से देखा, वहां मैं,पापा और दादाजी घर के आसपास फ़ैली कई एकड़ ज़मीन पर दिन भर घूमते रहते। मैं लड़खड़ाती तो दादाजी की रूखी हथेली मेरी कलाई थाम लेते......वो स्पर्श मुझे अब भी याद है। मुझे याद है वहां जाकर अपने पिता का बच्चा बन जाना, जब दादाजी उन्हें 'कुट्टन' कह कर पुकारते, तो उनकी आंखों के कोर गीले हो जाते और मेरी आंखें चमक जाती थी। जब अप्पुपन(मेरे दादा) मुझे कुट्ट-कुट्टी बुलाते..... याने बेटे की बेटीे हमारे देश में केरल शुरू से ऐसा प्रदेश रहा जहां औरतों को बेटियों को बराबर का मान-सम्मान और प्यार मिलता है।

आइरूर गाँव में होती स्थानीय पूजा।

मेरा गाँव मुझे शरारतें नहीं याद दिलाता है, मेरा गाँव मुझे अपनों से दूर चले जाने की टीस का एहसास कराता है। मैंने ये टीस, ये तकलीफ़ अपने दादा और अपने पिता की आंखों में एक साथ देखी थी।

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हम एक महीने पूरा आइरूर में रहते थे। हमारे घर के ठीक सामने एक छोटी सी प्रतिमा थी किसी छोटे कद के आदिवासी आदमी की। दादाजी बताया करते थे कि ये एक बहादुर था, जिसने आदमखोर शेर को मार कर गाँव वालों को बचाया था। इसलिए उन्होंने उसकी मूर्ती बनवाई। ये बात इसलिए बड़ी थी कि उस दौर में केरल में जातिवाद बहुत ज़ोर पर था और इस वीर का कुल ऊंचा नहीं माना जाता था। उस वक्त उसकी प्रतिमा बनवाकर उसे महिमामंडित करना समाज में आसानी से स्वीकार नहीं किया गया था पर आज उस प्रतिमा पर श्रद्धालु फूल चढ़ा कर माथा टेकते हैं।

आइरूर गाँव में लगी आदिवासी आदमी की मूर्ति।

यानी कि मुझे अपने गाँव से एक अच्छी सोच और उदार मानसिकता विरासत में मिली है। केरल पूर्ण रूप से साक्षर प्रदेश है यानी वहां का हर बाशिंदा पढ़ा लिखा है और इसलिए वहां लोग बहुत जागरूक हैं। उन दिनों हमारे घर काम करने आने वाली हेल्पर भी फुर्सत पाते ही अखबार खोल कर बैठ जाती थी। मैं सारा दिन उन्हीं के आसपास मंडराती रहती थी, हर लड़की की तरह मुझे भी घर-घर खेलना अच्छा लगता था।

वो कभी ओखली में लंबे-लंबे डंडों से नारियल कूटना सिखाती , तो कभी सिल पर मसाले पीसना और सुपारी की छाल से स्पेचुला बनाना, कटहल के पत्तों से टेबल स्पून बनाना सिखाती थी। घर से ज़रा सी दूर बहती पम्पा नदी के किनारे बैठे मैंने न जाने कितनी कहानियां दादाजी से सुनी होंगी, जिनके पात्र या तो मछुआरे थे या धान की खेती में जुटे मजदूर या मसाले उगाने वाले व्यापारी। मैं अब समझी कि कैसे खेल खेल में वो मुझे अपने गाँव, अपने प्रदेश से जोड़ने की कोशिश करने में लगे थे।

गाँव के पास बहती पंपा नदी का दृश्य।

दादाजी के देहांत के बाद हम वहां कभी नहीं गए...कोई पुकारने वाला , जो नहीं था। पापा अपने साथ घर के बागीचे से एक मुट्ठी मिट्टी उठा लाए थे, जो हमने उसके अंतिम समय में उनके हाथ में रख दी थी। जाउंगी फिर कभी...बिना किसी के पुकारे....अपने लिए एक मुट्ठी मिट्टी मुझे भी तो लानी है।

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अनुलता राज नायर की तरह अगर आपके मन में भी अपने गाँव से जुड़ी यादें हैं, तो उन्हें हमारे साथ साझा करें- kanchan@gaonconnection.com पर। आख़िर यही तो है हम सबका गाँव कनेक्शन

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