छुआछूत और अपमान की वजह से स्कूल छोड़ देते हैं वाल्मीकि समुदाय के ज़्यादातर बच्चे

चौदह वर्षीय रिया वाल्मीकि भी आम बच्चों की तरह बैग लेकर स्कूल जाना चाहती थी, पढ़ना चाहती थी, हाथ पकड़कर लिखना सीखना चाहती थी, सबके साथ खेलना चाहती थी, साथ बैठकर खाना चाहती थी लेकिन इसमें से उसकी कोई भी ख़्वाहिश पूरी नहीं हो सकी। उसका कसूर सिर्फ इतना था कि उसने बाल्मीकी समुदाय में जन्म लिया था। छुआछूत और गरीबी की वजह से रिया जैसे हज़ारों बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं। पढ़िए सीरीज का तीसरा भाग ...

Neetu SinghNeetu Singh   21 Dec 2020 2:46 PM GMT

छुआछूत और अपमान की वजह से स्कूल छोड़ देते हैं वाल्मीकि समुदाय के ज़्यादातर बच्चे

जालौन (उत्तर प्रदेश)। रिया के दिन स्कूल में बहुत थोड़े लेकिन दर्द भरे थे। उसे छह साल की उम्र में स्कूल में दाखिला तो मिल गया था मगर उसे बाकी बच्चों से अलग बैठाया जाता था। उसे स्कूल में बैठने के लिए अपने घर से एक ख़ाली बोरी लानी होती थी और उसे ज़मीन पर बिछाकर उसी पर बैठना होता था। रिया के साथ छुआछूत इतनी ज़्यादा थी कि उसे कुछ ही दिन बाद स्कूल छोड़ देना पड़ा। रिया अब 14 साल की हो चुकी है मगर स्कूल के उन चंद दिनों के दौरान उसके साथ हुआ छुआछूत वाला बर्ताव वो आज तक नहीं भूल पाई हैं।

"हमें दूसरे बच्चों से दूर बैठाया जाता था। अगर कोई अक्षर हमें लिखना नहीं आ रहा होता तो मास्टर जी हाथ पकड़कर नहीं लिखवाते थे, वो भी हमसे छुआछूत मानते थे। ये सब हमें बहुत बुरा लगता था, हमने स्कूल जाना ही छोड़ दिया," स्कूल के दिनों की बातें याद करते हुए रिया रुआंसी हो जाती है। रिया यूपी के जालौन जिला मुख्यालय से लगभग 17 किलोमीटर दूर कदौरा के संदी गाँव में रहती हैं। स्कूल में रिया के साथ छुआछूत की वजह उनका वाल्मीकि समुदाय से होना था।

रिया अकेली नहीं हैं जिन्हें छुआछूत की वजह से स्कूल छोड़ देना पड़ा। गांव में कुल पांच वाल्मीकि परिवार रहते हैं। रिया के घर के आस-पास जितने भी बच्चे वाल्मीकि परिवारों से हैं उनमें से कोई भी आठवीं की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाया है। ज़्यादातर बच्चे पांचवीं तक भी नहीं पढ़ पाए हैं। स्कूलों में होने वाले जातिगत भेदभाव की वजह से वाल्मीकि समाज के ज़्यादतर बच्चे स्कूल जाने से कतराते हैं। रिया की ही तरह उत्तर प्रदेश के जालौन ज़िले के कदौरा ब्लॉक के संदी, मरगायां और चमारी गाँव के लगभग 25 बच्चों ने गाँव कनेक्शन की रिपोर्टर को स्कूलों में अपने साथ हुई छुआछूत की घटनाओं को साझा किया।

सीरीज का पहला भाग यहाँ पढ़ें : हाथों से मैला उठाने की कुप्रथा यहाँ पीढ़ियों से चली आ रही, इस दंष से अभी तक आजाद नहीं हुई ये महिलाएं

ये हैं रिया वाल्मीकि, जो छुआछूत और अपमान की वजह से पढ़ाई नहीं कर सकीं. फोटो: नीतू सिंह

ये वो बच्चे हैं जिनके परिवार सफ़ाई का काम करते हैं। इनमें से कईं आज भी हाथ से मैला उठाने का काम करते हैं। रिया के माता-पिता तो नहीं मगर उनकी दादी आज भी हाथों से मैला उठाती हैं। देश के कईं इलाक़ों की तरह यूपी के जालौन ज़िले में भी हाथों से मैला उठाने की कुप्रथा अभी भी जारी है। भारत सरकार ने अप्रैल 2018 में हुए एक सर्वे में जालौन ज़िले की 649 ऐसी महिलाओं को चिन्हित किया था। जिसमें 546 लोगों को पुनर्वास के लिए 40,000 रूपये मिल चुके हैं, लेकिन अभी भी यहां ऐसी कईं महिलाएं हैं जो हाथ से मैला उठाती हैं वो पुनर्वास की राशि से वंचित हैं। रिया की दादी भी उनमें से एक हैं, जिन्हें आज तक पुनर्वास के लिए मुआवज़े की राशि नहीं मिली है। वो आज भी हाथ से मैला उठाने का काम करती हैं।

गाँव कनेक्शन की विशेष सीरीज 'स्वच्छ भारत में मैला उठाती महिलाएं' के पहले भाग में हमने बात की थी कि शौचालय निर्माण में हर साल करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद आज भी ये महिलाएं हाथ से मैला उठाने को मजबूर हैं। दूसरे भाग में हमने बात की थी कि हाथ से मैला उठाने वाले परिवार मैला उठाने का काम छोड़ दें, सरकार ने बदले में इनके जीवकोपार्जन के लिए चिन्हित परिवारों को 40,000 रुपए की धनराशि दी है। जालौन जिले में 500 से ज्यादा महिलाएं ये काम करना छोड़ चुकी हैं पर इनका आरोप है 'काम छोड़ने के बदले में सरकार की तरफ से मिलने वाले 40,000 रुपए पर्याप्त नहीं'. इस भाग में हम बात करेंगे हाथ से मैला उठाने वाली महिलाओं के बच्चों की, जिन्हें स्कूलों में छुआछूत का सामना करना पड़ता है। वो पढ़ना तो चाहते हैं लेकिन स्कूलों में होने वाले अपने अपमान की वजह से स्कूल जाना छोड़ देते हैं।

सफ़ाई कर्मचारियों पर काम करने वाले संगठन राष्ट्रीय सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन के अनुसार जालौन ज़िले में अभी भी 2,059 शौचालय (dry laterines) ऐसे हैं जिनमें सफ़ाई कर्मचारी हाथ से मैला उठाते हैं। पूरे उत्तर प्रदेश में ऐसे शौचालयों की संख्या 5.58 लाख है।

ये हैं रिया की माँ और छोटा भाई, इनकी माँ चाहती हैं कि इनके बच्चों को कोई ट्यूशन पढ़ा दे लेकिन छुआछूत की वजह से सबने पढ़ाने से मना कर दिया. फोटो : नीतू सिंह

साल 2011 की जनगणना के अनुसार जालौन ज़िले में वाल्मीकि समुदाय के 412 परिवार रहते हैं। इनमें से 301 ग्रामीण क्षेत्रों में और 111 शहरी क्षेत्रों में हैं। पूरे उत्तर प्रदेश बालमीकी समुदाय के 3.26 लाख परिवार हैं जिसमें 2.19 लाख परिवार ग्रामीण क्षेत्रों में और एक लाख परिवार शहरी क्षेत्रों में रहते हैं।

इन वाल्मीकि परिवारों की माली हालत भी काफ़ी ख़राब है। हाथ से मैला उठाने वाली महिलाओं को ज़्यादातर बदले में सिर्फ़ खाना मिलता है। रिया के परिवार की भी आमदनी अच्छी नहीं है। परिवार में रिया के अलावा तीन भाई-बहन, माता-पिता और दादी हैं। रिया के पिता एक होटल में सफ़ाई का काम करते हैं, मां मज़दूरी करती हैं और दादी हाथ से मैला उठाने का काम करती हैं। रिया के किसी भी भाई-बहन ने पांचवीं तक की पढ़ाई पूरी नहीं की है।

रिया की माँ ने बताया, "हमारे 4 बच्चे हैं। हमने इन्हें पढ़ाने की बहुत कोशिश की लेकिन स्कूल में इनके साथ इतनी छुआछूत होती है कि ये स्कूल जाते ही नहीं है। घर पर पढ़ाने के लिए भी बहुत लोगों से बात की मगर छुआछूत की वजह से कोई हमारे भी नहीं आना चाहता। जब इन्हें पढ़ने का मौका ही नहीं मिलेगा तो इनके भविष्य का आप ऐसे ही अंदाज़ा लगा लीजिये।"

यूपी के सर्व शिक्षा अभियान के राज्य परियोजना निदेशक ने नवंबर 2012 में सभी ज़िलों के बेसिक शिक्षा अधिकारियों को 'मैला ढोने वाले परिवारों के बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराए जाने के सम्बन्ध में' एक पत्र जारी किया था जिसमें मैला ढोने वाले परिवारों के बच्चे (6-14 वर्ष) की कितनी संख्या है और कितने बच्चों का विद्यालयों में दाख़िला कराया गया है। इस पत्र के जवाब में बेसिक शिक्षा अधिकारियों ने क्या आंकड़े उपलब्ध कराए हैं, ये जानकारी उपलब्ध कराने में विभाग असमर्थ रहा।

यूपी के जालौन जिले के ये बच्चे चमारी गाँव के हैं, इनमे से बहुत कम बच्चों को ही स्कूल जाने का मौका मिला है. फोटो : नीतू सिंह

यूपी के सर्व शिक्षा अभियान द्वारा भेजे गये इस पत्र का कितना असर पड़ा? इस सवाल के जवाब में उत्तर प्रदेश सर्व शिक्षा अभियान के परियोजना परिषद के वरिष्ठ विशेषज्ञ (स्कूल शिक्षा) रोहित त्रिपाठी ने गाँव कनेक्शन को फोन पर बताया, "विभाग की तरफ से हर साल आउट ऑफ़ स्कूल बच्चों को चिन्हित किया जाता और उनका दाख़िला परिषदीय विद्यालयों में कराया जाता है। इस साल भी ये सर्वे हुआ है, कोविड की वजह से बच्चों की संख्या इस साल पूरे राज्य में लगभग पांच लाख थी, सभी का दाख़िला परिषदीय विद्यालय में करा दिया गया है।"

मैला ढोने वाले परिवारों के कितने बच्चे अभी स्कूल पहुंच पा रहे हैं? यह पूछने पर रोहित त्रिपाठी कहते हैं, "इस स्पेशल कैटेगरी में ऐसी कोई गणना या सर्वे विभाग द्वारा नहीं कराया जाता, इसका आपको कोई आंकड़ा नहीं मिल पाएगा।"

हाथ से मैला ढोने का काम करने वाले लोगों के पुनर्वास के लिए 'राज्य स्तरीय निगरानी समिति के सदस्य, जालौन ज़िले के भग्गू लाल बालमीकी ने कहा, "वाल्मीकि समुदाय के साथ सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और शैक्षिणिक हर स्तर पर भेदभाव होता आ रहा है। जब हमने बीस साल पहले इनके साथ काम करना शुरू किया था तब स्थिति बहुत खराब थी, उस समय गिनती के कुछ एक बच्चे ही बमुश्किल स्कूल पहुंच पाते थे लेकिन अभी हालात बेहतर हैं, हालांकि स्कूल जाने के मामले में ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों की संख्या बहुत कम है।"

भग्गू लाल वाल्मीकि आगे कहते हैं, "हमने ग्रामीण क्षेत्रों में कई जगह देखा है हमारी जाति के बच्चों से स्कूल में झाड़ू लगवाई जाती है। मैंने खुद 15 अगस्त 2008 को तीन शिक्षकों को बच्चों के साथ छुआछूत करने की वजह से जेल भिजवाया था। अभी भी कईं स्कूलों में बच्चे अपने बैठने का बिछौना और खाने का बर्तन अपने घर से ले जाते हैं, उन्हें दूसरे बच्चों से अलग बैठाया जाता है। ऐसे व्यवहार से बच्चों में हीन भावना आती है और वो स्कूल जाना तक छोड़ देते हैं। भेदभाव की वजह से बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा पांचवीं और आठवीं तक ही नहीं हो पाती, उच्च शिक्षा की तो बात ही छोड़ दीजिए।"

रिया भी ख़ूब पढ़ना चाहती थी लेकिन छुआछूत इतनी ज़्यादा थी कि उसने अपमान सहने की बजाय अपने सपनों को मरने दिया। "पढ़ने का शौक किसे नहीं होता है पर हमसे सबको छूत लगता था, हमने स्कूल जाना छोड़ दिया। घर में इतना पैसा नहीं था कि कहीं दूर हमारा एडमिशन करवाते जहाँ किसी को ये न पता होता कि हम किस जाति से हैं," रिया ये कहते हुए उदास हो गई।

मैला ढोने के विषय पर 'अदृश्य भारत' नाम से किताब लिखने वाली वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह गाँव कनेक्शन को फोन पर बताती हैं, "मैला ढोने वालों के जो बच्चे हैं उनकी प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक की गारंटी सरकार को लेनी चाहिए। अभी हम देख रहे हैं स्कूलों में इनका दाखिला ही नहीं हो रहा है। हमने उनके बच्चों को भी ये अहसास करा दिया है कि झाड़ू लगाना ही तुम्हारा भविष्य है। इनके माता-पिता बिलकुल नहीं चाहते कि उनके बच्चे वही काम करें जिसे पीढ़ियों से इन्हें मजबूरी में करना पड़ रहा है। इनके दाखिले से लेकर गरिमामयी रोज़गार सुनिश्चित करने तक की ज़िम्मेदारी सरकार को लेनी चाहिए, जिससे इनकी ये पीढ़ी समाज में बराबरी का जीवन जी सके।"

संदी गाँव की सात वर्षीय अंशिका वाल्मीकि का दाखिला गरीबी के बावजूद उनके माता-पिता ने एक प्राइवेट स्कूल में करवा दिया लेकिन अंशिका का स्कूल भी छु्आछूत से अछूता नहीं है। अंशिका कहती हैं, "बच्चे दूर-दूर रहते हैं, जल्दी कोई साथ में खेलता नहीं है। स्कूल के बच्चे मेरे साथ लंच भी नहीं शेयर करते। बुरा तो लगता है पर पढ़ना है, अभी तो कोरोना की वजह से बहुत दिन से स्कूल नहीं गयी हूँ।"

दिल्ली विश्वविद्यालय से सफाई कर्मचारियों की स्थिति पर पीएचडी कर चुके सुमित उज्जैनवाल बताते हैं, "जिन बच्चों की माँएं सुबह उठकर अपने काम पर चली जाती हों उन बच्चों की शिक्षा का आप अंदाजा लगा सकते हैं। इन बच्चों को तैयार करके, उंगली पकड़कर कोई स्कूल भेजने वाला नहीं होता है। इनकी माँओं के लिए आजीविका शिक्षा से ज्यादा महत्वपूर्ण है। वो जानती हैं अगर काम पर नहीं गये तो बच्चों का पेट कैसे भरेंगे। जो बच्चे गंदी बस्ती में रहकर स्कूल किसी तरह पहुंचते भी हैं, उन बच्चों का हमारा सभ्य समाज बहिष्कार कर देता है।" सुमित उज्जैनवाल के शोध का विषय 'स्वच्छता का ज्ञान-विज्ञान तथा समाजिक सम्बन्धों की राजनीति' : उत्तरी पश्चिमी रेलवे में असंगठित स्वच्छता कारों का अध्ययन (2000-2014) था।

चमारी गाँव की रहने वाली आठ साल की राधिका दूसरी कक्षा में है लेकिन वो स्कूल गिनती के कुछ एक दिन ही गयी हैं। घर के बाहर अपनी बस्ती के बच्चों के साथ खेल रहीं राधिका कहती हैं, "स्कूल कोई साथ लेकर जाता है तो चली जाती हूँ अकेले नहीं जाती। अभी बहुत दिन से छुट्टी चल रही है, कोई पढ़ने नहीं जाता तो हम भी पढ़ने नहीं जाते।"

यह पूछने पर कि स्कूल में क्या सीखा, राधिका चुप रही। राधिका की माँ ने कहा, "गाँव के स्कूल में कितनी पढ़ाई होती है वो तो आपको पता ही है। छुआछूत की वजह से टीचर हमारे बच्चों पर बिलकुल ध्यान नहीं देते। हम लोग भी पढ़े लिखे नहीं, बच्चे घर पर भी नहीं पढ़ पाते।"

देश में मैला ढोने की कुप्रथा पर प्रतिबंध है। इसके लिए एक कानून भी बनाया गया है, "हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम 2013"। इस कानून के तहत मैला ढोने का काम कर रहे लोगों को पुनर्वास किया करना, ज़िला स्तर पर 'जिलास्तरीय सर्वेक्षण समिति' और राज्य स्तर पर 'राज्य स्तरीय सर्वेक्षण समिति' का गठन और जिन लोगों की पहचान हो उन्हें रोज़गार से जोड़ा जाए। इसके बावजूद देश में आज भी सरकारी आंकड़ों के अनुसार हज़ारों लोग हाथ से मैला उठाने का काम करने को मजबूर हैं।

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अधीन काम करने वाली संस्था नेशनल सफाई कर्मचारी फ़ाइनेंस एंड डवलपमेंट कॉरपोरेशन (एनएसकेएफडीसी) ने अगस्त 2019 में 18 राज्यों के 170 ज़िलों में एक सर्वे कराया था. इस सर्वे के दौरान कुल 87,913 लोगों ने खुद को मैला ढोने वाला बताते हुए रजिस्ट्रेशन कराया था। जिसमें सिर्फ 42,303 लोगों को ही राज्य सरकारों ने मैनुअल स्कैवेंजर्स (हाथ से मैला ढोने वाले लोग) के रूप में स्वीकार किया। इस हिसाब से जितने लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया था, उसमें से 50 फीसदी से भी कम लोगों को मैनुअल स्कैवेंजर्स माना गया है। इस सर्वे के अनुसार पूरे देश में सबसे अधिक उत्तर प्रदेश के 47 ज़िलों से 41,068 लोगों ने खुद को मैनुअल स्कैवेंजर्स बताते हुए रजिस्ट्रेशन कराया था जबकि राज्य सरकार ने केवल 19,712 लोगों को ही मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में स्वीकार किया है।

सफाई कर्मचारी आंदोलन के समन्वयक मैगसेसे पुरस्कार विजेता बेज़वाड़ा विल्सन कहते हैं, "इन बच्चों की शिक्षा इस समय बहुत बड़ी समस्या है। इनके पास कॉपी-किताबें होना ही मुश्किल होता है, अभी तो ऑनलाइन क्लास चल रही है इनके पास न मोबाइल है, न लैपटॉप न कम्प्यूटर। ऐसे में इनकी पढ़ाई कैसे होगी? सरकार ने सबकुछ खोल दिला है लेकिन स्कूल नहीं। सरकार की नीति से हमारी शिकायत है अगर ऐसा ही चला तो दलित और सफाई कर्मचारियों के बच्चे जल्द ही चाइल्ड लेबर बन जाएंगे।"

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