इस गाँव में सालों से न पुलिस आई, ना ही लोग अदालत गए 

इस गाँव में सालों से न पुलिस  आई, ना ही लोग अदालत गए इस गाँव में सालों से पुलिस नहीं आई. 

सहारनपुर। एक तरफ जहां सहारनपुर के कई गाँव इन दिनों जातीय संघर्ष से गुज़र रहे हैं। वहीं यहां एक ऐसे गाँव भी है जहां वर्षों से एक भी मामला पुलिस थाने या अदालत में नहीं गया।

सहारनपुर का दर्द: ‘जिनको पैदा होते देखा, उन्होंने ही घर जला दिया’

सहारनपुर जिला मुख्यालय से महज दो किलोमीटर दूरी पर स्थित नया गाँव रामनगर जहां हिन्दू-मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग लगभग बराबर संख्या में रहते हैं।

मेरे दादा हाजी तुफैल गांडा समुदाय के प्रमुख थे। उनका इंतकाल कुछ दिनों पहले हुआ था। उनके समय से ही गाँव का कोई भी मामला थाने या अदालत में नहीं गया। गाँव के बड़े-बुजुर्ग बैठकर मामले का हल निकाल लेते थे।
फरहद आलम गांडा, प्रदेश अध्यक्ष, गांडा युवा मंच

गांडा युवा मंच के प्रदेश अध्यक्ष फरहद आलम गांडा (35 वर्ष) इसी गाँव के रहने वाले हैं। फरहद बताते हैं, ‘‘मेरे दादा हाजी तुफैल गांडा समुदाय के प्रमुख थे। उनका इंतकाल कुछ दिनों पहले हुआ था। उनके समय से ही गाँव का कोई भी मामला थाने या अदालत में नहीं गया। गाँव के बड़े-बुजुर्ग बैठकर मामले का हल निकाल लेते थे। अब यह काम मैं और मेरे गाँव के अन्य समझदार लोग मिलकर देखते हैं।”

भीम आर्मी दलितों की आवाज़ या कुछ और?

कब्रिस्तान और अम्बेडकर प्रतिमा मसला गाँव में सुलझा

फरहद बताते हैं, “एक बार दलित समुदाय के लोग मुस्लिम समुदाय के लोगों की कब्रिस्तान की जमीन पर बाबा साहब की प्रतिमा लगाने लगे। एक सरकारी अधिकारी ने दलित समुदाय को बहुत चढ़ाया और बात लड़ाई-झगड़े तक आ गई। तब मेरे दादा ने दोनों समुदाय के लोगों के साथ पंचायत की। पंचायम में दलित समुदाय के लोगों ने कहा कि हमें बाबा साहब की प्रतिमा लगानी है। मुस्लिमों ने कहा कि हमें कब्रिस्तान चाहिए। मेरे दादा ने अपनी जमीन कब्रिस्तान के लिए दे दी और कब्रिस्तान की ज़मीन पर बाबा साहब की प्रतिमा लगी। ऐसे मसलों पर तो हिन्दू-मुस्लिम दंगे हो जाते हैं, लेकिन हमारे गाँव के बड़े-बुजुर्गों की सूझबूझ से ऐसा नहीं हुआ।”

कब्रिस्तान और अम्बेडकर प्रतिमा मसला गाँव में सुलझा

बलात्कार की कोशिश के मामले को पंचायत ने सुलझाया

फरहद बताते हैं, “गाँव की पंचायत ने बलात्कार की कोशिश जैसे मामले में भी गाँव में ही सुनवाई कर मामला खत्म कर दिया। पिछले कुछ साल पहले एक मुस्लिम समुदाय के लड़के ने दलित समुदाय की लड़की के साथ गलत करने की कोशिश की थी। जब बात पंचायत को पता चली तो पंचायत में दोषी लड़के को शर्मिंदा किया गया और उसके पिता ने सबके सामने उसे मारा। लड़के से लिखवाया गया कि भविष्य में ऐसा कुछ नहीं करेगा तब जाकर पंचायत ने उसे छोड़ा।” गाँव के रहने वाले और ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने वाले शादाब अली (उम्र 21) बताते हैं, “हमारे गाँव में पुलिस कब आई पता ही नहीं है।”

सहारनपुर का दर्द: ‘वो लोग मेरी छाती पर तलवार मारना चाहते थे’

जातीय संघर्ष के बाद यहां भी पुलिस कर रही जांच

हाल ही में दलित अधिकारों को लेकर चर्चा में आए भीम आर्मी का इस गाँव के युवाओं पर काफी ज्यादा प्रभाव दिखता है। भीम आर्मी से सम्बन्धित एक युवा सचिन बताते हैं, ‘‘हमारे गाँव में तो कभी लड़ाई नहीं हुई है। हम सब भाई-भाई की तरह रहते हैं। कोई भी लड़ाई-झगड़ा हो प्रधान और गाँव के बड़े लोग उसे गाँव से बाहर जाने नहीं देते हैं, लेकिन सहारनपुर के बाकी जगहों पर दलितों के साथ अच्छा नहीं हो रहा है।

फरहद आलम, प्रदेश अध्यक्ष, गांडा युवा मंच

सहारनपुर जातीय संघर्ष के बाद इस गाँव में पुलिस जांच कर रही है। पुलिस को शक है कि नौ मई की दोपहर शहर में जो गाड़ियां और पुलिस चौकी जलाई गई इसमें यहां के भी युवक शामिल थे। पुलिस इसीलिए ज्यादा शक कर रही है क्योंकि सबसे ज़्यादा तोड़-फोड़ इसी गाँव के करीब हुई। पुलिस दिन-रात दबिश दे रही है, लेकिन ग्रामीणों का कहना पुलिस पहले तो लापरवाही दिखाई और अब दिखाओ के लिए कुछ लड़कों को पकड़कर जेल में डालने की कोशिश कर रही है।

Share it
Share it
Share it
Top