किसान पीड़ा में, ऋणमाफी स्थायी हल नहीं : मोहन भागवत

किसान पीड़ा में, ऋणमाफी स्थायी हल नहीं : मोहन भागवतमोहन भागवत।

नागपुर (भाषा)। किसानों के पीड़ा में होने का उल्लेख करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने आज कहा कि कर्जमाफी जैसे सरकार के कदम तात्कालिक राहत हैं लेकिन यह इस समस्या का हल नहीं हैं। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था में सुधार और उसे स्वच्छ बनाने के उपायों में सर्वत्र थोडी बहुत उथलपुथल एवं अस्थिरता अपेक्षित है, लेकिन अनौपचारिक अर्थव्यवस्था पर उसका असर कम हो और उसे अधिकतम बल मिले।

उन्होंने यहां संघ मुख्यालय में विजयदशमी कार्यक्रम में कहा कि हमारे नीति आयोग एवं राज्यों के नीति सलाहकारों को घिसेपिटे आर्थिक विचारों से बाहर आकर सोचना पड़ेगा और विश्व के अद्यतन अनुभवों एवं यहां की ठोस वास्तविकताओं के बीच तालतेल बनाना होगा। किसानों की दुर्दशा को उठाते हुए भागवत ने कहा, ''हमारा किसान स्वभाव से न केवल अपने परिवार का, अपितु सभी का भरणपोषण करनेवाला है। वह आज दुखी है। वह बाढ़, अकाल, आयात निर्यात नीति, फसल के कम दाम और फसल बर्बाद होने पर सब तरह से नुकसान की मार झेलकर निराश होने लगा है।

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उन्होंने कहा कि एक भाव घर करता जा रहा है कि नई पीढ़ी पढ़ेगी तो शहरों में जाकर बेरोजगार बन जायेगी, देहात में रहकर खेती में काम करना पसंद नहीं करेगी और यदि खेती में काम करती है तो देहातों के सुविधाशून्य जीवन में ही पड़ी रहेगी। उन्होंने कहा कि कृषि बीमा, मृदा परीक्षण और कृषि उत्पादों की ई खरीददारी जैसी प्रशंसनीय योजनाएं लायी जा रही हैं परंतु धरातल पर इसका अमल ठीक से हो, इसलिये केंद्र व राज्य शासनों के द्वारा अधिक चौकसी रहनी चाहिये।

आरएसएस प्रमुख ने कहा, ''ऋणमाफी जैसे कदम सरकारों की संवेदनशीलता एवं सद्भावना के संकेत हैं लेकिन ये अस्थायी उपाय इस समस्या का समाधान नहीं है। हाल ही में महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश सरकारों ने किसानों के लिए ऋणमाफी की घोषणा की थी।'' भागवत ने कहा कि किसानों के लिए नई तकनीक अपनायी जानी चाहिएं और गैरप्रदूषणकारी परंपरागत तरीके भी उनके साथ जोडे जाने चाहिएं ताकि कहीं से कर्जा लिये बिना किसान कम लागत में खेती कर सके। नई तकनीक को भी यह सुनिश्चित करने के बाद ही स्वीकार किया जाना चाहिए कि जमीन, पर्यावरण एवं मनुष्य के स्वास्थ्य पर उसके कोई घातक, दीर्घकालिक दुष्परिणाम नहीं हो।

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उन्होंने कहा, ''अपने परिवार को चलाकर अगले वर्ष की खेती कर सके, इतना लागत पर लाभ देनेवाला न्यूनतम फसल मूल्य किसानों को मिलना चाहिये। फसल की समर्थनमूल्य पर खरीददारी सरकार द्वारा सुनिश्चित करनी पड़ेगी। जैविक कृषि, मिश्रित कृषि, गौआधारित पशुपालन सहित कृषि का प्रचलन बढ़ाना होगा। अन्न, जल व जमीन को विषयुक्त बनानेवाली, किसान का खर्चा बढ़ानेवाली रासायनिक खेती धीरेधीरे बंद करनी पड़ेगी।''

उन्होंने कहा कि खाली हाथों को काम मिलना, उसमें से आजीविका की न्यूनतम पर्याप्त व्यवस्था होना यानी रोजगार, वह भी अपने देश की मुख्य आवश्यकता मानी जाती है। इन दोनों में सबसे बड़ा योगदान हमारे लघु, मध्यम, कुटीर उद्योगों का, खुदरा व्यापार तथा स्वरोजगार के छोटे छोटे नित्य चलने वाले अथवा तात्कालिक रुप से करने के काम करनेवालों का, सहकारिता क्षेत्र का तथा कृषि और कृषि पर निर्भर कार्यों का है। उन्होंने कहा कि त्रुटिपूर्ण होने के बाद भी सकल घरेलू उत्पाद का मानक अर्थव्यवस्था की सुदृढ़ता एवं वृद्धि की गति का मापक है।

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