सरदार सरोवर : उन्हें तरस नहीं आ रहा हजारों बस्तियां डुबाने में !

सरदार सरोवर : उन्हें तरस नहीं आ रहा हजारों बस्तियां डुबाने में !पुनर्वास केंद्र।

धार/बड़वानी (आईएएनएस)। 'लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने (डुबाने) में।' देश के मशहूर शायर बशीद बद्र ने भले ही हिंसा को लेकर ये शेर लिखा हो, मगर इन दिनों ये पंक्तियां मध्यप्रदेश सरकार और प्रशासन द्वारा हजारों परिवारों के घर नर्मदा के जल में डुबाने की तैयारी पर एकदम सटीक बैठती है। घर जलाने वाले तो दंगाई होते हैं, मगर घर डुबाने वालों को क्या नाम दिया जाए!

नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई 138 मीटर किए जाने की स्थिति में मध्यप्रदेश को सबसे बड़ा नुकसान होने वाला है, क्योंकि यहां के 192 गांव के 40 हजार से ज्यादा परिवारों पर इसका असर पड़ने वाला है। घर, दुकान, खेती और हरे भरे जंगल पानी में डूब जाएंगे, तो हजारों लोग उन स्थानों पर वक्त काटने के लिए मजबूर होंगे, जो दड़वे के समान है, जिन्हें सरकार मकान और घर बता रही है।

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राज्य में नर्मदा घाटी विकास के मंत्री भी है और इसकी जिम्मेदारी लाल सिंह आर्य के पास है। उन्होंने अब तक प्रभावित क्षेत्र तक जाना भी मुनासिब नहीं समझा है, वे खुद मानते हैं कि 178 गांव में से 107 गांव का ही पुनर्वास हुआ है। उन्हीं की मान ली जाए तो 71 गांव का पुनर्वास शेष है वहीं दूसरी ओर, नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेधा पाटकर का कहना है कि सरकार झूठे आंकड़े दे रही है। पुनर्वास के नाम पर टीन के कमरे बना दिए गए हैं, जहां बिजली, पानी और सड़क जैसी मूलभूत सुविधाएं तक नहीं हैं।

प्राधिकरण के उपाध्यक्ष रजनीश वैश्य का कहना है कि प्रभावित परिवारों की संख्या 23 हजार 624 है। इनमें से पांच हजार 551 परिवार गुजरात में बस गए हैं, 12 हजार 577 परिवारों का विस्थापन हो चुका है। इस तरह पांच हजार से ज्यादा परिवारों का पुनर्वास होना है। जहां तक आंदोलन की बात है, तो वे सब बाहरी लोग कर रहे हैं, जिन्हें विस्थापित लोगों पर तरस आ रहा है।

किसान संघर्ष समिति और जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय डॉ. सुनीलम् का कहना है कि सरकार द्वारा बनाए जा रहे पुनर्वास स्थलों को देखें तो वे पूरी तरह टीन शेड के बनाए जा रहे हैं, महज एक कमरे के इन आवासों में परिवार, उसके मवेशी कैसे रहेंगे, इस बात की चिंता किसी को नहीं है। सड़क की जगह कीचड़ है, बिजली नहीं है, पीने के पानी का कोई इंतजाम नहीं है। इतनी बड़ी आबादी के बच्चे कहां पढ़ेंगे, इसकी परवाह किसी को नहीं है।

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नर्मदा आंदोलन की मेधा पाटकर कहती हैं कि सरकार ने न्यायालय तक को गलत और झूठे आंकड़े दे दिए हैं और अब फिर झूठे आंकड़े दिए जा रहे हैं। पुनर्वास स्थलों का हाल देखकर वहां जाने को कोई तैयार नहीं हो सकता, जबकि सरकार दावा कर रही है कि कई हजार परिवार पुनर्वास स्थलों पर पहुंच गए हैं। टीन शेड वाले जो घर और शौचालय बने हैं, उनमें दरवाजे तक नहीं हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता अमूल्य निधि का कहना है कि यह आवास सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप नहीं है, मकान पक्का बनना है, मगर 160 फुट क्षेत्र का एक टीन शेड का कमरा और बाहर शौचालय बनाया गया है।

नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह का कहना है कि राज्य सरकार विस्थापितों के साथ अग्रेजों जैसा बर्ताव कर रही है। गुजरात के फायदे के लिए मुख्यमंत्री चौहान अपने प्रदेश की जनता को नुकसान पहुंचाने पर आमादा हैं। मुख्यमंत्री को चाहिए कि वे प्रभावितों का बेहतर पुनर्वास करें, उसके बाद विस्थापन किया जाए।

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मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव बादल सरोज शिवराज सरकार के क्रिया कलापों को जनविरोधी करार देते हैं। उनका कहना है कि राज्य सरकार पुनर्वास का इंतजाम किए बिना विस्थापन के काम में जुट गई है। पुलिस बल के जरिए गांव वालों को डराया-धमकाया जा रहा है, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ है।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नर्मदा बचाओ आंदोलन की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई आठ अगस्त को होनी है। इस कारण विस्थापन का काम फिलहाल धीमा पड़ गया है, मगर डूब वाले क्षेत्र में सुरक्षा बलों की तैनाती है। प्रभावितों की आंखों में आस जगी है कि न्याय व्यवस्था उनकी जिंदगी बदरंग नहीं होने देगी।

(संदीप पौराणिक)

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