ग्राउंड रिपोर्ट: सुप्रीम कोर्ट की नरमी के बाद भी आदिवासियों में क्यों है रोष?

कोर्ट के इस आदेश के बाद देश के करीब 11 लाख वन-आश्रित परिवारों पर बेघर होने का संकट मंडराने लगा है। यही वजह है कि जल, जंगल और जमीन को लेकर झारखंड एक बार फिर आंदोलित हो गया है और धरना-प्रदर्शन में मधु मंसुरी का गीत हर एक की जुबान पर है।

Md. Asghar khanMd. Asghar khan   2 April 2019 11:30 AM GMT

ग्राउंड रिपोर्ट: सुप्रीम कोर्ट की नरमी के बाद भी आदिवासियों में क्यों है रोष?सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद झारखंड में आदिवासियों का प्रदर्शन लगातार जारी है।

रांची (झारखंड)। गांव छोड़ब नाही, जंगल छोड़ब नाही, माई माटी छोड़ब नाही, लड़ाई छोड़ब नाही, लोक गायक और गीतकार मधु मंसूरी हंसमुख का यह गीत इन दिनों झारखंड के आदिवासियों के बीच और धरना-प्रर्दशन में खूब गाया-सुना जा रहा है। गांव कस्बों में इस गीत के तर्ज पर आंदोलन की जमीन तैयार की जा रही है, जिसका केंद्र है जल, जंगल और जमीन। 13 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि वैसे आदिवासी और अन्य पारंपरिक वनवासी को वन भूमि से बेदखल किया जाए जिनका जंगल की जमीन पर दावा खारिज कर दिया गया है। हालांकि बाद में कोर्ट ने अपने इस आदेश पर दस जुलाई तक के लिए रोक लगा दी।

कोर्ट के इस आदेश के बाद देश के करीब 11 लाख वन-आश्रित परिवारों पर बेघर होने का संकट मंडराने लगा है। झारखंड में ऐसे परिवारों की संख्या सरकार के अस्वीकृत सूची के मुताबिक 28,107 है। यही वजह है कि जल, जंगल और जमीन को लेकर झारखंड एक बार फिर आंदोलित हो गया है और धरना-प्रदर्शन में मधु मंसुरी का गीत हर एक की जुबान पर है।

नौ मार्च को जब वन अधिकार रक्षा मंच झारखंड, के बैनर तले रांची के राजभवन के पास विभिन्न समाजिक संगठनों से लोग एकत्रित हुए तो कोई सरकार विरोधी नारे लगा रहा था तो कोई गीत गा रहा था। इन्हीं में से एक गणेश महतो हैं जो हजारीबाग से उस दिन रांची के राजभवन पहुंचे थें। गणेश एक हाथ से माइक पकड़े हुए थे तो दूसरा रूक-रूक कर उपर उठा रहे थे और कंठ से निकला स्वर, 'गांव छोड़ब नाही, जंगल छोड़ब नाही...', था।


20 फरवरी को नेशनल अलायंस फॉर पीस एंड जस्टिस के बैनर तले हजारीबाग से सैकड़ों लोग इस फैसले के खिलाफ पदयात्रा करके सात दिनों बाद 27 फरवरी को रांची पहुंचें थें। इस पदयात्रा के दौरान भी कई बार 'गांव छोड़ब नाही, जंगल छोड़ब नाही...', गीत गाया और सुना गया।

आबादी का 80 फीसदी हिस्सा जंगलों पर है आश्रित

मधु मंसूरी से वनवासियों को बेदखल करने वाले फैसले पर जब सवाल किया तो इन्होंने भी अपने उसी गीत को दोहराया और कुछ क्षण के बाद एक सांस कहा, "15 दिन पहले बेटा एक बड़े नामचीन का फोन आया था। वो कह रहे थे कि हमारे इस गीत को बैन करने की बात हो रही है। उनका नाम मत लिखना बेटा। बाद में वो ये भी बोले थे कि मजाक में कह रहे हैं लेकिन बेटा इधर कई लोगों ने हमसे इस गीत के बारे में चर्चा किए हैं।"

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बेदखल वाले सवाल पर उनका जवाब उचित नहीं लगा तो मोबाइल पर हुई बातचीत में मैंने अपने सवाल को फिर दोहराया।

तब कहते हैं, "अगर कोई आदिवासी के पास खतियानी जमीन नहीं है या थी तो किसी साहूकार ने ले ली, या फिर उसने गरीबी के कारण बेच दी तो क्या उसे बेदखल कर दिया जाएगा, अगर वो जंगल में जाकर बस गया तो क्या उसे अतिक्रमण कहा जाएगा, तो क्या इसे अपराथ माना जाएगा। इ तो आदिवासी हैं। इनका तो घर ही जंगल है। सरकार और कोर्ट ये कैसे भूल सकती है कि आदिवासी समाज ही यहां का मूलवासी है तो फिर अतिक्रमण कैसे हुआ। वो जाएंगे कहां, इस पर गंभीरता से सोचना चाहिए।"


मधु मंसूरी ने जवाब में कई प्रश्न भी खड़ा किया और सरकार को इस मामले पर गंभीरता से सोचने की सलाह भी दी। अंत में कहा कि गीत को बैन करने से आदिवासियों का भला हो जाता है और उन्हें उनकी जमीन से बेदखल नहीं किया जाता तो सरकार को ऐसा अवश्य करना चाहिए।

2011 की जनगणना के मुताबिक 26 प्रतिशत झारखंड में ट्राईबल (अनुसूचित जनजाती) है। इसे आंकड़ों में देखे तो करीब 79 लाख, जिसका 80 फीसदी हिस्सा जंगलों में निवास करता है। वन अधिकार कानून के जानकारों का कहना है कि वन भूमि में रह रहे आदिवासी और अन्य वनवासी परिवार की संख्या कितनी है इसका सही आंकड़ा ना ही सरकार के पास है न ही किसी संस्था के पास।

कानून का हुआ उलंघन

राज्य सरकार की ओर केंद्र को भेजी गई लिस्ट में जंगल जमीन पर एक लाख दस हजार के करीब दावेदारो की संख्या बताई गई है। इसी में से जिन लोगों का दावा रद्द किया गया, वे 28,107 परिवार है। जनगणना के मुताबिक झारखंड में 33 हजार गांव हैं, जिनमें 15 हजार गांव जंगल से लगे हैं। वहीं इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट सर्वे 2017 के के अनुसार झारखंड में 23,553 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में जंगल है। इसमें 4.5 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल आरक्षित जंगल है जबकि बाकि अनाराक्षित वन भूमि है।

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झारखंड के भौगोलिक रुपरेखा की तस्वीर बनना बिना यहां के जंगलो और वन-आश्रितों के अधूरी मानी जाती है। इसलिए यहां जब-जब जल, जंगल, जमीन का मुद्दा उठा तो विरोध-प्रदर्शन देखने को मिला। समाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि जिन लोगों का दावा खारिज किया गया है उसमें वन अधिकार अधिनियम 2006 और पेसा कानून की प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और इन लोगों ने राज्यपाल को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरूद्ध मांग पत्र भी सौंपा है।


झारखंड जंगल बचाओं आंदोलन के संस्थापक संजय बसु मल्लिक कहते हैं, "जो दावा खारिज किया गया उसमें वन अधिकार कानून 2006 की नियमावली 2008, या संशोधित नियमावली 2012 का घोर उलंघन हुआ है अगर अनुमंडलीय और जिला स्तरीय समिति को (इसी समिति के पास ग्रामसभा दावेदार का आवेदन जमा करती है) दावा झूठा या उसमें कोई त्रुटियां नजर आएगी तब वो ग्राम सभा को उसे वापस भेजेगी और दावेदार को उसका पक्ष रखने के लिए 60 दिन का समय देना होगा। इस तरह की कई प्रक्रियाओं का प्रतिपालन नहीं हुआ।"

संजय बसु का यह भी कहना है कि सुप्रीम कोर्ट को राज्य और केंद्र सरकार से पूछना चाहिए था कि दावे को किस आधार पर खारिज किया गया, और क्या उसमें कानून का पालन हुआ। जब इस मामले पर विभागीय मंत्री लुईस मरांडी से उनका पक्ष जानना चाहा तो उन्होंने यह कहते हुए टाल दिया कि वो क्षेत्र में हैं आप सचिव से बात कर लीजिए।

कोर्ट के अगले आदेश का इंतजार

इधर झारखंड कल्याण विभाग के उप सचिव शैलेंद्र लाल का कहना है कि जिन दावों को खारिज किया गया उसमें लगभग 18,500 दावे को स्वं ग्राम सभा ने ही खारिज किया है बाकि जिला और अनुमंडलीय समिति ने रद्द किया है। फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट में है और बेदखल वाले फैसले पर रोक है। आगे जो कोर्ट का दिशा-निर्देश होगा, उस दिशा में काम किया जाएगा। जबकि झारखंड वन अधिकार मंच के संयोजक मंडली के सदस्य, जॉर्ज मोनीप्पल्ली विभाग के इस बयान से सहमत नहीं है। वो कहते हैं, कोई भी वन अधिकार दावे को अंतिम रूप से स्वीकर करना या उसे रद्द का अधिकार सिर्फ जिला स्तरीय समिति को होता है। ग्राम सभा कोई भी दावे को निरस्त या स्वीकृत करने के लिए अनुसंशा कर सकती है। अपने स्तर पर रद्द नहीं कर सकती है।


कोर्ट के आदेश आने के बाद गांव में सभाएं कर ग्रामीणों को एकजुट किया जा रहा है। पर्चा और पंपलेट बांटे जा रहे हैं, जिनमें "ग्रामसभा से सभी पारित वनाधिकार दावों को स्वीकृत कर उनका पट्टा देना होगा, वनाधिकार कानून के तहत वनभूमि के दावेदारों का बेदखली करना बंद करो, पैसा एवं वनधिकार कानून को सख्ती से लागू करो" आदि के मांग चस्पा है।

झारखंड आदिवासी विकास समिति के अध्यक्ष प्रभाकर नाग कहते हैं, "हमें अपनी लड़ाई एकजुट होकर और कानून संबद्ध लड़नी है। संगठनों के माध्यम से मैं गांव का भ्रमण कर रहा हूं और जल, जंगल और जमीन को लेकर जो मांग है उसे गाने-बजाने के साथ नुक्कड़ कर उन तक पहुंचा रहा हूं। इसमें मधु मंसूरी जी का गीत (गांव छोड़ब नाही, जंगल छोड़ब नाही...) काफी कारगार साबित हो रहा है।"

गीत के सहारे आंदोलन का संदेश

इस तरह के गीतों से जो माहौल बनाया जा रहा है उससे एक बात तो साफ है कि सरकार और न्यायालय के आदेश के खिलाफ इन लोगों में काफी रोष है। सवाल है कि जब केंद्र सरकार के दखल के बाद कोर्ट ने अपने आदेश पर अगले 10 जुलाई तक रोक लगा दी है तो फिर आंदोलन की तैयारी क्यों?

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इस पर प्रभाकर नाग कहते हैं, "इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने चार बार सुनवाई की। एक बार भी सरकार का कोई प्रतिनिधि वहां मौजूद नहीं था। सरकार ने अपना पक्ष तक नहीं रखा। अब जब चुनाव का समय आया तो इसमें दखल किया जाता है। हम लोग आंदोलन अपनी मांग को लेकर कर रहे हैं, और करें क्यों नहीं, कोर्ट ने आदेश पर रोक लगाया है न कि हमारे पक्ष में फैसला सुनाया है।"


इसी सवाल पर संजय बसु मल्लिक कहते हैं, "आंदोलन अगर होता है तो इसकी वजह यह भी है कि सरकार ने इतने बड़े मामले पर चुप्पी क्यों साधी रखी? इसे नजर अंदाज क्यों किया? आदेश के बाद जब देश में भर में हंगामा हुआ तो चुनाव को देखते हुए सिर्फ मामले को टालने की कोशिश की गई जबकि इसे हल करना चाहिए था। जिन 11 लाख लोगों का दावा रद्द किया उसे कानून संबंद्ध फिर से जांच करवाना चाहिए था। मेरा मानना है कि झारखंड में होने वाले लोकसभा और विधानसभा दोनों ही चुनाव में यह एक अहम मुद्दा होगा।"

वनधिकार 2006 अधिनियम कहता है कि जंगलों में रहने वाले वन आश्रितों को 31 दिसंबर 2005 से पहले कम से कम तीन पीढ़ी से निवास करने का सबूत देना होता है। इन्हें इसके लिए वन भूमि पर घर, खेत आदि दिखाना पड़ता है। 2011 की जनगनणा के अनुसार भारत में अनुमानित 104 मिलियन आदिवासी हैं लेकिन सिविल सोसाइटी समूहों का अनुमान है कि वन क्षेत्रों में 1,70,000 गांवों में रहने वाले अनुसूचित जनजातियों और अन्य वासियों को मिलाकर लगभग 200 मिलियन लोग हैं, जो भारत के भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 22 प्रतिशत हिस्सा कवर करते हैं।

राजनीतिक मुद्दा बनेगा?

नेशनल अलायंस फॉर पीस एंड जस्टिस के संस्थापक बिरेंद्र कुमार बताते हैं, "पदयात्रा के दौरान जंगल जमीन से जुड़े कई गीत गाते हुए हमलोग रांची पहुंचे थे. लेकिन उसमें सबसे अधिक 'गांव छोड़ब नाही, जंगल छोड़ब नाही...गाया गया। अब इस गीत को गांव में होने वाली सभाओं सुना जा रहा है। आदिवासियों को लेकर सरकार की नियत स्पष्ठ हो गई है। हमें अब इंतजार नहीं करना है। गांव छोडब नहीं, जंगल छोडब नहीं..., का संदेश अब गांव गांव पहुंचना है।"


अगर अगली सुनवाई में कोई फैसला वन-आश्रितों के पक्ष में नहीं आता है तो झारखंड का आदिवासी समाज सबसे अधिक प्रभावित होगा, क्योंकि जंगलों रहने वाली अधितर आबादी इन्हीं की बताई जाती है।

झारखंड की राजनीति को नजदीक से समझने और आदिवासी मुद्दें पर काम करने वाले वरिष्ठ पत्रकार फैसल अनुराग कहते हैं, "इस पूरे प्रकरण का असर लोकसभा चुनाव पर निश्चित पड़ेगा। झारखंड में जंगल पर अधिकार की लड़ाई लंबे वक्त से चली आ रही है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को आदिवासी अपनी अस्मिता से जोड़कर देख रहा है। उन्हें लग रहा है कि उनके अधिकार छीने जा रहे हैं। और जिस तरह फैसले में सरकार की भूमिका निष्क्रिय रही है वो आगामी चुनावों में बीजेपी के खिलाफ जा सकती है।"


फैसल अनुराग का मानना है कि सीएनटी-एसपीटी एक्ट और भूमि अधिग्रहन को लेकर झारखंड सरकार पहले ही आदिवासियों के प्रतिरोध का सामना चुकी है। ऐसे में जंगल से बेदखल करने वाले फैसले पर सरकार की चुप्पी ने उसके लिए एक बड़ी राजनीतिक मुश्किल खड़ी कर दी है।

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मधु मंसूरी का जो गीत इन दिनों झारखंड के कस्बों में सुना जा रहा है उसे 2007 में राष्ट्रीय पुरस्कृत फिल्म मेकर मेघनाथ ने लिखा है। उनके मुताबिक जब इसे लिखकर इन्होंने मधु मंसुरी को दिखाया तो उन्होंने अपने हिसाब से इसमें कई फेरबदल किए। इसके बाद यह गीत तो राज्य का सबसे लोकप्रिय क्रांतिकारी गीत बन गया। बाद में इस पर सवा पांच मिनट की म्यूजिक फिल्म बनाई गई, जिसमें गांव, जंगल, पहाड़ और प्राकृतिक संपदा को बचाने की लड़ाई लड़ रहे आदिवासियों का प्रतिरोध दिखाया गया है। बताया जाता है कि ये गाना इतना लोक्रप्रिय हुआ की कई देशों में गया और सुना गया। अब एक फिर से यह गीत झारखंड के गांव कस्बों में गाया-सुना जा रहा है।

(ये स्टोरी एनएफआई मीडिया फैलोशिप प्रोग्राम 2019-20 के तहत प्रकाशित की गई।)

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