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भारत में रोजाना 43 बच्चों की सड़क हादसों में होती है मौत, क्या इन मौतों को रोका जा सकता है?

देश में सड़कों के निर्माण के समय अगर बच्चों की जरूरतों को ध्यान में रखा जाए तो बच्चों की ये मौतें रुक सकती हैं। अभी देश में रोजाना सड़क हादसों में 43 बच्चों की मौत होती है।

भारत में रोजाना 43 बच्चों की सड़क हादसों में होती है मौत, क्या इन मौतों को रोका जा सकता है?बच्चों के लिए सड़क पर काम नहीं करने वाली चीजें लाल फ्रेम में कैद हो गईं। फोटो- हर्षल बोपर्डीकर / डब्ल्यूआरआई इंडिया

प्रियंका सुल्खूलान

आज के भारत में हर घर के फैसले बच्चों की जरूरतों के हिसाब से लिये जाते हैं। बच्चे फैसले लेने की प्रक्रिया में हर स्तर पर केन्द्रीय भूमिका में होते हैं। जहां भारतीय परिवार अपने घर की डिजायन तैयार करते वक्त बच्चों की आवश्यकताओं को प्राथमिकता देते हैं, वहीं नगरों की योजना बनाने वाले लोग इस भावी पीढ़ी की जरूरतों को ध्यान में नहीं रखते।

शहर हर किसी के रहने लायक होने चाहिये, मगर सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण वह आने वाली पीढ़ी है जो इन शहरों में पले-बढ़ेगी। नगर में रहने जा रहे लोगों की बात सुनना किसी शहर के डिजायन को समावेशी बनाने की दिशा में पहला कदम है। पिछले एक दशक के दौरान 'डिजायन थिंकिंग' प्रणाली का चलन बढ़ा है। इस प्रणाली में मानव-केन्द्रित नजरिये और सहानुभूति को डिजायन तैयार करने के प्राथमिक जरिये के तौर पर देखा जाता है। डब्ल्यूआरआई (वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टिट्यूट) की एक टीम ने नवंबर 2019 में गुरुग्राम नगर निगम के सहयोग से एक वॉकिंग वर्कशॉप आयोजित की थी, ताकी सड़कों के युवा उपयोगकर्ताओं की बात सुनी जा सके और शहर की सड़कों का सबसे बेहतर डिजायन तैयार हो।

शहरों का डिजायन तैयार करते वक्त दो अन्य महत्वपूर्ण बातों को भी जेहन में रखना होगा। पहला, अनेक शोधकर्ता और बाल मनोविज्ञानियों की राय है कि एक बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिये उसका अपने घर के बाहर अच्छा, समय बिताना बहुत जरूरी है। बच्चे अपने घर के बाहर समाज और जीवन के बारे में अनेक रचनात्मक क्षमताएं और कौशल अर्जित करते हैं। लिहाजा,सड़कों की डिजायन और नगरीय ढांचा तैयार करने की प्रक्रिया में उनकी बात को शामिल करना और भी जरूरी हो जाता है। दूसरा, भारत में रोजाना सड़क हादसों में औसतन 43 बच्चों की मौत होती है, लिहाजा सड़कों का डिजायन तैयार करते वक्तं उनकी जरूरतों का ख्याल नहीं रखे जाने से ऐसी ही और भी त्रासद घटनाएं होती रहेंगी।

शहरी क्षेत्र में बच्चों की जरूरतों पर आधारित किस्म की जगहों के निर्माण का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इससे बच्चों को अपनी आवाज उठाने का मौका मिलता है। ये ऐसे निर्मित स्थल हैं जो संरक्षित और टिकाऊ होने के साथ-साथ सुरक्षित और स्वतंत्र अनुभव भी देते हैं।

शहरी डिजायन प्रथाओं में बच्चों की जरूरतों पर विचार किया जाना चाहिए। फोटो- प्रियंका सुलखलान / डब्ल्यूआरआई इंडिया

वर्ष 1996 में यूनिसेफ और यूएन-हैबिटेट द्वारा शुरू किये गये चाइल्ड फ्रेंडली सिटीज इनीशियेटिव में कहा गया है कि किसी शहर की डिजायन तैयार करते वक्त इस बात को ध्यान में रखना एक मार्गदर्शक सिद्धांत होता है कि बच्चों को अपनी राय रखने का अधिकार मिले। साथ ही वे उन निर्णयों पर असर डाल सकें, जो खुद उन्हें सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं।

शहरों को बच्चों के लिए बेहतर बनाने का मतलब है कि वे सभी के लिए अच्छे शहर साबित होंगे। सड़क सुरक्षा संबंधी वैश्विक लोकोपकारी संगठन एफआईए फाउंडेशन के विजन जीरो फॉर यूथ इनीशिएटिव के तहत डब्ल्यूआरआई इंडिया ने गुरुग्राम में स्कूलों के आसपास सड़कों की डिजाइन के रूपांतरण की पहल की एक परियोजना शुरू की है। इसमें बच्चों की चहलकदमी या चलने-फिरने में उत्पन्न होने वाली चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करते हुए अधिक सुरक्षित ढांचे को शामिल किया गया है।

इन मसलों का समाधान करने से बच्चों को सड़कों का इस्तेमाल करने और नगरीय ढांचे से खुद को जोड़ने में मदद मिलेगी।

इस पहल के एक हिस्से के तौर पर हमने गुरुग्राम नगर निगम और राहगीरी फाउंडेशन नामक एनजीओ के साथ मिलकर एक वर्कशॉप का आयोजन किया। यह कार्यक्रम संबंधित पक्षों द्वारा मिलकर विचार मंथन करने और समझे जाने वाले मुद्दों पर आधारित उपयोगी जानकारी हासिल करने के लिए आयोजित किया गया था। यह वर्कशॉप गुरुग्राम के तीन स्कूलों के बच्चों को साथ लेकर आयोजित किया गया था ताकि शहर की सड़कों को बच्चों की नजर से देखा जा सके। स्ट्रीट डिजाइन विशेषज्ञों ने इस आयोजन को युवा प्रतिभागियों के साथ-साथ गैर तकनीकी पृष्ठभूमि वाले हित धारकों को ध्यान में रखकर तैयार किया था।

वयस्क लोगों के साथ स्कूल के बच्चों ने एक स्कूल के आसपास एक-एक किलोमीटर के चार अलग-अलग रास्तों पर चहल कदमी की और अपनेप्रत्यक्ष अनुभवों को दर्ज किया। सामान्य सी तकनीक, जैसे कि हरे कार्डबोर्ड का फ्रेम (यह जाहिर करने के लिए कि उन्हें क्या पसंद है) और लाल फ्रेम (यह दिखाने के लिए कि उन्हें क्या नहीं पसंद है) का इस्तेमाल करके उन समूहों से अपनी-अपनी प्रतिक्रिया देने को कहा गया।

बच्चों तथा वयस्क लोगों जिनमें स्कूल के छात्र और उनके माता-पिता से लेकर रेजिडेंशियल वेलफेयर एसोसिएशन के सदस्य शामिल थे, उन्हें चार पूर्व निर्धारित रास्तों पर ले जाया गया। हर समूह के साथ एक स्ट्रीट डिजाइन विशेषज्ञ जैसे कि नगरीय डिजाइनर और योजना निर्माता कोमध्यस्थ के तौर पर साथ भेजा गया। इसके लिए जिन रास्तों को चुना गया वे अक्सर छात्रों द्वारा इस्तेमाल किये जाते हैं। इस दौरान वयस्क लोग बच्चों के पीछे रहे और बच्चों ने अपनी पसंद और नापसंद के लिहाज से सड़क के डिजाइन के विभिन्न पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अपने मोबाइल फोन से तस्वीरें खींची।

एक बच्चे के नजरिए पर विचार करना

इस कार्यक्रम में गुरुग्राम नगर निगम भी साझीदार था। उसकी तरफ से मुख्य अभियंता श्रीरमन शर्मा ने इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया। श्री शर्मा ने विभिन्न सिफारिशों की समीक्षा के लिए आयोजित विचार-विमर्श में हिस्सा लिया ताकि उन संस्तुतियों को आगे बढ़ाया जा सके। रखरखाव करने वालों, शिक्षकों और अभिभावकों ने इस वर्कशॉप के दौरान बच्चों के नजरिए को समझने की कोशिश की। वर्कशॉप के बाद वे समूह अपने-अपने अनुभव दर्ज करने के लिए इकट्ठा हुए और अपने द्वारा महसूस की गई बातों, मुद्दों और बच्चों की सिफारिशों पर आधारित संवादात्मक नक्शे एक साथ रखे।

इस कार्यक्रम में शामिल 14 साल की एक लड़की ने कहा "हम फुटपाथ पर पैदा होने वाले व्यवधान को पसंद नहीं करते क्योंकि इसकी वजह से न तो हम पैदल चल सकते हैं और ना ही साइकिल चला सकते हैं।" फुटपाथ की स्थिति को लेकर इस लड़की की बात से सहमति जाहिर करते हुए 65 साल के एक बुजुर्ग ने कहा "यह पैदल चलने वालों के लिए संकेत है कि आप फुटपाथ पर मत चलो। अगर चलो, तो अपने जोखिम पर चलो।"


फर्राटा भरते हुए वाहन बच्चों के लिए चिंता का एक आम कारण हैं। दुर्भाग्य से बच्चे अपनी तरफ आ रहे वाहन की रफ्तार और उससे अपनी दूरी को भांपने में उतने सक्षम नहीं होते। यह खतरा तब और बढ़ जाता है जब आ रहे वाहन की गति 30 किलोमीटर प्रति घंटा से ज्यादा हो।

हालांकि वयस्क वाहन चालक तेजी से गाड़ी चलाने लायक सड़कें पसंद करते हैं, मगर धीमी रफ्तार से चलने योग्य सड़कें बेहतर काम करती हैं। खास तौर पर सड़क सुरक्षा के लिहाज से। सड़क सुरक्षा को लेकर हाल में आयोजित तृतीय ग्लोबल मिनिस्टीरियल कॉन्फ्रेंस के स्टॉक होम डिक्लेरेशन में रफ्तार के प्रबंधन को लेकर एक सिफारिश की गई है, जिसके तहत शहर की सीमा के अंदर वाहनों की अधिकतम गति 30 किलोमीटर प्रति घंटा निर्धारित की गई है।

वर्कशॉप के दौरान यह देखा गया कि जहां बच्चे सड़कों पर अधिक संवादात्मक हरे-भरे स्थान चाहते हैं,ताकि हम उसे इस्तेमाल कर सकें और उससे जुड़ाव महसूस कर सकें। वहीं, वयस्क प्रतिभागियों का ध्यान वाहनों की रफ्तार कम करने के लिए यातायात नियमों को लागू करने पर केंद्रित था। भले ही दोनों नजरिए अलग-अलग रहे हों लेकिन उनका ध्यान सड़कों पर वाहनों की रफ्तार में कमी लाने पर था। मुख्य अभियंता ने कार्यक्रम में सामने आए विचारों को सुना और जरूरी कदम उठाने के प्रति संकल्पबद्धता जताई। इसके साथ ही वॉक शॉप कार्यक्रम का समापन हुआ।

आगे का रास्ता : मुख्य निष्कर्ष

सड़कों के युवा उपयोगकर्ताओं के साथ सहभागिता के मॉडल के रूप में इस पूरी प्रक्रिया के तीन मुख्य निष्कर्ष थे। पहला, बच्चों की सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए किसी प्रणाली में प्रत्यक्ष और स्वतंत्र सहभागिता का शामिल होना जरूरी है, जिसमें डेटा हासिल करने की नवोन्मेषी प्रणालियों के जरिए स्वत: स्फूर्त ढंग से दर्ज किए गए अनुभव शामिल हों। इसके अलावा बच्चों से संबंधित नजरिए को अमलीजामा पहनाने के लिए देखभाल करने वाले लोगों, शिक्षकों, सिविल सोसाइटी के सदस्यों तथा कार्यदायी एजेंसियों के दृष्टिकोण को भी जानना जरूरी है।

परिवर्तन जो बच्चे चाहते हैं। स्केच- हर्षल बोपर्डीकर / डब्ल्यूआरआई, इंडिया

तीसरा, एक ठोस समाधान प्राप्त करना जैसे कि एक कार्यक्रम के अंत में हस्तक्षेप परियोजना तैयार करने से यह तय नहीं होता कि वह मॉडल कामयाब है।वॉकशॉप के आयोजन का उद्देश्य युवाओं और बुजुर्गों समेत सड़कों के उपयोगकर्ताओं को सड़कों के साथ जोड़ने और जमीनी मुद्दों का स्वयं जायजालेने तथा निर्णय निर्माताओं के साथ बातचीत शुरू करने का मौका देना था। खास तौर से युवा पीढ़ी के लिए सुरक्षित आवागमन प्रणाली विकसित करने के उद्देश्य से ठोस उपायों के निर्माण के लिए इस तरह के कार्यक्रमों की एक श्रंखला की जरूरत होगी। डब्ल्यूआरआई-इंडिया भविष्य में भी ऐसी और गतिविधियां आयोजित करेगा।

अनुवाद- इंदु सिंह

(स्टोरी साभार WRI India, आप मूल स्टोरी यहां पढ़ सकते हैं।)

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