आखिर क्यों स्वास्थ्य सेवाओं में फिसड्डी है उत्तर प्रदेश   

आखिर क्यों स्वास्थ्य सेवाओं में फिसड्डी है उत्तर प्रदेश   उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य व्यवस्था बेहाल 

लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार और स्वास्थ्य विभाग की लाख कोशिशों के बाद भी प्रदेश में स्वास्थ्य व्यवस्था की हालत अभी सुधरती नहीं दिख रही है। हाल ही में नीति आयोग की रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को सबसे फिसड्डी बताया गया है।

नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार हेल्थ इंडेक्स पर 80 अंकों के स्कोर के साथ बड़े राज्यों में केरल का प्रदर्शन सर्वश्रेष्ठ है जबकि 33.69 अंकों के साथ उत्तर प्रदेश सबसे फिसड्डी है। यूपी का यह स्कोर बड़े व छोटे राज्यों और सभी केंद्र शासित प्रदेशों में न्यूनतम है।

लखनऊ के बख्शी का तालाब ब्लॉक में सेवा अस्पताल के पास रहने वाले अवधेश कुमार (30 वर्ष) सामुदायिक स्वस्थ्य केंद्र पर अपनी पत्नी का इलाज करवा रहे हैं। उन्होंने बताया, “मेरी पत्नी के गर्भवती होने के बाद से मैं लगातार उसका इलाज इसी सरकारी अस्पताल में करवा रहा हूं। अब तक पूरे नौ महीनों में कई बार डॉक्टर ने बाहर से दवाई लिखी है। अस्पताल के सामने ही मेडिकल स्टोर है डॉक्टर बोलते हैं वहीँ से दवाई ले लो। शायद अस्पताल में दवाई नहीं है यही सोच कर बाहर से दवाई ले लेता हूं।

उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 821 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं जहां पर एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में कुल 30 बेड हैं यानि पूरे प्रदेश के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में कुल 24630 बेड हैं। प्रदेश में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र 3621 हैं और कुल बेड की संख्या 14484 है।

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वर्ष 2016 में देश के स्वास्थ्य बजट के मुकाबले बजट में 27 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की गई है, फिर भी स्वास्थ्य सेवाएं विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुरूप नहीं आ रही हैं। वर्ष 2016 में देश का बजट 37061.55 करोड़ रुपए था जो कि बढ़कर वर्ष 2017 में 47352.51 करोड़ रुपए कर दिया गया था। वर्ष 2017 के स्वास्थ्य बजट में मानव संसाधन और चिकित्सा शिक्षा के लिए 3425 करोड़ रुपए, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के लिए 2903.73 करोड़ रुपए, जो कि पिछले वर्ष एक मुकाबले 705 करोड़ रुपए ज्यादा है, प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के लिए 1525 करोड़ और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के लिए 357 करोड़ रुपए दिए गए। वर्ष 2018-019 के बजट में बढ़ोत्तरी की गई है।

उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में रहने वाली सुनीता (40 वर्ष) लीवर में संक्रमण के बाद अपने पति के इलाज के लिए लखनऊ के एक बड़े निजी अस्पताल पहुंची थीं। लखनऊ में एसजीपीजीआई और देश के सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज में शामिल किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज (केजीएमसी) में ना जाकर वहीं क्यों गईं, इस सवाल के जवाब वह जो जवाब देती हैं, वो कई सवाल खड़े करता है।

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“सरकारी अस्पताल ले जाते तो ये (पति) मर ही जाते। पहले पर्चा बनवाने के लिए लाइन, फिर डॉक्टर को दिखाने के लिए लाइन। डॉक्टर ने जांच लिखी है, तो फिर लाइन में। जांच रिपोर्ट की लाइन, फिर डॉक्टर को उसे दिखाने की लाइन। इतने में तो गंभीर मरीज की जान चली जाएगी।” सुनीता यहीं नहीं रुकतीं, वह बताती हैं, “लोग अस्पताल आराम करने तो आते नहीं, जब कोई मामला गंभीर होता है, तभी आते हैं, और वहां इतने झंझट होते हैं। मेरे पति की हालत गंभीर थी, अगर सरकारी अस्पताल ले जाती तो बचते नहीं। सरकारी अस्पताल सस्ते हैं तो मगर लाइनें बहुत होती हैं।”

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 में सरकारी अस्पतालों में प्रति 1000 व्यक्तियों पर दो बेड की योजना बनाई गई है, जबकि हकीकत में बिल्कुल ऐसा नहीं है। इतना ही नहीं, नेशनल हेल्थ प्रोफाइल 2017 की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में 19,561 लोगों पर सिर्फ एक डॉक्टर है।

एक रिपोर्ट के अनुसार लोग प्राइवेट अस्पतालों के लिए 64,628 करोड़ रुपये खर्च करते हैं जबकि सरकारी अस्पतालों पर 8,193 करोड़ रुपये ही खर्च किये जाते हैं। इसके अलावा 18,149 करोड़ रुपये रोगी परिवहन सेवाओं पर खर्च करते हैं। सरकारी वित्त पोषण सहित सभी राजस्व स्रोतों को ध्यान में रखते हुए, निजी अस्पतालों पर खर्च 88,552 करोड़ रूपये और सरकारी अस्पतालों पर 41,797 करोड़ रूपये था।

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उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं के फिसड्डी होने के बारे में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन उत्तर प्रदेश के सचिव डॉ. राजेश सिंह ने बताया, “उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में सच में फिसड्डी है। उत्तर प्रदेश में अगर गाँव का व्यक्ति बीमार होता है और वह प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर जाता है तो उसका इलाज सही तरीके से नहीं हो पाता है।

प्राथमिक स्वस्थ्य केन्द्रों पर अच्छे डॉक्टर ही नहीं होते हैं। इससे व्यक्ति की बीमारी सही ही नहीं हो पाती है और वह इधर-उधर दौड़ता है। गाँव में होने वाली गन्दगी को अगर खत्म कर दिया जाये तो आधे से ज्यादा बीमारी खुद सही हो जाएंगी। अगर गोरखपुर की बात करें तो वहां पर इतनी जयादा बीमारियां हैं लेकिन प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था सही नहीं है, इसलिए व्यक्ति समय से अपना इलाज नहीं करवा पाता है। प्रदेश में लागातार डॉक्टरों की कमीं बरकरार है इसलिए इलाज नहीं हो पाता है। जब डॉक्टर ही नहीं हैं तो उत्तर प्रदेश हमेशा फिसड्डी बना रहेगा।”

उन्होंने आगे बताया, “उत्तर प्रदेश के स्वस्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह को इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के द्वारा स्वास्थ्य समस्याओं के निवारण की बारे में जानकारी दी है। डॉक्टरों की कमीं से लड़ने के लिए सरकार को प्राइवेट डॉक्टर के साथ मिलकर काम करना चाहिए और उनका बनने वाला मानदेय उन्हें देना चाहिए। प्राइवेट डॉक्टर इंडियनम मेडिकल एसोसिएशन के द्वरा सरकार को दिए जायेंगे, जिससे लोगों का बेहतर इलाज हो सके।”

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स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी 2015 के अनुसार, देश में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) में 83 फीसदी चिकित्सा पेशेवरों और विशेषज्ञों की कमी है। इंडियास्पेंड के विश्लेषण वर्ष 2015 रिपोर्ट के अनुसार, सीएचसी में उत्तर प्रदेश में चिकित्सकों की 86.7 प्रतिशत कमी है। इसके अलावा बाल रोग विशेषज्ञों की 80.1 प्रतिशत और रेडियोग्राफर की 89.4 प्रतिशत कमी है।

राज्य और उनकी रैंक

राज्य और उनको नीति आयोग के सूचकांक से मिली रैंक की बात करें तो केरल को पहली, पंजाब को दूसरी, तमिलनाडु को तीसरी, गुजरात को चौथी, हिमाचल प्रदेश को पांचवी, महाराष्ट्र को छठवी, जम्मू कश्मीर को सातवीं, आंध्रप्रदेश को आठवीं, कर्नाटक को नवीं, पश्चिम बंगाल को दसवीं, तेलंगना को ग्यारवीं, छत्तीसगढ़ को बारहवीं, हरियाणा को तेरहवीं, झारखंड को चौदहवीं, उत्तराखंड को पंद्रहवीं, असम को सोलहवीं, मध्य प्रदेश को सत्रहवीं, उड़ीसा को अट्ठारहवीं, बिहार को उन्नीसवीं, राजस्थान को बीसवीं और उत्तर प्रदेश को इक्कीसवां स्थान दिया गया है।

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केंद्र शासित क्षेत्रों में लक्षद्वीप को पहली रैंक, चंडीगढ़ को दूसरी, दिल्ली को तीसरी, अंडमान निकोबार को चौथी, पांडुचेरी को पांचवीं, दमन और द्वीप को छठवी और दादरा नगर हवेली को सातवीं रैंक दी गई है।

उत्तर प्रदेश के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ. पद्माकर सिंह ने बताया, “उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा राज्य है और सबसे ज्यादा जनसंख्या यहीं पर है इसलिए बीमारियां तो होंगी ही। उत्तर प्रदेश सबसे फिसड्डी नहीं बहुत सारे काम स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए किये जा रहे हैं। आने वाले समय में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देखने को मिलेंगीं।”

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