किसान दिवस विशेष: जलवायु परिवर्तन जैसे समस्याओं से जूझते किसानों की जिम्मेदारी कौन लेगा?

किसान ही है जो वैश्विक संकटों से मुक्ति दिला सकता है क्योंकि लगभग आधी धरती की देखभाल किसान ही करते है या अन्न का उत्पादन करते हैं।

किसान दिवस विशेष: जलवायु परिवर्तन जैसे समस्याओं से जूझते किसानों की जिम्मेदारी कौन लेगा?

गुंजन मिश्रा

किसान किसी भी तरह से बॉर्डर पर खड़े जवानों से कम नहीं है। क्योंकि किसान भी हर मौसम में प्रकृति के नियमों के अनुसार अगर खेती करता है तो पंचतत्वों के प्रत्येक तत्व को व्यवस्थित रखता है। इसलिए जिस तरह देश की सुरक्षा महत्वपूर्ण है उससे कहीं ज्यादा धरती व् प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा है। देश में इसके अलावा सुरक्षित रखने के लिए और क्या है।

खेती एक बुनियादी मसला है। देश व विश्व को प्रत्येक दृष्टिकोण से खुश हाल बनाने के लिए भारत ही नहीं विश्व की सरकारों को प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की जिम्मेदारी लेनी होगी। इस मुद्दे पर किसानो को अनदेखा नहीं किया जा सकता। क्योंकि किसान ही है जो वैश्विक संकटों से मुक्ति दिला सकता है क्योंकि लगभग आधी धरती की देखभाल किसान ही करते है या अन्न का उत्पादन करते है। इन वैश्विक समस्याओं को हल करने के लिए सरकार किस तरह किसानों को प्रोत्साहित करती है इसमें सरकार की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है।

इन समस्याओं में हाल ही में सबसे बड़ा खतरा जलवायु परिवर्तन को लेकर है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन न सिर्फ पर्यावरणीय घटकों को प्रभावित करता है बल्कि अनाज की पोषकता को भी प्रभावित करता है। इसकी वजह कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा वातावरण में कार्बनिक और अकार्बनिक तत्वों व यौगिकों के वितरण को भी प्रभावित करती है।

कार्बन उत्सर्जन के मामले में चीन और अमेरिका के बाद भारत तीसरे स्थान पर है। यदि भारत से जुड़े आंकड़ों पर गौर करें तो पर्यावरण के जो सात संकेतक चुने गए है उसमें से कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के मामले में भारत ने निर्धारित सीमा को पार कर लिया है। गौरतलब है कि प्रति व्यक्ति हर वर्ष कार्बन उत्सर्जन के लिए 1.6 टन की सीमा तय की गई है जबकि भारत हर वर्ष प्रतिव्यक्ति 1.7 टन कार्बन उत्सर्जन कर रहा है। शोध के मुताबिक बढ़ते तापमान के साथ मिट्टी की कार्बन भंडारण क्षमता घटती जाएगी, जिसका असर पृथ्वी की जलवायु पर भी पड़ेगा।


सरकारों को चाहिए कि आज आवश्यकता और लालच के बीच जो जमीन आसमान का फर्क है उसको विस्तृत रूप से समझाने की इसमें सिर्फ किसान ही शामिल नहीं है बल्कि देश का वह हर उद्योगपति भी शामिल है जिसका व्यापार प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है।

हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने गुजरात के किसानों से धरती माता की सेवा के लिए प्राकृतिक खेती अपनाने की सलाह दी। क्योंकि कृषि भूमि में जैविक कार्बन की मात्रा उचित रखने पर असमानता और गरीबी को कम करने के साथ-साथ वैश्विक तापमान लक्ष्य को पूरा किया जा सकता है व टिकाऊ खेती खाद्य श्रृंखला को छोटा करती है जो अनाज की बर्बादी और लंबी दूरी के परिवहन को रोककर किसानो की आमदनी को बढ़ाती है।

किसान आंदोलन इस बात का प्रमाण है कि देश का किसान परेशान है तभी वह लगभग वर्ष भर दिल्ली के किनारे डटे रहे। हालांकि मोदी सरकार कि अनेक योजनाए किसानों की आमदनी दाोगुनी करने के लिए चल रही है। इसमें मृदा स्वास्थ योजना को नकारा नहीं जा सकता है। क्योंकि भारत में 71.4 % कृषि भूमि मध्यम क्षारीय हो चुकी है, इतना ही नहीं 48.5 % क्षेत्र में नाइट्रोजन की मात्रा बहुत कम और 33% में कम है |

फॉस्फोरस व पौटेशियम 41% व 47% मध्यम, 16% व 31% कृषि भूमि में ज्यादा पाया गया है और सूक्ष्म तत्वों में बोरॉन 22%, आयरन 35%, सल्फर 25% व जिंक 33% की कमी कृषि भूमि में पायी गयी है। इसलिए किसानों को चाहिए की सबसे पहले प्रधानमंत्री द्वारा शुरू की गयी मृदा स्वस्थ योजना के माध्यम से अपने खेतों की मिट्टी का स्वास्थ्य समझे तभी देश को समृद्ध व सुखी बनाया जा सकता है। क्योंकि डार्विन के सिद्धांत के अनुसार जलवायु संकट को हल करने के लिए किसान की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। इस सिंद्धांत के अनुसार एक साथ रोपित प्रजातियों का मिश्रण अक्सर एकल रूप से रोपित प्रजातियों की तुलना में अधिक मजबूती से बढ़ता है। यानी हमारे देश में जो किसान बर्षो से बहुफसली खेती करते थे उसको डार्विन जैसा वैज्ञानिक भी सही मानता था।


आज के समय "जय जवान जय किसान" के नारे में किसानों की स्थिति देखते हुए किसानों की जय कहीं नहीं दिखाई देती है सही अर्थों में देखा जाए तो सरकार अपनी योजनाओं के माध्यम से पहले यह बात सुनिश्चित करे कि देश में किसान हैं। इसलिए देश के किसानो को बचाने के लिए यानी देश की धरती सजाने के लिए, प्रकृति व आम लोगों को स्वस्थ रखने के लिए, देश को स्थाई तौर पर फिर से सोने की चिड़िया बनाने के लिए देश के नीति निर्माताओं की नीतियों के केंद्र में किसानों को जगह मिलने चाहिए। लेकिन हरित क्रांति की तरह नहीं क्योंकि पंजाब से निकलने वाली कैंसर ट्रेन देश के प्रत्येक राज्य से न निकलने लगे इससे देश वासियों को बचा कर रखना होगा। इसके लिए विज्ञान को मानवता के साथ जिम्मेदारी से काम करने की जरूरत है। इस काम में किसानो को भी चाहिए की सरकार की मदद करें, इसके लिए सबसे पहले कृषि वैज्ञानिकों को एक ऐसा मॉडल खेती का तैयार करना होगा जो मानवीय आधार पर प्राकृतिक नियमो के अनुसार हो।

हालांकि आजकल देश में जीरो बजट खेती की बात हो रही है, लेकिन यह खेती प्रत्येक कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए व्यावहारिक है की नहीं यह चिंतन करने की बात है। क्योंकि योजना आयोग ने 15 कृषि-जलवायु क्षेत्रों को बांटा है इसको आगे 73 उप क्षेत्र में विभाजित किया गया है। जीरो बजट खेती के अनुसार कृषि में फसल मिट्टी से केवल 1.5 से 2 % प्रतिशत पोषक तत्व लेती है शेष 18 प्रतिशत हवा, पानी और सौर्य ऊर्जा से मिलते है। अतः किसान को अपने खेत का प्राकृतिक वातावरण संतुलित रखना होगा | कुल मिलाकर खेती के लिए नीतिया ऐसी हो जिसमे प्राकृतिक संतुलन हो जिससे किसान स्वाबलंबी या स्वायत्त हो सके। ये जिम्मेदारी सरकारों को लेनी होगी तभी किसान अपनी जरूरते समझ सकेगा या पूरी कर सकेगा। क्योंकि कृषि जीवन प्रक्रियाओं का प्रबंधन करती है और पृथ्वी, पौधों और जानवरों के बीच में संतुलन को बढ़ावा देती है। अतः खेती के लिए उचित स्थानीय वातावरण देना मुख्य है इसीलिए खेत में ताप, दाब, आद्रता आदि की बहुत बड़ी भूमिका होती है। इसके लिए कृषि भूमि के अनुसार बीज, खाद, खेत में पेड़ पौधे, तालाब आदि का होना भी आवश्यक हो जाता है।

सरकार की जिम्मेदारी :- हालांकि सरकार के द्वारा मृदा स्वास्थ योजना, नीम कोटेड यूरिया, प्रसंस्करण यूनिट लगाने के लिए आर्थिक मदद आदि कई योजनाए किसानो की आय बढ़ाने एवं जैव विवधता को संरक्षित रखने के लिए चलायी जा रही है। लेकिन सरकार यदि निम्न योजनाओं पर भी ध्यान देगी तो किसानो का जीवन जल्दी से बेहतर हो सकेगा।

  • रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, बीज आदि को दी जाने वाली छूट उन किसानों को दी जाए जो अपने बनाए (देशी ) बीज, खाद, कीटनाशक व पशुओ को प्रयोग में लाते है।
  • देश के खनिज, वन, जल का अंधाधुंध दोहन हो रहा है उसक सीधा असर किसानी पर पड़ता है। इसलिए कॉर्पोरेट की सामाजिक जिम्मेदारी के पैसे से एक किसान कल्याण निधि बनायी जाए।
  • किसानों को वर्गीकृत करके जो किसान परिवार सीधे कृषि क्षेत्र से जुड़े है उनको 60 वर्ष की आयु के बाद किसान कल्याण निधि से पेंशन की व्यवस्था की जाए।
  • किसानों के लिए अलग बजट बने
  • सरकारी कार्यालयों में किसानो के लिए सिंगल विंडो की व्यवस्था की जाए व सम्मान मिले।
  • सामूहिक खेती को बढ़ावा दिया जाए।
  • कृषि वैज्ञानिकों को आत्मनिर्भरता, उत्पादकता, उर्वरता, पर्यावरणीय संतुलन, व किसान परिवार की समृद्धि के अनुसार प्राकर्तिक खेती के लिए फार्म डिज़ाइन को बढ़ावा दिया जाए।
  • सरकार को चाहिए कि गांव स्तर पर प्राकृतिक संसाधनों को लेकर एक ऑडिट करवाया जाय जिसमे वाटर बजट, इकोलॉजिकल फुट प्रिंट आदि शामिल किया जाए।

उपरोक्त योजनाओं को लागू करने पर पर्यावरण संरक्षण के साथ किसानो की ये जरूरते भी जैसे किसान बाजार, खेत पर प्रोसेसिंग यूनिट, बाग़, खेत तालाब, भंडारण, मौसम संबंधी समस्याएं, नीति निर्माण में भागीदारी, बीज, जल, खाद, ऊर्जा में आत्मनिर्भरता आदि पूरी हो सकेगी इस तरह देश को सुरक्षित व् खुशहाल करने व रखने में हम सफल हो पाएंगे एवं वसुधेव कुटुंबकम व सर्वे भवतु सुखिनः के सिद्धांत का पालन भी कर सकेंगे।

(गुंजन मिश्रा पर्यावरणविद् हैं और यह उनके निजी विचार हैं।)

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