देश में नया श्रम कानून लागू, मगर मजदूरों के हाथ खाली

हमारे देश में मजदूरों के लिए पुराने चार श्रम कानूनों की जगह पर नया श्रम कानून 'वेजस कोड बिल' लागू हो चुका है मगर नया कानून लागू होने के पांच महीने बाद भी मजदूरों के हाथ पहले की ही तरह खाली हैं।

Kushal MishraKushal Mishra   2 Jan 2020 12:58 PM GMT

देश में नया श्रम कानून लागू, मगर मजदूरों के हाथ खाली

"नये श्रम कानून में सरकार अगर देश में मजदूरों की 178 रुपए कम से कम मजदूरी तय कर रही है, तो सीमेंट की बोरी ढोने वाले हम जैसे मजदूरों को दिन भर काम के बाद 250 रुपए मजदूरी मिलती है, अब आप बताइये इतनी महंगाई में 250 रुपए दिहाड़ी पर घर चलता है क्या?, तो 178 रुपए पर क्या कहेंगे," यह कहना है मजदूर दल्ला मीना का, जो राजस्थान के उदयपुर जिले के एक छोटे से शहर सलुम्बर के चौकी नाका क्षेत्र में मजदूरी करते हैं।

हमारे देश में मजदूरों के लिए पुराने चार श्रम कानूनों की जगह पर नया श्रम कानून 'वेजस कोड बिल' लागू हो चुका है मगर नया कानून लागू होने के पांच महीने बाद भी मजदूरों के हाथ पहले की ही तरह खाली हैं।

नये श्रम कानून में मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी 178 रुपए प्रति दिन और 4628 रुपए प्रति माह दिया जाना तय किया गया है। ऐसे में देश के कई राष्ट्रीय मजदूर संगठन और ट्रेड यूनियन सरकार की इस न्यूनतम मजदूरी के खिलाफ विरोध जता रहे हैं और 08 जनवरी को मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी के साथ नए श्रम कानून में अपनी मांगों को लेकर देशव्यापी प्रदर्शन करेंगे।

इस कानून में न्यूनतम मजदूरी के साथ ही देश के मजदूरों को एक समान वेतन देने, निर्धारित सीमा से अधिक काम करने पर दोगुनी दर पर मजदूरी देने और तय समय में मजदूरी देने की सीमा भी तय की गई है। ऐसे में 'गांव कनेक्शन' ने नये श्रम कानून पर अलग-अलग राज्यों के मजदूरों और मजदूर संगठन के लोगों से बातचीत की जिस पर न्यूनतम मजदूरी को लेकर उन्होंने अपनी बात सामने रखी।

मजदूर दल्ला मीना कहते हैं, "मेरे साथ मेरी पत्नी भी मजदूरी करती है। वो बोरी ढोने और गारा बनाने का काम करती है तब जाकर दोनों के 350 से 400 रुपए बनते हैं और परिवार किसी तरह चल पाता है। कभी अगर ज्यादा पैसों की जरूरत होती है तो कुछ न कुछ गिरवी रख कर ही पैसा मिलता है, मगर ठेकेदार उधार तक नहीं देते, बहाने बनाते हैं।"

'कभी तय मजदूरी नहीं होती'


महाराष्ट्र के नांदेड़ जिले के तरायबाड़ी ग्राम पंचायत में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के मजदूर सहायक शेख मलंग 'गांव कनेक्शन' से बताते हैं, "कभी मजदूर 200 रुपए में मिल गया तो कभी 250 रुपए में, कभी तय मजदूरी नहीं होती। काम के आधार पर भी मजदूरी तय होती है। जैसे मिस्त्री के काम में यहां 200 रुपए मजदूरी मिलती है तो महिलाओं को 150 रुपए तक। पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को हमेशा से ही कम मजदूरी मिलती रही है। मजदूरों को कम से कम इतना पैसा मिलना ही चाहिए कि उनका परिवार ठीक से पल सके।"

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देश के मजदूर संगठन सरकार से मांग कर रहे हैं कि 15वें भारतीय श्रम सम्मेलन में देश के मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी को लेकर एक मानक तय किया गया है। इसमें तय किया गया कि एक मजदूर की मजदूरी उसके परिवार में शामिल तीन इकाइयों के भोजन के बराबर होनी चाहिए।

ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) की महासचिव अमरजीत कौर 'गांव कनेक्शन' से फोन पर बताती हैं, "देश के सभी मजदूर संगठनों ने इस भारतीय श्रम सम्मेलन में न्यूनतम मजदूरी के मानकों ने सर्वसम्मति से अपनाया था। इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट और सरकार ने भी न्यूनतम मजदूरी के इन मानकों पर अपनी सहमति जताई थी, तो फिर 178 रुपए न्यूनतम मजदूरी क्यों?"

'न्यूनतम मजदूरी 375 रुपए देने की सिफारिश की'

अमरजीत कहती हैं, "प्रधानमंत्री मोदी सरकार ने भी न्यूनतम मजदूरी के लिए एक विशेषज्ञ कमेटी का गठन किया था, जिसने मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी 375 रुपए प्रति दिन दिए जाने की सिफारिश की थी, लेकिन सरकार अब अपने ही बात से मुकर रही है।"

श्रम मंत्रालय के अनुसार देश में 50 करोड़ संगठित और असंगठित क्षेत्र के मजदूर हैं। वहीं आर्थिक सर्वेक्षण 2019 के अनुसार देश में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की संख्या 93 प्रतिशत है। इनमें 77.3 प्रतिशत को सही समय पर मजदूरी और छुट्टी नहीं मिलती और 69 फीसदी को कोई सामाजिक सुरक्षा का लाभ नहीं मिलता है।

नए श्रम कानून में न्यूनतम मजदूरी के साथ सरकार ने निर्धारित समय से ज्यादा काम करने पर दोगुनी दर पर मजदूरी देने का भी प्रावधान किया है। मगर ज्यादा समय तक काम करने पर भी मजदूरों के हाथ ज्यादा पैसे नहीं लगते।

गुजरात के अरावल्ली जिले के मेघराज गांव में भवन निर्माण से जुड़े मजदूर सुरेश कुमार बताते हैं, "अगर सरकार कहती है कि मजदूर ओवरटाइम काम करता है तो मजदूरी दोगुनी मिलनी चाहिए, अब हमें 300 रुपए दिहाड़ी मिलती है, हमारे काम में कभी-कभी ऐसा होता है कि काम उसी दिन ही पूरा करना पड़ता है, तो ज्यादा देर काम करना पड़ता है, मगर ज्यादा से ज्यादा मालिक से चाय-पानी मिल जाता है या खाना खिला दिया, इससे ज्यादा कुछ नहीं।"

'किस आधार पर तय की गई न्यूनतम मजदूरी'


इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस के अध्यक्ष डॉ. जी. संजीवा रेड्डी 'गांव कनेक्शन' से बताते हैं, "नये श्रम कानून में मजदूरों को ओवरटाइम दोगुनी दर पर मिले और पुरुषों-महिलाओं को एक समान मजदूरी मिले, हम इसका समर्थन करते हैं, मगर हमारा विरोध एक मजदूर की न्यूनतम मजदूरी को लेकर है, सरकार ने 178 रुपए किस आधार पर तय किया है। एक मजदूर को कम से कम 350 से 400 रुपए तो मिलने ही चाहिए इसीलिए देश के सभी मजदूर संगठन आठ जनवरी को पूरे देश में हड़ताल करने जा रहे हैं। देश के मजदूरों के लिए सरकार को हमारी मांगें माननी पड़ेंगी।"

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वहीं अगर देश में महंगाई की बात करें तो बीते नवंबर महीने में खुदरा महंगाई दर में खासी बढ़ोत्तरी दर्ज की गई थी। अक्टूबर में जो खुदरा मुद्रा स्फीति दर 4.62 प्रतिशत थी, वही नवंबर में 5.54 फीसदी हो गई। इस तरह नवंबर में खुदरा महंगाई दर बीते तीन सालों में सबसे ऊपर पहुंच गई।

खुदरा महंगाई दर में यह इजाफा प्याज, टमाटर और अन्य सब्जियों की कीमतों में बढ़ोत्तरी के कारण देखने को मिला। आंकड़ों के अनुसार शहरी और ग्रामीण, दोनों ही क्षेत्रों में सब्जियों की महंगाई बढ़कर 36 प्रतिशत तक हो गई।

उत्तर प्रदेश के वाराणसी के कज्जाकपुरा में एक कारखाने में पीतल की डलिया बनाने वाले एक युवा मजदूर सूरज कुमार (23 वर्ष) बताते हैं, "हम जैसे मजदूरों को तो एक डलिया बनाने में 15 रुपए तक मिल जाते हैं, तो एक दिन में 130-150 रुपए तक कमा पाते हैं। अब भला 150 रुपए में क्या होता है। मेरा बड़ा भाई शहर में मजदूरी करता है, तब जाकर घर चल पाता है।"

'सरकार को स्पष्ट करना चाहिए'

न्यू ट्रेड यूनियन इनीशिएटिव के महासचिव गौतम मोदी 'गांव कनेक्शन' से फोन पर बताते हैं, "सरकार को यह बताना चाहिए कि देश के मजदूरों के लिए 178 रुपए न्यूनतम मजदूरी किस आधार पर तय की गई है। वेतन आयोग की ओर से जो न्यूनतम मजदूरी तय की गई है वह 18,000 रुपए मासिक है यानी 600 रुपए प्रति दिन है, ऐसे में आज की महंगाई को देखते हुए 178 रुपए कैसे तय किया गया है।"

गौतम मोदी कहते हैँ, "इसलिए देश के मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी के साथ ट्रेड यूनियन कानून, मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर तमाम मजदूर संगठन आठ जनवरी को देशव्यापी विरोध जताने जा रहे हैं। हमारी सरकार से मांग है कि आज बदलती परिस्थितियों को देखते हुए सरकार श्रम कानून के एक-एक मुद्दे पर मजदूर संगठनों के साथ विस्तृत चर्चा करे ताकि देश के करोड़ों मजदूरों को बेहतर जिंदगी जीने का मौका मिल सके।"

सरकार ने नए श्रम कानून में पुरुषों और महिलाओं को एक समान मजदूरी दिए जाने की बात कही है, मगर महिलाओं और पुरुषों की मजदूरी में काफी अंतर सामने आता है।

झारखंड के बोकारो जिला के पिटरबार गांव में शटरिंग का काम करने वाले मजदूर कुलेश्वर करमाली बताते हैं, "कभी गांव में शटरिंग का काम करते थे, तब 300 रुपए तक दिहाड़ी मिल जाती थी, लेकिन फिर रांची में आ गया क्योंकि यहां उसी काम के 400 रुपए तक मिल जाते हैं तो घर-बार चल पाता है।" कुलेश्वर कहते हैं, "महिलाएं गांव में घर पर ही रहती है, सीजन के समय ज्यादा से ज्यादा खेतों में काम कर लिया तो 100-150 रुपए तक मिल जाते हैं, तब परिवार चलता है।"

न्यूनतम मासिक आय पाने वाले 72 फीसदी भी नहीं


हाल में श्रम मंत्रालय के सामयिक श्रम बल सर्वे में सामने आया कि भारत में 45 फीसदी कामगारों का वेतन 10 हजार रुपए से भी कम है, वहीं 32 फीसदी महिला कामगारों को 5000 रुपए से भी कम वेतन मिलता है। इस सर्वे में 2.46 लाख ग्रामीण और 1.86 लाख शहरी कामगार शामिल रहे। अध्ययन में सामने आया कि सातवें वेतन आयोग की ओर से निर्धारित की गई न्यूनतम मासिक आय (18,000 रुपए) पाने वाले लोग 72 फीसदी भी नहीं हैं।

महाराष्ट्र के नांदेड़ जिले के लोहा तालुका में सहायक मजदूर गोविंद गाडेकर बताते हैं, "मेरी तालुका में ज्यादातर महिलाएं मनरेगा के काम में हैं क्योंकि कम से कम महिलाओं को वहां 206 रुपए तक तो मिल जाते हैं। बाकी निर्माण कार्य के काम में यहां बहुत मजदूर हैं जिसमें पुरुषों को 300 तो महिलाओं को सिर्फ 150 रुपए मिलते हैं। ऐसे में महिलाएं मनरेगा में ज्यादा जुड़ती हैं।"

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ग्रामीण स्तर पर खेतिहर मजदूरों के हालात भी अच्छे नहीं है। उत्तराखंड और बिहार में काम की तलाश में गांव से मजदूर शहरों की ओर पलायन कर गए हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में खेतों में काम करने के लिए किसानों को मजदूर तक नहीं मिल रहे।

बिहार के पश्चिमी चंपारण के नटकरियागंज के किसान दीपेंद्र दुबे बताते हैं, "आज से दो साल पहले तक तो खेतों में काम करने के लिए 150 रुपए में मजदूर मिल जाते थे, मगर पलायन की वजह से आज मजदूरी 300 रुपए प्रति दिन की है। महिलाओं की मजदूरी भी 250 से 300 रुपए में हैं क्योंकि मजदूरों की बहुत कमी है इस क्षेत्र में।"

दीपेंद्र बताते हैं, "महंगाई बढ़ी है और 178 रुपए न्यूनतम मजदूरी तय किया जाना सही नहीं है। आज हम लोगों को खेतों के लिए मजदूर चाहिए ही, ऐसे में हम जैसे किसान मजदूरों के लिए दोपहर में भोजन की सुविधा देते हैं ताकि खेतों में समय पर और सही से काम हो सके, वरना किसानों की खड़ी फसल बर्बाद हो जाएगी। जरूरी है कि मजदूरों को अच्छा मेहनताना मिल सके।"

वहीं मध्य प्रदेश के बेतुल जिले के किशनपुर गांव में खेतिहर मजदूर अंतिम मालवीय बताते हैं, "मैं और मेरा भाई नारायण दोनों मिलकर खेतों में काम करते हैं तब जाकर 400 रुपए यानी 200 रुपए एक को मिलता है दिन का। और इसी काम के लिए महिलाएं 100 से 180 रुपए तक पाती हैं। मगर इतनी महंगाई में इतनी मजदूरी काफी नहीं है परिवार का पेट पालने के लिए।"

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