"नौकरी के लिए घूस देना पड़ता है, होता है यौन शोषण"

जम्मू और कश्मीर में 14 जनवरी से राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत काम करने वाले कर्मचारी हड़ताल कर रहे हैं। पिछले तीन सालों में दो लाख 75 हज़ार कर्मचारी पूरे देश में लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। बड़े पैमाने पर हो रहे विरोध के बावजूद संविदा कर्मचारियों की हालत जस-की-तस बनी हुई है। स्वास्थ्य कर्मचारियों की इन हड़तालों की क्या वजहें हैं?

Pragya BhartiPragya Bharti   14 Feb 2019 12:26 PM GMT

नौकरी के लिए घूस देना पड़ता है, होता है यौन शोषणजम्मू और कश्मीर में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के संविदा कर्मचारी 14 जनवरी 2019 से हड़ताल पर बैठे हैं। साभार- फेसबुक/All NHM EMPLOYEES J&K

लखनऊ।

"हर साल नौकरी ज़ारी रखने के लिए एक टेस्ट होता है, इसे अप्रेज़ल कहते हैं, इसमें पास होने के लिए पैसे देने पड़ते हैं, औरतों का यौन शोषण होता है,"- रजनी (बदला हुआ नाम)।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के तहत रजनी मध्य प्रदेश के बुराहनपुर जिले के एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में संविदा कर्मचारी हैं। संविदा नौकरी पक्की नौकरियां नहीं होतीं, इन्हें अस्थाई रूप से रखा जाता है और इस कारण कर्मचारियों का शोषण होता है।

जम्मू और कश्मीर राज्य में पिछले एक महीने से स्वास्थ्य सेवाएं ठप्प पड़ी हैं क्योंकि एनएचएम कर्मचारी हड़ताल पर हैं। वहीं अब तक भारत के कई राज्यों में एनएचएम के लाखों संविदा कर्मचारी हड़ताल कर चुके हैं। एनएचएम के तहत आने वाली मुश्किलों, संविदा कर्मचारियों की समस्याओं और मांगों को जानने के लिए गाँव कनेक्शन संवाददाता ने अलग-अलग राज्यों में इनसे बात की।

रजनी फोन पर बताती हैं, "रात में 7-8 बजे तक अधिकारी ऑफिस में संविदा महिला कर्मचारियों को रोक कर रखते हैं, कौन सा अप्रेज़ल इतनी रात ऑफिस में होता है? कोई भी आगे आकर ये नहीं कहेगा क्योंकि सबके परिवार हैं, साथ ही नौकरी तो करनी ही है, जो कि इन अधिकारियों पर ही निर्भर करती है, वो जब चाहे हमें निकाल देते हैं। दस-बारह साल हो जाते हैं नौकरी करते हुए फिर भी अप्रेज़ल में बैठना होता है, ये खत्म होना चाहिए।"

हालांकि रजनी संविदा कर्मचारी के तहत जिस पद पर हैं, उनका हर साल अप्रेजल नहीं होता, वो पांच सालों से पांच हज़ार रुपए प्रति माह तनख्वाह पर काम कर रही हैं, लेकिन जो एएनएम हैं या एनएचएम के तहत काम करने वाले और कर्मचारी हैं, सबको इस अप्रेज़ल के नाम पर शोषण सहना पड़ता है।

जो बात रजनी कहती हैं, वही गाँव कनेक्शन से फोन पर बात करते हुए राहुल जैन बताते हैं, "हमारी नौकरी अस्थाई है, हर साल एक टेस्ट होता है जिसमें 65 नंबर नहीं आए तो हमें नौकरी से निकाल दिया जाता है। हमें सीनियर अधिकारियों को घूस देना पड़ता है, महिला कर्मचारियों का दैहिक शोषण भी होता है।"

राहुल मध्य प्रदेश के शाजापुर जिले में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम- नेशनल हेल्थ मिशन) के तहत डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम मैनेजर के पद पर कार्यरत हैं। वो बताते हैं, "राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत काम करने वाले लगभग सभी कर्मचारियों की हालत बहुत खराब है। कोई नियमावली नहीं होने के कारण एनएचएम में भ्रष्टाचार बहुत है। आईएएस, मंत्री सब मिले हुए हैं। संविदा कर्मचारियों को गुलाम समझा जाता है, मीटिंग में उन्हें कह दिया जाता है कि दो मिनट में नौकरी से निकाल दिया जाएगा। कोई भरोसा नहीं है कि कब तक नौकरी है।"

वो आगे बताते हैं, "साल 2005 में मैंने 22 हज़ार रुपए से नौकरी शुरू की थी और अब मेरा वेतन 48 हज़ार है, वहीं मेरे साथ स्थाई पद पर नौकरी शुरू करने वाले कर्मचारी 20 हज़ार रुपए पाते थे और अब उनका वेतन एक-सवा लाख तक पहुंच गया है। जो संविदा एएनएम हैं वो 8 से 10 हज़ार रुपए पाती हैं, वहीं स्थाई एएनएम का वेतन 40 हज़ार रुपए तक है।"

राहुल जैन आगे बताते हैं, "काम के घंटों का कोई वक्त भी तय नहीं है, 12 से 14 घंटे तक काम करना पड़ता है। साल भर में केवल 13 छुट्टियां मिलती हैं वो भी कभी-कभी नहीं मिल पाती हैं। जो लोग अधिकारियों की चापलूसी करते हैं वो आगे बढ़ते हैं बाकी सब वहीं के वहीं हैं।"

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वहीं जम्मू और कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में एडमिनिस्ट्रेशन मैनेजमेंट स्टॉफ में कार्यरत अल्ताफ भट्ट 15 सालों से यहां नौकरी कर रहे हैं, वो बताते हैं, "राज्य में एनएचएम कर्मचारी 14 जनवरी से हड़ताल कर रहे हैं और पिछले 4-5 दिनों से डिविज़नल प्रसिडेंट (मंडल अध्यक्ष), कुछ डॉक्टर्स और एसोसिएट्स भूख हड़ताल पर हैं, वे अमरण अनशन कर रहे हैं।"

भट्ट बताते हैं, "बीते साल 2018 में भी राज्य में 34 दिनों की हड़ताल हुई थी, जिसके बाद सरकार ने आश्वासन दिया था कि संविदा के तहत अस्थाई कर्मचारियों को उनके वेतनमान के अनुसार स्थाई नौकरी दी जाएगी, लेकिन अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है। सरकार और एसोसिएशन के बीच एमओयू भी साइन हुआ था जिसके तहत 1024 कर्मचारियों को स्थाई नौकरी देने की बात थी लेकिन अभी तक किसी की नौकरी पक्की नहीं हुई है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत अस्थाई नौकरी पर काम करते हुए लोगों को 10 से 15 साल बीत चुके हैं, लेकिन सुविधाओं के नाम पर उनके पास कुछ नहीं है। हमारा वेतन बहुत कम है, नौकरी सुरक्षित नहीं है। सरकारी नौकरियों में जगह खाली हैं, हमें लिया जा सकता है। हर साल 31 मार्च के बाद हमारा कॉन्ट्रेक्ट जांचा जाता है, अगर ये रिन्यू होता है तो नौकरी मिलती है नहीं तो नहीं।"

जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में अमरण अनशन कर रहे एनएचएम कर्मचारी। फोटो साभार- सोशल मीडिया

हरियाणा राज्य की पंजाब बॉर्डर से लगे कैथल जिले में मेंटल हेल्थ प्रोग्राम में कार्यरत डॉ. विनय गुप्ता कहते हैं कि एनएचएम के तहत पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं क्योंकि सभी की समस्याएं लगभग एक जैसी हैं।

"सबसे बड़ी समस्या है कि हमारी नौकरी सुरक्षित नहीं है। हमारा वेतन बहुत कम है, हमारी योग्यता स्थाई कर्मचारियों जितनी ही है लेकिन हमारे और उनके वेतन में बहुत फर्क है। जो सुविधाएं उन्हें मिलती हैं जैसे कि छुट्टियां और बाकी भत्ते वो हमें नहीं मिलते।"

एनएचएम कर्मचारियों का हड़ताल करना भी उनके लिए खतरा है। 5 फरवरी 2019 से हरियाणा में चल रही हड़ताल में शामिल 146 कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया है। 14 फरवरी को भिवानी जिले के मेंबर सेक्रेटरी और सिविल सर्जन द्वारा जारी आधिकारिक पत्र में ये कहा गया कि हड़ताल में शामिल 146 एनएचएम संविदा कर्मचारियों का कॉन्ट्रेक्ट तत्काल आदेश से खत्म किया जा रहा है।

हरियाणा के भिवानी जिले के मेंबर सेक्रेटरी और सिविल सर्जन द्वारा जारी आधिकारिक पत्र की प्रति। साभार- योगेश उपाध्याय

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के गोमती नगर विस्तार में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, मलेशिमो गांव में कार्यरत डॉ. योगेश उपाध्याय कहते हैं कि जब राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन शुरू हुआ तो कहा गया था कि राज्य सरकार के अंतर्गत आने वाले कर्मचारियों को मिलने वाली सुविधाएं एनएचएम कर्मचारियों को दी जाएंगी। ये योजना पहले पंचवर्षीय योजना के तौर पर शुरू की गई थी, कहा गया कि पहले कर्मचारियों को अस्थाई नौकरी पर रख लीजिए फिर धीरे-धीरे इन्हें स्थाई किया जाए पर ऐसा कुछ हुआ नहीं, कर्मचारियों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया, न ही आजतक किसी प्रदेश में कोई पॉलिसी बनी कि किसका क्या वेतनमान होगा, न ही कोई नियमावली (गाइडलाइन) तैयार की गई।

योगेश बताते हैं कि साल 2011 में सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश जारी किया कि एनएचएम कर्मचारियों को स्थाई किया जाए। इसके बाद साल 2016 न्यायालय ने पत्र जारी कर कहा कि कर्मचारियों का वेतन बढ़ाया जाए लेकिन राज्य सरकार ने ऐसा नहीं किया। 2008 में एक स्थाई एएनएम का वेतन 8000 था तो संविदा वाले का 7-7500 था लेकिन अब स्थाई एएनएम का वेतन 70-80 हज़ार पहुंच गया है और संविदा एएनएम अभी भी 13-13500 पर काम कर रही है।

वो आगे बताते हैं कि भाजपा की तरफ से उन्हें आश्वासन दिया गया था कि सरकार बनने पर संविदा कर्मचारियों को स्थाई नौकरी दी जाएगी, उनकी समस्याओं का निदान किया जाएगा लेकिन सरकार बने इतना समय बीत जाने पर भी कुछ नहीं हुआ।

सांसद कौशल किशोर द्वारा उत्तर प्रदेश के एनएचएम कर्मचारियों को जारी आश्वासन। साभार- योगेश उपाध्याय

मध्यप्रदेश के टीकमपुर जिले में निवाड़ी कस्बे के सरकारी अस्पताल में काम करने वाले अनूप पटेल बताते हैं कि साल 2016 में कई कर्मचारियों को निकाल दिया गया था। वह 10 सालों से संविदा की नौकरी कर रहे हैं। हर साल 5 प्रतिशत वेतन बढ़ता है। एनएचएम में स्टॉफ नर्स की 18-20 हज़ार रुपए तनख्वाह है, वहीं स्थाई नर्स को 35 से 40 हज़ार रुपए तक मिलते हैं।

उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र जौरही में काम करने वाली डॉ. अर्चना भारती कहती हैं कि हमारी नौकरी का कोई भरोसा नहीं है। अभी हमारे पास नौकरी है कहो दो मिनिट बाद हमारे पास नौकरी न रहे, कभी भी हमें निकाला जा सकता है। साल भर का कॉन्ट्रेक्ट होता है।

वो आगे कहती हैं कि हर राज्य में हमारा वेतनमान अलग है। स्थाई कर्मचारियों को मिलने वाला वेतन तो हमसे बहुत ज़्यादा है ही हमारी ही पोस्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों को अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग वेतन दिया जाता है। बिहार में संविदा कर्मचारियों का वेतन 35 हज़ार है, उत्तर प्रदेश में 30 हज़ार, मध्यप्रदेश में कुछ और है तो किसी और राज्य में कुछ और। ये केन्द्र सरकार की योजना है तो सबका वेतनमान एक जैसा होना चाहिए।

"हमें पढ़ाई के लिए एज्यूकेशन लीव नहीं मिलती है यानी कि अगर कोई नौकरी के साथ आगे पढ़ना चाहे तो नहीं पढ़ सकता। जो ग्रेजुएशन किए हुए है वो उसके आगे पढ़ ही नहीं पाता क्योंकि अगर उसे पढ़ना है तो नौकरी छोड़नी होगी और फिर कोई भरोसा नहीं है कि उसे दोबारा नौकरी मिलेगी या नहीं। साथ ही जब स्थाई नौकरियों अगर निकलती हैं तो हम संविदा डॉक्टर्स को सीनियोरिटी का वैटेज नहीं दिया जाता, इसका मतलब है कि वो अगर 5 साल से नौकरी कर रहे हैं तो उन्हें इसके कोई नंबर नहीं मिलते जबकि पैरामेडिकल कर्मचारियों को वैटेज दिया गया है,"- डॉ.अर्चना आगे बताती हैं।

गाँव कनेक्शन ने सरकार का पक्ष जानने के लिए एनएचएम अधिकारियों से बात करने की कोशिश की। उत्तर प्रदेश के एनएचएम मिशन निदेशक श्री पंकज कुमार के दफ्तर में 4 बार फोन करने पर पता चला कि वे चारों बार मीटिंग व्यस्त हैं। मध्यप्रदेश के मिशन निदेशक डॉ. बी एम चौहान भी मीटिंग में व्यस्त थे। वहीं स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के प्रिंसिपल सेक्रेटरी श्री प्रशांत त्रिवेदी की पीए ने कहा कि एनएचएम कर्मचारियों से संबंधित बात मिशन निदेशक ही बता सकते हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के केन्द्रीय दफ्तर में फोन करने पर फोन को इधर से उधर दूसरे अधिकारियों के पास ट्रांसफर किया गया लेकिन किसी भी अधिकारी ने सरकार का पक्ष पेश नहीं किया।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत लाखों कर्मचारी संविदा यानी अस्थाई नौकरियों पर काम कर रहे हैं, जिनका भविष्य हर पल दांव पर लगा है, नौकरी का कोई भरोसा नहीं है, काम बहुत ज़्यादा और वेतन बहुत कम है।

5 फरवरी से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के गुरूग्राम शहर में लगभग 600 एनएचएम कर्मचारी धरना दे रहे हैं। 8 फरवरी को सरकार ने एक आदेश जारी कर कहा कि जो भी विरोध प्रदर्शन का हिस्सा है उसे नौकरी से निकाला जाएगा। इसके एक दिन बाद 6 फरवरी को हरियाणा के फतेहाबाद में एनएचएम कर्मचारियों ने हड़ताल की। अक्टूबर, 2018 में राष्ट्रीय स्तर पर हुई हड़ताल के दौरान देश के लगभग 28 हज़ार एनएचएम कर्मचारी शामिल हुए थे, इनमें डॉक्टर्स, पैरामेडिकल स्टॉफ, नर्स, मैनेजमेंट स्टॉफ, एएनएम, लैब टेक्नीशियन, फार्मासिस्ट आदि एनएचएम के अंतर्गत आने वाले सभी कर्मचारी शामिल थे।

21 जनवरी 2019 को उत्तर प्रदेश में एनएचएम कर्मचारियों ने हड़ताल की। अंग्रेज़ी न्यूज़ वेबसाइट 'डाउन टू अर्थ' के मुताबिक राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत काम करने वाले दो लाख 75 हज़ार कर्मचारी 2016 से अभी तक लगातार पूरे देश में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

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5 नवंबर 2018 को उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन संविदा कर्मचारी संघ द्वारा प्रदेश सरकार को एक पत्र लिखा गया, इसके मुताबिक उत्तर प्रदेश में एनएचएम कर्मचारियों की ये मांगे हैं-

1. समान कार्य-समान वेतन

प्रदेश सरकार के स्थाई कर्मचारियों जितना ही काम करने के बावजूद संविदा कर्मचारियों को उनके मुकाबले बहुत कम वेतन मिलता है। साथ ही समय पर वेतन भुगतान की बात भी इसमें कही गई है। इस ही के साथ संविदा कर्मचारी विशिष्ट सेवा नीति (मानव संसाधन नीति) की मांग करते हैं। संविदा कर्मचारियों की नौकरियां सुरक्षित नहीं हैं, उन्हें कभी भी नौकरी से निकाला जा सकता है। इसे सुरक्षित करने और मानव संसाधन की नीतियों को लागू करने की मांग कर्मचारी करते हैं।

2. आउट सोर्सिंग/ठेका प्रथा पर रोकथाम

एनएचएम के तहत ब्लॉक प्रोग्राम मैनेजर व अन्य संविदा नौकरियां ठेकेदारों द्वारा नियुक्त की जाती हैं। सरकार ठेकेदारों से जुड़कर उन्हें कर्मचारी रखने को कहती है, इस कारण लोगों का शोषण होता है। इसे खत्म करने की मांग कर्मचारी करते हैं।

3. संविदा कर्मचारियों का स्थाई समायोजन एवं नवीन पद सृजन

संविदा कर्मचारियों को स्थाई नौकरी देने और पद नहीं होने पर नए पद बनाने और सभी को स्थाई नौकरी देने की मांग कर्मचारी करते हैं।

4. आशा

आशा कर्मचारियों को कम से कम 10,000 रुपए मासिक मानदेय देने और उन्हें स्थाई नौकरी देने की मांग कर्मचारी करते हैं।

योगेश उपाध्याय बताते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर भी राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के संविदा कर्मचारी मुख्य रुप से यही मांगें करते हैं।

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