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महिला और बाल विकास मंत्रालय के बजट में बढ़ोत्तरी का दावा, क्या है सच्चाई?

वित्त वर्ष 2021-22 के लिए महिला और बाल विकास मंत्रालय को 24,435 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया। जबकि एक फ़रवरी 2020 को पेश बजट में इस विभाग को 30,007.10 करोड़ दिया गया था। हालांकि इस राशि को संशोधित अनुमानों में घटाकर 21,008.31 करोड़ रुपए कर दिया गया था। यानी पिछले साल की बजट घोषणाओं से यह राशि 18.5% कम है जबकि संशोधित अनुमानों की तुलना में यह राशि 16% अधिक है।

Neetu SinghNeetu Singh   3 Feb 2021 4:29 PM GMT

महिला और बाल विकास मंत्रालय के बजट में बढ़ोत्तरी का दावा, क्या है सच्चाई?कोरोनाकाल में महिलाओं और बच्चों को सबसे ज़्यादा सरकारी मदद की ज़रूरत थी तब आवंटित बजट में 30% की कटौती कर दी गयी.

अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने महिला सशक्तिकरण और अधिकारों की तो बात की मगर उनके बजट सरकार की वो प्रतिबद्धता महिलाओं के लिए नज़र नहीं आती है।

इस बजट में महिला एवं बाल विकास विभाग के लिए वित्त वर्ष 2021-22 के लिए 24,435 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है। यह राशि संशोधित अनुमानों की तुलना में 16% अधिक तो है लेकिन पिछले साल की बजट घोषणाओं की तुलना में ये 18.5% कम है। आपको बता दें कि एक फ़रवरी 2020 को पेश बजट में महिला और बाल विकास विभाग के लिए 30,007.10 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया था। लेकिन संशोधित अनुमानों में इस बजट में लगभग 30% की कटौती कर दी गई। वो भी तब जब देश में कोरोनावायरस महामारी अपने चरम पर थी और महिलाओं और बच्चों को सरकारी मदद की ज़्यादा ज़रूरत थी। पिछले बजट के संशोधित अनुमानों का विवरण, वित्त वर्ष 2021-22 के बजट दस्तावेज़ों में ही सामने आया है।

साल 2020 में कोरोनावायरस महामारी की वजह से लगे लॉकडाउन के दौरान महिलाओं को कई तरह की मुसीबतों का सामना करना पड़ा। ग़ैर सरकारी संगठनों की रिपोर्ट के मुताबिक, लॉकडाउन में महिलाओं पर घरेलू काम का बोझ बढ़ गया था, घरेलू हिंसा के मामलों में बढ़ोत्तरी आई, बड़ी संख्या में कामकाजी महिलाओं का रोज़गार छिन गया, उन्हें सेनेटरी नेपकिन जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए मुश्किलों का सामना करना पड़ा। इसके अलावा देश के कई राज्यों से बच्चों की तस्करी और बाल श्रम के मामले बढ़े। यानी जिस मुश्किल वक्त में महिलाओं और बच्चों को ज़्यादा सरकारी मदद की ज़रूरत थी, तब महिला और बाल विकास के बजट में कटौती की गई।

ये चंबल क्षेत्र के वो महिला और बच्चे हैं जो आज भी महिला एवं बाल विभाग की योजनाओं से वंचित हैं. फोटो : नीतू सिंह

लंबे समय जेंडर मुद्दों पर काम कर रहे भोपाल के सचिन जैन ने गाँव कनेक्शन को फोन पर बताया हैं, "इस पूरे मुद्दे पर सरकार का ओरिएंटेशन ही नहीं हैं। कोविड के दौरान गर्भवती महिलाओं को देखरेख की सबसे ज्यादा जरुरत थी, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के बजट को वित्त वर्ष 2020-2021 में 2,500 करोड़ रुपए से संशोधित करके 1,300 करोड़ कर दिया। सरकार ने इस बार के बजट में कुछ नये नाम के साथ कई सारी स्कीमों को एक साथ कर दिया है पर कहीं भी इसका ज़िक्र नहीं हैं कि किस योजना के लिए कितना बजट खर्च होगा।"

सचिन मध्य प्रदेश में बच्चों और महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था 'विकास संवाद' के निदेशक हैं। सचिन जैन कहते हैं, "वित्त वर्ष 2020-21 में आंगनवाड़ी सेवाओं के लिए 20,532.38 करोड़ रुपए जारी किया गया था इस बार केंद्र सरकार ने इसे पोषण अभियान में मिला दिया है और इसे सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 कहा जा रहा है जिसमें अंब्रेला आंगनवाड़ी सेवाएं, पोषण अभियान, किशोरियों के लिए योजना और राष्ट्रीय क्रेच योजना शामिल हैं। इनके लिए 20,105 करोड़ रुपए आवंटित किए गये हैं जो काफी कम हैं।"

बजट 2021-2022 में 'सामर्थ' एक नया नाम दिया गया है जिसमें बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना, कौशल कार्यक्रम, क्रेच, जेंडर बजट को एक साथ कर दिया गया है इसके लिए 2,522 करोड़ रुपए की राशि जारी हुई है जिसमें यह स्पष्ट नहीं है कि किस अभियान पर कितना पैसा खर्च किया जाएगा।

ग्रामीण क्षेत्रों में लंबे समय से काम कर रहीं जेंडर मुद्दों की विशेषज्ञ डॉ स्मृति सिंह कहती हैं, "जो बजट जिस विभाग के लिए जारी किया जाता है वो विभाग उस बजट को खर्च नहीं कर पाता इसकी जवाबदेही जब तक तय नहीं होगी तब तक साल दर साल ये बजट घटता रहेगा। यूपी में पिछले साल महिला हेल्प लाइन-181 सिर्फ इसलिए बंद हो गयी क्योंकि विभाग के पास बजट नहीं था। जबकि विभाग कुल जारी बजट को खर्च नहीं कर पाया।"

महिलाओं और बच्चों का एक ऐसा बड़ा तबका आज भी मूलभूत सुविधाओं से है वंचित. फोटो : नीतू सिंह

डॉ स्मृति सिंह आगे कहती हैं, "महिलाओं की सुरक्षा इस समय सबसे बड़ा मुद्दा है बावजूद इसके निर्भया फंड को आधा कर दिया गया। जेंडर ट्रेनिंग प्रोग्राम के लिए अलग से कोई बजट नहीं है। महिलाओं के स्वास्थ्य और बच्चियों की शिक्षा के लिए अलग से कोई बजट नहीं, महिला किसान के लिए अलग से बजट नहीं जबकि हर विभाग में इनके लिए अलग से बजट का प्रावधान होना चाहिए।"

वर्ष 2013 में जब निर्भया फंड की स्थापना की गयी थी तब वित्त मंत्रालय ने राज्य सरकारों को पैसा जारी करने की घोषणा की थी। उस साल निर्भया फंड में 1,000 करोड़ रुपए की राशि आवंटित की गई थी और यह भी कहा गया था कि हर साल 1,000 करोड़ रूपए इस फंड के तहत विभिन्न राज्यों को उनकी जनसंख्या, क्षेत्रफल और महिलाओं के प्रति हुए अपराध के रिकॉर्ड के अनुसार दिए जाएंगे। लेकिन साल दर साल यह राशि घटती रही और सात साल में पिछले वित्त वर्ष तक 3,024.46 करोड़ रूपये ही केंद्र सरकार जारी कर पाई।

लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय मंत्री स्मृति ईरानी ने बताया कि 2013 से अब तक निर्भया फंड में 3024.46 करोड़ रूपये जारी किए गए हैं, लेकिन इसमें से 1,919.11 करोड़ रूपए (63.45%) ही खर्च हो पाए हैं। साल दर साल महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध के बावजूद इस फंड का बजट घटता गया है, जो बजट जारी भी किया गया उसे राज्य सरकारें खर्च करने में असफल रहीं। इस वर्ष निर्भया फंड में 500 करोड़ रुपए की राशि दी गयी है।

कोविड के दौरान गर्भवती महिलाओं को देखरेख की सबसे ज्यादा जरुरत थी, इसके बावजूद बजट में हुई बड़ी कटौती। फोटो : नीतू सिंह

स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रहे रवि दुग्गल कहते हैं, "हर साल एक जेंडर बजट जारी किया जाता है जो पिछले साल दो लाख सात हजार करोड़ का था, वो इस वर्ष 35% घटा दिया गया। ये डिमांड बजट नहीं सप्लाई बजट है। कोविड में बड़ी संख्या में चाइल्ड मैरिज हुई, लड़कियों की शिक्षा प्रभावित हुई वर्तमान बजट में सरकार की मंशा ही नहीं दिखी कि इसमें सुधार के लिए अलग से कुछ बजट दिया जाए।"

कुछ ऐसा ही बाल संरक्षण के बजट के साथ किया गया। एक फ़रवरी 2020 की बजट घोषणाओं में इसके लिए 1,500 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया। लेकिन कोरोना वायरस महामारी के दौरान इसमें कटौती कर संशोधित अनुमानों में इसे 821 करोड़ रुपए कर दिया गया, वो भी तब जब देश के कई राज्यों में बच्चों की तस्करी के मामले तेज़ी से बढ़े। इस साल इस योजना का नाम बदलकर मिशन वात्सालय कर दिया गया और इसे 900 करोड़ रुपए का आवंटंन किया गया। जबकि कोरोनावायरस के इस दौर में बच्चों के संरक्षण के लिए अधिक बजट की ज़रूरत थी।

सचिन जैन कहते हैं, "इस बजट में सिर्फ नाम बदले गए हैं जबकि बजट में भारी कटौती की गयी है। इस महामारी के बावजूद बच्चों और महिलाओं के लिए विशेष बजट जारी करने की बजाए उसे कम किया गया है।"


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