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पीपीपी मॉडल का विरोध- "भारत जैसे देश में चिकित्सा को निजी हाथों में सौंपना मूर्खता होगी"

नीति आयोग ने पीपीपी (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) मॉडल के तहत निजी मेडिकल कॉलेज से जिला अस्पतालों को जोड़ने की योजना को लेकर 250 पन्नों का दस्तावेज जारी किया है

Chandrakant MishraChandrakant Mishra   9 Jan 2020 12:20 PM GMT

पीपीपी मॉडल का विरोध- भारत जैसे देश में चिकित्सा को निजी हाथों में सौंपना मूर्खता होगी

लखनऊ। "सरकार अपनी जिम्मेदारियों से पीछा छुड़ा रही है, इसलिए इस तरह के फैसले ले रही है। भारत जैसे देश में चिकित्सा को प्राइवेट हाथों में सौंपना मूर्खता होगी। अभी तो बेड नहीं मिलने पर मरीज जमीन पर लेट कर इलाज करा लेता है, लेकिन निजी हाथों में होने पर ये भी नहीं मिलेगा।" डॉक्टर अरुण गार्डे कहते हैं। डॉ. गार्डे एसोसिएशन ऑफ डॉक्टर्स फॉर एथिकल हेल्थकेयर के प्रतिनिधि हैं और पुणे में रहते हैं।

केंद्र सरकार देशभर के जिला अस्पतालों को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी में है। नीति आयोग ने पीपीपी (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) मॉडल के तहत निजी मेडिकल कॉलेज से जिला अस्पतालों को जोड़ने की योजना को लेकर 250 पन्नों का दस्तावेज जारी किया है। किसी भी जिले में इलाज की सबसे बड़ी इकाई जिला अस्पताल होते हैं।

पीपीपी की योजना अभी सुझाव के रूप मे है लेकिन इसका विरोध तेज हो गया है। जन स्वास्थ्य जैसे मुददों पर काम करने वाली संस्थाओं एसोसिएशन ऑफ डॉक्टर्स फॉर एथिकल हेल्थकेयर और जन स्वास्थ्य अभियान ने प्रस्तावित योजना के खिलाफ सरकार को पत्र लिखने का भी फैसला किया है। वहीं, नीति आयोग का कहना है कि अभी यह शुरुआती प्रस्ताव है और यह सिस्टम कैसे काम करेगा, इस पर चर्चा होनी अभी बाकी है।

" इस योजना के तहत जिला अस्पताल में कम से कम 750 बेड होने चाहिए। इसमें से कम से कम 300 बेड और बाकी के बचे बेड का 20 प्रतिशत मुफ्त में इलाज लेने वाले मरीजों के लिए आरक्षित रखने होते हैं। बाकी के बचे बेड को जिला अस्पताल को संचालित करने वाला निजी मेडिकल कॉलेज अपने हिसाब से मुहैया कराता है।" डॉ. गार्डे ने आगे बताया।

"स्वास्थ्य के क्षेत्र में पीपीपी मॉडल कारगर नहीं है। इससे पहले योजना आयोग (मौजूदा नीति आयोग) ने इस मॉडल को बढ़ावा देने का सुझाव दिया था। कर्नाटक सरकार ने वर्ष 1997 में पीपीपी के जरिए राजीव गांधी सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल शुरू किया था। इस अस्पताल का तजुर्बा यह रहा है कि भर्ती होने वाले मरीजों में गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों की तादाद घटती गई।" सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता और गरीबों को इलाज को लेकर लेकर कानूनी लड़ाई लड़ने वाले समाजसेवी अशोक अग्रवाल कहते हैं।

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देश भर में डॉक्टरों की भारी कमी है। फोटो- गाँव कनेक्शन

नीति आयोग की सिफारिशें मंजूर होती हैं तो निजी कंपनी सा संस्थान मिलकर मेडिकल कॉलेज की स्थापना और उसे चलाने के लिए भी जिम्मेदार होंगे। इसके साथ ही इन मेडिकल कॉलेज सेकेंडरी हेल्थकेयर सेंटर (गंभीर बीमारियों के लिए) को जोड़ा जा सकेगा और ये सेंटर भी निजी हाथों से नियंत्रित होंगे।

अशोक अग्रवाल के मुताबिक पीपीपी मॉडल उन देशों में सफल हैं जहां कम आबादी और पैसे वाले लोग रहते हैं। वो आगे कहते हैं, "आम जनता को सस्ता और बेहतर इलाज मुहैया कराना सरकार की जिम्मेदारी है और सरकार इसे पूरा कर पाने में नाकाम साबित हो रही है। सरकार के साथ पार्टनरशिप करके काम करने वाले प्राइवेट अस्पताल सरकारी अस्पताल का इस्तेमाल अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए करते हैं।"

दिल्ली में कई बड़े अस्पतालों ने सरकार ने सस्ती दरों पर ये कहकर जमीनें ली कि वो गरीब मरीजों के लिए बेड आरक्षित रखेंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। अशोक अग्रवाल जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसके लिए लंबी लड़ाई लड़ी।

अपने अनुभव पर वो कहते हैं, "ये कानून बनाने वाले अपना इलाज कराने तो विदेश चले जाते हैं और आम आदमी की सेहत सुधारने की बात कर रहे हैं। सरकार ने जहां-जहां इस योजना की शुरूआत की है वहां की स्थिति और खराब हो गई है। भारत जैसे देश में जहां करोड़ों लोग बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं मरहूम हैं वहां इस तरह की योजना बनाने की कोई जरुरत ही नहीं है।"

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, वर्ष 2017 के आंकड़ों के अनुसार भारत में जिला अस्पतालों की संख्या 779 है। सरकरी जिला अस्पतालों को निजी हाथों में सौंपने की संभावित योजना पर देश में वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार पत्रलेखा चटर्जी योजना के प्रभाव के बारे में कहती हैं, " सरकारी अस्पतालों को निजी संस्थाओं के हाथ में सौंपने से आम जनता को कितना फायदा होगा यह बताना अभी संभव नहीं है। लेकिन सरकार को चाहिए कि वे प्राथमिक स्वास्थ्य को पहले मजबूत करें फिर जिला अस्पतालों की तरफ कदम बढ़ाएं। ग्रामीण क्षेंत्रों में संचालित सीएचसी-पीएचसी का बहुत बुरा हाल है।"

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बेड के अभाव में एक बेड पर दो-दो मरीजों का होता है इलाज। फोटो- गाँव कनेक्शन

"इस योजना को पूरे देश में लागू करने के पहले पहले सरकार को उन प्रदेशों की स्थिति को देखना चाहिए जहां उन्होंने पहले ही सरकारी अस्पतालों को पीपीपी मॉडल पर संचालित किए हैं। अगर वहां से रिजल्ट्स सही हैं तो फिर इस योजना का लाभ निश्चित रूप से आम लोगों को मिलेगा।" उन्होंने आगे बताया।

जन स्वास्थ्य अभियान के नेशनल को-कनवेनर डॉ. अभय शुक्ला ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस को बताया, "इस नीति को लागू करने के बाद स्वास्थ्य सेवा और उसकी गुणवत्ता से समझौता करना पड़ेगा। इसका सबसे ज्यादा असर गरीबों पर पड़ेगा। हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा में निवेश की जरुरत है। किसी का यह कहना कि हमारे पास संसाधन की कमी है, यह एक हास्यास्पद तर्क है क्योंकि हमारा स्वास्थ्य सेवा खर्च दुनिया में सबसे कम है।"

नीति आयोग ने इस योजना को लेकर जो दस्तावेज जारी किए हैं, उसमें योजना में दिलचस्पी रखने वाले लोगों से प्रतिक्रिया मांगी गई है। इस माह के अंत में इन शेयर धारकों की बैठक भी आयोजित होगी। इस मसौदे के अनुसार, योजना के लागू होने से मेडिकल कॉलेजों की कमियां दूर होंगी। जिला अस्पतालों की हालत काफी अच्छी हो जाएगी।

वहीं इस मामले में निति आयोग के सदस्य डॉक्टर मदन गोपाल गाँव कनेक्शन को फोन बताया, " केंद्र और राज्य की सरकार अपने सीमित संसाधन और सीमित खर्च की वजह से चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में अंतर को खत्म नहीं कर सकते हैं। ऐसे में स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने और चिकित्सा क्षेत्र में पढ़ाई की लागत को करने के लिए यह फैसला जरूरी है।"

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