चाकू की धार पर बीत रही सिकलीगर समुदाय के बच्चों की जिंदगी

खानाबदोश सिकलीगर समुदाय, जो गुरु तेग बहादुर की सेना के लिए हथियार बनाने का दावा करता है, अब घोर गरीबी में जी रहा है और उनके बच्चे, 12 साल की उम्र में जयपुर की सड़कों पर घूमते हैं और घर चलाने के लिए चाकू की धार तेज करते हैं। लेकिन दिन ब दिन ग्राहकों की संख्या कम हो रही है, क्योंकि इन दिनों कोई भी चाकुओं में धार नहीं लगवाता है।

Madhav SharmaMadhav Sharma   5 May 2022 8:02 AM GMT

चाकू की धार पर बीत रही सिकलीगर समुदाय के बच्चों की जिंदगी

12 साल का राहुल ऐसे ही अपने कंधे पर 10 किलो का भार उठाए जयपुर की सड़कों पर काम की तलाश में घूमता रहता है। सभी फोटो: माधव शर्मा

जयपुर, राजस्थान। जयपुर से अजमेर की ओर जाने वाले राजमार्ग पर झोपड़ियों का एक समूह है। उनमें से ज्यादातर के बाहर लकड़ी के एक फ्रेम में साइकिल के पहिए से बनी कई मशीनें रखी हैं। इन्हीं से चाकुओं में धार लगाई जाती है, जो झोपड़ियों में लोगों के लिए आजीविका का स्रोत हैं।

एक झोपड़ी में 12 वर्षीय राहुल अपने पिता, एक दिहाड़ी मजदूर और उसकी माँ के साथ रहता है जो बांस की टोकरियां बुनती है। राहुल लोहारों के सिकलीगर समुदाय से ताल्लुक रखता है जो जयपुर की सड़कों पर चाकू, कैंची और खेत के औजारों को धार लगाने के लिए घूमता है। सिकलीगर समुदाय गुरु तेग बहादुर की सेना के लिए हथियार बनाने का भी दावा करता है।

राहुल हर सुबह लगभग 8 बजे रात की दो बासी रोटी को छाछ में तोड़कर खाने के बाद वह अपनी पीठ पर लगभग 20 किलोग्राम वजन वाले लकड़ी के यंत्र रखता है और भीषण गर्मी में बाहर निकल जाता है। कभी-कभी वह अपनी पीठ पर उस भार के साथ लगभग 10 किलोमीटर चलता है, उम्मीद करता है कि कहीं किसी को उसके काम की जरूरत होगी। अगर किस्मत ने साथ दिया तो वह दिन में 150 रुपए कमाकर लौटेगा।

15 साल का राजू पिछले सात साल से चाकुओं की धार तेज कर रहा है। वह कभी स्कूल नहीं गया है।

"सुबह मैं कभी सोचकर नहीं निकलता कि कहां जाऊंगा। बस स्टैंड पर जो भी बस मिलती है, उसमें बैठ जाता हूं, "राहुल ने गाँव कनेक्शन को बताया। राहुल ने आगे कहा, "और जहां मन होता है, उतर जाता हूं। कभी-कभी पैसे नहीं होने पर पैदल ही चला जाता हूं। फिर जयपुर शहर की किसी कॉलोनी की गलियों में पैदल घूमते हुए आवाज़ लगाता हूं। चाकू-छुरी, कैंची पर धार लगवा लो...।"

राहुल की तरह सिकलीगर समुदाय का 15 साल का राजू पिछले सात साल से चाकुओं की धार तेज कर रहा है। वह कभी स्कूल नहीं गया है। "हम सब मजदूरी करते हैं। मैं तो यह भी नहीं जानता कि स्कूल में भर्ती कैसे होते हैं। मेरा भी मन है कि मैं पढ़ने जाऊं और एक अच्छी जिंदगी जीऊं, लेकिन हमारे समाज में कोई पढ़ता नहीं है। बचपन से ही धार रखने या कोई दूसरी मजदूरी करने लगते हैं, "राजू ने गाँव कनेक्शन को बताया।

राजस्थान राज्य विमुक्त घूमंतु- अर्धघूमंतु कल्याण बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष गोपाल सिंह केशावत दावा ने गाँव कनेक्शन को बताया, "सिकलीगारों का दावा है कि उन्होंने युद्ध के समय महाराणा प्रताप की सेना को हथियार बनाने और मरम्मत का काम सिकलीगर जाति के लोगों ने ही किया।" 1891 में हुई मेवाड़ की मरदुमशुमारी यानी जनगणना रिपोर्ट के अनुसार सिकलीगरों को मेवाड़ में मारू भी कहा जाता है। लेकिन राज्य के पास फिलहाल इनके बारे में कोई डेटा उपलब्ध नहीं है।


दिलचस्प बात यह है कि राजस्थान, गुजरात, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश राज्यों में सिकलीगर हिंदू धर्म का पालन करते हैं जबकि पंजाब में वे सिख हैं। राजस्थान में उन्हें खानाबदोश के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

न शिक्षा, न बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच

जयपुर स्थित एसोसिएशन फॉर रूरल एडवांसमेंट थ्रू वॉलेन्ट्री एक्शन एंड लोकल इन्वॉल्वमेंट यानी अरावली के कार्यक्रम निदेशक वरुण शर्मा ने कहा, "यह कितना दुखद है कि जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताब-पेन और खिलौने होने चाहिए, उस उम्र में सिकलगीर समुदाय के बच्चे अपने सिर पर वजन लादकर घरेलू औजारों पर धार रख रहे हैं।"

उन्होंने कहा कि शिक्षा तक पहुंच न होना इन बच्चों के मौलिक अधिकारों का हनन है। संविधान के अनुच्छेद 21ए और अनुच्छेद 45 में कहा गया है कि छह से 14 साल की उम्र के बच्चों को मुफ्त में शिक्षा देना अनिवार्य है। शर्मा ने कहा, "लेकिन, सिकलीगर समुदाय के सैकड़ों बच्चे अभी भी किसी भी तरह की स्कूली शिक्षा से वंचित हैं।"

उनके मुताबिक इन बच्चों तक ना तो किसी एनजीओ की पहुंच है और ना ही सरकार की बच्चों से संबंधित कोई योजना इन तक पहुंचती है। इसीलिए सबसे पहले सिकलीगर बच्चों की पहचान होनी चाहिए और फिर कोई विशेष योजना से इन्हें जोड़ा जाना चाहिए।

12 वर्षीय राहुल अपने पिता, एक दिहाड़ी मजदूर और उसकी माँ के साथ रहता है जो बांस की टोकरियां बुनती है।

शिक्षा के अलावा, जयपुर के बाहरी इलाके में रहने वाले सिकलीगर समुदाय के पास पीने के पानी या स्वच्छता तक पहुंच नहीं है। "हमें पीने का पानी भी पास की एक बिल्डिंग से मांग कर लाना पड़ता है। यहां ना तो शौचालय हैं और ना ही कोई अन्य सुविधा, लेकिन पेट पालने के लिए हमें यहां रहना पड़ रहा है, "राहुल के करीब एक झोपड़ी में रहने वाली 25 वर्षीय नैना ने पूछा।

एक बड़ी स्वास्थ्य लागत भी जुड़ी हुई है। "जिस समय में बच्चों का बौद्धिक विकास होता है, उस समय ये बच्चे कड़ी मेहनत कर रहे होते हैं। अपने काम के अलावा बाहरी दुनिया के बच्चों से उनका वास्ता नहीं पड़ता। इससे बच्चों के विकास की प्रक्रिया अवरुद्ध होती है।, "जयपुर के जेके लोन अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ अशोक गुप्ता ने कहा। "अपना पूरा बचपन मजदूरी करके गुजार देने से बच्चों की मनस्थिति भी काफी नकारात्मक हो जाती है। भविष्य के लिए उनके सपने मर जाते हैं। अधिकतर मामलों में बच्चों की मजदूरी भी परिजन ही रखते हैं, ऐसे में बच्चों के मन में परिवार और व्यवस्था के खिलाफ एक विचार बन जाता है। कई बार यह विचार हिंसा का रूप भी ले लेता है, "गुप्ता ने गाँव कनेक्शन को बताया।

कोई मरम्मत नहीं, कोई पुन: उपयोग नहीं का मतलब आजीविका नहीं है। इस समुदाय के लिए और भी बुरा है क्योंकि उनकी आजीविका का एक मात्र जरिया भी अब खत्म होने के कागार पर है। "अब लोगों की आदत चीजों को सुधारने की नहीं रही है। घर का कोई भी सामान खराब या पुराना होता है तो बाजार से नया ले आते हैं। ऐसे ही घरों में अगर चाकू की धार खत्म हो जाती है तो नया चाकू आ जाता है। उसी चाकू पर धार रखवाना अब चलन से बाहर हो गया है। घरों में हाशिया अब उपयोग नहीं होता, "बचपन में धार रखने का काम करने वाले जोतराम ने गाँव कनेक्शन को बताया।

"जिस तरह टीवी के आने से लोक नाटक और गायन खत्म हुआ है, उसी तरह बाजार में घरों में काम आने वाली नई-नई चीजों से हमारा काम भी प्रभावित हुआ है। 10-15 घरों में जाने पर किसी एक घर से एक चाकू या कैंची लेकर कोई ग्राहक आता है, "उन्होंने कहा।

घूमंतु समुदायों के साथ काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता अश्वनी कबीर इन समुदायों के मुख्यधारा से कटने का कारण राजनीतिक मानते हैं। वे कहते हैं, "किसी भी सरकार के पास इन समुदायों को लेकर कोई दृष्टि नहीं है। घूमंतु समुदाय अपने सहज ज्ञान से जीने वाले लोग हैं। हमारे समाज ने भी उनकी संस्कृति को स्वीकार नहीं किया है। इनका इतिहास और परंपराएं आज के कानूनों में जकड़े हुए हैं। जबकि घूमंतु जातियों के स्किल का इस्तेमाल उन्हीं के विकास में लिया जाना चाहिए था लेकिन सरकारों के पास इन समुदायों की कोई ठोस जानकारी ही नहीं है और ना हीं उस दिशा में सरकार कुछ करना चाहती हैं।"


गाँव कनेक्शन ने सामाजिक न्याय विभाग के सचिव समित शर्मा को कई बार फोन किया, ताकि पता लगाया जा सके कि सिकलीगर समुदाय के लिए कोई कल्याण कार्य चल रहा है या नहीं, लेकिन उन्होंने कॉल का जवाब नहीं दिया।

तेजगढ़, गुजरात में आदिवासी अकेडमी के ऑनररी डायरेक्टर मदन मीणा, "सिकलीगर लोग हथियारों की मरम्मत करने, ढाल बनाने, तलवारों की म्यान बनाने में पारंगत थे। चूंकि आजादी के बाद राजे-रजवाड़े इन सब चीजों का महत्व कम हो गया। इसीलिए आर्थिक रूप से यह समुदाय हाशिए पर चला गया। सामाजिक रूप से इनकी पूछ खत्म हो गई। आज सही मायनों में इनकी असली संख्या तक का पता व्यवस्था को नहीं है।"

स्टोरी एक फेलोशिप फॉर वर्क: नो चाइल्ड बिजनेस (WNCB) का हिस्सा है। स्टोरी में बच्चों के नाम बदल दिए गए हैं।

अंग्रेजी में पढ़ें,

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