भारत के केवल 11 प्रतिशत गाँवों में सामान्य बाल लिंगानुपात : रिसर्च

भारत के केवल 11 प्रतिशत गाँवों में सामान्य बाल लिंगानुपात : रिसर्च

एक नए अध्ययन के अनुसार भारत के सिर्फ 11 प्रतिशत गांवों में ही सामान्य बाल लिंगानुपात है। देश की जनगणना में शून्य से छह वर्ष की आयु के बालकों और बालिकाओं की लगभग समान संख्या को सामान्य बाल लिंगानुपात कहते हैं।

केवल गांवों के स्तर पर बालक और बालिकाओं की अधिकतम संख्या के आधार पर देश में 39 प्रतिशत बालक बहुल गांव हैं, जहां 100 बालकों पर बालिकाओं की संख्या 88 या उससे कम है। इसी तरह, देश में 28 प्रतिशत बालिका बहुल गांव हैं, जहां 100 बालकों पर बालिकाओं की संख्या 103 या उससे अधिक है। देश में एक तरफ जहां 12 प्रतिशत गांवों में बालिकाओं की कमी देखी गई है, तो दूसरी ओर 10 प्रतिशत गांव ऐसे भी हैं, जहां बालिकाओं की संख्या अधिक है।

लैंगिक अनुपात का आकलन आमतौर पर राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर किया जाता है। इस शोध में गांव, तहसील, जिला और राज्य जैसे विभिन्न भौगोलिक स्तरों पर बाल लैंगिक अनुपात में भिन्नता का मूल्यांकन किया गया है।


भारतीय एवं अमेरिकी शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन में 2011 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग किया है। शोधकर्ताओं ने कुल 29 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के 634 जिलों और 5,895 तहसीलों के अंतर्गत 5.87 लाख गांवों में छह वर्ष तक के 12.12 करोड़ बच्चों के लैंगिक अनुपात का विश्लेषण किया है।

अध्ययन के अनुसार पंजाब, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, गुजरात के सौराष्ट्र, महाराष्ट्र के खानदेश और मराठवाड़ा, तमिलनाडु के पूर्वी क्षेत्र तथा ओडिशा के तटीय एवं डेल्टा क्षेत्रों के अधिकांश गांवों में बालकों की संख्या सर्वाधिक है। जबकि, अधिकतर बालिका-बहुल गांव देश के दक्षिण-पूर्वी भागों, जैसे- महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा के उत्तरी पहाड़ी क्षेत्र, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के भागों में हैं।

अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय में कार्यरत शोधकर्ता प्रो. एस.वी. सुब्रमण्यन ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि "इस अध्ययन में पहली बार ग्रामीण स्तर पर बाल लिंगानुपात और बालिकाओं की संख्या के आधार पर बालिका-बहुल गांवों को भी सामने लाया गया है। सामान्य बाल-लिंगानुपात में कमी सरकार और समाज दोनों के लिए एक गंभीर चुनौती और चिंता का विषय है।"


प्रोफेसर सुब्रमण्यन ने स्पष्ट किया कि जनगणना के बाल लिंगानुपात के आंकड़े 1000 बालकों पर बालिकाओं की संख्या पर आधारित होते हैं। इस अध्ययन में उन आंकड़ों के आधार पर ही 100 बालकों को मानक बनाते हुए बाल लिंगानुपात की गणना की गई है क्योंकि कई गांव ऐसे भी हैं जहां 1000 बच्चे भी नहीं होंगे। अतः प्रति 100 बालकों का चयन गणना के लिए अधिक यथार्थवादी पाया गया।


"हार्वर्ड विश्वविद्यालय की प्रमुख अमेरिकी शोधकर्ता रॉकली किम का कहना है कि राज्य और जिला जैसे उच्च स्तरों पर किए गए आकलनों से निचले स्तर पर लिंगानुपात की वास्तविक स्थिति का सटीक मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।"

रॉकली किम मानती हैं कि जिला या राज्य स्तर पर बाललिंगानुपात में दिख रही निम्न भिन्नता में कहीं कुछ भ्रामक कारक अवश्य हैं। यह दर्शाता है कि ग्रामीण स्तर पर कुछ तो ऐसा हो रहा है -शायद सामाजिक/सांस्कृतिक कारक - जो जिलों की तुलना में गांवों में अधिक प्रभावी असर रखता है। इसी कारण गांवों में बाललिंगानुपात में विषमताएं अधिक नजर आ रही हैं।


उदाहरण के तौर पर अध्ययन में एक चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है कि हरियाणा और पंजाब जैसे बेटी विरोधी विचारधारा रखने वाले राज्यों के भीतर भी लगभग 20 से 30 प्रतिशत गांव ऐसे हैं, जिनमें प्रति 100 बालकों पर 93 या अधिक बालिकाएं पायी गई हैं। अकेले अरुणाचल प्रदेश के कुल 4,736 गांवों में से 42 प्रतिशत गांव सबसे अधिक बालिका वाले और 39 प्रतिशत गांवसबसे अधिक बालकों वाले हैं। इस राज्य के मात्र तीन प्रतिशत गांवों में सामान्य बाल लिंगानुपात देखा गया है। इसी तरह की मिलती-जुलती बाल लैंगिकविषमताहिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर, अंडमान और निकोबार द्वीप, आंध्र प्रदेश और ओडिशा के गांवों में भी सर्वाधिक देखी गई है।

गांवों में बालक-बालिकाओं के प्रतिशत में भिन्नता के कारण ही सामान्य बाल लिंगानुपात में कमी हुई है।बालक बहुल गांवों में बेटियों के प्रति पूर्वाग्रह, पितृसत्तात्मक सोच, सामाजिक-आर्थिक दबाव, असुरक्षा और आधुनिक चिकित्सकीय तकनीकों का दुरुपयोग गांवों के स्तर पर सामान्य बाल लिंगानुपात की कमी के प्रमुख कारण कहे जा सकते हैं। वहीं, विभिन्न राज्यों के विशिष्ट सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्वरूप के कारण वहां के गांवों में बाल लिंगानुपात और उससे जुड़ी प्रवृत्तियों में विविधता भी काफी मायने रखती है।

अध्ययन में तैयार किए गए गएबाल लिंगानुपात वितरण के मानचित्रों से पता चलता है कि आमतौर पर किसी राज्य विशेष का समग्र क्षेत्रीय पैटर्न एक समान दिखाई देता है। लेकिन, उसको गहराई से जानने के लिए ग्रामीण स्तर पर सूक्ष्म अवलोकन की आवश्यकता है।

प्रोफेसर सुब्रमण्यनऔर रॉकली किम के अलावाशोधकर्ताओं में प्रवीण कुमार पाठक (दिल्ली विश्वविद्यालय), विलियम जो (आर्थिक विकास संस्थान, नई दिल्ली),आलोक कुमार (नीति आयोग, नई दिल्ली), आर. वेंकटरमण (यूनिवर्सिटी ऑफ वार्विक, इंग्लैंड) और युन झू (सुपर मैप सॉफ्टवेयर कार्पोरेशन लिमिटेड, चीन) शामिल थे। यह शोध हाल ही में हेल्थ ऐंड प्लेस जर्नल में प्रकाशित किया गया है। (इंडिया साइंस वायर)

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