जब-जब सड़ीं और सड़कों पर फेंकी गईं सब्जियां, होती रही है ये अनहोनी

जब-जब सड़ीं और सड़कों पर फेंकी गईं सब्जियां, होती रही है ये अनहोनीकिसान आंदोलनों की मुख्य वजह सब्जियों की सही कीमत न मिल पाना है

लखनऊ। जब-जब सब्जियां सड़ी तो अनहोनी हुई। जब सब्जियां सड़कों पर फेंकी गईं तो सरकारें तक हिल गईं और सत्ता का सुख भी खोना पड़ा। जब-जब अन्नदाता सड़कों पर उतरा है तो पूरे देश में हड़कंप मचा है। इस बार ये आग और ज्यादा उग्र है।

मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के किसान जिन समस्याओं को लेकर सड़क पर उतरे हैं, उनमें से एक है सब्जियों की सही कीमत का न मिल पाना। अब यही समस्या पूरे देश में किसानों के सामने है। बागवनी बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले दो हफ्तों में देशभर में सब्जियों की कीमतों में 45 फीसदी की गिरावट आई है।

ऐसे में देशभर के सब्जी उत्पादक किसानों के सामने एक बार फिर संकट आ गया है। भीषण गर्मी से एक तरफ जहां खेत में खड़ी फसलें बर्बाद हो रही हैं, वहीं किसान जब उन्हें लेकर मंडी पहुंचता है तो उचित दाम नहीं मिल रहे। सब्जियों की कीमतों में गिरावट का असर सीधे किसानों की आमदनी पर पड़ता है। दिल्ली की सबसे बड़ी सब्जी मंडी आजादपुर में मई में करीब 20 रुपए किलो से बिकने वाली भिंडी घटकर 11-12 रुपए किलो तक आ गई है।

येे भी पढ़ें: किसान का दर्द : “आमदनी छोड़िए, लागत निकालना मुश्किल”

देशभर में नगदी फसलों के रूप में सब्जियां किसानों के लिए बड़ा सहारा बनी हैं, लेकिन पिछले कुछ महीनों में उन्हें लगातार घाटा हुआ है। यूपी से लेकर पंजाब और मध्य प्रदेश तक पहले आलू के रेट गिरे। महाराष्ट्र में संतरे के रेट गिरे तो इंदौर और नासिक में प्याज किसान घाटे का शिकार हुए। मध्यप्रदेश में कई किसान 50 पैसे किलो तक प्याज बिक्री को मजबूर हुए। सर्दियों के सीजन में यूपी में गोभी किसानों को भी काफी घाटा हुआ था।

सब्जियों के रेट किस कदर किसान और सरकारों को प्रभावित करते हैं, ये केंद्रीय कृषि विश्व विद्यालय इंफाल (मणिपुर) के पूर्व कुलपति डॉ. एमपी सिंह की बातों से समझा जा सकता है, ‘आप ध्यान दीजिए, किसान जब-जब सड़क पर उतरा है, उसमें सब्जियां और दूध शामिल रहा है। टमाटर से लेकर प्याज तक के लिए आंदोलन हुए हैं।’

ये भी पढ़ें: क्या किसान आक्रोश की गूंज 2019 लोकसभा चुनाव में सुनाई देगी ?

टमाटर, गोभी और भिंडी जैसी सब्जी जल्दी खराब हो जाती हैं। इनको स्टोर करने के लिए कोल्ड स्टारेज चाहिए होता है, लेकिन इसका देशभर में अभाव है।
डॉ. नीरज, कृषि वैज्ञानिक

भारतीय सब्जी उत्पादक संघ अध्यक्ष श्रीराम गाढवे बताते हैं, ‘गर्मी और बरसात में सब्जी खराब होने के डर से किसान 75-80 फीसदी पकने वाली सब्जी तोड़ रहे हैं। किसानों की इस हड़बड़ी से मंडियों में सब्जी की आपूर्ति बढ़ गई है और सब्जियों के भंडारण की व्यवस्था नहीं होने से औने-पौनेदामों में किसान सब्जी बेचने को मजबूर हैं।’

कोल्ड स्टोरेज न होने का सबसे ज्यादा नुकसान हरी सब्जियों उगाने वाले किसानों को होता है। गोरखपुर जिला मुख्यालय से 35 किमी की दूरी पर स्थित ग्राम जिगिना बाबू सब्जियों की खेती के लिए जाना जाता है। इस साल यहां के किसान टमाटर को खेती से निराश हैं। किसान रामबदन मौर्या बताते हैं, ‘टमाटर की बहुत अच्छी पैदावार हुई है लेकिन खरीदार नहीं मिल रहे हैं। अभी तो ये हालत है कि तुड़ाई की मजदूरी नहीं निकल रही है, इसलिए खेत में छोड़ दिया है।’ ये दर्द सिर्फ रामबदन का नहीं यूपी में ऐसे किसानों की संख्या लाखों में है।

भारतीय सब्जी उत्पादक संघ अध्यक्ष श्रीराम गाढवे और केंद्रीय विश्वविद्यालय इंफाल के पूर्व कुलपति प्रो. एमसी सिंह खुले तौर पर मानते हैं, सरकार को चाहिए सब्जियों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय कर दें। उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने आलू किसानों की दिक्कतों को देखते हुए आलू का समर्थन मूल्य तय किया तो किसानों के प्रदर्शन के बीच मध्यप्रदेश में शिवराज सरकार ने प्याज को आठ रुपए किलो के सरकारी रेट पर लेना का फैसला किया था।

ये भी पढ़ें: बातें गांधी की करेंगे और काम नेहरू का, तो किसान तो मरेगा ही

खुद कृषि एवं लागत मूल्य के अध्यक्ष प्रो. विजय पाल कहते हैं, ‘सब्जियों का उत्पादन बढ़ाने और उसके विपणन (मार्केटिंग) के संबंध में किसानों कोप्रशिक्षण दिए जाने की आवश्यकता है, लेकिन हमारे पास (सरकार) ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। दूसरा सब्जियों को तुरंत नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट कीतरफ लाया जाएगा। हर राज्य सरकार कोल्ड स्टोरेज और फूड प्रोसेसिंग खोंले।’ प्रो. विजय पाल एक और सुझाव पर सरकार को भी गौर करना चाहिए।

किसानों की आमदनी को 2022 तक दोगुनी करने के दावा करने का प्रयास करने वाली सरकार और कृषि के जानकार लगातार ये कहते रहे हैं, किसानों को अपनी उपज को उत्पाद, आटा, दलिया और सब्जियों और फलों को जैली-जूस बनाकर बेचना चाहिए। लेकिन एक जुलाई से लागू होने वाली जीएसटी के बाद फल और सब्जियों से जुड़ा खाद्य प्रसंस्करण और महंगा होने वाला है। जानकारों का मानना है, इससे किसानों को नुकसान हो सकता है।

सब्जियों का उत्पादन बढ़ाने और उसके विपणन (मार्केटिंग) के संबंध में किसानों को प्रशिक्षण दिए जाने की आवश्यकता है, लेकिन हमारे पास(सरकार) ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। दूसरा सब्जियों को तुरंत नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट की तरफ लाया जाएगा। हर राज्य सरकार कोल्ड स्टोरेज और फूड प्रोसेसिंग खोंले।
प्रो. विजय पाल, अध्यक्ष, खुद कृषि एवं लागत मूल्य

प्रदेश के किसानों की समस्या और यूपी की उत्पादन क्षमता को देखते हुए केंद्र सरकार ने वर्ष 2016 में सिर्फ टमाटर के लिए 40 कोल्ड स्टोरेज बनानेका ऐलान किया था लेकिन योजना जमीन पर नहीं उतरी। इस वर्ष फिर केंद्र सरकार ने खाद्य उत्पादक केन्द्रों को कोल्ड स्टोरेज और प्रसंस्करण उद्योग से जोड़ने के लिए खाद्य एवं प्रसंस्करण मंत्रालय ने 101 नई एकीकृत कोल्ड चेन परियोजनाओं को मंजूरी दे दी है। उनमें 16 यूपी हैं।

फिर बनाते हैं अधिक उत्पादन का बहाना

सब्जियां और फल का उत्पादन जब ज्यादा होता है तो कारोबारी से लेकर सरकार तक ओवर प्रोडक्शन (ज्यादा उत्पादन) का बहाना बनाते हैं। लेकिन ये उत्पादन कैसे किसानों के लिए लाभदायक बने, इस पर वैसा काम नहीं हुआ। पूर्व कुलपति डॉ. एपी सिंह कहते हैं, ‘हम ये पिछले 50 वर्षों से कहते आ रहे हैं कि किसान बहुत उत्पादन करते हैं।

पढ़ें ये भी : किसान आंदोलन: फिर भड़की हिंसा, एक और किसान की मौत

मगर सीजन में किसान को सब्जियों के दाम नहीं मिलते और दो ढाई महीने में लोग वही सब्जी तिगुने कीमत पर खरीदते हैं।’ वो आगे कहते हैं, ‘फल-सब्जियां कच्चा माल हैं। इन्हें घर पर रखा नहीं जा सकता है। इसलिए जरूरी है, पर्याप्त संख्या में कोल्ड स्टोरेज हों। इसमें भी निजी क्षेत्र के अलावा सरकारी भी हों, क्योंकि वहां किसानों ने मनमानी होती है।”

ये भी पढ़ें: किसान आंदोलन में राजनीति तेज : अब आगे क्या ?

कोल्ड स्टोरेज में भरे जाते हैं सिर्फ आलू

पश्चिम बंगाल में सब्जियों की सबसे ज्यादा खेती होती है, उसके बाद उत्तर प्रदेश का नंबर आता है। देश के कुल सब्जी उत्पादन में उत्तर प्रदेश काहिस्सा 12 प्रतिशत है, लेकिन कोल्ड चेन श्रृंखला यहां सबसे कमजोर है। उत्तर प्रदेश में कुल 2100 से ज्यादा कोल्ड स्टोरेज हैं, जिसमें सरकारी स्टोरेजकी संख्या सिर्फ 2 है लेकिन इनमें भी 80-90 फीसदी सिर्फ आलू रखा जाता है। उत्तर प्रदेश में कोल्ड सप्लाई चेन की व्यवस्था नहीं होने से दूध, फलऔर सब्ज़ियों की प्रोसेसिंग नहीं हो पाती है। जिसका असर प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। फेडरेशन ऑफ कोल्ड स्टोरेज एसोसिएशन ऑफ़इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था नहीं होने से उत्तर प्रदेश में 40 प्रतिशत सब्जियां, फूल और दूध हो जाते हैं बर्बाद होजाते हैं।

Share it
Top