नोटबंदी का एक साल: महिलाओं को तोड़ने पड़े थे अपने खुफिया गुल्लक, डर अभी भी कायम

Shrinkhala PandeyShrinkhala Pandey   8 Nov 2017 2:26 PM GMT

नोटबंदी का एक साल: महिलाओं को तोड़ने पड़े थे अपने खुफिया गुल्लक, डर अभी भी कायमनोटबंदी को लेकर महिलाओं की क्या है राय।

"उस दिन मुझे पूरी रात नींद नहीं आई। मतलब परेशान तो पति और घर के दूसरे लोग भी थे,लेकिन मुझे सबसे ज्यादा चिंता अपने उन पैसों को लेकर थी, ये वो रुपए थे जो मैंने परिवार से छिपाकर रखे थे। सही बात तो मुझे भी ठीक से नहीं पता था वो हैं कितने।" थोड़ा मुस्कुराते हुए लखनऊ के अलीगंज में रहने वाली अंकिता यादव 8 नवंबर 2016 की रात को याद करती हैं।

अंकिता (32 वर्ष) हाउस वाइफ हैं नोटबंदी के दौरान उन्होंने कुल साढ़े 8 हजार रुपए के पुराने ऐसे नोट दिए थे, जो वो खुद काफी मशक्कत के बाद अलमारियों की दराजों और पुराने कपड़ों से खोज पाई थीं। अंकिता की तरह 8 नवबंर की रात देश का करोड़ों महिलाओं की छिपी छिपाई, गुल्लकें और पर्सें बाहर गई थीं।

पिछले साल जब 500 और 1000 के पुराने नोट बंद किए गए तो महिलाओं को मजबूरी में वो पैसा भी निकालना पड़ा तो उन्होंने घर-परिवार से छिपाकर एक एक पाई जोड़ कर रखा था, ताकि किसी मजबूरी में काम आ सके। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबंदी के फैसले के चलते शहर से लेकर गांव तक राशन के डिब्बों, पुरानी संदूकों, गद्दों के नीचे,किताबों के बीच और जरुरी कागजात के नाम पर बचा कर रखे गए थे।

दिल्ली से सटे गाजियाबाद के राजेेंद्र नगर इलाके में रहने वाली चेतना जैन (40 वर्ष) ने नोटबंदी के दौरान करीब 70-80 हजार रुपए अपने बैंक में जमा किए थे। इनमें से कई नोटें वो भी थीं जो उन्हें 7 साल पहले शादी के दौरान शादी में मुंह दिखाई में मिली थी। इसी पैसे में कई बार वो पति के पैसे न होने पर गैस सिलेंडर भराती थीं तो कई बार बच्चों की फीस तक भरी थी। नोटबंदी और जनधन से पहले गांव की हजारों महिलाओं के पास खाते नहीं थे, उस दौरान उनकी बैंक उनकी रसोई के बर्तन और बक्से ही हुआ करते थे।

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घरेलू महिलाओं के घरेलू श्रम को देश के जीडीपी में नहीं जोड़ा जाता। ये महिलाएं अपनी आर्थिक जरूरतों के लिए परिवार के पुरुषों पर निर्भर रहती हैं जो घर खर्च के लिए पैसे देते हैं। उसी पैसे से ये थोड़ी थोड़ी बचत करती हैं। इन खुफिया गुल्लकों में कितना पैसा होता है, इसका कोई आंकलन तो नहीं लेकिन ये घर परिवार के कितना काम आता है इसकी दूरगामी परिणाम साल 2008 में नजर आया था।

वैश्विक आर्थिक मंदी के आंधी में अमेरिका समेत कई देशों की अर्थव्यवस्था हिल गई थी। जानकार बताते हैं, भारत इस मंदी का इसलिए सामना कर पाया था क्योंकि देश की करोड़ों महिलाओं के पास ये छिपा हुआ था धन था, जिसने आर्थिक संकट के दौरान, पति और बेटों का कारोबार बचाया था। ये पैसा इसलिए गुणाभाग से बाहर था क्योंकि बैंक खातों में नहीं था, परिवार की नजर में नहीं था। यूएनडीपी रिपोर्ट के अनुसार साल 2014 के अंत तक अस्सी प्रतिशत भारतीय महिलाओं के पास बैंक खाते नहीं थे।

नोटबंदी का एक साल पूरा होने पर गांव कनेक्शन ने ऐसी कई महिलाओं से बातकर ये समझने की कोशिश कि क्या वो खुफिया गुल्लकें अभी भरी जाती हैं या नोट बंद होने का डर हावी है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के इंदिरानगर की रहने वाली सलोनी पांडेय (32 वर्ष) ने बताया, “ पहले तो हर खर्च में कुछ न कुछ कटौती कर या पति को ज्यादा खर्च बताकर कुछ न कुछ बचाने की कोशिश करती थी। वो पैसा आता तो उन्हीं के काम था, लेकिन अब ज्यादा नहीं करती। थोड़े बहुत घर में रखते हैं, ज्यादा होते हैं तो बैंक में जमा कर देते हैं।"

वहीं अगर ग्रामीण महिलाओं की बात करें तो लखनऊ से लगभग 28 किमी दूर अमेठी गाँव की रामरती (52वर्ष) बताती हैं, पिछले साल जब नोटबंदी हुई थी, मैंने ढूंढ-ढूंढ के पैसे निकाले लेकिन फिर भी एक दो नोटें इधर उधर रह ही गईं जो बाद में मिली। हम लोग बैंक तो जाते नहीं है कम पढ़े लिखें हैं न कोई लाखों रुपए हैं कि जमा करें।

नोटबंदी ने बदली महिलाओं में बचत की आदत।

लखनऊ के एक निजी स्कूल में पढ़ाने वाली आंकाक्षा द्विवेदी बताती हैं, “सरकार की इसके पीछे भले अच्छी मंशा रही हो लेकिन इसका कोई फायदा आम जनता को नहीं मिला। हम अपने पैसे निकालने के लिए परेशान हुए, जमा करने के लिए लंबी लाइनों में खड़े हुए। आम जनता को बहुत मुश्किलें उठानी पड़ीं थीं।”

एकल महिलाओं ने झेलीं कई परेशानियां

दिल्ली में रहने वाली स्वतंत्र पत्रकार और लेखिका अनुशक्ति सिंह इस बारे में बताती हैं, “मैं एकल मां हूं, अकेली रहती हूं, मुझे ख़ासी दिक्कत का सामना करना पड़ा था। कैश पैसे जमा करने के लिए लाइन लगानी पड़ी थी फ्रीलांस असाइनमेंट के पेमेंट डिले हो गये थे उस दौरान।” वो आगे कहती हैं, “मैं कई बार चार चार घंटे लाइन में लगी। सारे एटीएम कैशलेस थे, एक दिन तो मुझे भूखा भी रहना पड़ा क्योंकि कैश खत्म था।”

विशेषज्ञों का नजरिया

नोटबंदी का उद्देश्य काले धन पर रोक लगाना था। लेकिन इसका असर कितना हुआ इस बारे में हमने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री आरके प्रसाद बताते हैं, “हर चीज के दो पहलू होते हैं, एक सकारात्मक और एक नकारात्मक। नोटबंदी का अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर पड़ा है। लेकिन अगर हम बात करें महिलाओं की जो ग्रामीण क्षेत्रों से हैं तो उन्हें परेशानी इसलिए हुई क्योंकि वो बैंक में पैसे नहीं रखतीं।” वो आगे कहते हैं, “बैंक में हमारा व्हाइट मनी होता है अगर भविष्य में दोबारा भी नोटंबदी हुई तो सिर्फ करेंसी बदलेगी पैसा तो हमारा हमारे पास ही होगा।”

वहीं एक दूसरे अर्थशास्त्री डॉ ए आर प्रसाद का मानना है, “नोटबंदी में आम लोगों को दिक्कतें हुई थीं। एटीएम के बाहर लोगों की लंबी कतारें लगी थीं फिर भी लोग खाली हाथ लौट रहे थे। कई लोगों की मौतें भी हुईं।” वो आगे बताते हैं, “महिलाओं को इसलिए भी दिक्कत आई क्योंकि आज भी ज्यादातर महिलाओं के पास बैंक एकाउंट नहीं है वो घर पर ही पैसे रखती हैं। क्योंकि वो पैसे रोज के खर्च के या फिर अचानक काम आने पर निकलते हैं तो इसलिए महिलाओं का नजरिया नोटबंदी को लेकर बहुत अच्छा नहीं था।”

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