धुंध के साये से बचने के लिए दिल्ली, यूपी और हरियाणा को बारिश का इंतजार

धुंध के साये से बचने के लिए दिल्ली, यूपी और हरियाणा को बारिश का इंतजारहरियाणा में पानीपत के एक गांव में स्मॉग के बीच धान पीटते मजूदर। फोटो- विनय गुप्ता।

सोनीपत/दिल्ली। दिल्ली और उसके आसपास के इलाके प्रदूषण की समस्या से बचने के लिए कुदरत के सहारे का इंतजार है। दिल्ली के साथ यूपी और हरियाणा के कई इलाके भी स्मॉग की भीषण चपेट में हैं।

दिल्ली में ऑड इवेन फॉर्मूला राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण की सख्त शर्तों के लागू नहीं होगा। मौसम विभाग का अनुमान है कि आने वाले 48 घंटों में वर्षा होगी, तभी ये धुंध छटेगी क्योंकि कृत्रिम बारिश के कोशिशें होती नजर नहीं रही हैं। हालांकि ख़बर है इसी बीच पवन हंस समेत कई हेलीकॉप्टर देने वाली कंपनियों ने हेलीकॉप्टर से बारिश कराने में रुचि दिखाई है।

150 किमी दूर लोगों को दोपहर में जलानी पड़ी वाहनों की लाइट

स्मॉग को लेकर सुर्खियों में भले सिर्फ दिल्ली हो, लेकिन शनिवार को दिल्ली से 150 किलोमीटर दूर हरियाणा के सोनीपत और पानीपत समेत दोपहर के तीन बजे भी वाहन चालकों को लाइट जलानी पड़ रही थी। शहर ही नहीं गाँव और कस्बों तक में दृश्यता काफी कम थी। ग्रामीणों के मुताबिक, हरियाणा में ये समस्या करीब 5-6 दिनों से है। किसान प्रदूषण के लिए सिर्फ किसानों को जिम्मेदार ठहराए जाने से काफी गुस्सा भी है।

भले एक मात्र कारण नजर आता हो

दिल्ली और उसके आसपास रहने वाली एक बड़ी आबादी को इस स्मॉग के लिए फसलों का जलाया जाना भले एक मात्र कारण नजर आता हो, लेकिन इस क्षेत्र में काम करने वाले लोग इससे पूरी तरह इनकार करते हैं। हालांकि वो ये जरूर चाहते हैं कि किसान खेतों में अवशेष न जलाएं। ज्यादातर समस्या पराली जलाने से हैं इसलिए गाँव कनेक्शन ने धान के क्षेत्र में कई वर्षों से शोध कर रहे देश को बासमती धान की किस्म पूसा 1121 देने वाले पद्मश्री कृषि वैज्ञानिक डॉ. वीपी सिंह कहते हैं, “प्रदूषण की समस्या सिर्फ खेत जलाने से ये नहीं कहा जा सकता है, लेकिन किसानों को अपने हित के लिए खेत नहीं जलाने चाहिए। धान की खेती को नियंत्रित करने की जरुरत है, जितनी जरुरत है उतनी खेती हो, ताकि पुवाल की समस्या ही कम हो, लेकिन उससे पहले किसानों को दूसरी खेती के विकल्प देने होंगे।”

पुवाल-पुवाल सब चिल्ला रहे हैं

“पुवाल-पुवाल सब चिल्ला रहे हैं, लेकिन दिल्ली में जो एक-एक घर में 3-3 ऐसी और चार-चार गाड़ियां हैं, उनका उनसे कितना नुकसान है, ये भी देखिए।” जसपाल जोयथ, जागरुक किसान, चिड़ाना (सोनीपत) खुद ही सवाल करते है।

उससे ज्यादा नुकसान कोई और पहुंचा रहा

प्रदूषण फसल से है, लेकिन उससे ज्यादा नुकसान कोई और पहुंचा रहा है। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने शनिवार को अरविंद केजरीवाल सरकार ने ऑड इवेन फार्मूले को लागू करने के लिए जो शर्तें लगाई, उनमें कई सवाल छिपे नजर आते हैं। एनजीटी ने दिल्ली सरकार ये फार्मूला चार पहिया के साथ दुपहिया में भी लगाने की शर्त रखी थी, दूसरा अभिकरण ने दिल्ली के 300 किलोमीटर के दायरे में 13 थर्मल पावर प्लांट हैं, जो सल्फेट गैस छोड़ रहे हैं। ये पीएम 10 और 2.5 का स्तर बढ़ा रहे हैं, इन पावर प्लांट को अपग्रेड किए जाने के संबंध में दिल्ली और दूसरे राज्यों से रिपोर्ट मांगी है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय पहले ही 7 सदस्यीय कमेटी बना चुका है, तुरंत होने वाले निदान और आगे ये समस्या न हो इस पर शोध कर अपनी रिपोर्ट देगी।

जिस पर ध्यान दिए जाने की जरुरत भी है

लेकिन इन सबसे अलग सोशल मीडिया में आईवांटटूब्रीथ हैशटैग ट्रेंड कर रहा है। लोग सांस लेने को अधिकार मानते हुए अपनी आवाज उठा रहे हैं। इसमें से कुछ किसानों पर ठीकरा फोड़ रहे तो कुछ सरकारों की उदासीनता, दिल्ली में डीजल गाड़ियों को चलने देने आदि पर बहस को आगे बढ़ा रहे हैं। बहस दिल्ली और सोशल मीडिया से काफी दूर खेतों में भी हैं लेकिन वहां चर्चा कुछ और, जिस पर ध्यान दिए जाने की जरुरत भी है।

मैंने तो एक भी खेत नहीं फूंका

हरियाणा में गोहाना से एनएच-1 को जोड़ने वाली सड़क के किनारे ही अपने खेतों में धान पिटवा रहे बुआना लाखू गाँव के रोहताश (45 वर्ष) के पास इस वर्ष 4 एकड़ धान था। वो बताते हैं, “मैंने तो एक भी खेत नहीं फूंका, सब किसान के पीछे पड़े हैं। हमने तो बिहार से आए इन मजूदरों को ठेका दे रखा है, कटाई और धान साफ करने का। वैसे ही हमारे इलाके में एक एकड़ पुवाल के 1000-1200 रुपए मिल जाते हैं फिर हम क्यों फूंकेंगे खेत।” हालांकि वो ये भी मानते हैं कि जहां मजदूर नहीं मिलते या फिर फसल खराब (कम पैदावार) होती है, मशीन से कटवाते हैं और उसके कुछ भाग को फूंक देते हैं।

धान एक महीने पहले ही कट चुका है

वहीं पास में खड़े रोहताश के चाचा नरेश कुमार (57 वर्ष) इस मुद्दे पर ज्यादा मुखर हैं। सीआरपीएफ के सेवा निवृत्त जवान नरेश कहते हैं, देखो भाई, किसान को गेहूं बोने के लिए अपने खेत खाली करने हैं। मजदूर उतने हैं नहीं, इसलिए किसान मशीन चलवाएगा और फिर मजबूरी है, कि जो बचे उसे जलाए।” हरियाणा पंजाब समेत देश के लगभग सभी राज्यों में ज्यादातर धान एक महीने पहले ही कट चुका है। हरियाणा में राष्ट्रीय राजमार्ग 1 के आसपास और ग्रामीण इलाकों में खेत जो तरह के नजर आए, एक जिन्हें जोतकर रबी की फसलों की बुवाई हो गई थी, दूसरे वो जिनमें फूंके जाने के निशान थे, तीसरे वो जिन्हें मशीन से कटाई के बाद बची अवशेष में पानी भरा गया है ताकि वो सड़ जाएं।

उठते धुएं से कोई गुरेज नजर नहीं आती

एनजीटी और सरकारों की सख्ती ग्रामीण इलाकों में नजर आती हैं, लेकिन कुछ किसान खेत खाली करने के लिए अवशेष जलाने से परहेज नहीं कर रहे है। पानीपत-सोनीपत सड़क किनारे ही एक किसान इसी धुंधलके में करीब 5 एकड़ खेत में आग लगा रहा था, उसके साथ उसके परिवार के कई बच्चे थे, जिन्हें उठते धुएं से कोई गुरेज नजर नहीं आती थी। पराली जलाने से पर्यावरण को कितना नुकसान होता है, इस बारे में नवबंर 2016 में पूर्व पर्यावरण मंत्री स्व. अनिल माधव दवे ने लोकसभा में एक सवाल के जवाब में कहा था कि अभी तक इस बात का कोई सबूत नहीं मिला है, जिससे ये साबित हो कि पराली ही धुंध के लिए जिम्मेदार है।

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