आज आपको मां की याद आएगी ... नानी के हाथ का पहला स्वेटर भी

आज आपको मां की याद आएगी ... नानी के हाथ का पहला स्वेटर भीऊन से बुने स्वेटर

आज आप को अपने गांव, अपनी मां और दादी की याद आ सकती है। सलाइयों में फंसकर ऊन जब स्वेटर बन जाया करता था, नानी का वो पहला स्वेटर याद है आपको, ऊन का वो गोला लेकर जब आप दरवाजे की तरफ भागते थे, वो महफ़िल जो सर्दियों में आंगन और छतों पर सजती थी, जब मां, बुआ, नानी और दादियां आपके लिए स्वेटर बुनती थी, वो भी क्या दिन थे। उस बीच उलझी ऊन को सुलझाकर गोला बनाना बच्चों का पसंदीदा काम हुआ करता था। लोग कहते थे कि उन रंगीन धागों से महिलाएं स्वेटर नहीं 'रिश्ते' बुनती हैं लेकिन पिछले कुछ साल से स्वेटर बुनने का ये चलन कम होता जा रहा है।

एक वक्त था जब सर्दियों के बाज़ार में ऊन की अनगिनत दुकानें होती थीं। उन दुकानों पर उस ऊन को खरीदने वाली महिलाओं की भीड़ होती थी लेकिन अब तो जैसे सब बीते ज़माने की बातें हो गईं। सर्दियों के बाज़ार तो अब भी लगते हैं लेकिन उनमें ऊन की दुकानें न के बराबर होती हैं। चलिए आज ताज़ा करते हैं उस ऊन से बने स्वेटर की कुछ यादें...

तोहफे में देने का चलन

आपको सिर्फ तुम की स्वेटर वाली वो कहानी याद है। फिल्म में हीरोइन अपने हीरो को चेहरे से नहीं पहचानती है। हीरो का नाम दीपक होता है, वो उसके लिए अपने हाथों से स्वेटर बुनकर भेजती है जिसमें दीपक बना होता है। एक वक्त होता है जब दोनों एक दूसरे के सामने होते हैं लेकिन पहचान नहीं पाते... वो अलग होने ही वाले होते हैं, उसी सीन में हीरो हीरोइन का दिया हुआ, वो स्वेटर पहनता है और हीरोइन पहचान लेती है कि ये वही दीपक है जिससे वो प्यार करती है। ये तो हुई फिल्मों में हाथों से बुने स्वेटर की अहमियत।

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लेकिन हमारे यहां भी किसी का बर्थडे हो या किसी के यहां बच्चा होने वाला हो, महिलाएं कई महीनों पहले से ही स्वेटर बिनना शुरू कर देती थीं। ऊन से बने दस्ताने, टोपी, मोज़े, स्वेटर और पैजामा पूरा सेट बनाया जाता था बच्चे के लिए। यहां तक कि उस ऊन से ही शॉल बनाकर भी दी जाती थी जिसमें बच्चे को पूरा लपेट कर सर्दी बचती थी लेकिन अब ऐसे बहुत ही कम लोग होते हैं जो किसी को तोहफे में देने के लिए या अपने ही घर के लोगों के लिए स्वेटर बिनें।

लखनऊ के सआदतगंज में रहने वाली अनीता शुक्ला बताती हैं, मेरी शादी को 22 साल हो गए। शादी से पहले मुझसे कहा जाता था कि स्वेटर बुनना सीख लो, नहीं तो अपने बच्चों को सर्दी में क्या पहनाओगी। शादी के कुछ साल बाद तक मैंने ऊन से स्वेटर बुने भी लेकिन धीरे - धीरे बाकी कामों में व्यस्तता बढ़ती गई और स्वेटर बुनने की आदत छूटती गई। अनीता आगे बताती हैं कि घर पर स्वेटर न बुनने का एक कारण ऊन का अधिक महंगा होना भी है। वह कहती हैं कि एक स्वेटर बनाने के लिए ऊन जितने रुपये की आती है उतने में तो बाज़ार से बना बनाया स्वेटर आ जाता है और समय बचता है वो अलग।

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गर्लफ्रेंड का दिया हुआ वो स्वेटर

कानपुर के रहने वाले संजीव बाजपेई (43) बरेली में नौकरी करते हैं। वो बताते हैं कि शादी से पहले मेरी गर्लफ्रेंड ने मुझे अपने हाथों से बुनकर एक सफेद रंग की ऊन का स्वेटर बना कर दिया था। इस बात को 20 साल हो गए होंगे। वो स्वेटर आज भी मेरे पास है। हर सर्दी में मैं सिर्फ एक बार उस स्वेटर को पहनता हूं ताकि वो कभी पुराना न हो। संजीव बताते हैं कि ये बात मेरी बीवी को भी पता है। जब नई - नई शादी हुई तब उस स्वेटर को पहनने पर वो नाराज़ हो जाती थीं लेकिन अब बुरा नहीं मानतीं।

एक जगह की कला को पहुंचाते थे दूसरी जगह तक

स्वेटर एक जगह की कला को दूसरी जगह तक पहुंचाने का ज़रिया हुआ करते थे। हर गाँव, हर क्षेत्र के लोगों की स्वेटर बुनने की एक कला होती थी, उनके कुछ नमूने होते थे, कुछ डिज़ाइन होती थीं। लड़कियां इनको बड़ा मन लगाकर और मेहनत से सीखती थीं। फिर जब उनकी शादी होती थी और वो किसी दूसरे गाँव, शहर जाती थीं तो अपने मायके से सीख कर आई डिज़ाइन को वहां के लोगों को सिखाती थीं। ये तरीका था, संस्कृति और कला के आदान - प्रदान का। कुछ महिलाएं तो ऐसी भी थीं जो ऊन से किसी डिज़ाइन के छोटे - छोटे नमूने बनाकर उन्हें सहेज कर रखती थीं ताकि आने वाली पीढ़ियों तक वो कला आगे बढ़ती रहे।

सेहत के लिए भी फायदेमंद

स्वेटर बुनने से महिलाओं की सेहत को भी कुछ फायदे होते हैं। लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज के ऑर्थोपेडिक्स बताते हैं, ''स्वेटर बिनते वक्त महिलाओं की उंगलियों में जो मूवमेंट होते हैं वो एक एक्सरसाइज की तरह होते हैं जो उनकी सेहत के लिए फायदेमंद साबित हो सकते हैं।'' आगरा के साइकोलॉजिस्ट डॉ. सारंग धर बताते हैं, ''स्वेटर बिनने से महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर भी काफी अच्छा प्रभाव पड़ता है।

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स्वेटर बुनते समय वे दूसरी महिलाओं के साथ जो हंसी ठिठोली करती हैं उससे उनके अंदर डोपामाइन और सिरोटोनिन हॉर्मोन का संचार होता है, जिन्हें हैप्पीनेस हॉर्मोन कहते हैं।'' वह कहते हैं कि इसके अलावा किसी काम में लगे रहने के कारण उनका ध्यान बंटा रहता है, जिससे उनमें तनाव, अवसाद, घबराहट जैसी चीज़ें कम होती हैं। इसके अलावा जब उनके बुने स्वेटर की कोई तारीफ करता है तो भी उनके अंदर एक सकारात्मक भावना आती है, जो उनका आत्मविश्वास मज़बूत करती है। धूप में बैठकर स्वेटर बिनने से महिलाओं के लिए सबसे ज़रूरी विटामिन यानि विटामिन डी भी उन्हें अच्छी मात्रा में मिल जाता है।

कुछ महिलाओं को अभी भी है शौक

वैसे तो स्वेटर बुनने का शौक अब ज़्यादातर महिलाओं को नहीं रहा लेकिन कुछ महिलाएं ऐसी हैं जो इस पुरानी कला को अभी तक ज़िंदा रखे हुए हैं। हालांकि उन्हें भी ये लगता है कि उनकी आगे आने वाली पीढ़ियां इसे आगे नहीं बढ़ा पाएंगी। बरेली के शास्त्रीनगर में रहने वाली आभा गंगवार बताती हैं, ''मेरे पति को ऊन से बुना हुआ स्वेटर पहनना ही अच्छा लगता है। इसलिए मैं अभी भी उनके लिए स्वेटर बुनती हूं। हर साल सर्दियों में 4 - 5 स्वेटर तो बुन ही डालती हूं। हालांकि अब बच्चों को घर पर बना हुआ स्वेटर अच्छा नहीं लगता। उन्हें बाज़ार वाला ही चाहिए होता है, इसलिए मुझे लगता है कि मेरी ये कला अब मेरे परिवार में आगे नहीं बढ़ पाएगी।

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