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किसान आंदोलन में संघर्ष कर रहीं तीन पीढ़ियां: 8 साल के बच्चे से लेकर 80 साल के बुजुर्ग तक आंदोलन में हैं शामिल

किसान आंदोलन में पंजाब और हरियाणा की कई पीढ़ियां शामिल हैं। पंजाब के लोगों का ऐसा कहना है कि देश में पहली बार ऐसा कोई किसान आंदोलन हो रहा है जिसमें पांच साल के बच्चे से लेकर 90 साल तक के बुजुर्ग शामिल हैं और जिसे पंजाब लीड कर रहा है।

Arvind ShuklaArvind Shukla   1 Dec 2020 3:57 PM GMT

किसान आंदोलन में संघर्ष कर रहीं तीन पीढ़ियां:  8 साल के बच्चे से लेकर 80 साल के बुजुर्ग तक आंदोलन में हैं शामिल

हाईवे पर लगी ट्रैक्टर ट्राली की कतारों के बीच एक ट्राली से सीढ़ियों के सहारे दो कुछ लोग एक बुजुर्ग व्यक्ति को नीचे उतरने में मदद कर रहे थे। देखने में लग रहा था कि जीवन के 70 बसंत वो जरुर देख चुके होंगे। ट्राली से उतरकर कर उन्होंने कांधे पर रखी शॉल संभाली और डंडा टेकते हुए आगे बढ़ चले, इस डंडे पर एक झंडा लगा था, झंडे पर लिखा गुरुमुखी में लिखा था, भारतीय किसान यूनियन (उगरहा)।

कृषि कानूनों के विरोध में पंजाब और हरियाणा को जोड़ने वाले हाईवे संगरुर-जींद हाईवे पर खनौरी बॉर्डर पर 26 तारीख हजारों किसानों ने डेरा जमा रखा था। जबकि तमाम किसानों को ट्रैक्टर ट्राली से आने का सिलसिला जारी थी। इन्हीं में से एक थे संगरुर जिले के रहने वाले 70 साल के जसविंदर सिंह, जो किसानों के दिल्ली कूच में शामिल होने आए थे। खनौरी बॉर्डर ट्रैक्टर ट्रालियों की इतनी भीड़ थी कि दो किलोमीटर तक लाइऩ लगी थी इसलिए आगे का सफर पैदल ही तय करना था। गांव कनेक्शन ने जसिवंदर सिंह पूछा, इस उम्र में आप यहां क्यों आए हैं?

उन्होंने जवाब दिया, "हम अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए जमीनें बचाने आये हैं।"

जसविंदर सिंह को गाड़ी से उतरने में मदद करते किसान. फोटो : अरविन्द शुक्ला

दिल्ली की तरफ कूच करने वाले किसानों के जत्थों में जसविंदर की उम्र से ज्यादा के कई किसान शामिल थे। कुछ किसान ऐसे भी थे, जो चलने में असमर्थ थे लेकिन वो अपने परिवार के साथ किसानों का हौसला बढ़ाने आए थे। संगरुर दिल्ली मार्ग हो या पंजाब के अंबाला होते हुए पाकिस्तान के सीमावर्ती जिलों से आने वाले किसानों के जत्थों में भारी संख्या में बुजुर्ग शामिल थे। सिर्फ बुजुर्ग ही नहीं इनमें से कई ट्रैक्टर ट्रॉलियों में भारी संख्या में महिलाएं भी थी। पटियाला से होते हुए गांव खनौरी तक पहुंची गांव कनेक्शन की टीम को ऐसी की ट्रैक्टर ट्रालियां मिली थी, जिनमें 6 और 8 साल के बच्चों से लेकर 80 साल तक की बुजुर्ग महिला और पुरुष शामिल थे।

पंजाब में किसान और मजदूरों की आत्महत्या पर काम कर रहीं किरनजीत कौर जुनीर गाँव कनेक्शन को बताती हैं, "मेरी चार पीढ़ियां इस आंदोलन में शामिल हैं। पहली बार किसी किसान आंदोलन में पांच साल के बच्चे से लेकर 90 साल तक की महिला शामिल हुई हैं। इनको तीन कृषि कानूनों के बारे में ज्यादा कुछ भले ही न पता हो, पर ये इतना जरुर जानते हैं कि इनके साथ गलत हो रहा है। पंजाब में जो लोग घरों में हैं वो माइक से बोल-बोलकर दिल्ली में किसान आंदोलन में बैठे लोगों का उत्साह बढ़ा रहे हैं और उनसे कह रहे हैं, 'आप दिल्ली में निश्चिंत होकर बैठिए, हम आपका खेत और घर सब संभाल लेंगे।"

वो आगे कहती हैं, "हम लोग पूरी तैयारी से आये हैं, हमारे पास छह महीने के राशन का इंतजाम है। सदियों बाद ऐसा देखने को मिला है जब किसान आंदोलन को पंजाब लीड कर रहा है। ये एक ऐसा आंदोलन है जिसमें हर जाति-धर्म के लोग शामिल हैं। इसमें किसान हैं, युवा हैं, बच्चे और महिलाएं हैं।"

आंदोलन में शामिल महिला किसान. फोटो : अरविन्द शुक्ला

परिवार के साथ आंदोलन में शामिल होने के सवाल पर लुधियाना में सलौरी जिले के हरजीत सिंह कहते हैं, शुरु में हमने दो महीने पंजाब में ही धरना लगाए (धरना दिया) लेकिन गूंगी सरकार ने कुछ सुना नहीं। ऐसे में जब दिल्ली चलने का कार्यक्रम बना तो बुजुर्ग बोले हम भी चलेंगे, वो कहने लगे कि हमारी तो 5-7 साल की उम्र बची है, आगे वाली पीढ़ी की जिंदगी बचानी है तो चलेंगे। फिर महिलाएं भी साथ हो लीं तो हमारे बच्चे भी कहां पीछे रहने वाले हैं। परिवार पर संकट है तो सब मिलकर ही लड़ेंगे।"

एक देश एक बाजार, समझौता खेती और आवश्यक वस्तु अधिनियम के रुप में तीन नए कृषि कानूनों को सरकार कृषि सुधार के रुप में बड़ा कदम बता रही है लेकिन पंजाब के लोगों इससे अपनी मंडियों, न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी और भंडारण की खुली छूट को अपने लिए घातक मान रहे हैं। इसी के चलते पंजाब में 23 सितंबर से ही विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला जारी है। जबकि एक अक्टूबर से रेल सेवा करीब पौने दो महीने तक बंद रही। शंभु बॉर्डर समेत कई जगहों पर किसानों ने मोर्चा खोल दिया था, अलग-अलग किसान संगठन पंजाब में लगातार प्रदर्शन कर रहे थे। इन्होंने हाईवे, टोल, रेल, बड़ी बड़ी कंपनियों के रिटेल स्टोर को भी बंदा करवा दिया था। कृषि कानूनों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई के लिए 26 नवंबर को जैसे पूरे पंजाब ने दिल्ली कूच कर दिया था। हरियाणा के रास्ते दिल्ली को जाने वाले लगभग हर रास्ते पर किसानों के जत्थे नजर आ रहे थे, हरियाणा सरकार उन्हें जहां जहां रोकने की कोशिश करती लेकिन आंदोलनकारी सभी बाधाओं को पार कर आगे बढ़ चले थे।

आंदोलन में पंजाब के परिवारों की भागीदारी की बात करें तो सबसे ज्यादा महिलाएं संगरुर, मानसा, पटियाला आदि जिलों के रास्तों से चलने वाले जत्थों में नजर आई। पटियाला जिले में एक गुरुद्वारे के सामने किसान आंदोलकारियों के लिए लंगर का इंतजाम किया गया था, यही एक ट्राली में आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली यासमीन कौर बैठी थीं। वो मानसा जिले से अपनी बुवा और दो भाइयों (जो उसी के उम्र के आसपास के थे) साथ के दिल्ली जा रही थीं। गांव कनेक्शन ने यासमीन से सवाल किया, बेटा आप इतनी छोटी हो और आंदोलन में शामिल हो, क्या आपको पता है कृषि कानूनों में क्या लिखा है, किसने आपको बताया कि वो किसानों के खिलाफ हैं?" आठवीं की एक छोटी सी बच्ची के लिए ये सवाल पूछना कितना उचित था ये नहीं पता लेकिन आंदोलन में शामिल होने के चलते उनके जवाब का आसपास के कई लोग जैसे इंतजार कर रहे थे।

25 नवंबर की रात में गाँव कनेक्शन की टीम हरियाणा से पंजाब को जोड़ने वाले शंभू बॉर्डर पर पहुंची। फोटो : गाँव कनेक्शन


यसमीन ने कहा- हम दिल्ली में मोदी साहब से ये दसने (कहने) जा रहे कि वो अपने काले कानून वापस लें। इसके लिए पंजाब का बच्चा बच्चा दिल्ली जाएगा, अगर वो बॉर्डर सील करेंगे तो हम तोड़ कर भग जाएंगे। अगर वो लाठीचार्ज करेंगे तो अस्सी पीछे हटने वाले नहीं। हम गुरु गोविंद सिंह के बच्चे हैं डरने वाले नहीं।" यासमीन के बात सुनकर आसपास के लोगों ने जो बोले सो निहाल के नारे लगाए और फिर गांव कनेक्शन ने उससे दूसरा सवाल किया कि क्या वो जानती है कि उनके खेतों में क्या क्या उगाया जाता है? जवाब में थोड़ा ठहर कर यासमीन ने बताया कि जीरी (धान),.कनक (गेहूं), नरमा और कपास सब्जियां सब कुछ उगाया जाता है।"

इसी ट्रक में मौजूद मलकीत कौर (65 वर्ष) बताती हैं, अस्सी पूरा परिवार दिल्ली जा रहा है। खेती तो घर में चलती रहेगी।"

गांव कनेक्शन की टीम किसान आंदोलन कवर करने के लिए अंबाला के रास्ते पटियाला के शंभु बार्डर पहुंची जिसके बाद फतेहगढ़ साहिब पटियाला शहर, संगरुर होते हुए खनौरी बॉर्डर पहुंची। खनौरी बॉर्डर भीषण जाम के चलते हरियाणा के जींद, कैथल वाले मुख्य मार्ग बंद थे। पुलिसकर्मियों और ग्रामीणों की मदद से गांव कनेक्शन की टीम ग्रामीण रास्तों, खेतों और पंगडंडियों पर चलते हुए कैथल और करनाल के रास्ते सोनीपत पहुंची थी जहां, पुलिस ने सोनीपत-पानीपत-दिल्ली हाईवे को कई जगह जाम किया था। पंजाब हरियाणा के ज्यादातर किसान आंदोलनकारी इसी हाईवे के जरिए दिल्ली कूच कर रहे थे।

खनौरी बॉर्डर के अतिरिक्त दूसरे रास्तों पर बच्चों और महिलाओं की संख्या तो ज्यादा नजर नहीं आई लेकिन गुरुदासपुर से करीब 500 किलोमीटर दूर दिल्ली के सिंघू बॉर्डर पर पहुंचे जम्हूरी किसान सभा के जत्थों में सैकड़ों बुजुर्ग जरुर मिले। गुरुदासपुर के किसान गुरुचरण सिंह कहते हैं, "हम जमींदार है, हमारी खेती ही सबकुछ है। हमारे पिता ने हमें खेती दी। हमने अपने बच्चों को और अब आने वाले पीढ़ी की जमीन है ये लेकिन जिस तरह ये काले कानून आए हैं एक दिन हमारी खेती अड़ानी-अंबानी की हो जाएगी। हमको अपनी जमीन बचानी है। इसलिए यहां आए हैं।'

हरियाणा से पंजाब को जोड़ने वाले शंभु बॉर्डर पर पत्थरों और जंजीरों से बैरीकेड्स लगा दिए गए थे, 26 नवंबर को किसान इसे तोड़कर आगे बढ़ गए। फोटो: अरविंद शुक्ला

कृषि कानूनों को अपने अस्तित्व पर खतरा बताते हुए हरियाणा और पंजाब के किसान परिवारों में एक जुट लड़ाई छेड़ रखी है। इनमें जवान, बुजुर्ग और बच्चे सभी शामिल हैं। हजारों वो छात्र भी मिले जो खुद खेती नहीं करते लेकिन उनके परिवार का पेशा खेती है। दिल्ली -हरियाणा को जोड़ने वाले टीकरी बॉर्डर पर

दिल्ली तक पहुंचने के लिए पंजाब और हरियाणा के किसानों में से किसी जत्थे ने 4 तो किसी ने 8 बॉर्डर क्रास किए थे। पुलिस की बैरीकेडिंग तोड़ी थी। पानी की बौछार, आंसू के गैस के गोले और लाठीचार्ज तक सहा था।

सोनीपत में सुबह 7 बजे के आसपास जब किसान पुलिस की बैरीकेडिंग तोड़कर आगे बढ़े तो एक किसान ने कहा कि ये पंजाब से निकलने के बाद हमने ये आंठवीं बैरीकेडिंग तोड़ी है। सरकार ने कई जगह जेसीबी से गड्डे खुदवा दिए थे हमने उन्हें भरकर आएं हैं।"

कृषि कानूनों को लेकर देश में सबसे ज्यादा विरोध पंजाब और हरियाणा में हो रहा है। अक्टूबर महीने में देश के ग्रामीण मीडिया हाउस गांव कनेक्शन ने 16 राज्यों कृषि बिलों के मुद्दे पर रैपिड सर्वे कराया था जिसमें सबसे ज्यादा जागरुकता पंजाब हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में नजर आई थी।सर्वे के अनुसार 67 प्रतिशत किसान तीनों कृषि कानूनों को लेकर जागरूक हैं जिसमें पंजाब और हरियाणा के किसान सबसे ज्यादा जागरूक हैं। ये सर्वे देश के सबसे बड़े ग्रामीण मीडिया संस्थान गांव कनेक्शन के रूरल इनसाइट विंग ने देश के 16 राज्यों के 5,022 किसानों के बीच रैपिड सर्वे कराया था। तीन अक्टूबर से 9 अक्टूबर 2020 के बीच हुए इस फेस टू फेस सर्वे में किसानों से कृषि कानूनों, खुले बाजार, वन नेशन वर्न मार्केट, मंडी, न्यूनतम समर्थन मूल्य, कृषि अध्यादेशों के प्रभाव, किसानों आशंकाओं, केंद्र सरकार और राज्यों सरकार के फैसलों से लेकर कृषि से आमदनी और भविष्य के फैसलों आदि को लेकर सवाल किए गए थे। सर्वे में शामिल 85 फीसदी किसानों ने कहा कि कृषि उनकी आय का प्रमुख जरिया है।

गाड़ी में आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली यासमीन कौर कहती हैं, 'हम काले कानूनों को वापस करवाने आये हैं.' फोटो : दया सागर

देशभर के किसानों के संगठनों ने जिनमें पंजाब कि 31 कृषि यूनियन शामिल हैं ने संयुक्त किसान मोर्चे के तरह 26-27 नवंबर को दिल्ली कूच का ऐलान किया था। सरकार ने कोरोना के संक्रमण को देखते हुए किसानों को न आने के लिए कहा और बातचीत से हल निकालने की बात कही लेकिन कृषि बिलों पर सरकार के सख्त रूख को देखते किसान किसान ने बिना परमिशन मिले ही दिल्ली में धारा 144 के बीच दाखिल हुए और हरियाणा दिल्ली के बॉर्डर पर डेरा डाल रखा है। सिंघु बार्डर पर भी पहले दिन पुलिस और सुरक्षा बलों से किसानों की झपड़ हुई थी लेकिन किसान टस से मस नहीं हुए। आंदोलन में शामिल बुजुर्ग युवाओं को शांत तरीके से अपनी बात रखने की सलाह देते हैं तो खाना बनाने में भी मदद करते हैं। कई युवाओं ने सोशल मीडिया पर किसान आंदोलन को सफल बनाने और आंदोलन को लेकर चल रही कथित अफवाहों से निपटने का भीकाम करते हैं।

सिंधु बॉर्डरर एक ट्राली में मनप्रीत और उनके साथी मोबाइल और लैपटॉप से आंदोलन से जुड़ी फोटो और वीडियो और फोटो सोशल मीडिया (फेसबुक, यूट्बूब, इंस्टाग्राम और ट्वीटर आदि) पर पोस्ट करते हैं वो कहते हैं, यहां (सिंघु बार्डर पर जिनती भी बातें होती हैं वो उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं ताकि पिंड (गांवों में) बैठें लोगों जानकारी होती रही।" साथ ही ये लोग उन तमाम कथित अफवाहों का भी जवाब देते हैं जो किसान आंदोलन को लेकर उड़ाई जाती है। एक एक्ट्रेस का नाम लेते हुए मनप्रीत कहते हैं, अब वो यहां आई नहीं उन्हें कैसे पता चला कि यहां क्या हो रहा है ऐसे सही जानकारी लोगों तक पहुंचा उनका काम है।"

किरनजीत कौर इस आंदोलन की विशेषता बताती हैं, "पंजाब के लोग जैसे पहले मिलजुलकर एक दूसरे की मदद करते थे, वही सहयोग की भावना वर्षों बाद देखने को मिली है। जो जहाँ पर जिस स्थिति में है सबकी यही कोशिश है कि कुछ भी हो जाए सरकार को तीन कृषि कानूनों को वापस लेना ही पड़ेगा। पंजाब के किसानों ने सैनिक का रूप धारण करके फरवरी 1783 में दिल्ली कूच किया था, इस आंदोलन के 237 साल बाद ऐसा हो रहा है जब पंजाब किसान आंदोलन को लीड कर रहा है। इस आंदोलन से लोगों में उत्साह और उर्जा है कि वर्षो बाद ही सही कम से कम हम लोग एकजुट तो हुए।"

पंजाब के किसान छह महीने का राशन लेकर किसान आंदोलन करने पहुंचे हैं. फोटो : गाँव कनेक्शन

किरनजीत कौर 'किसान मजदूर खुदकुशी पीड़ित परिवार कमेटी पंजाब' नाम के एक गैर सरकारी संगठन की स्टेट कंवेनर हैं। इनके अनुसार इस आंदोलन में लाखों की संख्या में किसान, युवा, महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। कई वर्षों से पंजाब के लोगों में राजनैतिक पार्टियों ने बिखराव कर दिया था। लोगों में लीडरशिप खत्म हो गयी थी लेकिन इस आंदोलन में खोई हुई लीडरशिप वापस मिल गयी है।

आंदोलन में शामिल मानसा जिले की अमरजीत कौर (65 वर्ष) कहती हैं, "सरकार को अपने कानून वापस लेने ही पड़ेंगे। हम अपने बच्चों को लेकर आये हैं, हमारे घरों में ताले बंद हैं। खाना बनाने की हम पूरी व्यवस्था करके आये हैं। हम पंजाब तबतक नहीं लौटेंगे जबतक इन तीन कानून को सरकार वापस नहीं ले लेगी। हमारे पास कम जमीन है वो भी हम अगर किसी को करने के लिए दे देंगे तो फिर हम क्या खाएंगे? हमारे बच्चे इतने पढ़े-लिखे नहीं हैं कि उन्हें नौकरी मिल सके, खेतों में काम करके ही हमारा खर्च चलता है।"

महिला किसानों के साथ लम्बे समय से काम कर रहीं सीमा कुलकर्णी इस आंदोलन में शामिल कई पीढ़ियों के बारे में कहती हैं, "पंजाब और हरियाणा के किसान इन तीन कृषि कानूनों के लागू होने के बाद उन्हें खेती में अनिश्चिता नजर आ रही है। पंजाब और हरियाणा के लोगों की पूरी आजीविका खेती से ही सम्बन्ध रखती है। तीन-चार पीढ़ियां शामिल होने की एक वजह मुझे ये भी दिख रही है कि इनके पास रोजगार का कोई और साधन नहीं है। अगर हम आँकड़े देखें तो यहाँ की महिलाएं खेतों में बहुत ज्यादा काम नहीं करतीं लेकिन इस आंदोलन में पुरुषों का पूरा साथ दे रही हैं जिससे ये मूवमेंट थमे नहीं।"

सीमा कुलकर्णी महिला किसानों के लिए पिछले कई वर्षों से सड़क से लेकर संसद तक कानूनी लड़ाई लड़ रही महिला किसान अधिकार मंच (MAKAAM) की सदस्य भी हैं वो आगे कहती हैं, "इस आंदोलन रुके नहीं इसके लिए इन महिलाओं ने घर-घर जाकर राशन एकत्रित किया है। पंजाब हरियाणा में पित्रसत्तात्मक सोच की वजह से इनकी खेती में भले ही भागीदारी कम रही हो लेकिन इस प्रोटेस्ट में इन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है।"

सहयोग- लखनऊ से नीतू सिंह, दया सागर, दिल्ली से अमित पांडेय


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