ओडिशा: अंडों से बाहर निकलकर लाखों की संख्या में लुप्तप्राय ओलिव रिडले कछुओं ने शुरू की अपनी समुद्री यात्रा

गहिरमाथा समुद्री पनाहगाह जज़ीरों में लुप्तप्राय ओलिव रिडले समुद्री कछुओं के रिकॉर्ड घोंसले के बाद सफल इनक्युबेशन से, लाखों बच्चे अंडों से बाहर आकर बंगाल की खाड़ी के पानी में छलांग लगा कर अपने समुद्री जीवन की शुरुआत कर रहे हैं। इन कछुओं के बारे में ज्यादा जानने के लिए इस रिपोर्ट को पढ़ें।

Ashis SenapatiAshis Senapati   12 May 2022 1:34 PM GMT

ओडिशा: अंडों से बाहर निकलकर लाखों की संख्या में लुप्तप्राय ओलिव रिडले कछुओं ने शुरू की अपनी समुद्री यात्रा

लगभग 20 वर्ष की आयु तक पहुंचने के बाद, कछुए के बच्चे उसी समुद्र तट पर फिर से आते हैं जहां वे पैदा हुए थे

ओडिशा के गहिरमाथा समुद्री अभयारण्य में छोटे द्वीपों के आधे मिलियन से ज्यादा ओलिव रिडले कछुओं के घोंसलों का स्थान बनने के एक महीने बाद, उनके बच्चे समुद्री तट पर रेतीले गड्ढों में अपने अंडे के छिलके से बाहर निकलने लगे।

केंद्रपाड़ा जिले के भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान,गहिरमाथा समुद्री पनाहगाह जिसका एक हिस्सा है के संभागीय वन अधिकारी जेडी पाटी ने गाँव कनेक्शन को बताया, "25 मार्च से 28 मार्च तक कुल 501,157 ओलिव रिडले समुद्री कछुओं ने गहिरमाथा में अंडे दिए। एक मादा कछुआ एक वक्त में 80 से 100 अंडे देती है। हमें ये बताते हुए खुशी हो रही है कि अब बच्चे अंडे के छिलके से बाहर निकल कर समुद्र के पानी में प्रवेश कर रहे हैं। पहला बच्चा 9 मई की रात को देखा गया था। "

अधिकारी ने बताया, "मादा कछुए जिनका वजन लगभग 50 किलोग्राम है समुद्र के किनारे पर आए और अपनी पीठ की फ्लिपर्स की मदद से घोंसला बनाया, लगभग 100 अंडे देकर समुद्र में लौटने से पहले घोंसले ढ़क कर छुपा दिया। अंडे गर्म रेत में सेते हैं और मादा कछुआ दोबारा अपने अंडे या बच्चों की देखभाल के लिए नहीं जाता है।

फॉरेस्टर ने गाँव कनेक्शन को बताया कि मादा कछुओं द्वारा अंडे देने के 40 से 45 दिनों के बाद, लगभग दो इंच के कछुओं के बच्चे बाहर निकले और रात की ठंडी हवा में सुकून से अपने घोंसले से बाहर निकले और समुद्र में चले गए।


लुप्तप्राय समुद्री कछुओं की असाधारण प्रजनन की खबर वन्यजीव से मोहब्बत करने वालों और विशेषज्ञों की खुशी के लिए आती हैं जो समुद्री प्रजातियों की हिफाजत में लगे हुए हैं।

फॉरेस्ट गार्ड तैनात, मिसाइल परीक्षण रेंज की रोशनी छुपाई गई

यह पता चला है कि वन रक्षकों को तैनात किया गया है, ताकि कुत्तों, गीदड़ों, पक्षियों और अन्य जानवरों जैसे शिकारियों को कछुओं के खोल से निकलने के दौरान खाने से रोका जासके।

एक वन अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर गांव कनेक्शन को बताया कि गहिरमाथा समुद्र तट के पास अब्दुल कलाम द्वीप (जिसे पहले व्हीलर द्वीप के नाम से जाना जाता था) में मिसाइल टेस्ट रेंज की तेज रोशनी कछुओं के बच्चों के लिए जोखिम पैदा करती है। समुद्र की तरफ जाने के बजाए कछुओं का बच्चे भुमी की तरफ भटकते हैं और तत्काल मौत को दावत देते हैं।

अधिकारी ने बताया, "कछुओं के बच्चों की हिफाजत के लिए रक्षा कर्मियों ने मिसाइल परीक्षण स्थल की तेज रोशनी को छुपाया, जिसके बाद लाखों कछुए सुरक्षित रूप से गड्ढों से समुद्र के पानी में रेंग गए।"

एक मादा ओलिव रिडले समुद्री कछुए की उच्च प्रजनन दर समुद्र के पानी में शिशु कछुओं की उच्च मृत्यु दर से जुड़ी हुई है और एक हजार कछुओं के बच्चे में से केवल एक कछुआ वयस्कता प्राप्त करने के लिए जिंदा रहता है।


दिलचस्प बात यह है कि लगभग 20 वर्ष की आयु तक पहुंचने के बाद, कछुए के बच्चे उसी समुद्र तट पर फिर से आते हैं जहां वे पैदा हुए थे और संभोग में संलग्न होते हैं और मादा कछुआ फर्टिलाइजेशन के बाद अंडे देती थी।

ओडिशा में दुनिया का सबसे बड़ा ओलिव रिडले नेस्टिंग साइट

संरक्षित गहीरमाथा समुद्र तट ओलिव रिडले कछुओं के लिए दुनिया का सबसे बड़ा घोंसला की जगह है। ये शानदार समुद्री रेंगने वाले जानवर, जो अपने जैतून के हरे रंग के गोले से पहचाने जाते हैं, अपने विशाल अरिबदास (अंडे देने वाले एपिसोड के लिए स्पेनिश शब्द) के लिए जाने जाते हैं।

वन अधिकारी पति पाटी ने कहा, "समुद्री कछुओं का घोंसला प्रकृति के सबसे आश्चर्यजनक दृश्यों में से एक है। निस्संदेह समुद्री कछुआ ओडिशा के तट पर सबसे महत्वपूर्ण आकर्षण की वजह है।"

गहिरमाथा में रोकरी जो धामरा मुहाने से हुकीटोला द्वीप तक 1,435 वर्ग किलोमीटर में फैला है, को 1997 में एक समुद्री पनाहगाह घोषित किया गया था।

वन अधिकारी ने कहा, "यह वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत एक अनुसूचित पशु के रूप में लुप्तप्राय कछुओं की रक्षा के लिए किया गया था। इस साल, राज्य सरकार ने कछुओं की हिफाजत के लिए 1 नवंबर से 31 मई तक गहिरमाथा समुद्री पनाहगाह के अंदर मछली पकड़ने की गतिविधियों पर सात महीने का प्रतिबंध लगाया था।"

इस बीच, गहिरमाथा समुद्री कछुए और मैंग्रोव संरक्षण सोसायटी के सचिव हेमंत राउत ने गांव कनेक्शन को बताया कि झींगा फॉर्म, उर्वरक प्लांटों और तट के साथ मौजूद अन्य उद्योगों से निकलने वाले अशुद्ध पदार्थ तटीय क्षेत्र के सूक्ष्म जीवों को और कछुओं की खाद्य श्रृंखला को प्रभावित प्रभावित कर रहे हैं।

उन्होंने बताया, "तट से तेजी से खत्म होते मैंग्रोव जंगलों का बच्चे और वयस्क कछुओं के आहार और प्रजनन पैटर्न पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।"

अंग्रेजी में पढ़ें

अनुवाद: मोहम्मद अब्दुल्ला सिद्दीकी

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