जब बाबा साहेब ने कहा - असमानता के शिकार लोग राजनीतिक लोकतंत्र का ढांचा उड़ा देंगे ...

जब  बाबा साहेब ने कहा - असमानता के शिकार लोग राजनीतिक लोकतंत्र का ढांचा उड़ा देंगे ...संविधान सभा में बोलते हुए बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर।

देश अपना 69वां गणतन्त्र दिवस मना रहा है। एक स्वतंत्र गणराज्य बनने और देश में कानून का राज स्थापित करने के लिए संविधान को 26 नवम्बर 1949 को भारतीय संविधान सभा द्वारा अपनाया गया और 26 जनवरी 1950 को इसे एक लोकतांत्रिक सरकार प्रणाली के साथ लागू किया गया था। 26 जनवरी को इसलिए चुना गया था क्योंकि 1930 में इसी दिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत को पूर्ण स्वराज घोषित किया था। भारत के संविधान के निर्माण में बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की प्रमुख भूमिका थी। वह संविधान विशेषज्ञ थे। अनेक देशों के संविधानों का अध्ययन उन्होंने किया था। भारतीय संविधान का मुख्य निर्माता उन्हीं को माना जाता है। संविधान का निर्माण करने के बाद 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में बाबा साहेब के अंतिम वक्तव्य कुछ इस प्रकार थे...

हमें सिर्फ राजनीतिक लोकतंत्र से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। हमें अपने राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक लोकतंत्र भी बनाना चाहिए। राजनीतिक लोकतंत्र तब तक स्थायी नहीं हो सकता, जब तक इसकी बुनियाद में सामाजिक लोकतंत्र न हो। सामाजिक लोकतंत्र का अर्थ क्या है? इसका अर्थ है एक ऐसी जीवन शैली, जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को जीवन का मूल सिद्धांत मानती हो। इसकी शुरुआत इस तथ्य को मान्यता देकर ही की जा सकती है कि भारतीय समाज में दो चीजें सिरे से अनुपस्थित हैं। इनमें एक है समानता। सामाजिक धरातल पर, भारत में एक ऐसा समाज है जो श्रेणीबद्ध असमानता पर आधारित है। और आर्थिक धरातल पर हमारे समाज की हकीकत यह है कि इसमें एक तरफ कुछ लोगों के पास अकूत संपदा है, दूसरी तरफ बहुतेरे लोग निपट भुखमरी में जी रहे हैं।

ये भी पढ़ें- “खम्मा घणी ... मैं पद्मावती” : इस हंगामे के बीच ज़रा पद्मावती की बात भी सुन लीजिए 

26 जनवरी 1950 को हम एक अंतर्विरोध पूर्ण जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति में हमारे पास समानता होगी, जबकि सामाजिक और आर्थिक जीवन में हम असमानता से ग्रस्त होंगे। राजनीति में हम 'एक मनुष्य, एक वोट' और 'एक वोट, एक मूल्य' वाले सिद्धांत को मान्यता दे चुके होंगे। सामाजिक और आर्थिक जीवन में तथा अपने सामाजिक-आर्थिक ढांचे का अनुसरण करते हुए हम 'एक मनुष्य, एक मूल्य' वाले सिद्धांत का निषेध कर रहे होंगे। ऐसा अंतर्विरोधों भरा जीवन हम कब तक जीते रहेंगे? सामाजिक-आर्थिक जीवन में समानता का निषेध कब तक करते रहेंगे? अगर हम ज्यादा दिनों तक इसे नकारते रहे तो इसका कुल नतीजा यह होगा कि हमारा राजनीतिक जनतंत्र ही संकट में पड़ जाएगा। इस अंतर्विरोध को हम जितनी जल्दी खत्म कर सकें उतना अच्छा, वर्ना असमानता के शिकार लोग राजनीतिक लोकतंत्र के ढांचे को उड़ा देंगे, जिसे इस सभा ने इतनी मुश्किल से खड़ा किया है।

जिस दूसरी चीज का हमारे यहां सर्वथा अभाव है, वह है भ्रातृत्व के सिद्धांत की मान्यता। भ्रातृत्व का अर्थ क्या है? इसका अर्थ है सभी भारतीयों के बीच भाईचारे की भावना- बशर्ते भारतीयों को हम एक जनसमुदाय मानते हों। यह ऐसा सिद्धांत है जो सामाजिक जीवन को एकता और एकजुटता प्रदान करता है, लेकिन इसे हासिल करना कठिन है। कितना कठिन है, इसका अंदाजा यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका के संदर्भ में जेम्स ब्राइस द्वारा लिखे गए ग्रंथ अमेरिकन कॉमनवेल्थ को पढ़कर लगाया जा सकता है।

ब्राइस के ही शब्दों में-

'कुछ साल पहले अमेरिकन प्रोटेस्टेंट एपीस्कोपल चर्च के त्रिवार्षिक सम्मेलन में पूजा पद्धति के बदलाव को लेकर चर्चा चल रही थी। इस दौरान यह जरूरी पाया गया कि छोटे वाक्यों वाली प्रार्थनाओं में ऐसी एक प्रार्थना भी शामिल की जानी चाहिए, जो समूची जनता के लिए हो। न्यू इंग्लैंड के एक प्रतिष्ठित धर्माचार्य ने इसके लिए इन शब्दों का प्रस्ताव रखा- 'ओ लॉर्ड, ब्लेस अवर नेशन' (हे प्रभु, हमारे राष्ट्र पर कृपा करो)। उस शाम तो झटके में इसे स्वीकार कर लिया गया, लेकिन अगले दिन जब इसको पुनर्विचार के लिए लाया गया तो गृहस्थ ईसाइयों ने 'राष्ट्र' शब्द पर कई तरह की आपत्तियां उठा दीं। उनका कहना था कि इस शब्द के जरिए राष्ट्रीय एकता को कुछ ज्यादा ही ठोस रूप दे दिया गया है। नतीजा यह हुआ कि प्रार्थना से इस शब्द को हटा दिया गया। पुराने वाक्य की जगह जो नया वाक्य आया, वह था- 'हे प्रभु, इन संयुक्त राज्यों पर कृपा करो।'

जब यह घटना घटित हुई, उस समय तक संयुक्त राज्य अमेरिका के लोगों में एकजुटता का तत्व इतना कम था कि वे स्वयं को एक राष्ट्र नहीं महसूस कर पाते थे। अगर संयुक्त राज्य अमेरिका के लोग खुद को एक राष्ट्र नहीं मान पाते थे तो भारतीयों के लिए ऐसा मान पाना कितना मुश्किल होगा, यह बात आसानी से समझी जा सकती है। मुझे वे दिन याद हैं जब राजनीतिक मिजाज वाले भारतीय भी 'भारत के लोग' जैसी अभिव्यक्ति पर नाराजगी जताते थे। इसकी जगह 'भारतीय राष्ट्र' उन्हें कहीं बेहतर जान पड़ता था। मेरी राय है कि स्वयं को एक राष्ट्र मान कर हम बहुत बड़ी गलतफहमी पाल रहे हैं। कई हजार जातियों में बंटे हुए लोग भला एक राष्ट्र कैसे हो सकते हैं?

बंधुत्व ही आधार

जितनी जल्दी हम यह मान लें कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अर्थों में हम अभी तक एक राष्ट्र नहीं बन पाए हैं, हमारे लिए उतना ही अच्छा होगा। क्योंकि इस सचाई को स्वीकार कर लेने के बाद हमें एक राष्ट्र बनने की जरूरत महसूस होगी और उसके बाद ही हम इस लक्ष्य को हासिल करने के रास्तों और तौर-तरीकों पर विचार कर पाएंगे। casteइस लक्ष्य को हासिल करना बहुत मुश्किल साबित होने वाला है- अमेरिका में यह जितना मुश्किल साबित हुआ, उससे कहीं ज्यादा। अमेरिका में जाति कोई समस्या नहीं है। भारत में जातियां हैं और जातियां राष्ट्रविरोधी हैं। सबसे पहले तो इसलिए क्योंकि ये सामाजिक जीवन में अलगाव लाती हैं। वे इसलिए भी राष्ट्रविरोधी हैं क्योंकि वे विभिन्न जातियों के बीच ईर्ष्या और द्वेष की भावना पैदा करती हैं। लेकिन अगर हम वास्तव में एक राष्ट्र बनना चाहते हैं तो हमें हर हाल में इन कठिनाइयों पर विजय पानी होगी। वह इसलिए, क्योंकि बंधुत्व तभी संभव है जब हम एक राष्ट्र हों, और बंधुत्व न हो तो समानता और स्वतंत्रता की औकात मुलम्मे से ज्यादा नहीं होगी।

ये भी पढ़ें- बदरका : ‘आज़ाद’ का वो गांव जहां मेरा बचपन बीता

Share it
Top