कभी यह गांव था नक्सली हिंसा से परेशान आज है देश भर में मशहूर

कभी यह गांव था नक्सली हिंसा से परेशान आज है देश भर में मशहूरबिहार के रोहताश जिले का रेहल  गांव : साभार इंटरनेट

बिहार के रोहताश जिले में स्थित कैमूर की पहाड़ियां अपने घने जंगलों के लिए मशहूर हैं। पिछले कुछ दशकों में यहां फैले नक्सलवाद की वजह से भी इस इलाके की चर्चा होती रही है। लेकिन बिहार सरकार ने यहां 1700 फीट की ऊंचाई पर बसे एक गांव रेहल में बिजली, पानी, मोबाइल टावर, बैंक और स्वास्थ्य केंद्र जैसी आधुनिक सुखसुविधा पहुंचाकर इसे फिर से चर्चा में ला दिया है। इस पहल की सबसे अनोखी बात यह है कि इन सब चीजों के लिए बिजली किसी बिजलीघर से नहीं बल्कि सौर ऊर्जा से चलने वाले प्लांट से पैदा की जाती है। इसी आधार पर गांव को कार्बन निगेटिव गांव का भी दर्जा मिला है। बिहार सरकार इस इलाके के बाकी 162 गांवों को भी रेहल की तरह विकसित करने का मन बना चुकी है।

आप आप पूछेंगे कार्बन निगेटिव होता क्या है? कार्बन निगेटिव मतलब इस गांव की रोजमर्रा की गतिविधियों से जितनी कार्बन डाई ऑक्साइड गैस निकलती है उससे ज्यादा उसके आसपास मौजूद पेड़-पौधे सोख लेते हैं। यह तभी हो सकता है जब या तो आप अपने आस-पास हरियाली बढ़ा लें या कार्बन डाई ऑक्साइड निकालने वाले ईंधन का कम से कम इस्तेमाल करें। रेहल तो पहले से ही जंगल के बीच बसा था इसलिए उसे अपने ईंधन का स्रोत बदलना था। रेहल में भी बाकी गांवों की तरह गोबर और लकड़ियों का इस्तेमाल होता था लेकिन उनकी जगह सोलर एनर्जी का प्रयोग करने पर कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा अपने आप कम हो गई। कार्बन डाई ऑक्साइड ग्लोबल वॉर्मिंग के लिए जिम्मेदार गैसों में प्रमुख है।

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इस गांव के विकास की कहानी किसी परीकथा के सच होने जैसी ही है। 2002 में यहां एक वन अधिकारी संजय सिंह की हत्या नक्सलियों ने कर दी थी। नक्सलियों का सक्रिय क्षेत्र होने के कारण यह इलाका रेड कॉरीडोर के नाम से मशहूर हुआ करता था, यहां अधिकारी चुनाव तक कराने में डरा करते थे पर आज यह आलम है कि लोग इस गांव के विकास की बातें करते नहीं थक रहे हैं।

जिस गांव तक पहुंचने के लिए एक पक्की सड़क भी नहीं थी आज वहां दस किलो वॉट एम्पियर का एक सोलर पावर प्लांट है, जबकि एक दस किलो वॉट एम्पियर और एक पच्चीस किलो वॉट एम्पियर के सोलर पावर प्लांट पर काम चल रहा है। इस सोलर प्लांट से मिलने वाली बिजली से एक समय पर ही तीन बल्ब व एक पंखा चलाया जा सकता है। फिलहाल गांव में बैंक, पुलिस स्टेशन, स्वास्थ्य केंद्र, मोबाईल टॉवर और वॉटर सप्लाई जैसे सभी केन्द्रों को सोलर एनर्जी से बिजली दी जा रही है। 3160 की जनसंख्या वाले इस गांव के 162 घरों को भी इसी बिजली से रोशन किया गया है। बहुत ही कम समय में पूरा गांव जैसे बदल गया है। गाँव के सभी घरों में शौचालय, बायोगैस व पक्की नालियां भी बनी हैं।

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रेहल का एक इंटरनेशनल कनेक्शन भी है। रेहल को कार्बन निगेटिव बनाने का आइडिया भूटान से आया है। दरअसल पूरी दुनिया में एक ही कार्बन निगेटिव देश है, भूटान। भूटान का 72% भूभाग जंगलों से ढका हुआ है। वहां इतने पेड़ हैं जो 6 मिलियन टन कार्बन डाई ऑक्साइड सोख सकते हैं जबकि इस देश का खुद का कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन 2.2 मिलियन टन है।

रेहल की ही तरह केरल के वायनाद जिले में भी एक गांव है मीननगदी लेकिन इसे कार्बन न्यूट्रल गांव का दर्जा मिला है। यहां वृक्षारोपण करके, ऑर्गनिक खेती वगैरह करके हरियाली को बढ़ावा दिया गया है। यहां यह गांव जितनी कार्बन डाई ऑक्साइड गैस पैदा करता है उतनी गैस ये पेड़-पौधे सोख लेते हैं। मतलब कार्बन डाई ऑक्साइड का बैलेंस जीरो रहता है।

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