नोटबंदी का एक साल : लघु उद्योगों का सबसे बुरा हाल, कहीं बंद होने के कगार पर तो कहीं कमाई हुई आधी

नोटबंदी का एक साल : लघु उद्योगों का सबसे बुरा हाल, कहीं बंद होने के कगार पर  तो कहीं कमाई हुई आधीकालीन बुनते बुनकर।

लखनऊ। सरकार नोटबंदी की उप्लब्धियां गिना रही है लेकिन इस बात से खुद सरकार भी इनकार नहीं कर सकती कि 1000 और 500 के नोट जब बंद किए गए थे तब छोटे उद्योग धंधों पर इसका व्यापक असर हुआ था। नोटबंदी के वक्त देशभर से ऐसी ख़बरें आ रही थीं कि दिहाड़ी पर काम करने वाले लाखों मज़दूर बेरोजगार हो गए। देश के तमाम ऐसे उद्योग जिस पर लगभग एक पूरे शहर व दूसरी जगह से आए लोगों की अर्थव्यव्था टिकी होती है, उन पर नोटबंदी के प्रभाव को लेकर उस वक्त ज़्यादातर नकारात्मक ख़बरें ही आ रही थीं। क्या एक साल बाद भी ऐसे उद्योगों के हालात वही हैं या स्थिति पहले से सुधर गई है, हमने ये जानने का प्रयास किया। "नोटबंदी का एक साल" के विशेष सीरीज के तहत हम देशभर के प्रमुख लघु उद्योंगों की वर्तमान स्थिति के बारे में आपको बता रहे हैं...

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सबसे पहले बात कालीन बुनकरों की करते हैं। कालीन के कारीगर ज्यादातर बाहर से आते हैं। कालीन निर्यात संवर्धन परिषद (सीईपीसी) के अनुसार देशभर में 20 लाख कालीन बुनकर हैं। इसमें सबसे ज्यादा कालीन बुनकर लगभग 13 लाख भदोही और उसे सटे हुए जिलों में हैं। देश के कालीन निर्माण में इनका योगदान 60 प्रतिशत से ज्यादा है। नोटबंदी के बाद कालीन का व्यापार तेजी से घटा। व्यापारियों को भारी नुकसान हुआ।

सीईपीसी के सदस्य और कालीन व्यापारी भदोही के अब्दुल रब बताते हैं "नोटबंदी के बाद हमारा काम अभी तक उबर नहीं पाया। उस समय पैसे की किल्लत की वजह से जो कारीगर अपने घर लौटे वे आजतक वापस नहीं आए। नोटबंदी के बाद जीएसटी ने रही-सही कसर पूरी कर दी। कारीगर न होने के कारण कालीन कारोबार बेपटरी हो गया है।" वहीं भदोही की युवा व्यापारी पवन दुबे बताते हैं " नोटबंदी ने हमारी कमर तोड़ दी। कारीबर ज्यादातर ओडिश और बिहार के थे। हम उनको पैसे नहीं दे पाए, तो वे वापस अपने घर चले गए और लौट के नहीं आए। हमारा काम बंद होने के कगार पर पहुंच गया है।"

भारत में कालीन उत्पादक क्षेत्र – उत्तर प्रदेश में भदोही, मिर्जापुर, वाराणसी, घोसिया, औराई, आगरा, सोनभद्र, सहारनपुर, सहजनपुर, जौनपुर, गोरखपुर आदि प्रमुख केंद्र हैं। कालीन निर्यात संवर्धन परिषद के अनुसार कई उत्पादन इकाइयों के बंद होने के कारण लगभग 1,000 करोड़ रुपए के निर्यात का नुकसान हुआ है। भारतीय कालीन उद्योग अंतरराष्ट्रीय बाजार की प्रतिस्पर्धा में पिछड़ रहे हैं। चीन और तुर्की जैसे अन्य देश भारत से आगे निकल रहे हैं।

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सीईपीसी के अध्यक्ष महावीर प्रताप शर्मा कहते हैं "नोटबंदी के बाद कालीन के कारोबार पर व्यापक असर पड़ा। शुरुआती 6 महीनों में तो बहुत दिक्कत आई। नोटों की कमी के कारण व्यापार ठप सा हो गया। अब स्थिति ठीक तो है लेकिन जो कारीगर गए वे लौटे नहीं। जीएसटी ने काम और बिगाड़ दिया। "

देश का शायद हो कोई ऐसा व्यापारिक क्षेत्र हो जो नोटबंदी से प्रभावित हुए बिना रहा हो। दिल्ली से महज 150 किलोमीटर से भी कम दूरी पर स्थित ‘ताला नगरी' अलीगढ़ में देश के कुल तालों के 75 प्रतिशत हिस्से का उत्पादन होता है और यहां का ‘अलीगढ़ी ताला' दुनिया में अपनी मजबूती के लिए खासतौर पर मशहूर है। ताला नगरी इण्डस्ट्रियल डेवलपमेंट एसोसिएशन के महासचिव सुनील दत्ता ने बताया, "नोटबंदी के बाद अलीगढ़ का ताला उद्योग भी बंदी की कगार पर पहुंच गया था। क्योंकि इसका ज्यादातर कारोबार नकदी में होता था और 500 और हजार रुपए के नोटों का चलन अचानक बंद हो जाने से चीजें जहां-तहां रुक गईं। अभी कुछ हालात सुधरे जरूर लेकिन नुकसान इतना ज्यादा हो चुका है कि कवर करने में बहुत समय लगेगा।"

उद्योग मंडल एसोचैम के मुताबिक नोटबंदी से लघु एवं मध्यम उद्योग (एसएमई) प्रभावित हुए हैं जिससे रोजगार सृजन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। एसौचैम बिजकॉन सर्वेक्षण के मुताबिक दीर्घावधि में भारत के कॉर्पोरेट जगत के बड़े और संगठित क्षेत्रों को इससे मुनाफा होने की आशा है। सर्वेक्षण में कहा गया है कि नोटबंदी ने तत्काल में एसएमई, ग्रामीण उपभोग और रोजगार सृजन पर नकारात्मक प्रभाव डाला है। यह नकारात्मक प्रभाव मुख्य तौर पर कृषि, सीमेंट, उवर्रक, ऑटोमोबाइल, कपड़ा और खुदरा क्षेत्र पर देखा गया है।

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सर्वे के अनुसार असंगठित क्षेत्र में नोटबंदी के बाद सबसे अधिक नुकसान स्टील सेक्टर में ठेके पर काम कर रहे मजदूरों को हुआ है। अकेले राजस्थान में लगभग 10 हजार से ज्यादा मजदूरों की छंटनी हुई। वहीं उत्तर प्रदेश में पिछले एक साल में चार लाख से अधिक लोगों के रोजगार छीन लिए गए। उत्तर प्रदेश में 75 प्रतिशत उद्योग असंगठित क्षेत्र में है। नोटबंदी के बाद यहां के हालात बद से बदतर होते चले गए। छत्तीसगढ़ में 10,000 से ज्यादा कामगारों की स्टील उद्योग में छंटनी हुई जबकि उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां पर भी 35 फीसदी कामगारों की छंटनी हुई। लघु उद्योग भारती के सदस्य और छत्तीसगढ़ के संयोजक संजय चौबे कहते हैं "मुझे तो नहीं लगता कि नोटबंदी का बहुत ज्यादा असर लघु या मझोले उद्योगों पर पड़ा है। शुरुआत में कुछ दिक्कतें आई थीं लेकिन अब स्थिति सामान्य है। सुधार होने में थोड़ा समय तो लगता ही है।"

उत्तर भारत में होजरी एवं रेडीमेड कपड़ों का सबसे बड़े केंद्र लुधियाना भी नोटबंदी से बुरी तरह प्रभावित हुआ। लुधियाना में करीब 15000 होजरी फैक्ट्री हैं और यहां के कपड़ा कारोबार का सालाना टर्नओवर करीब 13 हजार 511 करोड़ रुपये है। खास बात है कि कुल कारोबार का करीब 70 फीसदी हिस्सा नवंबर महीने में होता है। और पिछले साल इसी समय नोटबंदी का बड़ा फैसला लिया गया। लुधियाना में स्वेटशर्ट एवं टीशर्ट बनाने वाली कंपनी पूनम टेक्सटाइल्स के मालिक हरिंदर सिंह बताते हैं "नोटबंदी से उस समय थोड़ा व्यापार प्रभावित तो हुआ ही था। छोटे व्यापारियों को ज्यादा नुकसान हुआ। स्थिति सुधरने वाली थी लेकिन जीएसटी ने हालात सुधरने नहीं दिए।"

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एक अनुमान के मुताबिक भारत में रेडीमेड कपड़ा उद्योग का आकार करीब 25,000-30,000 करोड़ रुपए का है। उसमें से 10-15 फीसदी हिस्सा ऊनी कपड़ों का है और लुधियाना इसका सबसे बड़ा गढ़ है। पूरे देश में तैयार होने वाले ऊनी कपड़ों का 90 फीसदी कारोबार लुधियाना से ही होता है। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक लुधियाना के कपड़ा कारखानों में 1.06 लाख लोग काम करते हैं। लेकिन पिछले एक वर्षों में इनकी संख्या में कटौती हुई है।

भारतीय अर्थव्यवस्था निगरानी केंद्र (सीएमआईई) के सर्वेक्षण नतीजों ने भी इस समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया है। इस सर्वेक्षण के मुताबिक उत्पादन गिरने के चलते कम मजदूर शहरी इलाकों में बने कारखानों का रुख कर रहे हैं। सीएमआईई के आंकड़े बताते हैं कि नोटबंदी के बाद काम में लगे या काम तलाश रहे लोगों की संख्या काफी कम हुई है। श्रम भागीदारी दर (एलपीआर) में एक फीसदी की गिरावट का यह मतलब है कि बड़ी श्रमशक्ति वाले देश में गहरा रोजगार संकट पैदा हो चुका है।

सूरत का हीरा कारोबार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से करीबन छह लाख लोगों को रोजगार मुहैया कराता है। सूरत के बाजार में हीरा कटिंग और पालिशिंग का काम होता है। 93 प्रतिशत का कारोबार आयात पर और 7 प्रतिशत कारोबार स्थानीय बाजार में होता है। करीबन 250 लाख करोड़ के इस कारोबार में 35 से 40 प्रतिशत हिस्सेदारी है। नोटबंदी से ये व्यापार भी बच नहीं पाया। मिर्जापुर निवासी मुकेश दुबे (29) सूरत के वरछा रोड स्थित एक कंपनी में हीरा घसने का काम करते थे। पिछले साल मुकेश वहां से लौट आए।

मुकेश बताते हैं "नोटबंदी होते ही वहां पैसे की किल्लत होने लगी। मैं जहां काम करता था वहां 100 से ज्यादा कर्मचारी काम करते थे। मालिक से हमें पैसा नहीं मिल पाता था। कुछ इंतजार के बाद ज्यादातर बाहरी लोग अपने घर लौट गए।" वहीं सूरत डायमंड ट्रेडर्स एसोसिएशन के सदस्य दिनेशभाई नावदिया के अनुसार, "नोटबंदी से थोड़ी दिक्कत जरूर हुई, लेकिन साथ ही हीरे के व्यापार को नए सिरे से बेहतर भी किया जा रहा है इसके बाद। शुरूआती दिक्कतों के बाद अब चीजें पटरी पर लौटनी शुरू हो गई हैं, लेकिन जीएसटी से भी हमें काफी दिक्कतें हुईं।"

पिछले साल जनवरी से अक्टूबर की अवधि में औसत श्रम भागीदारी दर (एलपीआर) 46.9 फीसदी रहा था लेकिन नोटबंदी के ऐलान वाले महीने नवंबर में यह तीव्र गिरावट के साथ 44.8 फीसदी पर आ गया था। जनवरी-अप्रैल 2017 में औसत एलपीआर कमोबेश 44.3 फीसदी पर रहा जबकि 2016 की समान अवधि के 46.9 फीसदी की तुलना में यह काफी कम था।

एलपीआर में तीव्र गिरावट के साथ ही वर्ष 2017 के पहले आठ महीनों में करीब 20 लाख लोगों के बेरोजगार होने का भी अनुमान है। सीएमआईई के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी महेश व्यास कहते हैं, 'जनवरी-अप्रैल 2017 में करीब 15 लाख लोगों की नौकरी चली गई। उसके बाद मई-अगस्त अवधि में करीब पांच लाख अन्य लोग भी बेरोजगार हो गए। इस तरह वर्ष 2017 के पहले आठ महीनों में ही 20 लाख लोग नौकरी गंवा चुके हैं। हालांकि यह साफ तौर पर नहीं कहा जा सकता है कि इन लोगों की बेरोजगारी के लिए नोटबंदी या कोई दूसरा आर्थिक कारण ही जिम्मेदार है।'

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कानपुर कभी अपने चमड़ा उद्योग और जूतों के लिए मशहूर हुआ करता था, पर नोटबंदी के बाद से कारखानों में बंदी की आहट सुनाई पड़ने लगी। कुछ साल पहले तक कानपुर में विदेशी खरीददारों की आमद होती रहती थी। रेड टेप, बाटा, हश पप्पिज, गुच्ची, लुइस वितों जैसे लगभग हर बड़े ब्रांड को चमड़े की सप्लाई कानपुर से होती थी। कानपुर के नई सड़क इलाके में प्रदेश की सबसे बड़ी चमड़ा मंडी है। 2014 से पहले तक यहां रोज 20-25 ट्रक खाल आती थी। लगभग 1200 मजदूर काम करते थे। यहां 500 रजिस्टर्ड कारोबारी थे।

एक ट्रक खाल का माल पहले 15-16लाख तक आता था। पेच बाग में खाल को नमक लगा कर रखा जाता था और फिर टेनरी भेजा जाता था। वहां उसको फिनिश करके फैक्ट्री में भेजा जाता था जिससे जूते, घोड़े की काठी, बेल्ट, पर्स और अन्य आइटम बनते थे। कुल 6000 करोड़ का टर्नओवर होता है जो भारत में तमिलनाडु के बाद दूसरे नंबर पर है। सीधे तौर पर 2 लाख और अप्रत्यक्ष रूप में 20 लाख लोगों को रोजगार मिलता है। मौजूदा समय में कुल 300 ट्रेडर्स बचे हैं, खाल भी अब 2-4 ट्रक एक हफ्ते में आती है। नतीजा ये हुआ है कि बहुत से ट्रेडर्स ने अपना धंधा छोड़ कर रेडीमेड कपड़े की दुकान खोल ली है।

नोटबंदी से आगरा का जूता कारोबार मुश्किल में आ गया था। पूरे आगरा में छोटे-छोटे करीब 10 हजार से ज्यादा कुटीर उद्योग हैं जो इस जूता उद्योग से जुड़े हैं। यहां के 40 फीसदी लोगों की रोजी-रोटी इसी धंधे से चलती है। नोटबंदी की मार सबसे ज्यादा जूता उद्योग पर पड़ी है, क्योंकि यहां पूरा काम नकद लेन-देन पर चलता है। यहां काम करने वाले कारीगरों को रोज पैसे चाहिए होता है।

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इन सबके अलावा मुरादाबाद का पीतल व्यापार, बनारस में साड़ी का कारोबार, फिरोजाबाद का कांच उद्योग और सूरत में साड़ी मैनुफक्चरिंग। इन सब पर नोटबंदी का आंशिक और व्यापक असर तो पड़ा ही है। एक साल हो जरूर गया लेकिन नोटबंदी के असर से देश का व्यापार क्षेत्र अभी तक उबर नहीं पाया है।

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