वो फसलें जिनके भाव कम या ज्यादा होने पर सरकारें बनती और बिगड़ती रही हैं

सब्जियों और दालों के रेट को लेकर भारत में सरकारें बनी और गिरी हैं। प्याज के अलावा लहसुन और टमाटर वे फसलें हैं, जिनके भाव कम-ज्यादा होने पर जनता और किसान परेशान हुए तो सरकारों को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ा है। इससे न कांग्रेस बच पाई है, न कई राज्यों में भाजपा।

वो फसलें जिनके भाव कम या ज्यादा होने पर सरकारें बनती और बिगड़ती रही हैं

लखनऊ। वो राजनीति का इंदिरा गांधी काल था। आपातकाल के बाद पहली बार देश में जनता पार्टी की गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी। केंद्र में वापसी के लिए जोर-आजमाइश कर रही कांग्रेस को कोई मुद्दा नहीं मिल रहा था, इसी बीच प्याज के दाम बढ़ गए। कांग्रेस ने इसका जबरदस्त सियासी इस्तेमाल किया। संसद में कई कांग्रेसी नेता प्याज की माला पहन कर पहुंच गए थे, कुछ समय बाद जनता पार्टी की सरकार गिर गई थी, कई मुद्दों के अलावा इसमें एक पेंच प्याज के भाव का भी था।

सब्जियों और दालों के रेट को लेकर भारत में राजनीतिक दलों की सरकार बनी और बिगड़ी हैं। प्याज के अलावा लहसुन और टमाटर वे फसलें हैं, जिनके भाव कम-ज्यादा होने पर जनता और किसान परेशान हुए तो सरकारों को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ा है। इससे न कांग्रेस बच पाई है, न कई राज्यों में भाजपा।


1980 में प्याज की माला पहनकर देश भर में घूमी थीं इंदिरा गांधी

वर्ष 1980 में जनता पार्टी की सरकार गिरने के बाद कांग्रेस फिर सत्ता में आ गई थी, लेकिन सरकार बनने के करीब एक साल बाद फिर जनता को प्याज के आंसू निकलने लगे थे। इस बार प्याज को तीर बनाने की बारी विपक्षियों की थी और उन्होंने सड़क से संसद तक इसका खूब इस्तेमाल किया। प्याज ने सिर्फ कांग्रेस को ही नहीं सताया, जिस भी सरकार में इसके भाव कम या ज्यादा हुए, पार्टी और सरकार को उसका खामियाजा भुगतना पड़ा।

प्याज ने शीला दीक्षित के भी आंसू निकाले

वर्ष 1998 में अटल बिहारी वाजपेई केंद्र में सत्ता में थे, और दिल्ली में भाजपा सरकार की वर्तमान विदेश मंत्री सुषमा स्वराज उन दिनों दिल्ली की मुख्यमंत्री थी, प्याज के दाम 100 रुपए किलो तक पहुंच गए थे और जनता ने भाजपा को दिल्ली की सत्ता से बाहर कर दिया था। इसके 15 साल बाद यानि 2013 में शीला दीक्षित को प्याज ने आंसू निकाले।

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प्याज-लहुसन के रेट बढ़ने पर उसे खाने वाले परेशान होते हैं तो संसद तक हंगामा मच जाता है, लेकिन यही फसलें जब माटी मोल होती हैं तो किसान की रीढ़ टूट जाती है। नाराज किसान सड़कों पर उतरते हैं। साल 2013 के बाद 2015 वो साल था, जब प्याज 100 रुपए किलो और लहसुन 200 रुपए किलो तक पहुंच गया था, लेकिन साल 2018 में मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के कई इलाकों में प्याज 50 पैसे तो लहसुन 1 और दो रुपए किलो तक पहुंच गया।

जब 2 रुपए किलो पहुंच गया लहसुन तो…

पिछले वर्ष मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र से लेकर कई राज्यों में किसान सड़कों पर उतरे थे, उसकी एक वजह इन फसलों के भाव न मिलना था। वर्ष 2017 के किसान आंदोलन में, जिस मंदसौर जिले में 6 किसानों की गोली से मौत हो गई थी, वहां इस वर्ष कई घरों में लहसुन की बोरियां पड़ी हुई हैं, क्योंकि थोक में 10 से लेकर 50 रुपए किलो तक बिकने वाला लहसुन 2 रुपए किलो पहुंच गया है।

प्याज और लहसुन के भाव की उठापठक ने मध्य प्रदेश में पिछले 14 वर्षों से सत्ता संभाल रहे शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ कांग्रेस को मुद्दा दे दिया है। पिछले साल के किसान आंदोलन में जान गंवाने वाले कन्हैयालाल पाटीदार की मां के घर में 8 कुंतल तो बबलूपाटीदार के भाई के घर में करीब 25 कुंतल लहसुन रखा है।

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मंदसौर में मल्हारगढ़ ब्लॉक में गर्रावद गांव के किसान मनोज सिंह चौहान कहते हैं, "25-30 कुंतल लहसुन घर में रखा है। मंडी में 300 से 800 रुपए प्रति कुंतल का रेट मिल रहा है। जबकि कम से कम 10 रुपए किलो तो लागत आती है। इस रेट पर बेचने से अच्छा है, सड़ जाए। सरकार हम लोगों का हक मारकर खाने वालों (उपभोक्ता) को राहत दे रही है।"


साल 2018 में मध्य प्रदेश में लहसुन 1 और दो रुपए किलो तक पहुंच गया है

जखीरेबाजों की साजिश का काम

लहसुन,प्याज के रेट सरकारों पर पड़ने वाले असर के बारे बात करने पर गाँव कनेक्शन के प्रधान संपादक डॉ. एसबी मिस्र कहते हैं, "प्याज-लहसुन, टमाटर जैसी फसलों की कीमतों का बढ़ना-घटना सरकार की दीर्घकालिक नीति का न होना और जखीरेबाजों (बिचौलिए-कारोबारी) की साजिश का काम है। जनता दल की सरकार गिरने की एक वजह प्याज थी, उस वक्त नाराज अटल जी (अटल बिहारी वाजपेई) ने कहा था, अब खाओ प्याज। बाद में भी कई सरकारों के लिए लहसुन-प्याज की कीमतें मुसीबत बनीं।"

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वो आगे बताते हैं, "पहले कई वर्षों में एक बार ऐसा होता था कि किसी चीज के दाम बढ़ते थे, लेकिन आजकल साल में कई बार ऐसा होता है। कभी प्याज 100 रुपए किलो हो जाता है तो कभी 2 रुपए किलो के खरीदार नहीं मिलते। एक बड़ी समस्या है कि इन सबके महंगे होने का फायदा किसानों को नहीं मिलता। सरकार की नीति हमेशा उपभोक्तावादी रही है, उनके खाने वालों के हिसाब से काम किया, कोई रणनीति बनाई नहीं, जब प्याज महंगा हुआ पाकिस्तान से मंगा लिया, हमारे किसानों के यहां ज्यादा होने पर उसे बाहर भेजने का इंतजाम नहीं होता।"

अब किसान गांव बंद नहीं, वोटबंदी करेंगे

मध्य प्रदेश समेत देश के सात राज्यों में 1 जून से लेकर 10 जून तक किसानों ने गांव बंद यानि हड़ताल की। किसान संगठन गेहूं-धान की तरह सब्जियों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने की मांग कर रहे थे, ये समर्थन मूल्य भी लागत पर डेढ़ गुना की मांग है।

गांव बंद में जोरशोर से जुटे रहे मध्य प्रदेश के गैर सरकारी किसान संगठन 'आम किसान यूनियन' के केदार शंकर सिरोही कहते हैं, "पिछले कई वर्षों से प्याज-लहसुन उगाने वाले किसान परेशान हैं। किसान के खेत का लहसुन 3 रुपए किलो जाता है, कारोबारी उसे 30-40 में बेचता है, लेकिन आम उपभोक्ता को ये 60 रुपए किलो मिलता है, ये 57 रुपए का मुनाफा कोई और ले जाता है। 'गांव बंद' का मकसद यही था कि ये 57 रुपए भी किसान को मिले। अगर यही हाल रहा तो आने वाले चुनावों में गांव बंदी के बाद किसान वोटबंदी करेंगे।"

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