देश की मिट्टी में रचे बसे देसी बीज ही बचाएंगे खेती, बढ़ाएंगे किसान की आमदनी

हरित क्रांति के दुष्परिणामों के बाद खेती के तरीकों में बदलावों के बीच जैविक खेती की बात हो रही है और पुराने बीजों पर भरोसा जताया जा रहा है, खेती के बदलते स्वरूप पर गाँव कनेक्शन की विशेष सीरीज का भाग- 2

देश की मिट्टी में रचे बसे देसी बीज ही बचाएंगे खेती, बढ़ाएंगे किसान की आमदनी

सीरीज का पहला भाग : जलवायु परिवर्तन और कंपनियों का मायाजाल तोड़ने के लिए पुरानी राह लौट रहे किसान?

लखनऊ। भारत के ग्रामीण इलाकों में जहां बीज की दुकानें हाईब्रिड बीजों से भरी पड़ी हैं और देश में बदलते मौसम में ये हाईब्रिड बीज दम तोड़ रहे हैं, वहीं लाखों किसान अब देसी बीज चाहते हैं।

पारंपरिक और जैविक खेती के साथ अब देसी बीजों पर भरोसा जताया जा रहा है क्योंकि ये सूखा और बाढ़ दोनों मौसम में अपेक्षाकृत बेहतर उत्पादन देने की क्षमता रखते हैं। दूसरी ओर, करोड़ों रुपए लगाकर बहुराष्ट्रीय कंपनियां हाईब्रिड बीजों का प्रचार-प्रसार भी कर रही हैं।

"जो किसान हाईब्रिड और विदेशी बीजों का खेल समझ गए हैं। वो अब देसी बीज ही अपना रहे हैं क्योंकि चाहे पानी ज्यादा बरसे या सूखा पड़े हमारे देसी फसल तैयार हो जाती है लेकिन हाईब्रिड बीज वाली फसलें मौसम में ज्यादा अंतर आने पर बर्बाद हो जाती हैं। मेरे पास हर साल सैकड़ों किसान देसी बीज लेने आते हैं।" बाबूलाल दहिया बताते हैं। 75 साल के बाबूलाल दहिया मध्य प्रदेश में सतना जिले के पिथौराबाद गाँव के रहने वाले हैं। उनके पास देसी धानों की 130 जिंसों समेत 200 किस्मों के बीज हैं। ये बीज उन्होंने 40 जिलों की यात्रा कर जमा किए हैं। बाबूलाल दहिया के मुताबिक अगर देसी बीज नहीं बचे तो खेती भी नहीं बचेगी।


किसानों को स्थायी समाधान देने होंगे

"खेती को बचाना है तो पुरानी विधियों और देसी बीजों की तरफ लौटना ही होगा। देसी बीज हजारों वर्षों में हमारे पर्यावरण और खेत के हिसाब से रचे बसे हैं। अगर उनमें कुछ खामियां हैं तो उन्हें दूर कर किसानों को स्थायी समाधान देने होंगे।" देसी बीजों का समर्थन करते हुए डॉ. एमएस बसु कहते हैं। डॉ. बसु आईसीआर के पूर्व निदेशक (गुजरात) हैं। वो इक्रीसैट के अलावा संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ काम कर चुके हैं।

खेती को बचाना है तो पुरानी विधियों और देसी बीजों की तरफ लौटना ही होगा। देसी बीज हजारों वर्षों में हमारे पर्यावरण और खेत के हिसाब से रचे बसे हैं। मुक्ति सदन बसु, पूर्व निदेशक, आईसीएआर

आजादी के बाद पहले दशक तक भारत की खेती पूरी तरह देसी बीजों और तरीकों पर निर्भर थी, लेकिन पहले के बड़े अकालों और देश की बढ़ती जनसंख्या के चलते देश में खाद्य संकट पैदा हो गया था। जनसंख्या का पेट भरने के लिए देश में हरित क्रांति शुरू हुई और मैक्सियों के गेहूं भी मंगवाए गए। इसके बाद देश में तेजी से गेहूं का उत्पादन बढ़ा और इसी के साथ संकर बीजों की मांग बढ़ने लगी।

यह भी पढ़ें: मिट्टी, पानी, हवा बचाने के लिए याद आई पुरखों की राह

देश से 1970 के दशक तक देसी बीज गायब होने लगे थे। भारत के बीज बाजार पर देसी-विदेशी कंपनियों का कब्जा होने लगा था। मैक्सियों से आए बौनी प्रजाति के गेहूं से उत्पादन तो खूब होता था लेकिन इसकी कई खामियां थीं। उन्हें ज्यादा उर्वरक (यूरिया-डीएपी) चाहिए थी। मानसून पर निर्भर भारतीय खेती में सिंचाई का खर्च तेजी से बढ़ रहा था, क्योंकि इन्हें ज्यादा पानी चाहिए था। हाईब्रिड बीजों में रोग ज्यादा लगते थे, फसल में खरपतवार ज्यादा होता, नतीजतन किसानों ने कीट और खरपतवार नाशक डालने शुरू किए और फिर देश में अरबों रुपए का कीटनाशक बाजार खड़ा कर दिया गया।

उदारीकरण के बाद दुनिया की सबसे ताकतवर कंपनियों ने भारत को अवसर के रूप में लिया और अपना जाल बिछा लिया। मोनसेंटे इंडिया, सिंजैंटा इंडिया लिमिटे, बायर क्राप साइस और पायनियर हाईब्रिड इंटनेशनल इंक जैसी कंपनियां बीज सेक्टर में करोड़ों रुपए का निवेश कर अरबों रुपए कमा रही हैं।

देसी बीजों के जीन में कई तरह के गुण होते हैं, एक समस्या आती है तो जीन का दूसरा गुण उसे सही कर लेता है। जबकि हाइब्रिड बीजों को एक विशेष रोग या वायरस से मुक्त बनाया जाता है लेकिन 10 साल बाद वो वायरस दोबारा उस पर हमला कर सकता है। - डॉ. वीना गुप्ता, प्रमुख वैज्ञानिक, जर्मप्लाज संरक्षण विभाग, एनबीपीजीआर

कृषि जानकारों के मुताबिक भारत में जितना कृषि शोध बजट है उससे ज्यादा की रॉयल्टी मोनसेंटों को हर साल मिलती है। अगर आप पिछले कुछ वर्षों के आयात पर नजर डालेंगे तो आंकड़े भी गवाही देंगे। साल 2014-15 में 22,292 टन, 2015-16 में 23,477 टन और 2016-17 में 21,064 टन बीजों का आयात किया गया। इसमें से अधिकतर फल, फूल, सब्जियों आदि के साथ अन्न के बीज शामिल हैं।

एमएस बसु इसे मल्टीनेशन कंपनियों की सोची समझी साजिश बताते हैं। देसी बीजों को बचाने में जुटे बाबूलाल दहिया के मुताबिक संकर बीजों, उर्वरकों और कीटनाशकों के खर्च ने खेती को घाटे का सौदा बना दिया। परंपरागंत देसी बीजों की खूबियां गिनाते हुए बाबूलाल दहिया कहते हैं, "धान की एक भारतीय किस्म है नेवारी, जो 120 दिन में होती है। इसी तरह एक डेवलप वैरायटी है आईआर 120, दोनों को अगर अगस्त महीने में बोएंगे तो नेवाड़ी धान 90 दिन में ही तैयार हो जाएगा क्योंकि वो हमारे मौसम के अनुकूल है, जबकि आईआर नवंबर में कटेगा, यानि तब सर्दियां शुरू हो गई होंगी, धान की बालियां काली हो जाएंगी, यानि उत्पादन कम हो जाएगा, ये अंतर है।"

हाईब्रीड बीज महंगे और दोबारा बोने पर नहीं देते अच्छी पैदावार

अपनी संस्था नवदान्या के जरिए देसी बीजों को बचाने में जुटी हैं डॉ. वंदना शिवा।अपनी संस्था नवदान्या के जरिए देसी बीजों को बचाने में जुटी हैं डॉ. वंदना शिवा।

हाईब्रिड यानी संकर बीजों की सबसे बड़ी समस्या है कि ये काफी महंगे हैं और इनमें से ज्यादातर दोबारा बीज के रूप में बोने पर पैदावार नहीं मिलती। महाराष्ट्र में कपास किसानों की बर्बादी और आत्महत्या के पीछे ऐसे ही मॉडिफाइड बीज हैं। यहां के किसानों ने जब से बीटी कॉटन उगाना शुरू किया, फसल बर्बादी और रोग कीट की जटिल जानलेवा समस्या में फंसते चले गए।

जबकि हकीकत यह है कि बढ़ती लागत और उपज का बेहतर मूल्य न मिलने से संकट का सामना कर रहे 60-70 फीसदी किसान अपने खेतों का ही बीज दूसरे साल प्रयोग करते रहे हैं। ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर किसानों के सामने किफायती मूल्यों पर गुणवत्ता वाले बीजों की समस्या है।

किसानों को प्रमाणित बीज उपलब्ध कराने के लिए 1963 राष्ट्रीय बीज निगम की स्थापना हुई थी, ये सरकारी संस्था करीब 600 किस्म के बीजों का उत्पादन करती है। कई दूसरी सहकारी संस्थाएं भी हैं लेकिन देश के करीब 600 करोड़ से ज्यादा के बीज कारोबार का 75 फीसदी हिस्सा निजी हाथों में है। जहां 500 से ज्यादा देसी विदेशी कंपनियां काबिज हैं।

देश में किसानों की आमदनी बढ़ाने की बात हो रही है। टिकाऊ खेती की भी बात हो रही है और जीरो बजट से लेकर जैविक खेती की भी। लेकिन पूरी रणनीति में कहीं भी बीजों के समग्र विकास की चिंता नजर नहीं आ रही है और न ही देसी बीजों को बचाने की। जबकि देसी बीज ही हैं जो देश की जनसंख्या की भूख और किसानों की झोलियां भर सकते हैं।- अरविंद कुमार सिंह, ग्रामीण मामलों के जानकार

बीजों के समग्र विकास की चिंता नहीं

ग्रामीण मामलों के जानकार और देश के वरिष्ठ कृषि पत्रकार अरविंद कुमार सिंह अपने कॉलम #खेतखलिहान में लिखते हैं, "देश में किसानों की आमदनी बढ़ाने की बात हो रही है। टिकाऊ खेती की भी बात हो रही है और जीरो बजट से लेकर जैविक खेती की भी। लेकिन पूरी रणनीति में कहीं भी बीजों के समग्र विकास की चिंता नजर नहीं आ रही है और न ही देसी बीजों को बचाने की। जबकि देसी बीज ही हैं जो देश की जनसंख्या की भूख और किसानों की झोलियां भर सकते हैं।"

यह भी पढ़ें: किसानों की जिंदगी और खेती को जहरीला कर रहीं कीटनाशक कंपनियां

भारत में दुनिया का तीसरा बड़ा बीज बैंक- साढ़े चार लाख पार हो गई बीजों की संख्या

देश में विलुप्त होती बीजों को संरक्षित करने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के तहत राष्ट्रीय पौध आनुवांशिक संसाधन ब्यूरो (एनबीपीजीआर) ने राष्ट्रीय जीन बैंक बनाया है। ये दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा जीन बैंक है। यहां माइनस 20 डिग्री तामपान पर 4,34,946 बीज संरक्षित हैं।

एनबीपीजीआर में जर्मप्लाज संरक्षण विभाग की प्रमुख वैज्ञानिक डॉ वीना गुप्ता कहती हैं, "देखिए मार्च में गेहूं पकता है। उस दौरान अगर 2 डिग्री तापमान ज्यादा हो जाए तो संकर किस्म के गेहूं के दाने मर जाते हैं, जिसका उत्पादन पर असर पड़ेगा। लेकिन हमारे पास ऐसी कई वैरायटी हैं जो इस बढ़ते तापमान में अच्छा उत्पादन देंगी। ऐसी किस्मों को और बढ़ावा दिए जाने की जरूरत है।" किसान इसे अपनी भाषा में खेत होरा या लू लगना भी बोलते हैं।

एनबीपीजीआर में देश के विभिन्न इलाकों की देसी, परंपरागत और जंगल प्रजातियों के जीन को सुरक्षित रखा गया है। सरकारी या किसी निजी संस्था को बीज उत्पादन के लिए ये जरूरत के मुताबिक दिए जाते हैं। इस संस्थान में बीजों की संख्या साढ़े चार लाख के पार हो गई है।


जलवायु परिवर्तन के दौर में देसी बीज कैसे किसानों के लिए मुफीद हैं, डॉ. वीना गुप्ता समझाती हैं, "पचास डिग्री से लेकर माइनस 50 डिग्री तक तापमान जाता है। ऐसे में हमारे बीज परिस्थिति के हिसाब से ढले हुए हैं। देसी बीजों के जीन में कई तरह की क्वालिटी होती है, एक समस्या आती है तो जीन का दूसरा गुण उसे सही करने में मदद करता है। जबकि हाइब्रिड बीजों को एक विशेष रोग या वायरस से मुक्त बनाया जाता है लेकिन 10 साल बाद वो वायरस दोबारा उस पर हमला कर सकता है।"

डॉ. वीना देसी बीजों की हिमायत के साथ उनमें परिस्थिति और आज की जरूरत के अनुसार शोधन करते नए बीज तैयार करने पर जोर देती हैं। इस जीन बैंक में चावल, गेहूं, मक्का, बाजरा, चना, सरसों, बैंगन और आम सहित 15 श्रेणियों को प्राथमिकता दी गई है।

धान की 17 हजार से ज्यादा किस्में

भारत के जाने माने कृषि वैज्ञानिक डॉ. आर.एच. रिछारियां के नाम पर छत्तीसगढ़ में एक संस्थान हैं। जहां उनके द्वारा खोजी और सूचीबद्ध की गई धान की 17 हजार से ज्यादा किस्में हैं। डॉ. रिछारिया ने हरित क्रांति के दौर में गेहूं-धान की बौनी किस्मों और उसकी तकनीकों को चुनौती दी थी, उन्होंने साबित किया था कि देसी किस्में हरित क्रांति वाली किस्मों से कमतर नहीं हैं।

जिन्हें स्वास्थ्य और पोषण की समझ हो गई है वो देसी बीज को तवज्जो दे रहे हैं। पढ़े लिखे लोगों ने देसी बीजों के पोषक शक्ति को समझा है। मेरे जैसे कई सैकड़ों लोग इन बीजों को खोज, संरक्षित और संवर्धित कर रहे हैं। अभी यौगिग, प्राकृतिक या जैविक खेती करने वाले किसान मांग रहे हैं, रासायनिक खेती वाले किसान इससे दूर हैं। - पीएस बारचे, प्रसार अधिकारी, कृषि विभाग, मध्य प्रदेश

"जिन्हें स्वास्थ्य और पोषण की समझ हो गई है वो देसी बीज को तवज्जो दे रहे हैं। पढ़े लिखे लोगों ने देसी बीजों के पोषक शक्ति को समझा है। मेरे जैसे कई सैकड़ों लोग इन बीजों को खोज, संरक्षित और संवर्धित कर रहे हैं। अभी यौगिग, प्राकृतिक या जैविक खेती करने वाले किसान मांग रहे हैं, रासायनिक खेती वाले किसान इससे दूर हैं।" पीएस बारचे कहते हैं।

मध्य प्रदेश सरकार के कृषि विभाग में प्रसार अधिकारी पीएस बारचे देसी बीजों के लिए पूरे देश का चक्कर लगाते नजर आते हैं। वो किसानों को देसी बीज देते हैं यहां तक वो शादी और दूसरे समारोह में देसी बीज उपहार स्वरूप देने का चलन चला रहे हैं।

देश में कई संस्थाएं और सामाजिक लोग देसी बीजों को बचाने और उन्हें आगे बढ़ाने में लगे हैं। पद्मश्री सुभाष पालेकर, नागपुर में वर्षा से डॉ. विभा गुप्ता, देहरादून की पर्यावरणविद डॉ. वंदना शिवा, उत्तराखंड के विजय जड़धारी, ज्ञानेंद्र रावत, बाबूलाल दहिया, पीएस बारचे, आकाश चौरसिया जैसे देश के कई कोनों में लोग हैं जो इन बीजों को बचाने में सार्थक पहल कर रहे हैं।

देसी बीज की जरूरत क्यों

देसी बीज की जरूरत क्यों है, पीएस बारचे के आखिरी वाक्य से समझा जा सकता है, "पेट भरने के जुगाड़ में देश ये बीमार हो गया था।"

वो अपनी बात का अर्थ समझाते हैं, "भारत में अनाज तो खूब हो रहा है, लोगों को खाना भी मिल रहा है। लेकिन जिन चीजों से लोगों को पोषण मिल रहा, अनाज, फल और सब्जियां उनमें पोषक तत्व का अभाव है, कुपोषण से जूझ रहे देश की ज्यादातर बीमारियां संकर फसलों के प्रतिकूल प्रभावों और पोषण न होने से हैं।"

यह भी पढ़ें: खेत उगलेंगे सोना, अगर किसान मान लें ' धरती पुत्र ' की ये 5 बातें

ये भी पढ़ें- ये है विश्व का तीसरे नंबर का सबसे बड़ा बीज बैंक, जहां संरक्षित हैं चार लाख से अधिक बीज

यह भी पढ़ें: 2019 की उल्टी गिनती : नरेंद्र मोदी से लेकर राहुल गांधी तक हर बड़े नेता की जुबान पर बस किसान, किसान, किसान

अगले पेज में देखें देसी बीजों की कुछ तस्वीरें...


Share it
Share it
Share it
Top