जलवायु परिवर्तन: जैविक कीटनाशक और प्राकृतिक उपाय ही किसानों का 'ब्रह्मास्त्र'

अमेरिका की वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने हाल में अपनी रिपोर्ट में कहा कि आने वाले दिनों में बढ़ते तामपान की वजह से फसलों पर कीट और रोगों का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा। वैज्ञानिकों को डर है कि बढ़े तापमान पर कीटों की प्रतिरोधक क्षमता विकसित होगी, यानि ये कीटनाशक असरदार नहीं रह जाएंगे।

जलवायु परिवर्तन: जैविक कीटनाशक और प्राकृतिक उपाय ही किसानों का ब्रह्मास्त्र

सीरीज का पहला भाग: जलवायु परिवर्तन और कंपनियों का मायाजाल तोड़ने के लिए पुरानी राह लौट रहे किसान?

लखनऊ। भारत समेत पूरी दुनिया की खेती बदलाव के दौर से गुजर रही है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के दुष्परिणामों के साथ ही जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कृषि वैज्ञानिक और जानकार अब प्राकृतिक उपायों और जैविक कीटनाशकों को ही एकमात्र समाधान बता रहे हैं।

अमेरिका की वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने हाल में अपनी रिपोर्ट में कहा कि आने वाले दिनों में बढ़ते तामपान की वजह से फसलों पर कीट और रोगों का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा। वैज्ञानिकों को डर है कि बढ़े तापमान पर कीटों की प्रतिरोधक क्षमता विकसित होगी, यानि ये कीटनाशक असरदार नहीं रह जाएंगे।

दुनिया में सबसे ज्यादा कीटनाशकों का इस्तेमाल यूरोप के ब्रिटेन में होता है। ब्रिटेन की साउथैंप्टन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर गाय पौपी ने इन कीटों को नियंत्रित करने के लिए जैविक उपायों पर जोर दिया है। साथ ही उन्होंने विकल्प के रूप में बुवाई के समय में परिवर्तन, फसल चक्र और ऐसे कीटों के हमलों से प्रतिरक्षित फसल उगाने की सलाह दी।

बढ़ते तापमना से कीटों में कीटनाशकों के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो सकती है। इसका मतलब है कि हमें कीटों को नियंत्रित करने के लिए जैविक उपायों का इस्तेमाल बढ़ाना होगा।

- प्रो. गाय पौपी, साउथैंप्टन यूनिवर्सिटी, ब्रिटेन (एक रिपोर्ट में)

यूरोप के प्रोफेसर जिस उपाय की बात कर रहे हैं, कभी वो भारतीयों किसान का मुख्य आधार हुआ करता था, देसी बीजों से प्राकृतिक खेती और फसल में रोग-व्याधि लगने पर नीम, हल्दी, दही आदि से जैविक कीट प्रबंधन करते थे। लेकिन 1960 से लेकर 1980-90 तक किसान कीटनाशकों और उर्वरकों पर निर्भर हो गए, हरित क्रांति के दुष्परिणामों ने देश में एक बार फिर देसी और पारंपरिक खेती की तरफ मुड़ने पर मजबूर किया है।

हरियाणा के किसान ईश्वर सिंह कुंडू ने किसानों के लिए कई खोजें और अविष्कार किए हैं। इसीलिए उन्हें किसान वैज्ञानिक कहा जाता है।हरियाणा के किसान ईश्वर सिंह कुंडू ने किसानों के लिए कई खोजें और अविष्कार किए हैं। इसीलिए उन्हें किसान वैज्ञानिक कहा जाता है।

प्रकृति का चक्र बिगाड़ कर बढ़ाई कीट-पतंगों की संख्या

"कीट-पतंगों की बढ़ती संख्या कुदरत की प्रक्रिया को तोड़ने का परिणाम है। दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने कीटों के खिलाफ एक तरफा लड़ाई लड़ी है। पत्ता खाने वाले (शाकाहारी) कीटों को मारा तो मांसाहारी कीट क्या खाएं? वर्ष 1950-60 के दौरान कीटों के नाम पर दीमक और हरा टिड्डा हुआ करते थे, आज सैकड़ों हैं। कीटनाशकों और उर्वरकों ने प्रकृति का चक्र बिगाड़ कर इनकी संख्या बढ़ाने में मदद की है।"हरियाणा के किसान वैज्ञानिक ईश्वर सिंह कुंडू कहते हैं। कुंडू के मुताबिक वैज्ञानिक और कृषि जानकार फसल सुरक्षा के मामले में पूरी तरफ फेल हो गए हैं, अब दारोमदार किसानों पर ही है।

सीरीज का दूसरा भाग: देश की मिट्टी में रचे बसे देसी बीज ही बचाएंगे खेती, बढ़ाएंगे किसान की आमदनी

उर्वरक और कीटनाशक के अंधाधुंध उपयोग के लिए कुख्यात रहे पंजाब-हरियाणा में आज सैकड़ों एकड़ में रसायनरहित खेती हो रही है। जागरुकता के अलावा इसका श्रेय कैथल जिले के ईश्वर सिंह कुंडू को जाता है। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किसान वैज्ञानिक और वनस्पति आधारित कृषि उत्पाद बनाने वाले ईश्वर सिंह कुंडू के मुताबिक हर साल 10-12 हजार एकड़ फसल उनके जड़ी-बूटी आधारित उत्पादों से होती हैं।

कुडूं 1980 के दशक में खुद रासायनिक दवाओं की दुकान चलाते थे, लेकिन खुद रोगी हुए और किसानों को कैंसर से मरते देख, आत्मग्लानि के चलते किसानों के लिए काम करना शुरू किया। "मैंने 10 साल तक यही शोध किया कि कैसे उर्वरक और कीटनाशकों से बचा जाए फिर जड़ी बूटियों से कुछ उत्पाद बनाए जो कीट-पतंगों की रोकथाम में पूरी तरह सक्षम हैं। मैंने फंगीसाइड, पेस्टीसाइड और विडीसाइड सबको साइड लगा दिया। किसान जहर मुक्त खेती करना चाहता है चाहे वो जैविक हो या प्राकृतिक।" ईश्वर कुंडू गाँव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं।

एकीकृत कीट प्रबंधन की हुई शुरुआत

हरित क्रांति के बाद कीटनाशकों और उर्वरकों के सीमित और उचित प्रयोग के साथ ही किसानों को वैकल्पिक फसल सुरक्षा प्रबंधन समझाने के लिए भारत में वर्ष 1970 में एकीकृत कीट प्रबंधन (आईपीएम) की शुरुआत की गई। इस प्रक्रिया से पर्यावरण के अनुकूल होकर जैविक और यंत्रों के द्वारा कीटों पर नियंत्रण किया जाता है और आखिरी उपाय कीटनाशक इस्तेमाल होता है।

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जब आपकी फसल में कीड़े या कोई रोग लगता है तो किसान कीटनाशक डालते हैं। खेत में खरपतवार होता है तो उसकी दवा (खरपतवारनाशक) डालते हैं। ये रासायनिक दवाएं न सिर्फ काफी महंगी पड़ती हैं, बल्कि किसानों की सेहत, फसल और यहां तक खेती की मिट्टी को बहुत नुकसान पहुंचाती हैं। लेकिन किसान बिना कीटनाशक भी खेती कर सकते हैं। बिना रासायनिक दवाओं के खेती करने के तरीके को एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन कहते हैं। ये बहुत सरल, सस्ता और उपयोगी तरीका है।


'खेती में देसी क्रांति' सीरीज के दौरान गाँव कनेक्शन ने देश के कई राज्यों के किसान, कृषि जानकारों और वैज्ञानिकों से बात की। इस दौरान कई किसानों ने कहा कि किसान देश में रसायन मुक्त खेती करना चाहता है, जैविक खेती का दायरा भी बढ़ा लेकिन ज्यादातर किसान अपने दम पर ये कर रहे हैं। सरकार की तरफ से मिलने वाली सहूलियतें शून्य हैं।

जैविक खेती सरकारों के लिए फैशन जैसी

"जैविक खेती सरकारों के लिए फैशन जैसी है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों को मिलने वाली छूट के मुकाबले भारत में जैविक का बजट .001 यानि दशमलव जीरो-जीरो एक फीसदी है। जबकि जैव विविधता वाली, प्राकृतिक तौर तरीकों वाली खेती में भारत की भलाई है। यही तरीका जलवायु परिवर्तन से निपट सकता है। हमने ये करके दिखाया है।" पर्यावरणविद डॉ. वंदना शिवा कहती हैं। उनकी संस्था नवदान्या भारत में देसी बीजों के संरक्षण पर काम करती है।

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"कीटनाशकों का सबसे ज्यादा प्रयोग फल और सब्जियों में होता है, लेकिन बिना कीटनाशक भी खेती हो सकती है। मेरे पास आने वाले 80 फीसदी किसान जहर मुक्त खेती करना चाहते हैं। रसायन मुक्त खेती की कुछ दिक्कतें थीं, हम लोगों ने ऐसे बैक्टीरिया और माइक्रो न्यूट्रिएंट की पहचान कर जैविक खेती को वैज्ञानिक आधार दिया है।" मेरठ के मोदीपुरम भारतीय कृषि प्रणाली अनुंसधान संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक दुष्यंत मिश्रा कहते हैं।

राजस्थान के वरिष्ठ कृषि पत्रकार और मिशन साइंटिंस परिवार के संस्थापक डॉ. महेंद्र मधुप किसानों के आगे सरकार को सबसे बड़ा रोड़ा बताते हैं। "जैविक खेती की अगली कड़ी है प्राकृतिक खेती, ये प्रक्रिया अगले 100-200 साल और आगे इससे चलती जाएगी। लेकिन जैविक खेती आदि के लिए सरकार जो सब्सिडी आदि दे रही है, वो एक धोखा है, सब्सिडी पर जो चीजें 100 रुपए की मिलती है, वो बाजार में 45 की मिल जाएगी।"

प्रकृति में ऐसे बहुत से सूक्ष्म जीव

जैविक कीटनाशक विभिन्न प्रकार के जीवों जैसे कीटों, फफूंदी, जीवाणु, विषाणु व वनस्पतियों का उत्पाद होते हैं। नीम आधारित कीटनाशी प्राकृतिक है, जिसमें एजाडारेक्टिन एवं सैलनिन नामक तत्व पाए जाते हैं, जिसका कीटों पर प्रभाव होता है बाजार में विभिन्न व्यापारिक नाम उपलब्ध है।

कीट-पतंगों की बढ़ती संख्या कुदरत की प्रक्रिया को तोड़ने का परिणाम है। दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने कीटों के खिलाफ एक तरफा लड़ाई लड़ी है। साल 1950-60 के दौरान कीटों के नाम पर दीमक और हरा टिड्डा हुआ करते थे, आज सैकड़ों हैं। कीटनाशकों और उर्वरकों ने प्रकृति का चक्र बिगाड़ कर इनकी संख्या बढ़ाने में मदद की है। - ईश्वर सिंह कुंडू, किसान वैज्ञानिक, हरियाणा

उत्तर प्रदेश में कृषि रक्षा विभाग की उप निदेशक एलएस यादव कहते हैं, "सरकार जैव कीटनाशकों के इस्तेमाल के लिए किसानों को प्रेरित कर रहे हैं, सरकार इस पर 75 फीसदी अनुदान भी देती है।"

प्रकृति में ऐसे बहुत से सूक्ष्म जीव हैं, जैसे विषाणु, जीवाणु और फफूंद जो शत्रु कीटों (फसल को नुकसान पहुंचाने वाले) में रोग उत्पन्न कर उन्हें खत्म कर देते हैं। वैज्ञानिकों ने इन्हें पहचान कर प्रयोगशालाओं में जमा किए और उनकी संख्या बढ़ाकर किसानों को प्रयोग के लिए दे रहे हैं। जैसे दीमक की रोकथाम के लिए बिबेरिया बेसियाना का उपयोग होता है। इसी तरह फोरमैन ट्रैप, फल मक्खी ट्रैप, प्रकाश प्रपंच आदि कारगर उपाय है, किसानों की अपनी समस्याएं हैं।

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"नरसिंहपुर काफी बड़ा जिला है, बड़े पैमाने पर खेती होती है लेकिन पूरे जिले में बिबेरिया बेसियाना और ट्राइकोडर्मा जैसे (जैव कीटनाशियों) की उपलब्धता न के बराबर है। सरकारें खुद नहीं चाहती किसान इस कुचक्र से निकले।" मध्य प्रदेश के किसान जोगेंद्र द्विवेदी (42 वर्ष) कहते हैं।


'दिन रात मेहनत करता हूं तो मुझे मुनाफा चाहिए'

मध्य प्रदेश में नरसिंहपुर जिले में पिपरिया गाँव के किसान जोगेंद्र आगे कहते हैं, "जो रासायानिक दवाएं मिट्टी को नुकसान पहुंचाती हैं, मैं उनका प्रयोग ध्यान से करता हूं, ताकि मेरी फसल भी हो जाए और नुकसान भी न हो। लेकिन मुझे न रासायनिक से मतलब है न जैविक से। मैं लाखों रुपए की खेती में लागत लगाता हूं, दिनरात मेहनत करता हूं तो मुझे मुनाफा चाहिए।"

आखिर में जोगेंद्र एक सवाल उपभोक्ताओं से करते हैं, "किसान जहर मुक्त, जैविक सब तरह की खेती खूब करे, लेकिन कोई खरीदार तो मिले, हमारे देश में शराब की बोतल और डॉक्टर को लोग मुंहमांगी कीमत देते हैं लेकिन बाजार में सब्जी के ठेले वाले से मोलभाव करते हैं।"

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जोगेंद्र की नाराजगी जायज भी लगती है, क्योंकि भारत में अभी तक जैविक-प्राकृतिक उत्पादों के विपणन को लेकर राष्ट्रीय नीति नहीं है। जो कारोबार है किसानों को खुद का नेटवर्क है। बस अच्छी ख़बर है कि अंतराष्ट्रीय स्तर पर जैविक उत्पादों की मांग बढ़ी है।

अमेरिका में बढ़ा जैविक फूड का कारोबार

सॉयल एसोसिएशन की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में इस साल जैविक फूड और ड्रिंक की मांग में 3.5 फीसदी की मांग बढ़ी है। ये लगातार सातवां वर्ष है जब वृद्धि दर्ज की गयी है। अमेरिका में जैविक फूड का कारोबार अब बढ़कर 2.2 बिलियन अमेरिकन डॉलर (15 अरब रुपए से ज्यादा) पहुंच गया है। वरिष्ठ कृषि पत्रकार महेंद्र मधुप इसका हल किसानों की जागरुकता और मीडिया के सहयोग में बताते हैं, "मीडिया को चाहिए कि वो अपने स्तर पर अच्छा काम करने वाले किसानों की ख़बरें ज्यादा से ज्यादा दिखाए उनका पता और नंबर भी छापे, इससे उनका नेटवर्क बनेगा, उपभोक्ता को अच्छा सामान और किसान को बाजार मिल जाएगा। सरकार को चाहिए कि किसानों को उत्पादक से आगे बढ़ाकर किसान उद्ममी बनाए, ग्राम पंचायत स्तर पर प्रसंस्करण की शुरुआत हो।"

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