पत्थलगड़ी: विरोध का नया तरीका या परंपरा का हिस्सा, आखिर क्या है पत्थलगड़ी?

पत्थलगड़ी: विरोध का नया तरीका या परंपरा का हिस्सा, आखिर क्या है पत्थलगड़ी?

झारखंड के कुछ गांवों में पिछले करीब एक साल से हालात असामान्य रहे हैं। आदिवासी आबादी वाले इलाकों में सरकार के खिलाफ गुस्सा और आंदोलन चला। बाहरी लोगों के गांवों में न घुसने के फरमान जारी कर दिये गए। जहां कुछ लोग इसे आदिवासियों का जायज़ गुस्सा बताते हैं वहीं सरकार इसे राजनीति से प्रेरित और उपद्रवियों का अतिवादी प्रचार कह रही है। जुलाई में हुई बड़ी पुलिस कार्रवाई के बाद गांव कनेक्शन की टीम इन गांवों में पहुंची। इन गांवों के मौजूदा हालात पर अब तक आप पढ़ चुके हैं गांव कनेक्शन की पहली और दूसरी रिपोर्ट। यह है रिपोर्ट का तीसरा हिस्सा।

झारखंड के खूंटी ज़िले में उपजे जिस पत्थलगड़ी आंदोलन की बात पिछले साल सुनाई दी वह राज्य के दूसरे ज़िलों से लेकर झारखंड के बाहर दूसरे राज्यों तक फैल गई। संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत ग्रामसभा की सर्वोच्च ताकत का हवाला देकर आदिवासी गांवों ने अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठानी शुरू की।

लेकिन आखिर क्या है पत्थलगड़ी? क्या पत्थलगड़ी विरोध के लिये ईजाद किया गया नया तरीका है या जनजातीय समाज का ही हिस्सा है।

ससंदिरी पत्थलगड़ी गांव के मुहाने पर लगाई जाती है।

असल में पत्थलगड़ी आदिवासी समाज की वह परंपरा है जिसके तहत ज़मीन पर एक पत्थर/ शिलालेख गाड़ा जाता है। इसका एक खास मकसद होता है और इसपर कोई संदेश लिखा होता है। यह सदियों से आदिवासी परंपरा का हिस्सा रहा है। जब से जनजातियों के पास अपनी कोई लिखित भाषालिपि तक नहीं थी तब से पत्थलगड़ी होती रही है। पत्थलगड़ी आदिवासियों के लिए अपनी ज़मीन के मालिकाना हक़ के पट्टे की तरह भी है।

सीरीज का पहला भाग: पत्थलगड़ी: विद्रोह की सुगबुगाहट के पीछे की कहानी

पत्थलगड़ी से जुड़े कई शब्द हैं जो विभिन्न शिलालेखों और उनके महत्व और मकसद को बताते हैं।

ससंदिरी- आदिवासी परम्परा में ससंदिरी किसी भी विशाल शिलालेख या पत्थर को कहा जाता है। किसी भी प्रकार की पत्थलगड़ी ससंदरी का ही हिस्सा कही जाएगी। पत्थलगड़ी आंदोलन के तहत गांवों के भीतर और बाहर कई तरह के पत्थर लगाए गए जिसमें भारत का संविधान शीर्षक लिखकर कई बातें लिखी गई थी। आदिवासी समाज के लोग कहते हैं कि पहले से गांव के नियम कायदे या जानकारी इसी तरह पत्थलगड़ी के माध्यम से लिखी जाती रही है।

बोरादिरी– किसी व्यक्ति की कब्र पर लगाया जाने वाला पत्थर बोरादिरी कहलाता है। इस पत्थर में उस व्यक्ति और परिवार के बारे में जानकारी लिखी होती है।

बोरादिरी पत्थलगड़ी कब्र पर लगने वाला पत्थर है।

जीद ससंदिरी– इसका सम्बन्ध बच्चे के जन्म से है। और बच्चे के जन्म के बारे में जानकारी लिखी रहती है।

कुर्सीनामा- आदिवासी समाज के लोग परिवार की वंशश्रृंखला (फैमिली ट्री) अक्सर पत्थरों पर लिख देते हैं ताकि उनके पूर्वजों के बारे में जानकारी उपलब्ध रहे।

होरादिरी- किसी गांव के प्रवेश पर लगने वाला पत्थर, गांव के नियम कानून कायदे लिखे होते हैं। ये काफी महत्वपूर्ण पत्थलगड़ी है क्योंकि ये गांव में घुसने वाले अजनबियों को बताती है कि वहां क्या किया जा सकता है और क्या नहीं।

सीरीज का दूसरा भाग: पत्थलगड़ी: पुलिस कार्रवाई के बाद गांवों में अब भी है डर और खामोशी

जाति बोरादिरी– आदिवासी समाज में भी एक ही गोत्र यानी करीबी रिश्तों में शादी की मनाही है। एक ही गोत्र को यहां की भाषा में किली कहा जाता है। एक किली में विवाह करना सामाजिक रूप से अस्वीकार्य है। ऐसे जोड़ों को गांव से बाहर निकाल कर उसका ऐलान किए जाने वाले पत्थर को जाति बोरादिरी कहा जाता है।


कुर्सीनामा में परिवारों की वंशावली होती है। फोटो-हरिवंश

सीमांदिरी– गांव या क्षेत्र की सीमाओं पर लगने वाले पत्थर को सीमांदिरी कहते हैं। सीमांदिरी दो गांवों के बीच भी लगती है ताकि उनके सीमांकन को चिन्हित किया जा सके।

जाति बोरादिरी में सगोत्री विवाह की मनाही का जिक्र है

इसी तरह की कई और पत्थलगड़ी हो सकती हैं और यह शब्द जनजातीय परंपरा का एक मोटा अंदाजा देते हैं। आदिवासी समाज में बहुत सारी विविधताएं हैं और अलग-अलग आदिवासियों में इन शब्दों और उनके इस्तेमाल के तरीकों में भिन्नता हो सकती है। लेकिन इतना सच है कि पत्थलगड़ी शब्द का इस्तेमाल रणनीतिक हो सकता है लेकिन यह कोई हाल फिलहाल में उपजा शब्द नहीं है।


Share it
Share it
Share it
Top