महावीर की भूमि पारसनाथ हिल्स: झारखण्ड में एक मिनी कश्मीर!

आप अगर झारखण्ड में रह कर कश्मीर के ड्रीमलैंड के आनंद को महसूस करना चाहते हैं, उसकी शीतलता जज्ब करना चाहते हैं, या फिर कुदरत दी हुई असीम नेमतें देखना चाहते हों तो गिरिडीह के कन्दराओं में चले जाइये

महावीर की भूमि पारसनाथ हिल्स: झारखण्ड में एक मिनी कश्मीर!

अरविंद प्रताप

कुदरत उदार है महान है तभी तो उसकी उदारता दुनिया के विभिन्न हिस्सों में बखूबी देखने को मिलती है।तभी तो कुदरती खुबसूरती से सजे इलाकों में जाने के बाद, उसकी नैसर्गिक खूबसूरती को देखने के बाद बरबस ही मुंह से निकल पड़ता है वाह ! क्या शानदार नज़ारा है।

कश्मीर के बारे में कहा जाता है 'गर फिरदौस बर रूये ज़मी अस्त-हमी अस्तो, हमी अस्तो, हमी अस्तो ' (यानी कि धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है, तो यहीं है, यहीं है, यही हैं) गांव कनेक्शन भी झारखण्ड के संदर्भ में ये बातें आपसे कहना चाहेगा, खास कर झारखण्ड में स्थित पारसनाथ हिल्स के बारे में कि अगर झारखण्ड में कहीं स्वर्ग है तो यहीं है, यहीं है, यहीं है।

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आप अगर झारखण्ड में रह कर कश्मीर के ड्रीमलैंड के आनंद को महसूस करना चाहते हैं, उसकी शीतलता जज्ब करना चाहते हैं, या फिर कुदरत दी हुई असीम नेमतें देखना चाहते हों तो गिरिडीह के कन्दराओं में चले जाइये, यानी कि पारसनाथ की ओर रुख कीजिये, जहां चारो तरफ बिखरे कुदरत के बेपनाह असबाब, आपका इंतजार करते नज़र आएंगे। उन नायाब दृश्यों में आप मानों विस्मृत हो जाना चाहेंगे।

शायद आपको याद होगा कि चाइना में एक कुदरती पहाड़ है जिसे 'स्वर्ग का द्वार' भी कहा जाता है, उसे देखने के बाद जब आप पारस नाथ हिल्स की चोटी पर जाकर देखेंगे तो आपको वैसा ही अद्भुत नजारा देखने को मिलेगा। यही कारण है कि गांव कनेक्शन आपसे पारसनाथ यात्रा का यह यात्रा संस्मरण साझा करने का लोभ संवरण नहीं कर पाया।

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यहां जा कर हमने जो देखा महसूस किया, उसे आप तक पंहुचाने की एक कोशिश है। हालांकि वहां बिना गए आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि झारखंड की वीरान पठारी तराइयों में, एक ऐसी रूहानी दुनिया भी आबाद है, जिसे बिना गए न तो आप देख सकते हैं, नहीं उसकी पवित्रता को महसूस कर सकते हैं। ये वो जगह है जहां हर साल, पूरी दुनिया के जैन धर्मावलम्बी आते हैं अपने इष्टदेव के सजदे में। वे आते हैं इस धरती के रज-कणों को अपने माथे से लगा कर धन्य हो जाने।


पारसनाथ की भौगोलिक संरचना और उसका पुरातात्विक महत्व!

बचपन मे हमने भगवान महावीर की कहानियां पढ़ी है जिन्हें अहिंसा का पुजारी कहा जाता है। दरअसल पारसनाथ हिल्स जिसे 'श्री सम्मेद शिखर जी' भी कहते हैं, उसकी समुद्र तल से ऊंचाई लगभग 4500 फीट है। यह अत्यंत ही रमणीक स्थान है। ये शिखर गिरिडीह ज़िले के पहाड़ी श्रृंखलाओं का भूभाग है जिसकी ऊंचाई लगभग 1360 मीटर है।


यह पर्वत श्रृंखला केवल झारखण्ड की ही सबसे उच्चा शिखर नहीं है बल्कि यह हिमालय के दक्षिणी भूभाग का सबसे ऊंचा पहाड़ है। यहां सालों भर ठंढी हवाएं निर्बाध बहती रहती हैं। यहां कोल्डड्रिंक या पानी को कभी ठंढा करने के लिए कृत्रिम उपकरणों का सहारा नहीं लेना पड़ता। इस शिखर पर जाने के बाद, मानों आपको यूं लगेगा कि इस शिखर को छू कर बहने वाली हवाएं भी आपसे कुछ कहना चाहती हैं। वे आपसे लिपटना चाहेंगी, तेज ठंढी हवाओं के कारण कानों में सरगोशियां सी महसूस करेंगे आप।

कौन हैं तीर्थंकर महावीर!

पारसनाथ की चोटी पर बने इस मंदिर को दुनिया मे जैनियों का सबसे पुराना मंदिर माना जाता है। यहां बिखरे अवशेष और शिलापट्टों पर खुदी लिपियाँ इसकी कहानी कहते नज़र आते हैं। यहां पत्थरों पर खुदे जो तारीख हैं वह 1785 AD के रूप में हैं। दरअसल यह पवित्र तीर्थ स्थल जैन समाज का सबसे प्रमुख और पवन धामों में से एक है। पारसनाथ ही दुनिया मे जैनियों की वह इकलौती जगह है जहां 24 तीर्थंकरों में से 20 ने यहां मोक्ष प्रप्त किया था इसीलिये इसे 'मोक्ष का द्वार' भी कहते हैं।

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एक आध्यात्मिक रोमांचक यात्रा पारसनाथ !

पारसनाथ जैनियों के 23 वें तीर्थंकर थे। जिनके नामन पर इस पहाड़ी स्थल का नामांकरण हुआ। इस स्थल का सफर अत्यंत रोमांचक है जैसे-जैसे आप आगे इस पर्वत कि ओर बढ़ते जाएंगे। वैसे-वैसे आप प्रकृति की सुंदरता पर मंत्रमुग्ध होते जाएंगे। पर्वत श्रृंखलाओं की गोद में दूर दूर तक फैला अरण्य आपको बाहें फैलाये बुलाता नज़र आएगा। जगह जगह आपको निर्देशों के साइन बोर्ड मिलेंगे।

रास्ते मे बने संगमरमर के कई मंदिर भी आपको मिलेंगे जहां रुक कर आप विश्राम भी कर सकते हैं। कई जगहों पर पानी, स्नैक्स और किल्डड्रिंक की भी दुकानें आपको मिलेगी। यहां रास्ते मे या शिखर पर स्थित तीर्थंकरों के कई मंदिर 1900 साल से भी पुराने माने जाते हैं। यहां बने मंदिरों की नक्कासी में मॉडर्न कल्चर की झलक भी आप देख पाएंगे। लेकिन पुरातात्विक दृष्टिकोण से ये बेहद प्राचीन मानी जाती हैं।

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मोक्ष के द्वार की तस्वीरें अभिभूत कर देती हैं!

दरअसल पारसनाथ हिल्स पर दो और चोटियां हैं जिन्हें गौतम स्वामी पहाड़ी और चन्द्र प्रभु पहाड़ी कहते हैं। हालांकि इन सारे टॉप पर जानें में काफी टाइम।लग जाता है लेकिन यहां जाने के बाद आध्यात्मिक अनुपम अहसास मन मे भर जाता है।

यहीं है उसरी जल प्रपात की मनोरम धारा!

कई किलोमीटर के विशाल वर्ग क्षेत्रों में फैला यह जंगल अपने अंदर कई रहस्यों को समेटे हुए है। प्रकृति के जल सन्नोतों से निर्मित हैं यहां 'उसरी जल प्रपात' जिसकी मधुर धुन में आप खो जाएंगे।यहां ऐसा लगता है, मानों यह जल प्रपात पारसनाथ की पहाड़ियों में महावीर तीर्थंकर के मंदिर को छूता हुआ पूरे वेग से सम्पूर्ण मानव जगत को तृप्त करने के लिए धरा पर गिर रहा हो।


जनजातीय समाज की आजीविका का मुख्य सन्नोत है यह पहाड़! जिसे संथाली समाज 'मरंग बुरु' कहता है

इस इलाके में कई जनजातियां निवास करती हैं जिनके लिए पहाड़, नदी, जंगल ही उनका सबकुछ है। जो न केवल उन्हें जीने का मज़बूत आधार देता है बल्कि उनके लिए यह पहाड़ ज़िंदा देवता भी है। ज़्यादातर यहां संथाल लोग निवास करते हैं। पूरा इलाका कई तरह की वनस्पतियों से ढका हुआ है। खासकर साल, सखुआ और सागवान ज़्यादा मिलेंगे।

अन्य अगर वनस्पतियों की बात करें तो यहां केड, भलवा, आसन पियर, सरिफा, कुसुम, बांस, महुआ, पलाश, सिमुल सहित कई औषधीय युक्त पौधे मिलेंगे जो कि इस इलाके के जनजातीय समाज के लिए संजीवनी का काम करते हैं। इन जनजातीय समाज की एक सबसे बड़ी खासियत यह जी की ये इस पारसनाथ पहाड़ को अपना पितृ देवता मानते हैं और इसे 'मरंग बुरु' भी कहते हैं। हालांकि इस जंगल का एक नाम भी है जिसे 'मधुवन' कहते हैं।

रोज़गार का बड़ा साधन है पारसनाथ हिल्स

इस पहाड़ी से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 20000(बीस हज़ार) लोगों का रोजगार जुड़ा है। हमें शिखर पर मोटरसाइकल द्वारा ले जाने वाले मुकेश महतो ने बताया कि बहुत चैलेंज होता है यहां कमाना खाना लेकिन उनकी दाल रोटी चल जाती है। प्रतिदिन मुकेश अपनी मोटरसाइकल से यात्रीयों को शिखर का दर्शन करवाकर 1000 रुपये कमा लेते हैं। सीजन के दिनों में इन मार्गों पर गाड़ियां बन्द कर दी जाती है।


कैसे जाएं, कब जाएं

वैसे तो यहां सालों भर लोग आते हैं, लेकिन सितम्बर से फरवरी तक का महीना सही माना जाता है। वैसे हिंदुस्तान ही नहीं बल्कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों मे फैले जैन धर्मावलम्बी यहां दर्शनों को आते हैं। यह यात्रा एडवेंचर पसन्द लोगों के लिए खास हो सकता है क्योंकि आपको यहां पहाड़ पर ट्रैकिंग करने का भरपूर मौका मिलेगा। आप मधुवन जंगल के माध्यम से जा सकते हैं।

आप इस पहाड़ पर अपनी सुविधा के हिसाब से स्थानीय मोटरसाइकल सवारों माध्यम से पैसों का भुगतान करके, डोली के द्वारा या पैदल ट्रेकिंग करके। हालांकि वाहनों का प्रयोग अभी वर्जित है लेकिन जल्द ही नए रास्ते पर वाहन उपर तक चलने लगेंगे। कुल सफर आपको लगभग 12 किमी का तय करना पड़ेगा। सफर के दौरान अपने साथ पानी की बोतल, छोटी रस्सी, टार्च, डंडा जरूर रख लें। ग्रेंड ट्रक रोड के समीप, नेशनल हाइवे, एयरपोर्ट (नज़दीकी रांची) पारसनाथ स्टेशन 10 किमी के साथ यह इलाका वेल कनेक्टेड है।

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पर्यटन की असीम संभावनाएं

बदलते वक्त के साथ सरकार ने भी इस इलाके को सुरक्षा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, यह इलाका नक्सलियों का गढ़ भी माना जाता है लेकिन यहां 24 घण्टे मुस्तैद सुरक्षाबल तैनात रहते हैं, यहां झारखण्ड पुलिस का जैप 1, जगुआर की कम्पनियां तैनात की गई है। पहाड़ी पर आकस्मिक स्थिति से निबटने के लिए हेलीपैड का भी निर्माण किया गया है। फिलहाल यहां उच्ची।पहाड़ियों पर पैराग्लाइडिंग और पैरासेलिंग की शुरुआत की पहल भी राज्य सरकार कर चुकी है।

पारसनाथ हिल्स के संरक्षण और संवर्धन की है जरूरत

आज इस इलाके में पारस नाथ हिल्स और तीर्थंकर जी का मंदिर नहीं होता तो ये जगह अत्यंत डरावना होता, लोग आज भी आदम जमाने में यहां जी रहे होते। जैनियों ने तो इस जगह को हमेशा के लिए अमर बना दिया। लेकिन इस अमर विरासत को सहेजने में हम कितने उदासीन हैं, वह यहां आ कर पता चलता है। आज भी इस अनमोल विरासत को बड़े स्तर पर संरक्षण और संवर्धन की ज़रूरत है। दोस्तों अगर आप ट्रैकिंग के शौकीन हैं तो झारखण्ड का यह जगह खास आपके लिए कुदरती डिजाइन है, जहां जाकर आप तीर्थयात्रा के साथ-साथ एडवेंचर का मज़ा ले सकते हैं।


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