बोर्ड परीक्षा: अभिवावक न डालें बच्चों पर दिन भर पढ़ने का दबाव

बोर्ड परीक्षा: अभिवावक न डालें बच्चों पर दिन भर पढ़ने का दबावबच्चों पर न डालें परीक्षा का ज्यादा दबाव।

रोहन (19 वर्ष) आजकल न खेलने निकलता है, न दोस्तों से मिलता है क्योंकि वो बोर्ड परीक्षा की तैयारियों में जुटा है लेकिन क्या ये तरीका सही है।

अक्सर परीक्षाओं के नजदीक आते ही बच्चों के साथ उनके अभिवावक भी घबराने लगते हैं। लखनऊ के इंदिरानगर के रहने वाले रोहन बताते हैं, मेरे घर में दीदी पढ़ने में बहुत तेज है, वो हमेशा फर्स्ट आती है इसलिए अगर मेरे नम्बर कम हुए तो बहुत बातें सुननी पड़ेगीं। पापा मारेगें भी वो चाहते हैं मैं बड़ा होकर डाक्टर बनूं। इसलिए अच्छे नम्बर लाना बहुत जरूरी है।

ये कहानी सिर्फ रोहन की नहीं है बल्कि ज्यादातर घरों की हैं। जहां परीक्षाएं आते ही एक अफरा तफरी का माहौल बन जाता है। अभिवावक बच्चों पर हर समय ये दबाव डालने लगते हैं कि इस बार 90 प्रतिशत से कम नहीं आना चाहिए।

गृह मंत्रालय की एक रिपार्ट के अनुसार 2014-16 के बीच लगभग 26,476 छात्रों ने खुदकुशी की यानि हर घंटे एक छात्र खुदकुशी करता है और इसकी एक वजह परीक्षा के दौरान होने वाला तनाव भी है।

लखनऊ की मनोचिकित्सक डॉ शाजिया सिद्दकी बताती हैं, “ज्यादातर अभिवावक परीक्षाओं में मिलने वाले अंक से ही बच्चों की प्रतिभा का निर्धारण करते हैं, ये तरीका गलत है। तीन घंटे की परीक्षा का मूल्यांकन आपका भविष्य नहीं तय कर सकता है। कई बार उन्हें बहुत कुछ आता होता है लेकिन वो परीक्षा में अच्छा नहीं कर पाते हैं।”

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वो आगे बताती हैं, “ये जरुरी नहीं है कि 90 प्रतिशत पाने वाले बच्चे जीवन में बहुत आगे ही रहें। सबसे ज्यादा जरूरी है वो समाज में लोगों से कैसे लोगों से मिलते जुलते हैं। हर अभिवावक अपने बच्चे की क्षमता को जानता है इसलिए उन्हें हर समय पुश करना उनके अंदर की रुचि को मार देता है। फिर वो दबाव व तनाव में ही रहने लगते हैं।”

कक्षा 12 में पढ़ने वाली प्रियंका सिंह (19 वर्ष) बताती हैं, “ऐसे लगता है बहुत कम समय बचा है, रात में सोते समय भी सेलेबस सपने में आता है, कभी देखती हूं कि पेपर छूट गया है लिख नहीं पाई हूं, कभी देखती हूं कि कुछ आ ही नहीं रहा जितना पढ़ा है, सब भूल गई हूं।”

कई बार ऐसा होता है कि अभिवावक अपनी इच्छाएं जबरन बच्चों पर थोप देते हैं। ये भी एक बच्चों के तनाव का एक कारण बन जाता है। लखनऊ के एक हास्टल में इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहे आकाश वर्मा (20वर्ष) बताते हैं, “मैं दो साल से तैयारी कर रहा हूं। मेरी रुचि इंजीनियरिंग में न होकर सोशल वर्क में थी इसलिए मैं उसी में पढ़ाई करना चाहता था लेकिन मेरे पापा नहीं चाहते थे। अब मैं सिर्फ उनके डर से पढ़ रहा हूं।”

इस बारे में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री डॉ सोहनलाल यादव बताते हैं, “ आजकल के लोग देखादेखी में जीने लगे हैं। अगर पड़ोसी का बेटा फलाने कोचिंग में पढ़ता है तो उनका बेटा भी वहीं पढ़ेगा। अगर उनके घर में एसी है तो हमारे घर में भी होनी चाहिए। यही तुलना वो बच्चों में भी करते हैं कि अगर तिवारी जी का बेटा 90 प्रतिशत पाता है तो मेरा 70 फीसदी ही क्यों पा रहा है।”

वो आगे बताते हैं, “अभिवावक बच्चों पर दबाव डालने लगते हैं। वो बच्चे की खुशी छोड़कर लोगों की परवाह करने लगते हैं जो कि गलत है। बच्चों में इससे हीनभावना जागने लगती है वो लोगों से मिलने में कतराते हैं कि कहीं कोई उनसे पूछने न लगे कितने नम्बर मिले थे, कम क्यों हैं।”

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अभिवावक इन बातों पर ध्यान दें

  • आप यह मानसिकता छोड़ दें कि बच्चे के सामने परीक्षा का हौवा खड़ा करने पर वह पढाई ज्यादा करेगा |
  • हर समय उसके पीछे न पड़ें।
  • आप अपने बच्चे के साथ संवाद बना कर रखें।
  • बच्चे को पढ़ाई के बीच थोड़ा थोड़ा ब्रेक लेने को कहें।
  • हर समय बच्चे की तुलना पड़ोसी या रिश्तेदार के बच्चों से न करें।
  • यदि लगता है कि आप के बच्चे को काउंसलिंग की जरुरत है तो देर न करें।

बच्चे इस समय ध्यान दें

  • एक दिनचर्या बनाना बहुत जरूरी है, जिसमें हर क्रियाविधि के बारे में लिखा होना चाहिए।
  • लोगों से मिलना जुलना जैसे फेसबुक, व्हाट्स ऐप और घर से बाहर निकलना न छोड़ें।
  • जो विषय कठिन हों उन्हें उस समय पढ़ें, जब दिमाग बिल्कुल फ्रेश हो और आसान विषय को दूसरे समय पर पढ़ें।
  • हाइलाइर्टस, रंग बिरंगें पेन का इस्तेमाल करके महत्वपूर्ण चीजों को अंडरलाइन कर लेना चाहिए, इससे याद करने में आसानी होती है।
  • खाने और सोने में कोताही न करें। सात से आठ घंटे की नींद जरूरी है दिमाग को फ्रेश और आराम देने के लिए और भूखे पेट पढ़ाई भी नहीं हो सकती।
  • परीक्षा में कोई दिक्कत हो तो अपने घर वालों से बात करें। प्रियजनों को जरूर बताएं।

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