पत्थलगड़ी: पुलिस कार्रवाई के बाद गांवों में अब भी है डर और खामोशी

पत्थलगड़ी: पुलिस कार्रवाई के बाद गांवों में अब भी है डर और खामोशी

झारखंड के कुछ गांवों में पिछले करीब एक साल से हालात असामान्य रहे हैं। आदिवासी आबादी वाले इलाकों में सरकार के खिलाफ गुस्सा और आंदोलन चला। बाहरी लोगों के गांवों में न घुसने के फरमान जारी कर दिये गए। जहां कुछ लोग इसे आदिवासियों का जायज़ गुस्सा बताते हैं वहीं सरकार इसे राजनीति से प्रेरित और उपद्रवियों का अतिवादी प्रचार कह रही है। जुलाई में हुई बड़ी पुलिस कार्रवाई के बाद गांव कनेक्शन की टीम इन गांवों में पहुंची। यह है इन गांवों के मौजूदा हालात पर गांव कनेक्शन की रिपोर्ट का पहला हिस्सा।

रांची से 50 किलोमीटर दूर घाघरा गांव के बाहर विशाल शिलालेख लगा है जिसके शीर्ष पर अंकित है–"भारत का संविधान"। यहां हरे रंग के पत्थर पर संविधान की पांचवीं अनुसूची और उससे जुड़ी धाराओं का वर्णन है। इसके साथ ही दी गई है एक चेतावनी- बाहर से आने वालों का प्रवेश वर्जित है।

घाघरा खूंटी ज़िले के उन तमाम गांवों में से एक है जहां प्रवेश के रास्ते पर ऐसी कई पत्थलगड़ी लगाई गई हैं। घाघरा गांव के बाहर लगी पत्थलगड़ी को देखने से पता चलता है कि यह इसी साल 26 जून को लगाई गई और जब आप गांव में दाखिल होते हैं तो भय का माहौल साफ दिखता है।

इसी गांव की असरिता मुन्डू का नवजात शिशु अभी महीने भर का भी नहीं हुआ। वह बताती हैं कि पिछले महीने पुलिस जब यहां घुसी तो गर्भवती होने के बावजूद उसकी पिटाई की गई। असरिता कहती है कि उस दिन वह ग्रामसभा की बैठक में हिस्सा लेने जा रही थी लेकिन पुलिस ने रोक लिया। फिर उसके साथ मारपीट की।

असरिता मुन्डू कहती है कि गर्भवती होने के बावजूद पुलिस ने उनकी पिटाई की

घाघरा में ज्यादातर पुरुष कुछ पूछने पर टालमटोली करते रहे। सबको इस बात का डर है कि मीडिया में उनका नाम आया तो उन पर आफत आ सकती है। फिर भी गांव कनेक्शन की टीम ने कई गांवों का दौरा कर इस शर्त पर बहुत सारे लोगों से जानकारी जुटाई कि उनकी पहचान गुप्त रखी जायेगी।

खूंटी ज़िला पिछले करीब 10 महीनों से पत्थलगड़ी आंदोलन की वजह से चर्चा में रहा है। सरकार का विरोध करते हुये ग्रामीणों ने बाहरी लोगों के प्रवेश पर रोक लगा दी। यहां दीवारों पर लगे नारों को देखने और लोगों के बयानों से साफ है कि इस इलाके की अनदेखी ने आंदोलन का रास्ता तैयार किया।

पिछले साल जब ज़िलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक के साथ करीब 50 हथियारबंद सीआरपीएफ जवानों की टीम खूंटी के कांकी गांव में घुसी तो गांव वालों ने इन्हें घेर लिया। यह टीम गांव में बाहरी लोगों को घुसने से रोकने के लिए लगे एक नाके को हटाने गई थी। आदिवासियों ने कई घंटों तक प्रशासनिक अधिकारियों और जवानों को बिठाकर रखा। आदिवासी अपने अधिकारों और संविधान की पांचवी अनुसूची के तहत ग्रामसभा की संप्रभुता की अवहेलना को लेकर उत्तेजित थे। राज्य प्रशासन के आला अधिकारियों के दखल के बाद उत्तेजित गांव वालों ने इन्हें छोड़ा।

उसके बाद जून में कुछ कथित पत्थलगड़ी समर्थकों ने कोचांग गांव से नुक्कड़ नाटक करने गई लड़कियों को उठा लिया। इन लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ और इस मामले में प्रतिबंधित पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ऑफ इंडिया के कुछ लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इस घटना के बाद पुलिस प्रशासन और पत्थलगड़ी समर्थकों के बीच अविश्वास की खाई न केवल चौड़ी हुई बल्कि पूरे मामले में सियासी मोड़ भी आ गया।



इसके बाद पुलिस और सुरक्षा बलों की आखिरी बड़ी कार्रवाई महीना भर पहले हुई जब बीती 26 जुलाई को हुई ग्रामीणों ने कुछ जवानों को बंधक बना लिया। बीजेपी के नेता इस बात से इनकार करते हैं कि कि अब खूंटी के गांवों में किसी तरह के डर का माहौल है। खूंटी से सांसद करिया मुंडा ने गांव कनेक्शन को बताया कि भड़काने वाले लोगों की गिरफ्तारी के बाद अब शांति है। मुंडा ने कहा, "अगर जनता उनके साथ होती और इन लोगों को अपना नेता मानती तो क्या उनकी गिरफ्तारी के बाद चुप बैठती?"

रांची में एडीजी पुलिस आर के मल्लिक का कहना है, "पत्थलगड़ी की जो समस्या है उस पर अभी काबू पा लिया गया है। कुछ लोग जो ग्रामीणों को बहका कर पत्थलगड़ी की गलत व्याख्या कर उसका इस्तेमाल कर रहे थे उनकी गिरफ्तारी हुई है। उनका क्रूर चेहरा सामने आया है और असलियत का पर्दाफाश हुआ है और लोगों का भरोसा उनसे हटा है। प्रशासन के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ा है। बहुत हद तक उन्हें पहले जो लोगों का समर्थन मिल रहा था वह नहीं मिल रहा है।"

सरकार ने खूंटी के बाज़ार में जगह जगह "पत्थलगड़ी की सच्चाई" बताने वाले बैनर लगा दिए हैं।

झारखंड का खूंटी ज़िला रांची से टूटकर बना। यह गुमला, सिमडेगा, पश्चिम सिंघभूम और लातेहार जैसे इलाकों से घिरा है जो माओवाद से प्रभावित ज़िले हैं। पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएलएफआई) इस इलाके में प्रमुख रूप से सक्रिय है। लेकिन सच यह भी है कि पत्थलगड़ी जैसे हालात तैयार करने में सरकार और राजनेताओं की भूमिका भी रही है। खूंटी के गांवों में घूमने पर यह भी पता चलता है कि पत्थलगड़ी के संघर्ष में बेकसूर आदिवासी पिस रहे हैं।

पुलिस की कारर्वाई से बचने के लिये कई गांवों में लोग घर छोड़कर चले भी गए हैं। उनमें से कुछ वापस लौटे हैं। एक ऐसे ही युवक से हमारी मुलाकात खूंटी में हुई जिसने बताया कि लोगों के दिमाग में यह बात है कि हिंसा फिर कभी भी भड़क सकती है और उन्हें गांव छोड़ना पड़ेगा। यानी पुलिस और सरकार भले आदिवासियों को अपनी ओर लाने और अतिवादियों से दूर करने का दावा कर रही हो लेकिन सरकार और लोगों के बीच अविश्वास की खाई चौड़ी हो रही है।

पुलिस कार्रवाई के महीने भर बाद भी खूंटी के गांवों में डर का माहौल है।

मिसाल के तौर पर जिकीलता गांव में भी एक अजीब सी खामोशी दिखती है। जिकीलता के मुंडा (गांव के मुखिया) ने हमसे बात नहीं की। डर का माहौल ऐसा कि अपना नाम बताने से भी इनकार कर दिया और हमें वहां से चले जाने को कहा। इसी गांव के एक युवक ने हमें बताया कि पुलिस के डर से अब यहां ग्रामीण साप्ताहिक बैठक नहीं कर रहे हैं।

"हम अगर मीटिंग के लिये इकट्ठा भी होते हैं तो पुलिस तुरंत आ जाती है। ऐसा लगता है कि यहां हर ओर उनके (पुलिस के) मुखबिर फैले हुए हैं। ग्रामसभा की बैठक तो हमारा संवैधानिक अधिकार है। उस पर पाबन्दी लगाकर सरकार हमें कौन सा इंसाफ दे रही है।" अपनी पहचान गुप्त रखने की शर्त पर जिकीलता के इस युवक ने हमें बताया।

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