झारखंड: पत्थलगड़ी करने पर आदिवासियों पर देशद्रोह के मुकदमें, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जताया विरोध

झारखंड: पत्थलगड़ी करने पर आदिवासियों पर देशद्रोह के मुकदमें, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जताया विरोध

झारखंड के रांची में सोमवार को राज भवन के सामने कई जन संगठनों ने आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन और देशद्रोह कानून द्वारा दमन का विरोध किया। इस प्रदर्शन में कई सामाजिक कार्यकर्ता जुटे और उन्‍होंने अपनी मांगों से संबंध‍ित ज्ञापन राज्यपाल को सौंपा।

ज्ञापन में मांग की गई है कि, खूंटी के हजारों अज्ञात आदिवासियों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं पर देशद्रोह के आरोप पर किए गए प्राथमिकी को तुरंत रद्द किया जाए। जितने नामजाद लोगों पर प्राथमिकी दर्ज की गयी है, उसकी न्यायिक जांच करवाई जाए। किस सबूत के आधार पर इन मामलों को दर्ज किया गया था और जांच में क्या प्रमाण मिलें, सरकार इसे तुरंत सार्वजानिक करे।

घाघरा व अन्य गावों में पुलिस द्वारा की गई हिंसा की न्यायिक जांच हो और हिंसा के लिए जिम्मेवार पदाधिकारियों पर दंडात्मक कार्यवाई हो। साथ ही, पीड़ित परिवारों को मानवाधिकार उलंघन के लिए मुआवजा दिया जाए। सरकार पत्थलगड़ी किए गांव के लोगों, आदवासी संगठनों के प्रतिनिधियों एवं संवैधानिक विशेषज्ञों के साथ पत्थलों पर लिखे गए संविधान के प्रावधानों की व्याख्या पर वार्ता करे। पांचवी अनुसूची और पेसा के प्रावधानों को पूर्ण रूप से लागू किया जाए।

प्रदर्शन में आए सामाजिक कार्यकर्ता और अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज ने धरने को संबोध‍ित करते हुए कहा, ''झारखंड सरकार का पत्थलगड़ी मुहीम के प्रति रवैया आदिवासियों के वाजिब और अहिंसक मांगों के प्रति असंवेदनशिलता को दर्शाता है। खूंटी में आदिवासियों के स्वशासन की परंपरा का संरक्षण किया जाना चाहिए और उससे सीखना चाहिए।''

वहीं, राज्य की प्रसिद्ध कवि जसिन्ता केरकेट्टा ने कहा, ''सरकार को असहमति के स्वरों को देशद्रोह कहना बंद करना चाहिए. यह अभिव्यक्ति की आज़ादी पर सीधा प्रहार है।''


क्‍या है मामला?

इस मामले के बारे में पत्रकार और महिला अध‍िकार कार्यकर्ता अलोका कुजूर बताती हैं कि झारखंड के खूंटी जिले के तीन प्रखंडों (खूंटी, अर्की और मुर्हू) के कई गावों में पिछले दो सालों में मुंडा आदिवासियों ने पत्थलगड़ी की थी। पत्‍थलगड़ी के तहत गांव के बाहर एक पत्थल की स्थापना की जाती है, जिसमें विभिन्न संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या एवं ग्राम सभा द्वारा तय कुछ नियम लिखे जाते हैं। अधिकांश पत्थलों पर कुछ मूल बातें लिखी हुई हैं जैसे जल, जंगल, जमीन पर आदिवासियों का अधिकार, ग्राम सभा की सर्वोपरिता, गांव में बाहरियों के घुसने पर रोक एवं आदिवासी ही मूल निवासी हैं, जैसी बातें लिखी होती हैं। पत्थलों में कई प्रावधानों व निर्णयों की जिस रूप से व्याख्या की गई है, वह असाधारण जरूर हैं। कई व्याख्याएं शायद व्यहवारिक भी नहीं हैं। लेकिन इन व्याख्याओं पर लोगों के साथ चर्चा व विमर्श करने के बजाय राज्य सरकार ने आदिवासियों की मूल मांगों व मुद्दों को दर किनार कर के इनका दमन किया।

2018 में पुलिस ने ऐसे कई गावों में छापा मारा जहां पत्थलगड़ी की गयी थी। पुलिस पर मुर्हू प्रखंड के घाघरा गांव के लोगों व वहां के पत्थलगड़ी समारोह में आए अन्य गांव के लोगों को बेरहमी से पीटने का आरोप भी है। आरोप है कि उस वक्‍त लोगों को घर से निकाल के पीटा था। एक गर्भवती महिला की पिटाई के कारण समयपूर्व प्रसव हुआ एवं बच्ची शारीरिक रूप से विकलांग पैदा हुई। दो लोगों को पुलिस की गोली लगी जिससे एक की मृत्यु हो गयी।

पुलिस ने पत्थलगड़ी को संविधान की गलत व्याख्या बोल कर पुलिस ने कम-से-कम 30,000 अज्ञात आदिवासियों पर विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया, जिसमें देशद्रोह का मामला भी शामिल है। देशद्रोह करार दिए जाने के डर से क्षेत्र के लोग खुल के उनके अधिकारों के उल्लंघन के विषय में भी नहीं बोल पाते हैं।

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